बैंक-केंद्रित से कॉरपोरेट बॉण्ड-आधारित वित्त की ओर | 19 Feb 2026

प्रिलिम्स के लिये: केंद्रीय बजट 2026–27कॉरपोरेट बॉण्डडेरिवेटिव्सरियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (REIT)लघु एवं मध्यम उद्यम (SME)ग्रीन कॉरपोरेट बॉण्ड

मेन्स के लिये: केंद्रीय बजट 2026–27 में कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार को मज़बूत बनाने के लिये प्रस्तुत सुधार, कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार की सीमित पैठ के कारण बैंकों के समक्ष उत्पन्न प्रमुख चुनौतियाँ तथा भारत में कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार को और सुदृढ़ एवं विस्तृत करने के लिये अपेक्षित अतिरिक्त कदम।

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

केंद्रीय बजट 2026–27 में भारत के कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार को मज़बूत बनाने तथा बैंकों पर विद्यमान संरचनात्मक बोझ को कम करने के उद्देश्य से वित्तीय क्षेत्र में अनेक सुधारात्मक उपाय प्रस्तुत किये गए हैं। 

  • ये उपाय अप्रत्यक्ष रूप से इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि भारत में बैंक ऐसे जोखिमों का वहन कर रहे हैं, जिन्हें विकसित अर्थव्यवस्थाओं में सुविकसित वित्तीय बाज़ारों द्वारा अवशोषित तथा व्यापक रूप से वितरित किया जाता है।

सारांश 

  • बजट 2026 में भारत के अपेक्षाकृत उथले कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार (जो सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 15–16% है) को मज़बूत बनाने हेतु मार्केट-मेकिंग, डेरिवेटिव तथा गारंटी कोष की शुरुआत की गई है। 
  • वर्तमान में बैंक अत्यधिक बोझ वहन कर रहे हैं, क्योंकि वे कुल कॉरपोरेट ऋण का लगभग 60–65% वहन करते हैं। इसके परिणामस्वरूप परिसंपत्ति-देयता असंतुलन की समस्या उत्पन्न हुई है तथा वर्ष 2017 से अब तक लगभग 3.2 लाख करोड़ रुपए के पुनर्पूंजीकरण की आवश्यकता पड़ी है। 
  • प्रस्तावित सुधारों का उद्देश्य ऋण जोखिम को बाज़ार तंत्र के माध्यम से व्यापक रूप से वितरित करना, तरलता में सुधार लाना तथा सतत अवसंरचना वित्तपोषण के लिये REIT के माध्यम से CPSE परिसंपत्तियों के मुद्रीकरण को प्रोत्साहित करना है।

केंद्रीय बजट 2026–27 में कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार को मज़बूत बनाने के लिये कौन-से सुधार प्रस्तुत किये गए हैं? 

  • मार्केट-मेकिंग फ्रेमवर्क: कॉरपोरेट बॉण्ड के लिये निरंतर द्विपक्षीय उद्धरण (क्रय एवं विक्रय) उपलब्ध कराने हेतु नामित मध्यस्थों की व्यवस्था की गई है, जिन्हें बॉण्ड सूचकांकों पर डेरिवेटिव साधनों तथा वित्तपोषण तक बेहतर पहुँच द्वारा समर्थित किया जाएगा। 
  • टोटल-रिटर्न स्वैप्स (TRS): ऐसे सिंथेटिक व्यापारिक साधनों की शुरुआत की गई है, जो निवेशकों को मूल परिसंपत्ति का स्वामित्व लिये बिना किसी बॉण्ड के कुल प्रतिफल (ब्याज तथा मूल्य परिवर्तन) में सहभागिता का अवसर प्रदान करते हैं, जिससे जोखिम बचाव-व्यवस्था में सुविधा मिलती है। 
  • बॉण्ड-इंडेक्स डेरिवेटिव्स: कॉरपोरेट बॉण्ड सूचकांकों पर आधारित डेरिवेटिव साधनों के माध्यम से सहभागिता का दायरा विस्तृत किया गया है तथा जोखिम प्रबंधन को सुदृढ़ किया गया है, जिससे स्थिर आय बाज़ार की व्यापकता में वृद्धि होगी। 
  • अवसंरचना जोखिम गारंटी कोष: अवसंरचना परियोजनाओं के विकास एवं निर्माण चरणों के दौरान ऋणदाताओं को विवेकपूर्ण रूप से विनियमित आंशिक ऋण गारंटी प्रदान करने की व्यवस्था की गई है। 
  • CPSE परिसंपत्ति मुद्रीकरण: केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (CPSE) की अल्प-उपयोगित रियल एस्टेट होल्डिंग्स को समर्पित रियल एस्टेट निवेश ट्रस्ट (REIT) के माध्यम से बाज़ार में लाकर पूंजी पुनर्चक्रण को गति देने का प्रावधान किया गया है। 
  • अवसंरचना जोखिम न्यूनीकरण: निजी क्षेत्र के डेवलपर्स का विश्वास सुदृढ़ करने, परियोजनाओं की बैंक-योग्यता बढ़ाने तथा उच्च-जोखिम वाले क्षेत्रों में निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु वित्तपोषण संबंधी बाधाओं को कम करने का प्रयास किया गया है।

कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार की सीमित पैठ के कारण बैंकों के समक्ष उत्पन्न प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं? 

  • जोखिम का संरचनात्मक अतिभार: गहन कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार के अभाव में बैंक ऋण जोखिम के डिफाॅल्ट भंडारगृह के रूप में कार्य करने के लिये विवश हैं। वे गैर-वित्तीय कॉरपोरेट ऋण का लगभग 60–65% वहन करते हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में यह अनुपात लगभग 30% है। 
  • गंभीर परिसंपत्ति-देयता असंतुलन: बैंकों को दीर्घ-परिपक्वता वाली अवसंरचना परियोजनाओं, जैसे– राजमार्ग एवं विद्युत संयंत्र का वित्तपोषण अल्पकालिक जमाओं के माध्यम से करना पड़ता है, जिससे प्रणालीगत आघातों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है। 
  • आवर्ती राजकोषीय निर्भरता: निजी क्षेत्र के ऋण घाटे के संचय ने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक पुनर्पूंजीकरण (2017 से 3.2 लाख करोड़ रुपये से अधिक) को आवश्यक बना दिया है, जिससे प्रभावी रूप से निजी हानि सार्वजनिक बैलेंस शीट पर स्थानांतरित हो गई है । 
  • सीमित ऋण प्रदान करने की क्षमता (अवसर लागत): दीर्घकालिक कॉर्पोरेट ऋणों में बँधी हुई पूंजी, पूंजी शोधन (capital clean-ups) के उपरांत भी, लघु एवं मध्यम उद्यमों (SMEs), निर्यातकों तथा प्रथम बार ऋण लेने वाले उधारकर्त्ताओं जैसे उत्पादक क्षेत्रों हेतु निधियों की उपलब्धता को सीमित कर देती है। 
  • मौद्रिक नीति संचरण में बाधा: दीर्घकालिक ऋण जोखिमों के कारण बैंक दरों को सुचारु रूप से समायोजित करने में अनिच्छुक होते हैं - उच्च लागतों को ग्राहकों पर डालने में संकोच करते हैं अथवा दरों में गिरावट आने पर नए ऋण देने से विवश होते हैं - जिससे नीतिगत संकेतों का संचरण विकृत हो जाता है । 

भारत में कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार की स्थिति 

  • .प्रभावशाली विकास पथ: भारत के कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार में उल्लेखनीय विस्तार देखा गया है, जो वित्त वर्ष 2015 में 17.5 ट्रिलियन रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 53.6 ट्रिलियन रुपये हो गया है, जिसमें लगभग 12% की CAGR वृद्धि हुई है, जो कॉर्पोरेट वित्तपोषण पैटर्न में क्रमिक बदलाव का संकेत देता है । 
  • अंतर्राष्ट्रीय मानकों की तुलना में सतही: विकास के बावजूद बाज़ार जीडीपी का केवल 15-16% है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका (80% से अधिक)दक्षिण कोरिया (79%) जर्मनी (55-60%), मलेशिया (54%) और चीन (45-50%) जैसी अर्थव्यवस्थाओं से पीछे है। 
  • केंद्रित निर्गम संरचना: बाज़ार में निजी प्लेसमेंट (98% निर्गम) और शीर्ष रेटिंग वाले (AAA/AA) उधारकर्त्ताओं का वर्चस्व है, जो सीमित गहराई और जोखिम विविधीकरण को दर्शाता है  
  • सीमित भागीदारी आधार: महत्त्वपूर्ण वर्गों की भागीदारी न्यूनतम बनी हुई है - खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी 2% से कम है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की उपस्थिति भी सीमित है, जबकि MSME बॉण्ड बाज़ार तक पहुँच से काफी हद तक वंचित हैं। 
  • गंभीर तरलता संबंधी बाधाएँ: बीमा कंपनियों और पेंशन फंडों जैसे संस्थागत निवेशकों द्वारा अपनाए गए "खरीदो और रखो" दृष्टिकोण के कारण द्वितीयक बाज़ार कम वार्षिक कारोबार अनुपात (0.3) से ग्रस्त है, जो मूल्य निर्धारण और बाज़ार दक्षता में बाधा उत्पन्न करता है। 
  • भविष्य की क्षमता: भारत के कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार में वर्ष 2030 तक 100-120 ट्रिलियन रुपये से अधिक होने की क्षमता है, जो वित्तीय स्थिरता और आर्थिक विकास का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरेगा । 

भारत में कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार को और अधिक मज़बूत बनाने के लिये कौन-से कदम उठाने की आवश्यकता है? 

  • कॉर्पोरेट बॉण्ड रेपो बाज़ार की स्थापना: कॉर्पोरेट बॉण्ड के लिये एक समर्पित, केंद्रीय रूप से स्वीकृत रेपो बाज़ार स्थापित करना, जिससे धारक अपने बॉण्ड पोर्टफोलियो के आधार पर ऋण प्राप्त कर सकें। इससे कॉर्पोरेट बॉण्ड "खरीदें और रखें" वाले साधनों से सक्रिय संपार्श्विक में परिवर्तित हो जाएंगे, जिससे तरलता में नाटकीय रूप से सुधार होगा और लीवरेज्ड ट्रेडिंग रणनीतियों को सक्षम बनाया जा सकेगा। 
  • ESG बॉण्ड के लिये "ग्रीनियम" प्रोत्साहन योजना शुरू करना: प्रमाणित ग्रीन कॉर्पोरेट बॉण्ड में निवेश करने वाले बैंकों को कम लिस्टिंग शुल्कत्वरित अनुमोदन प्रक्रिया या कम आरक्षित आवश्यकता जैसे नियामक प्रोत्साहन प्रदान करना। इससे वैश्विक ESG मांग को पूरा किया जा सकेगा और एक विशिष्ट, तरल ग्रीन कॉर्पोरेट बॉण्ड सेगमेंट का निर्माण होगा। 
  • अवसंरचना परियोजनाओं के लिये "केवल बॉण्ड-आधारित" वित्तपोषण अनिवार्य करना: धीरे-धीरे यह अनिवार्य करना कि नई अवसंरचना परियोजनाओं के वित्तपोषण का एक निश्चित प्रतिशत (जैसे– 20-30%) बैंक ऋणों के बजाय सार्वजनिक बॉण्ड जारी करके एकत्रित किया जाए। इससे बॉण्ड जारीकर्त्ताओं को परियोजना की शुरुआत से ही बाज़ार-अनुशासित, मूल्यांकित और व्यापार योग्य साधन बनाने के लिये बाध्य होना पड़ेगा। 
  • "कॉर्पोरेट बॉण्ड क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप" (CDS) इंडेक्स लॉन्च करना: इससे निवेशकों को व्यक्तिगत बॉण्ड चुने बिना व्यापक बाज़ार जोखिम से बचाव करने अथवा कॉर्पोरेट क्रेडिट चक्र पर विचार करने की सुविधा प्राप्त होगी, जिससे मैक्रो-ओरिएंटेड निवेशकों का एक नया वर्ग आकर्षित होगा। 
  • रिटेल-केंद्रित "कॉरपोरेट बॉण्ड बचत प्रमाणपत्र" लॉन्च करना: एक सरल, कम मूल्य श्रेणी वाले कॉरपोरेट बॉण्ड के उत्पाद को डिज़ाइन करना, जिसमें कर संबंधी लाभ (टैक्स-सेविंग फिक्स्ड डिपॉज़िट के समान) हों, लेकिन यह हाई-रेटिंग वाले कॉरपोरेट्स के विविध समूहों से जुड़ा हो। यह प्रत्यक्ष रूप में घरेलू बचत को कॉरपोरेट ऋण की ओर ले जाएगा और साथ ही रिटेल की मांग को बढ़ावा देगा। 

निष्कर्ष 

बजट 2026 दीर्घकालिक वित्त के लिये बैंकों पर भारत की अत्यधिक निर्भरता को दूर करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक है। अभिनव वित्तीय उपकरणों और जोखिम-साझाकरण तंत्र के माध्यम से कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार को गहरा करके इन सुधारों का लक्ष्य अधिक लचीला वित्तीय ढाँचा तैयार करना है। इसकी सफलता निरंतर कार्यान्वयन और रिटेल निवेशकों तथा विदेशी निवेशकों की व्यापक भागीदारी पर निर्भर करेगी। 

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. "भारत की वित्तीय प्रणाली संरचनात्मक रूप से बैंक-केंद्रित बनी हुई है।" बैंकों के समक्ष शैलो कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ारों से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का परीक्षण कीजिये। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

1. भारत के कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार का वर्तमान आकार क्या है? 
भारत का कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार वित्त वर्ष 2015 में 17.5 ट्रिलियन रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 53.6 ट्रिलियन रुपये हो गया है, जो लगभग 12% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है। 

2. भारत के कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार की डेप्थ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कैसे तुलना करती है? 
सकल घरेलू उत्पाद के 15-16% पर भारत का बाज़ार अमेरिका (80% से अधिक), दक्षिण कोरिया (79%), जर्मनी (55-60%) और चीन (45-50%) की तुलना में काफी उथला है। 

3. बजट 2026 में कॉर्पोरेट बॉण्ड के लिये कौन-से प्रमुख सुधार पेश किये गए हैं? 
प्रमुख सुधारों में बाज़ार-निर्माण ढाँचा, टोटल-रिटर्न स्वैप, बॉण्ड-इंडेक्स डेरिवेटिव, अवसंरचना जोखिम गारंटी कोष और रियल एस्टेट निवेश ट्रस्ट (REIT) के माध्यम से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम परिसंपत्ति मुद्रीकरण शामिल हैं। 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रारंभिक परीक्षा

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018) 

  1. पूंजी पर्याप्तता अनुपात (CAR) वह राशि है जिसे बैंकों को अपनी निधियों के रूप में रखना होता है जिससे वे, यदि खाता-धारकों द्वारा देयताओं का भुगतान नहीं करने से कोई हानि होती है, तो उसका प्रतिकार कर सकें। 
  2. CAR का निर्धारण प्रत्येक बैंक द्वारा अलग-अलग किया जाता है। 

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? 

(a)    केवल 1    

(b)    केवल 2 

(c)    1 और 2 दोनों    

(d)    न तो 1, न ही 2 

उत्तर: (a)

प्रश्न. समाचारों में प्रायः आने वाला 'बासल III (Basel III) समझौता' या सरल शब्दों में 'बासल III': (2015) 

(a) जैव विविधता के संरक्षण और धारणीय (सस्टेनेबल) उपयोग के लिये राष्ट्रीय कार्यनीतियाँ विकसित करने का प्रयास करता है 

(b) बैंकिंग क्षेत्रों के वित्तीय और आर्थिक दबावों का सामना करने के सामर्थ्य को उन्नत करने तथा जोखिम प्रबंधन को उन्नत करने का प्रयास करता है 

(c) ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने का प्रयास करता है किंतु विकसित देशों पर अपेक्षाकृत भारी बोझ रखता है 

(d) विकसित देशों से निर्धन देशों को प्रौद्योगिकी के अंतरण का प्रयास करता है ताकि वे प्रशीतन में प्रयुक्त होने वाले क्लोरोफ्लुओरोकार्बन के स्थान पर हानिरहित रसायनों का प्रयोग कर सकें 

उत्तर: (b)


मेन्स  

प्रश्न. क्या आप इस मत से सहमत हैं कि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की स्थायी संवृद्धि तथा निम्न मुद्रास्फीति के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में है? अपने तर्कों के समर्थन में कारण दीजिये। (2019)