प्रिलिम्स फैक्ट्स (09 Feb, 2026)



RBI के क्रेडिट और उपभोक्ता संरक्षण सुधार

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों, विशेषकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम ( MSME)  को प्रोत्साहित करने और डिजिटल युग में उपभोक्ता संरक्षण को मज़बूत करने के उद्देश्य से कई उपायों की शुरुआत की है।

अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों को प्रोत्साहित करने हेतु RBI ने कौन-से कदम उठाए हैं?

  • MSMEs के लिये ज़मानत ऋण की सीमा को दोगुना करना: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिये बिना ज़मानत ऋण की सीमा को ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹20 लाख करने का प्रस्ताव किया गया है। इसका उद्देश्य सक्षम छोटे व्यवसायों की वित्तीय बाधाओं को कम करना, अनौपचारिक ऋण पर उनकी निर्भरता घटाना तथा उनके विस्तार को समर्थन देना है।
  • REITs को बैंक ऋण की अनुमति: अब बैंकों को सूचीबद्ध रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REITs) को वित्तपोषण उपलब्ध कराने की अनुमति दी जाएगी। यह सुविधा पहले इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) के लिये उपलब्ध थी।
    • यह कदम बाज़ार नियामक SEBI के उस निर्णय के अनुरूप है, जिसमें REITs को इक्विटी के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिससे म्यूचुअल फंड जैसे संस्थागत निवेशकों का आकर्षण बढ़ने की संभावना है।
  • प्रस्तावित ग्राहक संरक्षण फ्रेमवर्क:  
    • कम मूल्य वाले धोखाधड़ीपूर्ण लेनदेन पर मुआवज़ा: कम मूल्य के डिजिटल धोखाधड़ी वाले लेनदेन में होने वाले नुकसान के लिये ग्राहकों को 25,000 रुपये तक मुआवज़ा देने हेतु एक नया ढाँचा प्रस्तुत किया जाएगा। इसका उद्देश्य अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन में ग्राहकों की देयता को सीमित करना है।
    • मिस-सेलिंग पर अंकुश के लिये दिशानिर्देश: बैंक काउंटरों पर बेचे जाने वाले सभी तृतीय-पक्ष वित्तीय उत्पादों (जैसे–बीमा, म्यूचुअल फंड) को ग्राहकों की आवश्यकताओं और उनकी जोखिम क्षमता के अनुरूप सुनिश्चित करने हेतु मसौदा निर्देश जारी किये जाएंगे।
    • ऋण वसूली अभिकर्त्ताओं हेतु समन्वित नियम: भारतीय रिज़र्व बैंक विभिन्न विनियमित संस्थाओं में ऋण वसूली अभिकर्त्ताओं की नियुक्ति तथा ऋण वसूली से संबद्ध आचरण के बारे में विद्यमान निर्देशों की समीक्षा और उनका सामंजस्य (हर्मोनाइज़ेशन) करेगा, ताकि वसूली की प्रक्रिया में न्यायसंगत एवं उपभोक्ता-हितैषी प्रथाएँ सुनिश्चित की जा सकें।
  • ‘मिशन सक्षम’ शहरी सहकारी बैंकों के लिये: मिशन सक्षम (सहकारी बैंक क्षमता निर्माण) प्राथमिक (शहरी) सहकारी बैंकों (UCB) के लिये क्षेत्रव्यापी क्षमता-विकास और प्रमाणन ढाँचा है। इस मिशन के अंतर्गत लगभग 1.40 लाख प्रतिभागियों को क्षेत्रीय भाषाओं में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से आच्छादित करने की योजना है।

REIT और InvIT क्या हैं?

पहलू

REIT

InvIT

परिचय

REIT ऐसे निवेश ट्रस्ट होते हैं, जो आय-सृजन करने वाली वाणिज्यिक अचल संपत्तियों, जैसे– कार्यालय परिसरों और मॉल आदि के स्वामित्व, संचालन और प्रबंधन का कार्य करते हैं तथा निवेशकों को नियमित किराया-आधारित आय के साथ पूंजी अभिमूल्यन का अवसर प्रदान करते हैं।

InvIT ऐसे निवेश ट्रस्ट हैं, जो राजमार्ग, सड़कें, विद्युत प्रसारण लाइनें, पाइपलाइन, नवीनीकरणीय ऊर्जा परिसंपत्तियाँ, टेलीकॉम टावर, डेटा सेंटर इत्यादि जैसी परिसंचालित अवसंरचनात्मक परियोजनाओं में निवेश को संभव बनाते हैं, आवश्यक अवसंरचना परिसंपत्तियों से स्थिर तथा दीर्घकालिक आय उपलब्ध कराते हैं।

प्राथमिक राजस्व स्रोत

किराए की आय, किराएदारों से प्राप्त लीज़ भुगतान तथा समय‑समय पर संपत्तियों के विक्रय से प्राप्त आमदनी

टोल, उपयोगकर्त्ता शुल्क, टैरिफ, उपलब्धता‑आधारित भुगतान या दीर्घकालिक अनुबंध (जो प्रायः विनियमित या सरकार से संबद्ध होते हैं)।

पोर्टफोलियो के लिये आवश्यकताएँ

कम-से-कम 80% निवेश पूर्णत: निर्मित, राजस्व-सृजन करने वाली परिसंपत्तियों में अधिकतम 20% तक गैर-निर्मित या अन्य प्रकार की परिसंपत्तियों में किया जा सकता है।

कम-से-कम 80% निवेश पूर्णत: निर्मित, राजस्व-सृजन करने वाली अवसंरचना परिसंपत्तियों में, गैर-निर्मित परिसंपत्तियों में सीमित निवेश की अनुमति होती है।

ऋण सीमा

संपत्ति के मूल्य का लगभग 49% तक ही ऋण की सीमा निर्धारित (अधिक सावधानीपूर्ण)।

संपत्ति के मूल्य का लगभग 70% तक ऋण लेने की अनुमति (उच्च ऋण लचीलापन)।

तरलता एवं इकाई मूल्य

कम इकाई मूल्य के साथ उच्च तरलता, जिसके कारण खुदरा निवेशकों के लिये अपेक्षाकृत अधिक सुलभ।

तरलता भिन्न‑भिन्न हो सकती है; सामान्यतः इकाई मूल्य अधिक होते हैं, व्यापार मात्रा संभवतः निम्न हो सकती है।

विनियामक ढाँचा

इनका संचालन भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स विनियम, 2014 के अधीन किया जाता है।

इनका संचालन भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स विनियम, 2014 के अधीन किया जाता है।

और पढ़ें: MSME, भारत में साइबर धोखाधड़ी, शहरी सहकारी बैंकों में प्रशासन

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. MSME ऋण की पहुँच में RBI द्वारा प्रस्तावित प्रमुख बदलाव क्या है?
RBI ने MSMEs के लिये बिना ज़मानत ऋण की सीमा ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹20 लाख करने का प्रस्ताव किया है, ताकि वित्तीय बाधाएँ कम हों और अनौपचारिक ऋण पर निर्भरता कम हो।

2. ₹25,000 मुआवज़ा ढाँचे का उद्देश्य क्या है?
यह एक उपभोक्ता संरक्षण उपाय है, जिसका उद्देश्य छोटे-मूल्य की धोखाधड़ीपूर्ण डिजिटल लेनदेन में हुए नुकसान के लिये मुआवज़ा देना और अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन में ग्राहक की देयता सीमित करना है।

3. RBI द्वारा घोषित मिशन SAKSHAM का उद्देश्य क्या है?
मिशन SAKSHAM का लक्ष्य शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) के लिये प्रशिक्षण और प्रमाणन के माध्यम से क्षेत्र-व्यापी क्षमता निर्माण करना है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रश्न. भारत के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये :

  1. ‘सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (एमएसएमईडी) अधिनियम, 2006’ के अनुसार, ‘जिनके संयंत्र और मशीन में निवेश 15 करोड़ रुपए से 25 करोड़ रुपए के बीच है, वे मध्यम उद्यम हैं’।  
  2. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को दिये गए सभी बैंक ऋण प्राथमिकता क्षेत्रक के अधीन अर्ह हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/है?

(a) केवल 1 

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों 

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (b)


प्रश्न. भारत में ‘शहरी सहकारी बैंकों’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)

  1. राज्य सरकारों द्वारा स्थापित स्थानीय मंडलों द्वारा उनका पर्यवेक्षण एवं विनियमन किया जाता है।
  2. वे इक्विटी शेयर और अधिमान शेयर जारी कर सकते हैं। 
  3. उन्हें वर्ष 1966 में एक संशोधन द्वारा बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के कार्यक्षेत्र में लाया गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1                     

(b)  केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर:(b)


दलहन आत्मनिर्भरता मिशन

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों?

दलहन आत्मनिर्भरता मिशन के लिये रोडमैप मध्य प्रदेश के सीहोर ज़िले के अमलाहा स्थित खाद्य दलहन अनुसंधान केंद्र (FLRP) में अंतिम रूप दिया गया।

दलहन आत्मनिर्भरता मिशन क्या है?

  • दलहन आत्मनिर्भरता मिशन: केंद्रीय बजट 2025–26 में इसकी घोषणा की गई थी और इसे अक्तूबर 2025 में लॉन्च किया गया। यह केंद्र-प्रायोजित योजना है, जिसकी योजना लागत ₹11,440 करोड़ है और इसका उद्देश्य वर्ष 2025–26 से 2030–31 तक दलहन आत्मनिर्भरता को हासिल करना है।
  • केंद्रित फसलें: इस मिशन में अरहर, उड़द और मसूर पर विशेष ध्यान दिया गया है, जो दैनिक उपभोग के लिये महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन वर्तमान में इनकी उत्पादन में कमी देखने को मिल रही है।
  • आवश्यकता:
    • पोषण सुरक्षा: दलहन एक “पोषण का पावरहाउस” हैं, जो भारतीय आहार में कुल प्रोटीन का 20–25% प्रदान करती हैं।
      • हालाँकि प्रति व्यक्ति खपत सिफारिश की गई 85 ग्राम प्रतिदिन से कम है, जिससे प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण और बढ़ जाता है।
    • आयात पर निर्भरता: यद्यपि घरेलू उत्पादन में 31% (वर्ष 2013-14 में 192.6 लाख टन से वर्ष 2024-25 में 252.38 लाख टन) वृद्धि हुई, भारत ने वर्ष 2023-24 में मांग पूरी करने के लिये 47.38 लाख टन दलहन आयात किया।
      • आयात को कम करना विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों को अंतर्राष्ट्रीय मूल्य अस्थिरता से सुरक्षा प्रदान करने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
  • मुख्य उद्देश्य और लक्ष्य: इस मिशन का उद्देश्य दलहन की कृषि को अतिरिक्त 35 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाना है, जिससे कुल क्षेत्रफल 310 लाख हेक्टेयर तक पहुँच सके और वर्ष 2030–31 तक उत्पादन 350 लाख टन तक बढ़ सके।
    • यह मिशन आयात में कमी, उपज सुधार, जलवायु-सहिष्णु कृषि प्रथाओं को बढ़ावा, किसानों की आय में वृद्धि और दीर्घकालिक पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • परिचालन रणनीति:
    • SATHI पोर्टल (बीज प्रमाणीकरण, पता लगाने की क्षमता और समग्र सूची): यह एक केंद्रीकृत पोर्टल है, जिसे कृषि मंत्रालय और NIC ने विकसित किया है, जो बीज के पूरे जीवनचक्र को स्वचालित करता है।
      • SATHI पोर्टल बीज के उत्पादन से लेकर प्रमाणन, लाइसेंसिंग और बिक्री तक की ट्रेसबिलिटी सुनिश्चित करता है, जिससे किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले बीजों तक पहुँच सुनिश्चित होती है।
    • सुनिश्चित खरीद: अगले चार वर्षों के लिये भाग लेने वाले राज्यों में अरहर, उड़द और मसूर की 100% खरीद सुनिश्चित की जाएगी।
      • राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (NAFED) और राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता महासंघ (NCCF) जैसी एजेंसियाँ इसे प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) के तहत नेतृत्व देंगी, ताकि न्यायसंगत मूल्य सुनिश्चित किये जा सकें तथा बाज़ार की अनिश्चितता को कम किया जा सके
    • क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण: हस्तक्षेप क्लस्टर मॉडल के अनुसार किये जाएंगे, ताकि भौगोलिक विविधीकरण और संसाधनों के कुशल उपयोग को बढ़ावा दिया जा सके।

दलहन आत्मनिर्भरता मिशन के लिये रोडमैप के प्रमुख बिंदु:

  • देश भर में 1,000 दलहन मिलें स्थापित करने का लक्ष्य है (जिसमें से 55 मध्य प्रदेश में) क्लस्टर मॉडल के तहत, प्रत्येक इकाई पर सरकारी सब्सिडी ₹25 लाख देकर स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्द्धन को प्रोत्साहित किया जाएगा।
  • क्लस्टरों में शामिल होने वाले किसानों को सीड किट्स और मॉडल फार्मिंग के लिये प्रति हेक्टेयर ₹10,000 तक सहायता प्रदान की जाएगी।

दलहन आत्मनिर्भरता के लिये नीति आयोग की सिफारिशें

  • वन ब्लॉक–वन सीड विलेज: क्लस्टर आधारित सीड हब और कृषक-उत्पादक संगठन (FPO) के माध्यम से दलहन सीड सिस्टम को सशक्त बनाने की सिफारिश की गई।
  • धान की बंजर भूमि: धान की कटाई के बाद बंजर भूमि का उपयोग दलहन कृषि के लिये करने की सिफारिश की गई।
  • आहार समावेशन: जन कल्याण कार्यक्रमों, जैसे– PDS और मिड-डे मील में दलहन को शामिल करके मांग बढ़ाने और कुपोषण दूर करने का सुझाव दिया गया।
  • प्रौद्योगिकी: जलवायु-अनुकूल, अल्पावधि किस्मों को बढ़ावा देने और डेटा-आधारित निगरानी के लिये SATHI पोर्टल का उपयोग करने की सिफारिश की गई।

दलहन से संबंधित प्रमुख तथ्य क्या हैं?

  • परिचय: दलहन फलीदार पौधों के खाद्य बीज हैं, जिन्हें केवल उनके सूखे अनाज के लिये संगृहीत किया जाता है, ये लेग्युमिनोसी परिवार से संबंधित हैं।
    • दलहन में प्रोटीन, फाइबर और पोषक तत्त्वों की मात्रा उच्च, जबकि इसमें वसा की मात्रा कम होती है, नाइट्रोजन-संयोजक फसल के रूप में ये मृदा उर्वरता को बढ़ाती हैं, सूखने पर इनकी भंडारण क्षमता दीर्घकालिक होती है।
  • जलवायु आवश्यकताएँ: दलहन के लिये तापमान 20–27°C, वार्षिक वर्षा 25–60 सेमी. और इसके लिये रेतीली–दोमट मृदा अनुकूल मृदा होती है। इसकी वर्ष भर कृषि की जाती है।
    • खरीफ: अरहर, उड़द (ब्लैकग्राम), मूंग (ग्रीनग्राम), लोबिया (काउपी), कुलथी (हॉर्सग्राम) और मोथ।
    • रबी: चना, मसूर, मटर, लैथिरस और राजमा।
    • ग्रीष्मकाल: मूंग, उड़द और काउपी।
  • वैश्विक और राष्ट्रीय स्थिति: भारत विश्व का सबसे बड़ा दलहन उत्पादक और उपभोक्ता है, जो विश्व उत्पादन में लगभग 25% योगदान देता है।
    • हालाँकि, भारत में दलहन का कुल अनाज उत्पादन में भाग वर्ष 1950 में 16% से घटकर वर्ष 2022–23 में लगभग 8% रह गया, जो दीर्घकालीन अनाज-केंद्रित नीति का संकेत है।
    • मुख्य दलहन उत्पादन क्षेत्र: मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, झारखंड, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल।
    • अध्ययन दर्शाते हैं कि वर्ष 2050 तक भारत की दालों की मांग लगभग 39 मिलियन टन होगी, जिसके लिये वार्षिक उत्पादन वृद्धि 2.2% आवश्यक है।
  • कृषि-विज्ञान एवं पर्यावरणीय लाभ: दलहन फसलें नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मृदा उर्वरता में सुधार करती हैं, मृदा की जैवविविधता को बढ़ाती हैं तथा अंतरफसली प्रणालियों को समर्थन देती हैं, जिससे वे पर्यावरणीय रूप से स्थायी बनती हैं।
    • इन्हें एक निम्न-कार्बन फसल माना जाता है, जो जलवायु-अनुकूल कृषि तथा शाकाहारी एवं पादप-आधारित आहारों की ओर बढ़ते रुझान के साथ संरेखित हैं।

Pulses

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. दलहन आत्मनिर्भरता मिशन क्या है?
यह एक केंद्र-प्रायोजित योजना है, जिसे अक्तूबर 2025 में ₹11,440 करोड़ के बजट के साथ शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य वर्ष 2025-26 से 2030-31 के दौरान दलहन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना है।

2. मिशन के तहत किन दलहन को प्राथमिकता दी गई है?
मिशन में अरहर, उड़द और मसूर को प्राथमिकता दी गई है, क्योंकि इन दलहन का उत्पादन लगातार कम है और इनकी मांग/खपत अधिक बनी हुई है।

3. मिशन के तहत उत्पादन लक्ष्य क्या हैं?
दलहन के क्षेत्र का विस्तार 310 लाख हेक्टेयर तक और उत्पादन 350 लाख टन तक वर्ष 2030-31 तक करने का लक्ष्य है।

4. मिशन में गारंटीकृत खरीद की भूमिका क्या है?
अरहर, उड़द और मसूर की 100% खरीद PM-AASHA के तहत NAFED और NCCF द्वारा की जाएगी, ताकि दामों में स्थिरता सुनिश्चित हो सके।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रिलिम्स 

प्रश्न. भारत में दालों के उत्पादन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020) 

  1. उड़द की खेती खरीफ और रबी दोनों फसलों में की जा सकती है।  
  2. कुल दाल उत्पादन का लगभग आधा भाग केवल मूंग का होता है।  
  3. पिछले तीन दशकों में जहाँ खरीफ दालों का उत्पादन बढ़ा है, वहीं रबी दालों का उत्पादन घटा है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1   

(b) केवल 2 और 3   

(c) केवल 2   

(d) 1, 2 और 3  

उत्तर: (a) 


सर्वोच्च न्यायालय ने ऑटिज़्म के लिये स्टेम सेल थेरैपी पर रोक लगाई

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के लिये स्टेम सेल थेरैपी को स्वीकृत नैदानिक परीक्षणों (Approved Clinical Trials) के बाहर नैदानिक सेवा (Clinical Service) के रूप में नहीं दिया जा सकता। साथ ही, न्यायालय ने केंद्र सरकार को स्टेम सेल अनुसंधान के लिये एक समर्पित नियामक प्राधिकरण स्थापित करने का निर्देश दिया।

  • न्यायालय ने माना कि ऐसी चिकित्सा में सुरक्षा और प्रभावकारिता के ठोस प्रमाण नहीं हैं और इसलिये यह चिकित्सकों द्वारा रोगियों को प्रदान किये जाने वाले उचित देखभाल मानकों के अनुरूप नहीं है।

स्टेम सेल क्या हैं?

  • परिचय: स्टेम सेल विशिष्ट प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं, जो रक्त, हड्डी और माँसपेशियों जैसी विशेष कोशिकाओं का निर्माण करती हैं और ऊतक पुनर्निर्माण तथा शारीरिक कार्यों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • प्रकार: 
    • भ्रूण स्टेम सेल: किसी भी प्रकार की कोशिका में परिवर्तित हो सकती हैं, इन्हें भ्रूण या कॉर्ड ब्लड से प्राप्त किया जाता है।
    • ऊतक-विशिष्ट स्टेम सेल: केवल संबंधित ऊतक की कोशिकाओं से उत्पन्न होता है, जैसे– ब्लड स्टेम सेल
    • प्रेरित भ्रूण जैसी स्टेम सेल : प्रयोगशाला में निर्मित कोशिकाएँ, जो भ्रूण स्टेम सेल की तरह व्यवहार करती हैं और अनुसंधान तथा दवा परीक्षण में उपयोग होती हैं।
  • स्टेम सेल थेरैपी: इसे पुनर्योजी चिकित्सा भी कहा जाता है और इसका उद्देश्य स्टेम सेल या उनसे उत्पन्न पदार्थों का उपयोग करके क्षतिग्रस्त या रोगग्रस्त ऊतकों की मरम्मत करना है।
    • भारत में स्टेम सेल आधारित उपचार केवल अनुमोदित क्लिनिकल ट्रायल के अंतर्गत ही अनुमति प्राप्त हैं, क्योंकि कई रोगों के लिये इसकी सुरक्षा, प्रभावशीलता और दीर्घकालिक प्रभाव पूरी तरह स्थापित नहीं हैं।
  • विनियम: भारत में स्टेम सेल थेरैपी का नियमन राष्ट्रीय स्टेम सेल अनुसंधान दिशानिर्देश, 2025 के तहत किया जाता है, जिसे भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और बायोटेक्नोलॉजी विभाग (DBT) ने संयुक्त रूप से तैयार किया है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय 

  • सूचित सहमति: सूचित सहमति की वैधता के लिये सुरक्षा, प्रभावशीलता, जोखिम और विकल्पों पर स्पष्ट वैज्ञानिक साक्ष्य आवश्यक हैं। वर्तमान में ऑटिज़्म में स्टेम सेल थेरैपी के लिये ऐसे पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, जिससे इस प्रकार का नैदानिक उपयोग नैतिक और विधिक रूप से अनुचित है।
  • रोगी की स्वायत्तता पर नैतिक सीमाएँ: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि रोगी या अभिभावक की सहमति उन उपचारों को न्यायोचित नहीं ठहरा सकती, जो वैज्ञानिक रूप से अप्रमाणित, नैतिक रूप से अनुचित या स्वीकृत चिकित्सा प्रथा के बाहर हों।
  • विधिक ढाँचे का उल्लंघन: ऐसे कार्य नई औषधि एवं नैदानिक ​​परीक्षण नियम, 2019 के साथ‑साथ भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा जारी स्‍टेम कोशिका अनुसंधान-2017 के लिये राष्‍ट्रीय दिशानिर्देश का उल्लंघन करती हैं।

ऑटिज़्म (ASD)

  • ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम विकार (ASD): यह एक जटिल न्यूरोडेवलपमेंटल कंडीशन है जो मस्तिष्क के विकास को प्रभावित करती है। इसका मुख्य लक्षण सामाजिक संपर्क, संवाद और व्यवहार में विसंगतियाँ हैं, जिसमें मस्तिष्क की क्षमताओं में व्यापक भिन्नता देखी जाती है।
  • वैश्विक स्तर पर अनुमानतः प्रत्येक 100 में लगभग 1 बच्चा ऑटिज़्म से प्रभावित है, हालाँकि कम और मध्यम आय वाले देशों में मामले अक्सर कम रिपोर्ट किये जाते हैं।
  • ऑटिज़्म का प्रारंभिक विकास आनुवंशिक और पर्यावरणीय जोखिम संबंधी कारकों के संयोजन से होता है, बाल टीकाकरण से ऑटिज़्म का जोखिम नहीं बढ़ता।
  • ऑटिज़्म से ग्रस्त व्यक्तियों में मिर्गी, अवसाद, चिंता, नींद से संबंद्ध विकार जैसी सहवर्ती स्थितियाँ पाई जा सकती हैं, जबकि उनकी बौद्धिक क्षमताएँ गंभीर ह्रास से लेकर औसत से अधिक स्तर तक विस्तृत हो सकती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. स्टेम सेल क्या हैं?
स्टेम सेल ऐसी विशेष कोशिकाएँ हैं, जो शरीर में विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं में विकसित हो सकती हैं और क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत या प्रतिस्थापन करने की क्षमता रखती हैं।

2. स्टेम सेल थेरैपी क्या है?
स्टेम सेल थेरैपी में रोगों के उपचार या प्रबंधन के लिये स्टेम सेल का उपयोग किया जाता है, जिससे क्षतिग्रस्त कोशिकाओं का पुनर्जनन किया जा सके। हालाँकि अधिकांश ऐसी थेरैपी अभी भी प्रयोगात्मक हैं।

3. ऑटिज़्म के लिये स्टेम सेल थेरैपी क्यों प्रतिबंधित है?
क्योंकि ऑटिज़्म के लिये इसकी सुरक्षा और प्रभावकारिता पर प्रमाणित वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं हैं तथा वैध सूचित सहमति सुनिश्चित नहीं की जा सकती।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

प्रिलिम्स

प्रश्न. वंशानुगत रोगों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021) 

  1. अंडों के अंतःपात्र (इन विट्रो) निषेचन से पहले या बाद में सूत्रकणिका प्रतिस्थापन (माइटोकॉन्ड्रिया रिप्लेसमेंट) चिकित्सा द्वारा सूत्रकणिका रोगों (माइटोकॉन्ड्रियल डिज़ीज़) को माता-पिता से संतान में जाने से रोका जा सकता है।  
  2. किसी संतान में सूत्रकणिका रोगों (माइटोकॉन्ड्रियल डिज़ीज़) आनुवंशिक रूप से पूर्णतः माता से जाता है न कि पिता से।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (C) 


प्रश्न. अक्सर सुर्खियों में रहने वाली ‘स्टेम कोशिकाओं’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में कौन-सा/से सही है/हैं? (2012)

  1. स्टेम कोशिकाएँ केवल स्तनपायी जीवों से ही प्राप्त की जा सकती है।  
  2. स्टेम कोशिकाएँ नई औषधियों को परखने के लिये प्रयोग की जा सकती है।  
  3. स्टेम कोशिकाएँ चिकित्सा थेरैपी के लिये प्रयोग की जा सकती हैं।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)


भारत-सेशेल्स

स्रोत: पीआईबी

हाल ही में भारत और सेशेल्स ने मुंबई में आयोजित भारत-सेशेल्स व्यवसाय गोलमेज़ वार्त्ता में समुद्री व्यापार, ब्लू इकोनॉमी क्षेत्रों और सतत विकास में सहयोग को मज़बूत करने के अवसरों पर चर्चा की। सेशेल्स के साथ भारत का संबंध महासागर (MAHASAGAR) विज़न–क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिये आपसी और समग्र प्रगति–द्वारा निर्देशित है। यह हिंद महासागर क्षेत्र में आर्थिक सहयोग, स्थिरता और सुरक्षा पर ज़ोर देता है।

  • सहयोग के पहचाने गए क्षेत्र में ब्लू इकॉनॉमी, पर्यटन, स्वास्थ्य देखभाल, औषधि उद्योग (फार्मास्यूटिकल्स), शिक्षा, कौशल विकास और वित्तीय सेवाएँ शामिल हैं।
  • यह साझेदारी भारत की नेबरहुड फर्स्ट तथा महासागर-आधारित सहयोग नीति के माध्यम से आगे बढ़ाई जा रही है, जिसमें एक शांतिपूर्ण एवं समृद्ध हिंद महासागर क्षेत्र की साझा परिकल्पना निहित है।

सेशेल्स

  • सेशेल्स 155 द्वीपों वाला एक संप्रभु द्वीपीय राष्ट्र एवं द्वीपसमूह राज्य है, जो पश्चिमी हिंद महासागर में मेडागास्कर के उत्तर-पूर्व तथा अफ्रीकी मुख्यभूमि के पूर्वी तट के समीप स्थित है।
    • सेशेल्स के द्वीप मसकेरीन पठार (Mascarene Plateau) पर अवस्थित हैं, जो हिंद महासागर में स्थित एक विस्तृत समुद्री पठार है।
  • यह अफ्रीका का सबसे छोटा तथा सबसे कम जनसंख्या वाला देश है।
  • राजधानी: विक्टोरिया (माहे द्वीप पर)।
  • भारत के लिये रणनीतिक महत्त्व: यह हिंद महासागर के महत्त्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों पर स्थित है और समुद्री डकैती-रोधी अभियानों, समुद्री सुरक्षा तथा ब्लू इकॉनॉमी में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
    • सेशेल्स भारत की SAGAR परिकल्पना तथा हिंद महासागर कूटनीति में एक प्रमुख साझेदार है।

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और पढें: भारत-सेशेल्स


विटामिन B12 पर PRIYA ट्रायल

स्रोत: द हिंदू

पुणे रूरल इंटरवेंशन इन यंग एडोलेसेंट्स (Pune Rural Intervention in Young Adolescents- PRIYA) ट्रायल के फॉलो-अप निष्कर्ष बताते हैं कि किशोरावस्था में विटामिन B12 का सेवन एपिजेनेटिक तंत्रों के माध्यम से नवजात स्वास्थ्य में सुधार करता है।

  • वर्ष 2012 से 2020 के बीच पुणे मातृ पोषण अध्ययन (PMNS) के अंतर्गत आयोजित PRIYA परीक्षण में यह आकलन किया गया कि क्या किशोरों में विटामिन B12 का स्तर बढ़ाने से व्यापक रूप से कमी वाले समुदाय में अंतरपीढ़ी मेटाबोलिक जोखिम कम किया जा सकता है।
  • अध्ययन में पाया गया कि किशोरावस्था में विटामिन B12 का सेवन नवजात शिशुओं के पोंडरल इंडेक्स (वज़न के अनुपात में ऊँचाई) को महत्त्वपूर्ण रूप से सुधारता है, जो भ्रूण विकास और जीवन के प्रारंभिक पोषण संबंधी परिणामों में सुधार को दर्शाता है।
  • ये परिणाम नीति संबंधी सिफारिशों को मज़बूती देते हैं कि किशोरों और प्रजनन आयु की महिलाओं के लिये आयरन–फोलिक एसिड पूरक कार्यक्रमों में विटामिन B12 की शारीरिक खुराक शामिल की जाए, ताकि दीर्घकालिक जनसंख्या स्वास्थ्य और मानव पूंजी को मज़बूत किया जा सके।

विटामिन B12

  • विटामिन B12 (सियानोकोबालामिन) एक जल-घुलनशील विटामिन है जिसे मानव शरीर स्वयं संश्लेषित नहीं कर सकता, यह सूक्ष्मजीवों द्वारा निर्मित होता है और मुख्यतः पशु आधारित आहार से प्राप्त किया जाता है।
  • यह लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण, DNA संश्लेषण, मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के सही कार्य के लिये आवश्यक है।
  • भारत में विटामिन B12 की कमी अत्यधिक प्रचलित है, जिसका मुख्य कारण आहार में इसकी अपर्याप्त मात्रा का होना है।
    • इस कमी के कारण एनीमिया और न्यूरोलॉजिकल विकार हो सकते हैं, जो मुख्य रूप से अपर्याप्त पोषण के कारण होते हैं और कुछ मामलों में इंट्रिंसिक फैक्टर की कमी के कारण अवशोषण में बाधा के कारण भी हो सकते हैं।

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ज़ाकिर हुसैन की जयंती

स्रोत: पीआईबी 

राष्ट्रपति ने 8 फरवरी को भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके शिक्षा और लोकतंत्र में योगदान की सराहना की।

  • परिचय: डॉ. जाकिर हुसैन का जन्म 8 फरवरी, 1897 को हुआ। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा हैदराबाद में प्राप्त की और इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अध्ययन किया, जहाँ उन्होंने अर्थशास्त्र में PhD की उपाधि प्राप्त की और जीवनपर्यंत शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता विकसित की।
  • योगदान: उन्होंने राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ की सह-स्थापना की, जो बाद में दिल्ली स्थानांतरित होकर जामिया मिल्लिया इस्लामिया बन गई।
    • उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय दोनों में कुलपति के रूप में सेवा दी, जहाँ उन्होंने समावेशी और भविष्योन्मुखी शिक्षा को प्रोत्साहित किया।
    • उनकी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी रही, उनका मानना था कि राष्ट्र निर्माण में शिक्षा की प्रमुख भूमिका है।
    • महात्मा गांधी के आग्रह पर वे वर्ष 1937 में राष्ट्रीय प्राथमिक शिक्षा समिति के अध्यक्ष बने, जिसे गांधीवादी पाठ्यक्रम विकसित करने हेतु स्थापित किया गया था।
    • वर्ष 1956 से 1958 के बीच उन्होंने संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) के कार्यकारी बोर्ड के सदस्य के रूप में सेवा दी।
  • सार्वजनिक पद: वे बिहार के राज्यपाल (1957–62) और भारत के उपराष्ट्रपति (1962–67) रहे, इससे पूर्व वे शिक्षा और प्रशासनिक क्षेत्रों में सक्रिय रहे।
  • भारत के राष्ट्रपति: डॉ. जाकिर हुसैन वर्ष 1967 से 1969 तक भारत के तीसरे राष्ट्रपति रहे और भारत के प्रथम मुस्लिम राष्ट्रपति बने
  • मृत्यु: उनका निधन 3 मई, 1969 को हुआ, वे पहले भारतीय राष्ट्रपति बने जिनका कार्यकाल में निधन हुआ, उनके उत्तराधिकारी वी.वी. गिरि बने।

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लंग्स कैंसर के उपचार हेतु दिशानिर्देश

स्रोत: पीआईबी

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने लंग्स कैंसर (फेफड़ों के कैंसर) के उपचार एवं उपशामक देखभाल हेतु राष्ट्रीय स्तर पर विकसित दिशानिर्देश जारी किये, ताकि देश भर में इस रोग से संबंधित देखभाल को मानकीकृत किया जा सके और रोगियों के परिणामों में सुधार हो।

लंग्स कैंसर के उपचार और उपशामक दिशानिर्देश

  • उद्देश्य: संपूर्ण भारत में लंग्स कैंसर के उपचार और उपशामक देखभाल के लिये एक मानकीकृत, साक्ष्य-आधारित ढाँचा प्रदान करना, जिससे सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य प्रणालियों में चिकित्सकीय प्रथाओं की असमानताओं को कम किया जा सके।
  • मुख्य विशेषताएँ: दिशानिर्देशों में 15 साक्ष्य-आधारित सिफारिशें शामिल हैं, जो उपचार और उपशामक दोनों को कवर करती हैं। इन्हें व्यवस्थित साक्ष्य संश्लेषण के माध्यम से विकसित किया गया और भारतीय स्वास्थ्य सेवा की वास्तविकताओं के अनुरूप अनुकूलित किया गया है।
  • प्रमुख क्षेत्र: प्राथमिक उपचार, उच्च जोखिम वाले समूहों के लिये सुदृढ़ स्क्रीनिंग, मानकीकृत उपचार मार्ग और उपशामक देखभाल सेवाओं पर विशेष बल।
  • संस्थागत समर्थन: इसे स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (DHR) और स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय,  (DGHS) ने प्रमुख ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञों और सहयोगी संस्थानों के साथ मिलकर विकसित किया।

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