प्रिलिम्स फैक्ट्स (04 Feb, 2026)



इलेक्ट्रॉनिक्स घटक निर्माण योजना

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों? 

केंद्रीय बजट 2026–27 में इलेक्ट्रॉनिक्स घटक निर्माण योजना (ECMS) के लिये वित्त आवंटन बढ़ाकर ₹40,000 करोड़ कर दिया गया है। यह कदम वर्ष 2030–31 तक 500 अरब अमेरिकी डॉलर के घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण पारितंत्र के निर्माण के लक्ष्य के अनुरूप है तथा इसका उद्देश्य भारत को वैश्विक स्तर पर प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक प्रमुख नेतृत्वकर्त्ता के रूप में अग्रसर करना है।

इलेक्ट्रॉनिक्स घटक निर्माण योजना से संबंधित प्रमुख तथ्य क्या हैं?

  • ECMS: इलेक्ट्रॉनिक्स घटक निर्माण योजना का प्रारंभ अप्रैल 2025 में इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा किया गया था। इसका उद्देश्य घरेलू स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं (GVCs) के साथ एकीकृत करना एवं घरेलू तथा वैश्विक निवेश को इस क्षेत्र में आकर्षित करते हुए एक स्वावलंबी इलेक्ट्रॉनिक्स घटक पारितंत्र विकसित करना है।
  • प्रोत्साहन संरचना: ECMS के अंतर्गत टर्नओवर-आधारित या पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) आधारित या  दोनों प्रकार के मिश्रित वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किये जाते हैं। इन प्रोत्साहनों का एक हिस्सा रोज़गार सृजन से भी संबद्ध है।
    • प्रोत्साहन पहले आओ–पहले पाओ के आधार पर उन इकाइयों को दिये जाते हैं जो शीघ्र उत्पादन आरंभ करने के लिये तैयार हों।
  • अवधि: योजना की कुल अवधि छह वर्ष है। टर्नओवर-आधारित प्रोत्साहन हेतु एक वर्ष की जेस्टेशन अवधि निर्धारित है, जबकि पूंजीगत व्यय आधारित प्रोत्साहन पाँच वर्षों तक उपलब्ध रहता है।
  • योजना के लक्षित क्षेत्र: 
    • सब-असेंबली: कैमरा मॉड्यूल, डिस्प्ले यूनिट
    • मूल घटक: मल्टी-लेयर PCB, कैपेसिटर, रेज़िस्टर
    • पूंजीगत उपकरण: इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण इकाइयों में प्रयुक्त मशीनरी
      पर है। ये मिलकर मोबाइल फोन के बिल ऑफ मैटीरियल (BoM) का लगभग 90% भाग बनाते हैं।
  • निवेश परिदृश्य: दिसंबर 2025 तक इस योजना के अंतर्गत ₹1.15 लाख करोड़ की निवेश प्रतिबद्धताएँ प्राप्त हुईं, जो प्रारंभिक लक्ष्य ₹59,350 करोड़ से लगभग दोगुनी हैं।
  • अनुमानित आर्थिक लाभ: ECMS से छह वर्षों में लगभग ₹10.34 लाख करोड़ के उत्पाद, 1.41 लाख प्रत्यक्ष रोज़गार तथा अनेक अप्रत्यक्ष रोज़गार अवसरों के सृजन की संभावना है।
    • पिछले एक दशक में उत्पादन में छह गुना वृद्धि के आधार पर, इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को भारत के दूसरे सबसे बड़े निर्यात उद्योग के रूप में स्थापित करने में यह योजना सहायक सिद्ध होगी।
  • इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 के साथ समन्वय: इलेक्ट्रॉनिक्स घटक निर्माण योजना इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के लिये एक सहायक तंत्र के रूप में कार्य करती है तथा देश में सामग्री, उपकरण एवं उन्नत पैकेजिंग को समाहित करने वाले समग्र इलेक्ट्रॉनिक्स–सेमीकंडक्टर पारितंत्र के निर्माण में योगदान देती है।

भारत की निर्यात सूची के एक प्रमुख घटक के रूप में इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग

  • इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में संवृद्धि: आर्थिक समीक्षा 2025–26 के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र अब भारत का तीसरा सबसे बड़ा तथा सर्वाधिक तीव्र गति से विकसित होने वाला निर्यात क्षेत्र बन गया है, जबकि वर्ष 2021–22 में यह सातवें स्थान पर था।
    • वित्त वर्ष 2026 की प्रथम छमाही में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 22.2 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जिससे यह क्षेत्र भारत की दूसरी सबसे बड़ी निर्यात श्रेणी बनने की दिशा में अग्रसर है।
    • इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में छह गुना वृद्धि दर्ज की गई है, जो 2014–15 में ₹1.9 लाख करोड़ से बढ़कर 2024–25 में ₹11.3 लाख करोड़ तक पहुँच गया।
    • भारत वर्तमान में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है, जहाँ पिछले एक दशक में मोबाइल फोन उत्पादन में 28 गुना वृद्धि हुई है।
  • रोज़गार सृजन: इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र ने पिछले 11 वर्षों में लगभग 25 लाख रोज़गार अवसरों का सृजन किया है, जिससे यह क्षेत्र समावेशी आर्थिक संवृद्धि का एक प्रमुख चालक बनकर उभरा है।

सहयोगी नीतिगत ढाँचा

  • उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: यह योजना 14 क्षेत्रों को आच्छादित करती है। वर्ष 2020 के पश्चात इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में आए लगभग 4 अरब अमेरिकी डॉलर के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में से लगभग 70% PLI लाभार्थी इकाइयों से संबद्ध है।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नीति:  इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र में 100% FDI की अनुमति (प्रासंगिक विधानों एवं विनियमों के अधीन) ने वैश्विक निवेश आकर्षण को सुदृढ़ किया है।
  • संशोधित इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर (EMC 2.0) योजना: यह योजना विश्वस्तरीय अवसंरचना के विकास पर केंद्रित है, जिससे बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा मिलता है।
  • इलेक्ट्रॉनिक घटक एवं सेमीकंडक्टर विनिर्माण प्रोत्साहन योजना (SPECS): यह योजना उच्च-मूल्य वाले इलेक्ट्रॉनिक घटकों के लिये पूंजीगत व्यय पर 25% वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है।
  • राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स नीति (NPE) 2019: यह एक समग्र नीति है, जिसका उद्देश्य भारत को इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम डिज़ाइन एवं विनिर्माण (ESDM) का वैश्विक केंद्र बनाना है।
  • वित्तीय प्रोत्साहन (केंद्रीय बजट 2026–27): बजट में माइक्रोवेव ओवन के इनपुट्स पर मूल सीमा प्रशुल्क (BCD) से छूट तथा इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के पुर्ज़ों पर सामाजिक कल्याण अधिभार से छूट की घोषणा की गई, जिससे क्षेत्र की लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार हुआ है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. इलेक्ट्रॉनिक्स घटक निर्माण योजना क्या है?
इलेक्ट्रॉनिक्स घटक निर्माण योजना इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा अप्रैल 2025 में प्रारंभ की गई एक योजना है। इसका उद्देश्य टर्नओवर-आधारित तथा पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) आधारित प्रोत्साहनों के माध्यम से एक स्वावलंबी इलेक्ट्रॉनिक घटक विनिर्माण पारितंत्र का निर्माण करना है।

2. इलेक्ट्रॉनिक्स घटक निर्माण योजना की अवधि एवं प्रोत्साहन ढाँचा क्या है?
इस योजना की कुल अवधि छह वर्ष है। इसमें टर्नओवर-आधारित प्रोत्साहन हेतु एक वर्ष की जेस्टेशन अवधि निर्धारित है, जबकि कैपेक्स-आधारित प्रोत्साहन पाँच वर्षों के लिये उपलब्ध हैं। प्रोत्साहनों का एक हिस्सा रोज़गार सृजन से भी संबद्ध है।

3. इलेक्ट्रॉनिक्स घटक निर्माण योजना के अंतर्गत किन क्षेत्रों को लक्षित किया गया है?
इस योजना के अंतर्गत सब-असेंबली, मूल (बेयर) घटक तथा पूंजीगत उपकरणों को लक्षित किया गया है, जो संयुक्त रूप से मोबाइल फोन के बिल ऑफ मैटीरियल (BoM) का लगभग 90% हिस्सा बनाते हैं।

4. निर्यात और रोज़गार के संदर्भ में इलेक्ट्रॉनिक्स घटक निर्माण योजना क्यों महत्त्वपूर्ण है?
इस योजना से ₹10 लाख करोड़ से अधिक के उत्पाद, 1.41 लाख प्रत्यक्ष रोज़गार अवसरों का सृजन होने की अपेक्षा है। साथ ही, यह इलेक्ट्रॉनिक्स को भारत से निर्यात की दूसरी सबसे बड़ी श्रेणी के रूप में स्थापित करने में सहायक होगी।

5. इलेक्ट्रॉनिक्स घटक निर्माण योजना अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स नीतियों के लिये किस प्रकार एक पूरक के रूप में कार्य करती है?
यह योजना उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI), इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0, EMC 2.0, SPECS तथा राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स नीति (NPE) 2019 के साथ समन्वय में संचालित है और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला को समग्र रूप में सुदृढ़ बनाती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स

प्रश्न निम्नलिखित में से किसके अंगीकरण को प्रोत्साहित करने के लिये ''R2 'व्यवहार संहिता (R2 कोड ऑफ प्रैक्टिसे) साधन उपलब्ध कराती है? (2021)

(A) इलेक्ट्राॅनिक पुनर्चक्रण उद्योग में पर्यावरणीय दृष्टि से विश्वसनीय व्यवहार
(B) रामसर कन्वेंशन के अंतर्गत 'अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्र भूमि' का रिस्थितिक प्रबंधन
(C) निम्नीकृत भूमि पर कृषि फसलों की खेती का संधारणीय व्यवहार
(D) प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में 'पर्यावरणीय प्रभाव आकलन

उत्तर: (A)


मज़दूरी संहिता, 2019

स्रोत: द हिंदू

सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने राज्यों से आग्रह किया है कि वे “उचित व्यवस्था और तंत्र” विकसित करें और घरेलू कामगारों को न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 तथा मज़दूरी संहिता अधिनियम, 2019 के तहत कानूनी संरक्षण और लाभों के दायरे में लाने पर अंतिम निर्णय लें।

मज़दूरी संहिता अधिनियम, 2019 क्या है?

  • परिचय: मज़दूरी संहिता अधिनियम, 2019 एक महत्त्वपूर्ण श्रम सुधार है, जिसका उद्देश्य उचित मज़दूरी, सामाजिक न्याय, अनुपालन में सुगमता और रोज़गार सृजन सुनिश्चित करना है। इसके तहत वेतन से संबंधित कई कानूनों को समेकित कर पूरे भारत में एक समान तथा एकीकृत कानूनी ढाँचा स्थापित किया गया है।
    • यह एकल पंजीकरण, एकल लाइसेंस तथा एकल रिटर्न की व्यवस्था को प्रोत्साहित करता है। इसके परिणामस्वरूप नियमों की संख्या 163 से घटकर 58, प्रपत्र 20 से घटकर 6 और रजिस्टर 24 से घटकर केवल 2 रह गए हैं।
  • उत्पत्ति: इनका अधिनियमन द्वितीय राष्ट्रीय श्रम आयोग (2002) की सिफारिशों के आधार पर किया गया है, ताकि 29 कानूनों को चार कार्यात्मक संहिताओं में समेकित किया जा सके, जो इस प्रकार हैं: मज़दूरी संहिता, 2019, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 और उपजीविकाजन्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता, 2020।

Code_of_Wages,_2019_for_Domestic_Workers

  • उद्देश्य: इसका लक्ष्य श्रमिकों के संरक्षण और नियोक्ताओं के लिये अनुपालन की सुगमता के बीच संतुलन स्थापित करना है, ताकि सम्मानजनक रोज़गार के माध्यम से आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा दिया जा सके।
  • श्रमिक के पक्ष में सुधार एवं मुख्य प्रावधान:
    • न्यूनतम मज़दूरी का सार्वभौमीकरण (धारा 5): इसके अंतर्गत संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के सभी श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी का वैधानिक अधिकार प्रदान किया गया है, जिससे कवरेज लगभग 30% से बढ़कर 100% तक हो जाता है।
    • राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम  वेतन की शुरुआत (धारा 9): इसके अंतर्गत केंद्र सरकार को जीवन स्तर के आधार पर एक आधारभूत न्यूनतम वेतन निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है; राज्य सरकारें इससे कम वेतन तय नहीं कर सकतीं।
    • न्यूनतम वेतन का निर्धारण: कौशल, भौगोलिक क्षेत्र और कार्य के आधार पर उपयुक्त सरकार द्वारा दरें तय की जाएँगी तथा सामान्यतः प्रत्येक 5 वर्ष में पुनरीक्षित की जाएँगी।
    • वेतन भुगतान की समयबद्ध सीमा (धारा 17): यह सभी कर्मचारियों पर बिना किसी वेतन सीमा के लागू होता है। वेतन भुगतान के लिये कड़ी समय-सीमा के प्रावधान हैं (जैसे– मासिक वेतन अगले माह की 7 तारीख तक; सेवा समाप्ति की स्थिति में 2 कार्य दिवसों के भीतर भुगतान)।
    • काम के घंटों की जानकारी (धारा 13): कार्य को 48 घंटे प्रति सप्ताह और अधिकतम 12 घंटे प्रतिदिन (आराम की अवधि सहित) तक सीमित करता है।
      • धारा 14 सामान्य वेतन दर के दो गुना की दर से ओवरटाइम के भुगतान को अनिवार्य बनाती है।
    • भुगतान और रोज़गार का प्रमाण (धारा 50): इसके अंतर्गत असंगठित क्षेत्र सहित सभी श्रमिकों को वेतन पर्ची जारी करना अनिवार्य किया गया है।
  • रोज़गार और अनुपालन संबंधी सुधार:
    • अपराधों का गैर-अपराधीकरण और संयोजन (धारा 56): जिन मामलों में केवल जुर्माने से दंड देना प्रथम अपराध हो, उनमें कारावास जैसी आपराधिक सज़ाओं के स्थान पर दीवानी दंड (श्रेणीबद्ध मौद्रिक ज़ुर्माना) का प्रावधान किया गया है।
      • इसमें ऐसी कंपाउंडिंग (समझौता-निपटान) व्यवस्था का प्रावधान किया गया है, जिसके अंतर्गत ऐसे अपराधों का निस्तारण अधिकतम जुर्माने की 50% राशि का भुगतान करके किया जा सकेगा।
    • निरीक्षक-सह-सुविधादाता (धारा 51): ‘इंस्पेक्टर राज’ की जगह पारदर्शी, वेब-आधारित यादृच्छिक निरीक्षण प्रणाली और सहायक (फैसिलिटेटिव) भूमिका लागू की गई है।
    • नियोक्ता की परिसंपत्तियों का संरक्षण (धारा 64): नियोक्ता की सरकारी जमा राशि/देयता को न्यायालयीय कुर्की से सुरक्षित रखता है, सिवाय उन देनदारियों के जो कर्मचारियों के प्रति हों।
  • लैंगिक समावेशन और सामाजिक न्याय:
    • लैंगिक भेदभाव का निषेध (धारा 3): समान या समान प्रकृति के कार्य के लिये भर्ती, मज़दूरी अथवा सेवा-शर्तों में लैगिंक (जिसमें ट्रांसजेंडर भी शामिल हैं) के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।
    • सलाहकार बोर्डों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व (धारा 42): यह सुनिश्चित करता है कि केंद्रीय और राज्य सलाहकार बोर्डों के कम-से-कम एक-तिहाई सदस्य महिलाएँ हों। ये बोर्ड न्यूनतम मज़दूरी निर्धारण तथा महिलाओं के लिये रोज़गार के अवसर बढ़ाने पर परामर्श देते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. मज़दूरी संहिता, 2019 क्या है?
यह एक समेकित श्रम कानून है, जो पूरे भारत में सार्वभौमिक न्यूनतम मज़दूरी, उचित पारिश्रमिक तथा अनुपालन में आसानी सुनिश्चित करने के लिये मज़दूरी से संबंधित चार अधिनियमों को एकीकृत करता है।

2. मज़दूरी संहिता, 2019 के अंतर्गत किन कानूनों को समाहित किया गया है?
मज़दूरी भुगतान अधिनियम, 1936; न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948; बोनस भुगतान अधिनियम, 1965 तथा समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976।

3. मज़दूरी संहिता के अंतर्गत नेशनल फ्लोर वेज  क्या है?
धारा 9 के अंतर्गत केंद्र सरकार न्यूनतम जीवन स्तर से जुड़ा एक आधारभूत वेतन निर्धारित करती है, जिससे नीचे राज्य न्यूनतम मज़दूरी तय नहीं कर सकते।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न. भारत में, निम्नलिखित में कौन एक, उन फैक्टरियों में जिनमें कामगार नियुक्त हैं, औद्योगिक विवादों, समापनों, छँटनी और कामबंदी के विषय में सूचनाओं को संकलित करता है? (2022)

(a) केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय

(b) उद्योग संवर्द्धन और आंतरिक व्यापार विभाग

(c) श्रम ब्यूरो

(d) राष्ट्रीय तकनीकी जनशक्ति सूचना प्रणाली

उत्तर:(c)


ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को लेकर चिंताएँ

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

निकोबार जनजातीय परिषद् ने आरोप लगाया है कि ₹92,000 करोड़ के ग्रेट निकोबार द्वीप मेगा-इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना के कुछ भागों के लिये जैसे-जैसे स्वीकृति मिलने का समय नज़दीक आ रहा है, वैसे ज़िला प्रशासन द्वारा उन्हें उनके पूर्वजों की जनजातीय भूमि छोड़ने के लिये दबाव बनाया जा रहा है।

  • परिषद ने प्रशासन के इस दावे को चुनौती दी है कि वन संबंधी अधिकार वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अंतर्गत लागू किये गए हैं, साथ में यह ज़ोर देकर कहा कि वन अधिकार अधिनियम की प्रक्रिया कभी शुरू ही नहीं हुई।

ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना क्या है?

    • परिचय: वर्ष 2021 में शुरू की गई ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना (GNIP) एक मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर पहल है, जिसे ग्रेट निकोबार द्वीप (GNI) पर लागू किया जा रहा है, जो अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के दक्षिणी छोर पर स्थित है।
      • परियोजना के लिये गैलेथिया बे, पेम्मया बे और नंजप्पा बे जैसे क्षेत्रों में वन भूमि के विचलन की आवश्यकता है, जो 2004 की सुनामी से पहले परंपरागत रूप से निकोबारी समुदाय के निवास क्षेत्र रहे हैं।
    • विशेषताएँ: नीति आयोग के नेतृत्व में, इस परियोजना में गैलेथिया बे पर एक ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, एक ग्रीनफील्ड टाउनशिप और गैस‑आधारित संयंत्र के साथ एक पर्यटन परियोजना शामिल है।
      • इसे अंडमान एंड निकोबार आइलैंड्स इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (ANIIDCO) द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है और यह मलक्का जलडमरूमध्य के निकट रणनीतिक रूप से स्थित है, जो हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ने वाला एक प्रमुख समुद्री मार्ग है।
    • सामरिक महत्त्व: निकोबार की स्थिति मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य के निकट होने के कारण भारत को वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिये महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्गों की निगरानी में सक्षम बनाती है, जो एक्ट ईस्ट पॉलिसी (2014) और क्वाड की इंडो‑पैसिफिक रणनीति के अनुरूप है।
      • प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट रक्षा तैनाती को सुदृढ़ करेगा, जिससे भारत की चीनी नौसेना की गतिविधियों पर नज़र रखने और क्षेत्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने की क्षमता में वृद्धि होगी।
    • आर्थिक महत्त्व: इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT) का उद्देश्य सिंगापुर और कोलंबो जैसे विदेशी बंदरगाहों पर भारत की निर्भरता को कम करना है।

    Great_Nicobar_Island

    ग्रेट निकोबार द्वीप

    • परिचय: ग्रेट निकोबार निकोबार समूह का दक्षिणतम और सबसे बड़ा द्वीप है, जो बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित है। यह अधिकांशतः उष्णकटिबंधीय वर्षावन से आच्छादित है।
      • इंदिरा प्वाइंट: ग्रेट निकोबार द्वीप पर स्थित इंदिरा प्वाइंट भारत का दक्षिणतम बिंदु है।
    • भौगोलिक विभाजन: अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में कुल 836 द्वीप हैं, जो अंडमान (उत्तर) और निकोबार (दक्षिण) में विभाजित हैं। ये द्वीप 150 किमी चौड़ी 10° चैनल से अलग हैं।
    • पर्यावरणीय महत्त्व: ग्रेट निकोबार द्वीप पर दो राष्ट्रीय उद्यान स्थित हैं, कैम्पबेल बे राष्ट्रीय उद्यान और गालाथिया राष्ट्रीय उद्यान इसके अलावा यह ग्रेट निकोबार बायोस्फीयर रिज़र्व का हिस्सा भी है।
    • जनजातियाँ: यहाँ कम संख्या में जनजातियाँ निवास करती हैं, जिनमें शॉम्पेन, ओंगे, अंडमानिया और निकोबारि शामिल हैं।

    अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

    1. ग्रेट निकोबार द्वीप कहाँ स्थित है?
    ग्रेट निकोबार द्वीप अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के दक्षिणतम हिस्से में, बंगाल की खाड़ी में स्थित है।

    2. ग्रेट निकोबार द्वीप का पारिस्थितिक महत्त्व क्यों है?
    यह उष्णकटिबंधीय वर्षावनों, स्थानिक प्रजातियों, दो राष्ट्रीय उद्यानों और ग्रेट निकोबार बायोस्फीयर रिज़र्व का पर्यावास है।

    3. ग्रेट निकोबार द्वीप पर कौन-कौन सी जनजातियाँ निवास करती हैं?
    स्थानीय जनजातियों में निकोबारि और शॉम्पेन समुदाय शामिल हैं।

    4. भारत के लिये ग्रेट निकोबार द्वीप रणनीतिक रूप से क्यों महत्त्वपूर्ण है?
    मलक्का जलसंधि के पास प्रमुख समुद्री मार्गों के निकट होने के कारण यह भारत की समुद्री सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उपस्थिति को बढ़ाता है।

    UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

    प्रिलिम्स

    प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)

    1. बैरेन द्वीप ज्वालामुखी एक सक्रिय ज्वालामुखी है जो भारतीय राज्य-क्षेत्र में स्थित है। 
    2. बैरेन द्वीप ग्रेट निकोबार के लगभग 140 किमी. पूर्व में स्थित है। 
    3. पिछली बार बैरेन द्वीप ज्वालामुखी में वर्ष 1991 में उद्गार हुआ था और तब से यह निष्क्रिय बना हुआ है।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल 1

    (b) 2 और 3

    (c) केवल 3

    (d) 1 और 3

    उत्तर: (a)


    प्रश्न. निम्नलिखित में से किनमें प्रवाल भित्तियाँ पाई जाती हैं? (2014)

    1. अंडमान और नोकोबार द्वीप समूह   
    2. कच्छ की खाड़ी   
    3. मन्नार की खाड़ी   
    4. सुंदरबन

    नीचे दिये गए कूट का उपयोग कर सही उत्तर चुनिये:

    (a) केवल 1, 2 और 3

    (b) केवल 2 और 4

    (c) केवल 1 और 3

    (d) 1, 2, 3 और 4

    उत्तर: (a)


    मणिपुर विधानसभा संवैधानिक गतिरोध

    स्रोत: द हिंदी

    मणिपुर कांग्रेस अध्यक्ष ने मणिपुर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है, जिसमें उन्होंने फरवरी 2025 में राष्ट्रपति शासन लगाने से पहले राज्यपाल द्वारा की गई असंवैधानिक कार्रवाई का आरोप लगाया है और संविधान के अनुच्छेद 174 के तहत मणिपुर विधानसभा के विघटन की मांग की है।

    • मामले की पृष्ठभूमि: मणिपुर में 60 सदस्यों वाली विधानसभा है। विधानसभा की आखिरी बैठक 12 अगस्त, 2024 को आयोजित की गई थी। 
      • संविधान के अनुच्छेद 174(1) के तहत विधानसभा की दो बैठकों के बीच का अंतराल छह माह से अधिक नहीं हो सकता। इसलिये विधानसभा को 11 फरवरी, 2025 तक बुलाना अनिवार्य था।
      • 9 फरवरी, 2025 को, मुख्यमंत्री के इस्तीफे के बाद, राज्यपाल ने समन आदेश को रद्द कर दिया और सत्र को अमान्य घोषित कर दिया।
      • फलस्वरूप विधानसभा संविधान के अनुच्छेद 174(1) के तहत निर्धारित छह महीने की अवधि के भीतर नहीं बुलाई जा सकी।
    • संवैधानिक विमर्श: याचिकाकर्त्ता का तर्क है कि विधानसभा सत्र रद्द करने से अनुच्छेद 174(1) को दरकिनार किया गया और अनिवार्य फ्लोर टेस्ट का अवसर छीना गया, जिससे संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन हुआ। इसके कारण बारहवीं मणिपुर विधानसभा संवैधानिक रूप से अस्थिर हो गई है और इसका विघटन आवश्यक है।
      • घटनाओं की यह शृंखला कथित रूप से राष्ट्रपति शासन लगाने में सहायक रही, जिससे संवैधानिक मशीनरी और राज्यपाल की विवेकाधिकारिता के दुरुपयोग को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।
    • न्यायिक प्रतिक्रिया: मणिपुर उच्च न्यायालय ने यह देखा कि यह मामला अनुच्छेद 174 की व्याख्या से जुड़ा है और यह एक महत्त्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न प्रस्तुत करता है। इस मामले को डिवीज़न बेंच में सूचीबद्ध करने के लिये मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया।
    • अनुच्छेद 174: यह राज्य विधानमंडल के सत्र, सत्रावसान और विघटन से संबंधित है। यह अनिवार्य करता है कि राज्यपाल हर छह महीने में कम-से-कम एक बार विधानसभा को बुलाएँ, ताकि दो बैठकों के मध्य अंतराल की अवधि छह माह से अधिक न हो।
      • यह अनुच्छेद राज्यपाल को विधानसभा का सत्र स्थगित करने या विधानसभा को भंग करने का अधिकार भी प्रदान करता है।

    और पढ़ें: मणिपुर में राष्ट्रपति शासन


    संरक्षणवादियों द्वारा ‘टर्टल ट्रेल’ पर चिंता

    स्रोत: द हिंदू

    केंद्रीय बजट 2026-27 में ओडिशा, कर्नाटक और केरल में प्रमुख टर्टल नेस्टिंग साइट के साथ 'टर्टल ट्रेल' विकसित करने के प्रस्ताव ने संरक्षणवादियों में चिंता उत्पन्न की है।

    • टर्टल ट्रेल विशेष तटीय मार्ग और दर्शनीय अवसंरचना हैं, जिन्हें कछुओं के नेस्टिंग साइट के आसपास नियंत्रित ईको-टूरिज़्म को बढ़ावा देने के लिये विकसित किया गया है।
    • संरक्षण विशेषज्ञों का तर्क है कि टर्टल ट्रेल की शुरुआत उन क्षेत्रों की डार्कनेस और ट्रेंक्विलिटी को खतरे में डालती है, जो मास-नेस्टिंग के लिये आवश्यक हैं। उनका मानना है कि नीतिगत प्रयासों को पर्यटन-प्रधान पहलों की बजाय ठोस संरक्षण उपायों पर केंद्रित करना चाहिये, जिसमें आवासन सुरक्षा और मत्स्याग्रह संबंधी  गतिविधियों के प्रभावी नियमन को प्राथमिकता दी जाए।

    ऑलिव रिडले कछुए

    • ऑलिव रिडले (Lepidochelys olivacea): यह सरीसृप वर्ग और चेलोनीडी कुल से संबंधित है, यह समुद्री कछुओं की सबसे छोटी प्रजाति है, जो अपने भूरे-हरे रंग और हृदयाकार आवरण से पहचानी जाती है।
    • व्यवहार (अरिबाडा): ऑलिव रिडले सर्वाहारी होते हैं और अरिबाडा नामक सामूहिक नीडन क्रिया करते हैं, जिसमें अनेक मादा कछुए एक साथ नीडन करती हैं।
      • वे प्रशांत महासागर, अटलांटिक और हिंद महासागर में 9,000 किमी. तक प्रवास करते हैं, दिसंबर से मार्च के बीच 1-3 बार अंडे देते हैं तथा प्रत्येक समूह में लगभग 100 अंडे देते हैं।
    • प्रमुख नीडन स्थल/नेस्टिंग साइट: ओडिशा का गाहिरमाथा और रुशिकुल्या ओलिव रिडले कछुओं के लिये विश्व के सबसे बड़े नीडन स्थलों में से हैं।
      • गाहिरमाथा इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज के निकटता के कारण एक सख्त प्रतिबंधित क्षेत्र है, जबकि रुशिकुल्या ने अतीत में कुछ कमियों का सामना किया है, जिससे आगंतुकों पर प्रतिबंध लगे हैं।
      • भारत में अन्य महत्त्वपूर्ण नीडन स्थलों में ओडिशा में देवी नदी का मुहाना और अंडमान द्वीप समूह शामिल हैं।
    • खतरे: प्रजनन काल के दौरान माँस, खोल और अंडों का अवैध शिकार तथा ट्रॉल और गिल नेट में आकस्मिक कैचिंग। भारत इनकी मृत्यु दर को कम करने के लिये ट्रॉल नामक जाल में टर्टल एक्स्क्लूडर डिवाइस (TED) के उपयोग को अनिवार्य करता है।
    • संरक्षण स्थिति: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (अनुसूची 1), IUCN रेड लिस्ट (सुभेद्य) और CITES (परिशिष्ट I)

    Olive_Ridley_Turtles

    और पढ़ें: ऑलिव रिडले कछुए


    भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम (CERT-In)

    स्रोत: पीआईबी 

    हाल ही में CERT-In के वर्ष 2025 के प्रदर्शन ने बढ़ते साइबर खतरों के बीच भारत के तेज़ी से फैलते डिजिटल ईकोसिस्टम को सुरक्षित रखने में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया है।

    • परिचय: भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम (CERT-In) भारत की राष्ट्रीय एजेंसी है, जो साइबर घटनाओं पर प्रतिक्रिया देती है। यह इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करती है और इसे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 द्वारा अधिकृत किया गया है।
    • कार्य: CERT-In साइबर घटनाओं, जैसे– फिशिंग, रैनसमवेयर, ऑनलाइन धोखाधड़ी, AI-सक्षम धोखाधड़ी और महत्त्वपूर्ण डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमलों को रोकने, निगरानी करने तथा उनका प्रत्युत्तर देने के लिये ज़िम्मेदार है।
      • यह BFSI (बैंकिंग, वित्तीय सेवाएँ और बीमा) क्षेत्र के लिये CSIRT-Fin तथा विद्युत् क्षेत्र हेतु CSIRT-पावर के साथ-साथ राज्य एवं क्षेत्रीय CSIRTs के नेटवर्क के माध्यम से क्षेत्रीय अनुकूलन को भी मज़बूत करता है।
    • संस्थागत ढाँचा: 'साइबर स्वच्छता केंद्र', 'राष्ट्रीय साइबर समन्वय केंद्र' (NCCC) और 'साइबर संकट प्रबंधन योजना' जैसे संस्थागत ढाँचे को आधार बनाकर CERT-In ने राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा को मज़बूत किया है तथा अपनी साइबर सुरक्षा नेतृत्व क्षमता के लिये वैश्विक मान्यता प्राप्त की है।
    • महत्त्व: विश्व आर्थिक मंच, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और फ्राँस की ANSSI द्वारा मान्यता प्राप्त, CERT-In राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और भारत के डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र में विश्वास को सुदृढ़ करता है, जो 'डिजिटल इंडिया' और साइबर सुरक्षा के दृष्टिकोण के अनुरूप है।

    CERT_In

    और पढ़ें: CERT-In को RTI अधिनियम के दायरे से छूट