प्रिलिम्स फैक्ट्स (14 Jan, 2026)



भारतीय लघुचित्र कला

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

स्वर्ण मंदिर ने पहाड़ी लघुचित्र कला की जन्मस्थली माने जाने वाले काँगड़ा क्षेत्र के कलाकारों को पारंपरिक तकनीकों और प्राकृतिक रंगद्रव्यों का उपयोग करते हुए गुरु गोबिंद सिंह की लगभग 200 वर्ष पुरानी एक पेंटिंग के संरक्षण/पुनर्स्थापन हेतु नियुक्त किया है।

लघुचित्र कला (Miniature Painting) क्या है?

  • परिचय: लघुचित्र कला छोटी और अत्यंत सूक्ष्म विवरण वाली चित्रकला होती है, जिसका आकार सामान्यतः 25 वर्ग इंच से अधिक नहीं होता। इसमें विषय-वस्तु को प्रायः वास्तविक आकार के 1/6 भाग में दर्शाया जाता है। इसमें पारंपरिक टेंपरा तकनीक का प्रयोग होता है, जिसमें रंगद्रव्यों को पानी और एक पायसन/इमल्शन (आमतौर पर अंडे की जर्दी) के साथ मिलाया जाता है।
    • सामान्य विशेषताओं में उभरी हुई आँखें, नुकीली नाक और पतली कमर शामिल हैं। कलाकारों ने सूक्ष्म अंकन के लिये सिंगल ब्रिसल वाले ब्रश का उपयोग किया।
  • लघुचित्र कला की शैलियाँ/प्रकार 
    • पाला कला शैली (750-1150 ई.): पूर्वी भारत के प्रारंभिक उदाहरणों में से एक, जिसे बौद्ध और वज्रायण शैली के शासकों ने संरक्षण दिया। इसकी विशेषताएँ हैं मुलायम रेखाएँ और संयमित रंग, जो ताड़ के पत्ते या वेलम/चर्मपत्र पर चित्रित किये जाते थे।
    • अपभ्रंश कला शैली: पश्चिमी भारतीय शैली के समकक्ष, जो गुजरात और मेवाड़ (राजस्थान) से संबद्ध है। प्रारंभ में जैन विषयों पर केंद्रित, बाद में वैष्णव विषयों और गीत गोविंद को शामिल किया गया।
      • मछली के आकार की उभरी आँखें, नुकीली नाक और दोहरी ठोड़ी के लिये प्रसिद्ध।
    • दिल्ली सल्तनत काल: इस दौरान ईरानी और जैन परंपराओं से प्रेरणा लेते हुए एक 'इंडो-पर्शियन' (भारत-फारसी) शैली विकसित हुई। इसके प्रमुख केंद्रों में मांडू और जौनपुर शामिल थे। यह शैली मुगल, राजपूत और दक्कन शैलियों से पहले की शैली थी।
    • मुगलकालीन लघु चित्रकला: इसमें पर्शियन/फारसी-प्रेरित शैली का प्रवेश हुआ, जिसमें दरबारी दृश्य और शिकार जैसे धर्मनिरपेक्ष विषयों पर अधिक ध्यान दिया गया। इसकी एक प्रमुख विशेषता ‘फोरशॉर्टनिंग’ तकनीक थी, जिसमें वस्तुएँ वास्तविक आकार की तुलना में अधिक निकट तथा छोटी दिखाई जाती हैं।
      • अकबर: तस्वीरखाना की स्थापना की। फारसी और भारतीय शैलियों का समन्वय किया। तूतीनामा और हमज़ानामा जैसी पांडुलिपियों का चित्रांकन कराया।
      • जहाँगीर: यहाँ प्राकृतिक यथार्थवाद का चरम उत्कर्ष देखने को मिलता है, जिसमें वनस्पति और जीव-जंतुओं के चित्रण पर विशेष बल दिया गया। उस्ताद मंसूर इस काल के प्रसिद्ध चित्रकार थे।
      • शाहजहाँ: यूरोपीय प्रभाव का समावेश किया, पेंसिल स्केचिंग की शुरुआत की तथा स्वर्ण और रजत रंगों का व्यापक प्रयोग किया।
    • राजपूत चित्रकला शैलियाँ: इनमें मेवाड़, किशनगढ़, बूँदी, आमेर-जयपुर और मारवाड़ शामिल हैं। इनके प्रमुख विषय रामायण, महाभारत, भागवत पुराण तथा रागमाला (रागों की माला) से लिये गए हैं।
      • मेवाड़: चित्रकार साहिबदीन का प्रभुत्व रहा। रागमाला चित्रों के लिये प्रसिद्ध।
      • किशनगढ़: राजा सावंत सिंह और बणी-ठणी से जुड़ा, चित्रकार निहाल चंद द्वारा चित्रित।
    • पहाड़ी शैली: हिमालयी राज्यों (जम्मू, बासोली, काँगड़ा) से उत्पन्न।
      • बासोली शैली: इसमें बोल्ड रेखाएँ और लाल एवं पीले जैसे चमकदार प्राथमिक रंगों की विशेषता है और यह रसमंजरी और रामायण जैसे विषयों को चित्रित करती है।
      • गुलेर–काँगड़ा शैली: यह अपनी सूक्ष्म प्रकृतिवादी अभिव्यक्ति और प्रेमप्रधान कृष्ण-लीलाओं के लिये प्रसिद्ध है। 
      • इसमें गीत गोविंद, भागवत पुराण, नल–दमयंती  तथा बारहमासा  जैसे काव्यात्मक एवं धार्मिक विषयों का चित्रण किया गया है।
      • कुल्लू-मंडी शैली: एक लोक शैली, जिसमें बोल्ड चित्रांकन और गहरे रंगों का प्रयोग होता है।
    • औपनिवेशिक और आधुनिक विकास:
      • कंपनी चित्रकला: राजपूत, मुगल और भारतीय शैलियों का मिश्रण, जिसमें यूरोपीय यथार्थवाद की झलक थी; ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा कमीशन कराया गया।
      • बंगाल शैली (20वीं सदी में शुरुआत): एक उपनिवेशवाद विरोधी शैली; इसमें सरल रंगों का उपयोग किया गया और भारतीय सौंदर्यशास्त्र के पुनरुद्धार को बढ़ावा दिया गया।
    • सामग्री और विषय: शुरुआती कलाकृतियाँ ताड़ के पत्तों पर, बाद में कागज़ पर चित्रित की गईं, इनमें प्राकृतिक रंगद्रव्यों (जैसे- लाजवर्द) का उपयोग किया गया। विषयवस्तुओं में - महाकाव्य, दंतकथाएँ, धार्मिक ग्रंथ, दरबारी जीवन, व्यक्ति-चित्रण और प्रेमप्रधान किंवदंतियाँ शामिल हैं।

Bani_Thani

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भारतीय कला शैली में लघु चित्रकला क्या है?
लघु चित्रकला छोटे आकार की, अत्यधिक विस्तृत कलाकृतियाँ होती हैं जिनमें टेंपेरा तकनीक का उपयोग किया जाता है, इसमें प्रायः धार्मिक ग्रंथों, दरबारी जीवन और कलात्मक विषयों को दर्शाया जाता है।

2. काँगड़ा शैली का महत्त्व क्यों है?
गुलेर-काँगड़ा शैली परिष्कृत प्रकृतिवाद और कलात्मक कृष्ण-लीलाओं का प्रतिनिधित्व करती है, जो पहाड़ी चित्रकला के शिखर को चिह्नित करती है।

3. राजपूत चित्रकला की कौन-सी शैली 'बणी-ठणी' के लिये प्रसिद्ध है?
किशनगढ़ शैली ‘बणी-ठणी’ के लिये प्रसिद्ध है, जिसकी पहचान आदर्श आकृतियों से होती है जिसमें लंबी, कमल जैसी आँखें, नुकीली ठुड्डी और विशिष्ट पार्श्व प्रोफाइल को दर्शाया जाता है, जो प्रायः राधा‑कृष्ण संबंधी विषयों को चित्रित करती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रश्न. सुप्रसिद्ध चित्र "बणी-ठणी" किस शैली का है? (2018)

(a) बूँदी शैली

(b) जयपुर शैली

(c) काँगड़ा शैली

(d) किशनगढ़ शैली

उत्तर: (d)


प्रश्न. बोधिसत्त्व पद्मपाणि का चित्र सबसे प्रसिद्ध और प्रायः चित्रित चित्रकारी है, जो: (2017)

(a) अजंता में है

(b) बदामी में है

(c) बाघ में है

(d) एलोरा में है

उत्तर: (a)


प्रश्न. कलमकारी चित्रकला निर्दिष्ट (रेफर) करती है:  (2015)

(a) दक्षिण भारत में सूती वस्त्र पर हाथ से की गई चित्रकारी

(b) पूर्वोत्तर भारत में बाँस के हस्तशिल्प पर हाथ से किया गया चित्रांकन

(c) भारत के पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में ऊनी वस्त्र पर ठप्पे (ब्लॉक) से की गई चित्रकारी

(d) उत्तर-पश्चिमी भारत में सजावटी रेशमी वस्त्र पर हाथ से की गई चित्रकारी

उत्तर: (a)


प्रश्न. निम्नलिखित ऐतिहासिक स्थलों पर विचार कीजिये: (2013)

  1. अजंता की गुफाएँ
  2. लेपाक्षी मंदिर 
  3. साँची स्तूप

उपर्युक्त स्थलों में से कौन-सा/से भित्ति चित्रकला के लिये भी जाना जाता है/जाने जाते हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 1 और 2

(c) 1, 2 और 3

(d) कोई नहीं

उत्तर: (b)


प्रश्न. प्राचीन भारत में गुप्त काल के भित्तिचित्रों के केवल दो ही ज्ञात उदाहरण हैं। इनमें से एक अजंता गुफाओं के चित्र हैं। गुप्त कालीन चित्रों का दूसरा जीवित उदाहरण कहाँ है? (2010)

(a) बाघ की गुफाएँ

(b) एलोरा की गुफाएँ

(c) लोमश ऋषि की गुफा

(d) नासिक की गुफाएँ

उत्तर: (b)


पंखुड़ी पोर्टल

स्रोत: DD

महिला और बाल विकास मंत्रालय ने पंखुड़ी पोर्टल (PANKHUDI Portal) लॉन्च किया है, जिसका उद्देश्य महिला तथा बाल विकास से संबंधित पहलों में सहयोग एवं पारदर्शिता को सुदृढ़ करना है।

  • पंखुड़ी: यह एक समेकित, एक-खिड़की वाला डिजिटल पोर्टल है, जिसे महिला और बाल विकास हेतु कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) और साझेदारी पहलों को सुगम बनाने के लिये लॉन्च किया गया है।
    • प्रौद्योगिकी-प्रधान शासन और जनभागीदारी की दृष्टि से प्रेरित पंखुड़ी सरकार, नागरिकों और संस्थानों के बीच एक पुल के रूप में कार्य करता है, ताकि पारदर्शिता, सहभागिता और विश्वास को बढ़ावा दिया जा सके।
    • यह एक सामान्य डिजिटल मंच पर व्यक्तियों, NRI, NGOs, CSR योगदानकर्त्ताओं, कॉर्पोरेट संस्थाओं और सरकारी एजेंसियों को एकीकृत करता है, ताकि स्वैच्छिक और संस्थागत योगदानों को सरल और सुव्यवस्थित किया जा सके।
  • व्याप्ति: यह पोर्टल प्रमुख विषयगत क्षेत्रों को कवर करता है, जैसे– पोषण, स्वास्थ्य, प्रारंभिक बाल्यकाल देखभाल और शिक्षा (ECCE), बाल कल्याण, संरक्षण तथा पुनर्वास एवं महिलाओं की सुरक्षा व सशक्तीकरण।
  • योगदान: इस पोर्टल के माध्यम से योगदानकर्त्ता पंजीकरण कर सकते हैं, पहलों की पहचान कर सकते हैं, प्रस्ताव जमा कर सकते हैं और अनुमोदन तथा परियोजना की प्रगति को ट्रैक कर सकते हैं, जिससे समन्वय, निगरानी एवं जवाबदेही में सुधार होता है।
    • वित्तीय पारदर्शिता और निगरानी सुनिश्चित करने हेतु सभी योगदान केवल नकदरहित माध्यमों से ही स्वीकार किये जाते हैं।
  • महत्त्व: पंखुड़ी संरचित कार्यप्रवाहों के माध्यम से प्रमुख योजनाओं, जैसे– मिशन सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0, मिशन वात्सल्य और मिशन शक्ति के क्रियान्वयन को सशक्त बनाता है।
    • इस पोर्टल से 14 लाख से अधिक आंगनवाड़ी केंद्रों, लगभग 5,000 बाल देखभाल संस्थानों, लगभग 800 वन स्टॉप सेंटर्स, 500 से अधिक सखी निवास और 400 से अधिक शक्ति सदन में सेवा वितरण में सुधार होने की संभावना है।
    • पंखुड़ी एक प्रौद्योगिकी-सक्षम, परिणाम-केंद्रित शासन मॉडल का प्रतिनिधित्व करता है, जो CSR को सुगम बनाता है, साझेदारी को मज़बूत करता है और संपूर्ण भारत में करोड़ों लाभार्थियों के लिये जीवन की सहजता को बढ़ाता है।

और पढ़ें: समेकित बाल विकास सेवा (ICDS) कार्यक्रम


रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स (RNI)

स्रोत: पीआईबी 

वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन (WIF) (एक वैश्विक, गैर-पक्षपाती एवं सेक्टर-निरपेक्ष थिंक टैंक) रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स (RNI) लॉन्च करेगा। यह उत्तरदायी शासन, सततता और वैश्विक उत्तरदायित्व के आधार पर विविध देशों का मूल्यांकन करने वाला भारत का पहला विश्व स्तरीय सूचकांक है।

  • रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स (RNI): यह विविध देशों का आकलन पारंपरिक शक्ति या GDP-केंद्रित मानकों के बजाय उत्तरदायी शासन के आधार पर करता है।
    • यह सूचकांक वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन (WIF) द्वारा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), IIM मुंबई तथा डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर के सहयोग से विकसित किया गया है।
    • यह सूचकांक पारदर्शी और वैश्विक स्रोतों से प्राप्त डेटा के आधार पर 154 देशों को कवर करता है, ताकि विश्वसनीयता और तुलनीयता सुनिश्चित की जा सके।
  • RNI के तीन प्रमुख आयाम: यह सूचकांक तीन मूल आयामों पर आधारित है–
    • आंतरिक उत्तरदायित्व: गरिमा, न्याय और नागरिक कल्याण का आकलन करता है।
    • पर्यावरणीय उत्तरदायित्व: प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जलवायु कार्रवाई का मूल्यांकन करता है।
    • बाह्य उत्तरदायित्व: शांति, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक स्थिरता में किसी देश के योगदान को मापता है।
  • महत्त्व: यह वैश्विक आकलन को आर्थिक एवं सैन्य शक्ति के पारंपरिक मानकों से पृथक् कर नैतिक शासन, सामाजिक कल्याण, पर्यावरणीय संरक्षण और अंतर्राष्ट्रीय उत्तरदायित्व पर केंद्रित करता है।
    • यह मूल्य-आधारित और मानव-केंद्रित ढाँचे को बढ़ावा देता है, जो नैतिक नेतृत्व, सतत विकास और वैश्विक शासन में सुधार संबंधी भारत की दृष्टि के अनुरूप है।

और पढ़ें:  वैश्विक शासन में देशों का नैतिक अधिकार


टेक्स-RAMPS योजना

स्रोत: द हिंदू 

वस्त्र मंत्रालय ने गुवाहाटी में आयोजित राष्ट्रीय वस्त्र मंत्रियों के सम्मेलन के दौरान, जिसकी थीम है “भारत का वस्त्र: विकास, विरासत और नवाचार की बुनाई”, अपनी नई ‘टेक्स-RAMPS’ योजना के लिये 15 राज्यों के साथ समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किये।

  • टेक्स-RAMPS (टेक्सटाइल्स फोकस्ड रिसर्च, असेसमेंट, मॉनिटरिंग, प्लानिंग एंड स्टार्ट-अप  योजना)
  • परिचय: इस योजना का उद्देश्य वस्त्र-संबंधी उत्पादों और उन पर हुए शोध की कवरेज, गुणवत्ता, समयबद्धता एवं विश्वसनीयता में सुधार करना है। यह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में वस्त्र डेटा प्रणालियों को सुदृढ़ बनाकर बेहतर योजना और निर्णय-निर्माण को सक्षम बनाती है।
  • योजना की प्रकृति: यह एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना के रूप में लागू की जाएगी, जिसे पूरी तरह वस्त्र मंत्रालय द्वारा वित्तपोषित किया जाएगा। इसकी अवधि वित्त वर्ष 2025–26 से 2030–31 तक रहेगी, जो 16वें वित्त आयोग के चक्र के अनुरूप होगी।
  • कार्यक्षेत्र और कवरेज: यह योजना प्रमुखतः वस्त्र उद्योग के प्रमुख उप-वर्गों जैसे हैंडलूम, हस्तशिल्प, परिधान और तकनीकी वस्त्रों में एकीकृत योजना को प्रोत्साहित करती है।
  • वित्तीय सहायता: प्रत्येक राज्य या केंद्रशासित प्रदेश को प्रतिवर्ष 12 लाख रुपये की वार्षिक सहायता और प्रत्येक ज़िले को प्रतिवर्ष 1 लाख रुपये दिये जाएंगे, जो ज़िला कार्ययोजनाओं के विकास और क्रियान्वयन से संबंधित होंगे।
  • मुख्य घटक: अनुसंधान और नवाचार, डेटा, एनालिटिक्स और डायग्नोस्टिक्स, इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल्स स्टैटिस्टिकल सिस्टम (ITSS), क्षमता विकास, स्टार्टअप एवं नवाचार सहयोग।
  • अपेक्षित परिणाम: इन समझौता ज्ञापनों (MoU) से सहकारी संघवाद को बढ़ावा मिलेगा, वस्त्र डेटा प्रणालियों में सुधार होगा, महत्त्वपूर्ण डेटा अंतरालों को समाप्त करने में मदद मिलेगी और साक्ष्य-आधारित योजना को गति मिलेगी। इससे भारत को 350 अरब अमेरिकी डॉलर के वस्त्र उद्योग के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।

और पढ़ें: भारत का वस्त्र उद्योग