एडिटोरियल (10 Jan, 2026)



भारत की ऊर्जा सुरक्षा को भविष्य-उन्मुख बनाना

यह लेख 02/01/2026 को द फाइनेंशियल एक्सप्रेस में प्रकाशित "From energy scarcity to abundance​” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। इसमें रेखांकित किया गया है कि कैसे तकनीकी नवाचार से प्रेरित होकर विश्व ऊर्जा अधिशेष के युग की ओर अग्रसर हो रहा है, जो भारत को आयातित तेल पर अपनी निर्भरता कम करने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।

प्रिलिम्स के लिये: पीएम-कुसुम, PLI योजनाएँ, हरित हाइड्रोजन, बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS), नवीकरणीय ऊर्जा

मेन्स के लिये : भारत की ऊर्जा सुरक्षा, ऊर्जा क्षेत्र के प्रमुख मुद्दे और उपाय 

भारत की ऊर्जा सुरक्षा उसकी आर्थिक स्थिरता, रणनीतिक स्वायत्तता और दीर्घकालिक विकास पथ का एक केंद्रीय निर्धारक है। विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता होने के बावजूद, भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये लगभग 85% कच्चा तेल, 50% से अधिक प्राकृतिक गैस तथा लगभग 25% कोयला आयात पर निर्भर करता है, जिससे अर्थव्यवस्था वैश्विक मूल्य अस्थिरताओं और भू-राजनीतिक जोखिमों के प्रति संवेदनशील बनी रहती है। शहरीकरण, औद्योगीकरण और बढ़ती आय के कारण वर्ष 2040 तक ऊर्जा की मांग दोगुनी होने का अनुमान है, ऐसे में प्रमुख चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि ऊर्जा की आपूर्ति सुलभ, विश्वसनीय और सतत बनी रहे। इसी संदर्भ में वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता तथा वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के लक्ष्यों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता यह स्पष्ट करती है कि समकालीन ऊर्जा सुरक्षा अब स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण, आपूर्ति स्रोतों के विविधीकरण और तकनीकी आत्मनिर्भरता से अविभाज्य हो चुकी है।

भारत के ऊर्जा संरचना की वर्तमान स्थिति क्या है?

  • ऊर्जा मांग: भारत वर्तमान में वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है और वैश्विक प्राथमिक ऊर्जा मांग में इसका योगदान लगभग 6–7% है। तीव्र शहरीकरण, औद्योगिक विस्तार, बढ़ती आय और परिवहन व घरेलू क्षेत्रों का विद्युतीकरण ऊर्जा मांग को निरंतर बढ़ा रहे हैं।
  • भारत की कुल ऊर्जा मांग के वर्ष 2040 तक लगभग दोगुनी होने की संभावना है, जिससे ऊर्जा उपलब्धता एक केंद्रीय विकासात्मक मुद्दा बन जाती है।
  • प्राथमिक ऊर्जा मिश्रण: भारत की कुल प्राथमिक ऊर्जा खपत में विभिन्न ईंधन स्रोत शामिल हैं, जो उद्योग, परिवहन, आवासीय और वाणिज्यिक क्षेत्रों में पारंपरिक तथा आधुनिक ऊर्जा आवश्यकताओं को प्रतिबिंबित करते हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के नवीनतम अनुमानों के अनुसार निम्नलिखित हैं-
    • कोयला: कुल ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 46% (वर्ष 2023)
    • तेल (पेट्रोलियम एवं अन्य तरल ईंधन): कुल ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 25% (वर्ष 2023)
    • प्राकृतिक गैस: कुल ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 5% (वर्ष 2023)
    • नवीकरणीय ऊर्जा: ऊर्जा उत्पादन में 22% की हिस्सेदारी (वर्ष 2022)

भारत के ऊर्जा क्षेत्र में प्रमुख सुधार क्या हैं?

  • सार्वभौमिक ऊर्जा पहुँच: भारत के ऊर्जा क्षेत्र की सबसे परिवर्तनकारी उपलब्धियों में से एक लगभग सार्वभौमिक विद्युत पहुँच का सुनिश्चित होना है। 
    • विद्युत मंत्रालय के नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, सभी गाँवों और घरों में अब विद्युत पहुँच चुकी है, जो ग्रामीण विकास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
      • इसके परिणामस्वरूप भारत में प्रति व्यक्ति विद्युत खपत में वृद्धि हुई है (वित्तीय वर्ष 2023-24 में 18,410 मेगावाट जूल/व्यक्ति)। यह बेहतर पहुँच और जीवन स्तर में सुधार को दर्शाता है, यद्यपि यह वैश्विक औसत से अभी भी कम है, फिर भी यह ऊर्जा समानता की दिशा में स्थिर प्रगति का संकेत देता है।
    • ग्रामीण विद्युतीकरण ने सिंचाई, कोल्ड स्टोरेज, डिजिटल कनेक्टिविटी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को सक्षम बनाया है, जिससे उत्पादकता और जीवन की गुणवत्ता में प्रत्यक्ष सुधार हुआ है। 
  •  स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में तीव्र गति: भारत ने नवंबर 2025 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में अब तक की सबसे अधिक 44.5 गीगावाट की वृद्धि दर्ज की है, जो पिछले वर्ष की वृद्धि से लगभग दोगुनी है। इसके परिणामस्वरूप गैर-जीवाश्म स्रोत अब स्थापित विद्युत क्षमता का 51% से अधिक हैं, जिससे भारत पेरिस समझौते के लक्ष्यों को समय से पहले प्राप्त करने में सक्षम हो गया है।
  • ऊर्जा भंडारण में महत्त्वपूर्ण प्रगति: हरित ग्रिड की अनियमितता को ध्यान में रखते हुए भारत ने व्यापक स्तर पर ऊर्जा भंडारण क्षमता विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। 
    • यह परिवर्तन सुनिश्चित करता है कि नवीकरणीय ऊर्जा औद्योगिक और उच्च मांग वाले समय में निरंतर, स्थिर आपूर्ति प्रदान कर सके। 
    • उदाहरण के लिये, भारत की बैटरी ऊर्जा भंडारण क्षमता वर्ष 2025 में 507 मेगावाट घंटे से बढ़कर वर्ष 2026 में लगभग 5 गीगावाट घंटे (GWh) तक पहुँचने की संभावना है, जो लगभग दस गुना वृद्धि दर्शाती है।
  • ग्रिड शक्ति और प्रणाली विश्वसनीयता में सुधार: "एक राष्ट्र, एक ग्रिड, एक आवृत्ति" ढाँचा हरित ऊर्जा के लिये एक उच्च क्षमता वाले राजमार्ग के रूप में विकसित हुआ है, जिससे क्षेत्रीय विद्युत की कमी और मूल्य अस्थिरता में अत्यधिक कमी आई है। 
    • ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर और डिजिटल ग्रिड प्रबंधन प्रणालियों ने सिस्टम की अनुकूलन-क्षमता में सुधार किया है और विद्युत कटौती को कम किया है। 
    • उच्च-चरम दिनों में नवीकरणीय ऊर्जा की दैनिक मांग का आधे से अधिक पूरा करना प्रणाली की परिपक्वता को दर्शाता है।
      • केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक क्षेत्रीय अंतर्संबंधों में 50 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है, जिससे भारत को अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा का निर्यात करने में मदद मिलेगी।
  • विकेंद्रीकृत और वितरित ऊर्जा प्रणालियों का विकास: विकेंद्रीकृत ऊर्जा समाधानों का तेज़ी से विस्तार हुआ है, विशेष रूप से ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में। रूफटॉप सोलर पैनल, सोलर पंप और माइक्रोग्रिड ट्रांसमिशन हानि को कम कर रहे हैं और स्थानीय ऊर्जा उत्पादन के साथ समुदायों को सशक्त बना रहे हैं। 
    • उदाहरण के लिये प्रधानमंत्री सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना के अंतर्गत 26,76,432 घरों में छतों पर सौर पैनल लगाए गए, जिससे 7,879.07 मेगावाट की संचयी स्थापित क्षमता का सृजन हुआ है।
    • ये प्रणालियाँ ऊर्जा के प्रति अनुकूलन क्षमा को बढ़ाती हैं, कृषि आय का समर्थन करती हैं और सतत ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देती हैं।
  • जैव ईंधन और इथेनॉल मिश्रण में प्रगति: भारत अपने कृषि अधिशेष को उच्च-ऑक्टेन ईंधन में परिवर्तित करके ईंधन आत्मनिर्भरता की दिशा में अथक प्रयास कर रहा है, जिससे कृषि क्षेत्र प्रभावी रूप से एक ऊर्जा केंद्र में परिवर्तित हो रहा है। 
    • 20% इथेनॉल मिश्रण (E20) लक्ष्य को तेज़ी से लागू करना विदेशी मुद्रा संरक्षण और ग्रामीण धन सृजन की दोहरे उद्देश्य वाली रणनीति है।
    • उदाहरण के लिये, एथेनॉल आपूर्ति वर्ष (ESY) 2024-25 के दौरान 1,000 करोड़ लीटर से अधिक एथेनॉल का मिश्रण किया गया है, जबकि अक्तूबर 2025 में मिश्रण दर 19.97% थी।
  • परमाणु ऊर्जा और SMR अपनाना: भारत में ऊर्जा संक्रमण को सुदृढ़ करने के लिये सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) अधिनियम, 2025 ने निजी निवेश के लिये परमाणु क्षेत्र के ऐतिहासिक द्वार खोल दिये हैं।
    • भारत का दृष्टिकोण लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) तकनीक पर केंद्रित है, ताकि उन भारी उद्योगों के लिये विश्वसनीय, कार्बन-मुक्त, आधार-भार ऊर्जा प्रदान की जा सके, जिनमें प्रदूषण को कम करना चुनौतीपूर्ण है।
    • केंद्रीय बजट 2025–26 में परमाणु ऊर्जा मिशन के लिये 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं, जिसका लक्ष्य वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट क्षमता हासिल करना है।
  • हरित हाइड्रोजन को बढ़ावा: भारत अपनी अत्यंत कम लागत वाली नवीकरणीय ऊर्जा का लाभ उठाकर हरित अणुओं (green molecules) का एक प्रतिस्पर्धी वैश्विक निर्यातक बनने की दिशा में काम कर रहा है, जिसका लक्ष्य उर्वरक और इस्पात का पूर्ण रूप से कार्बन-मुक्तीकरण करना है।
    • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन अब केवल नीतिगत ढाँचे तक सीमित नहीं है, बल्कि समर्पित तटीय ‘हाइड्रोजन हब’ के भौतिक कार्यान्वयन की ओर अग्रसर है।
      • तीन प्रमुख बंदरगाह - दीनदयाल पोर्ट अथॉरिटी (गुजरात ), वी.ओ. चिदंबरनार पोर्ट अथॉरिटी (तमिलनाडु) और पारादीप पोर्ट अथॉरिटी (ओडिशा) को अक्तूबर 2025 में हरित हाइड्रोजन हब के रूप में मान्यता दी गई।

भारत के ऊर्जा क्षेत्र से संबंधित प्रमुख मुद्दे क्या हैं?

  • जीवाश्म ईंधन पर निरंतर निर्भरता: नवीकरणीय ऊर्जा की वृद्धि के बावजूद,पेट्रोलियम अभी भी प्राथमिक ऊर्जा खपत का लगभग 27% है और भारत अपनी कच्ची तेल की लगभग 85% जरूरतों के लिये आयात पर निर्भर है। 
  • इससे भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक मूल्य अस्थिरता और बाहरी आघातों के प्रति संवेदनशील हो जाती है, जिससे मुद्रास्फीति, व्यापार संतुलन और राजकोषीय स्थिरता प्रभावित होती है। ऊर्जा स्रोतों में विविधीकरण होने के बावजूद, भारत की अभी भी आयात पर अधिक निर्भरता बनी हुई है।
    • साथ ही कोयला भारत का सबसे बड़ा एकल ऊर्जा स्रोत बना हुआ है, जिसकी स्थापित क्षमता 219 गीगावाट है।
    • आयातित ईंधन और घरेलू कोयले पर यह दोहरी निर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने, पर्यावरणीय प्रभावों का प्रबंधन करने और स्वच्छ और अधिक सतत ऊर्जा स्रोतों की ओर संक्रमण को गति देने की चुनौतियों को उजागर करती है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन बनाम क्षमता उपयोग का अंतर: यद्यपि गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता कुल स्थापित विद्युत क्षमता के 50% से अधिक हो गई है, फिर भी अनिश्चितता और भंडारण सीमाओं के कारण वास्तविक नवीकरणीय विद्युत उत्पादन कम है।
    • वर्तमान में नवीकरणीय ऊर्जा कुल विद्युत उत्पादन में लगभग20–25% (वित्तीय वर्ष 2024–25 में ~22%) का योगदान देती है, जो स्थापित क्षमता और विश्वसनीय विद्युत उत्पादन के बीच के अंतर को उजागर करता है।
      • मौसमी परिवर्तनशीलता, सीमित ऊर्जा भंडारण और ग्रिड संतुलन की चुनौतियाँ इस उपयोग को बाधित करती हैं।
  • ग्रिड एकीकरण और अवसंरचना संबंधी सीमाएँ: नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में तीव्र वृद्धि पारेषण और वितरण अवसंरचना पर दबाव डालती है
    • सौर और पवन जैसे परिवर्तनीय संसाधनों का एकीकरण बेहतर ग्रिड अनुकूलन, सटीक पूर्वानुमान और राज्यों में विस्तारित ट्रांसमिशन नेटवर्क की मांग करता है।
      • उदाहरण के लिये, 50 गीगावाट से अधिक स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता पारेषण संबंधी बाधाओं के कारण कम उपयोग में है, जहाँ उत्पादन परिसंपत्तियाँ तकनीकी रूप से तैयार हैं, लेकिन ऊर्जा को कुशलतापूर्वक स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है क्योंकि पारेषण लाइनें, सबस्टेशन और निकासी मार्ग क्षमता वृद्धि के अनुरूप विस्तारित नहीं हुए हैं। 
    • हालाँकि ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर और स्मार्ट ग्रिड प्रौद्योगिकियों में निवेश जारी है, लेकिन कार्यान्वयन में विलंब और अंतर-राज्य समन्वय संबंधी मुद्दे नवीकरणीय ऊर्जा के सुचारू एकीकरण में बाधा डाल सकते हैं।
  • भूमि अधिग्रहण और मार्ग अधिकार (RoW) विवाद: गीगा-स्केल” सौर पार्कों के लिये बड़े, सन्निहित भूमि टुकड़ों का सुरक्षित करना उपजाऊ कृषि भूमि और चराई के अधिकारों को लेकर सामुदायिक विरोध और कानूनी विवाद उत्पन्न कर रहा है। 
    •  ये संघर्ष परियोजनाओं की प्रगति में देरी और डेवलपर्स को महंगी मुकदमेबाजी की ओर ले जाते हैं, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा के कम टैरिफ लाभ प्रभावित होते हैं।
      • उदाहरण के लिये, जून 2025 में, आंध्र प्रदेश के रामायपटनम बंदरगाह के पास एक सौर परियोजना के लिये 8,300 एकड़ उपजाऊ भूमि के अधिग्रहण की सरकार की योजना के विरुद्ध हज़ारों किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया।
  • विद्युत वितरण कंपनियों में वित्तीय दबाव: अनेक राज्य वितरण कंपनियाँ (DISCOM) उच्च कुल तकनीकी एवं वाणिज्यिक (AT&C) घाटा, क्रॉस-सब्सिडी और विलंबित भुगतान के कारण वित्तीय दबाव में हैं।
    • डिस्कॉमों का कुल तकनीकी और वाणिज्यिक (AT&C) घाटा वित्तीय वर्ष 2023 में 15.4% से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2024 में 17.6% हो गया।
    • इससे अवसंरचना में निवेश करने, कुशलतापूर्वक ऊर्जा प्राप्त करने और सुधारों को लागू करने की उनकी क्षमता प्रभावित होती है। 
    • हालाँकि हाल की नीतियाँ टैरिफ युक्तिकरण और स्मार्ट मीटरिंग को बढ़ावा देती हैं, लेकिन क्षेत्रीय दक्षता के लिये डिस्कॉम की व्यवहार्यता अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।
  • अविकसित प्राकृतिक गैस बाज़ार: प्राकृतिक गैस वर्तमान में केवल 6.8% प्राथमिक ऊर्जा खपत में योगदान देती है, जो सरकार के वर्ष 2030 तक 15% लक्ष्य से काफी कम है।
    • अवसंरचना की बाधाओं, सीमित पाइपलाइन नेटवर्क और ऐतिहासिक रूप से उच्च LNG कीमतों ने गैस की मांग में वृद्धि को धीमा कर दिया है।
      • सशक्त प्राकृतिक गैस पारिस्थितिकी तंत्र स्वच्छ औद्योगिक प्रक्रिया, विद्युत उत्पादन और कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिये महत्त्वपूर्ण है, परंतु इसकी प्रगति अपेक्षा से धीमी रही है।
  • पर्यावरण और जलवायु संबंधी दबाव: भारत का ऊर्जा क्षेत्र वायु प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन में प्रमुख योगदानकर्त्ता है। 
    • यद्यपि वर्ष 2025 की पहली छमाही में भारत के विद्युत क्षेत्र से होने वाले CO₂ उत्सर्जन में साल-दर-साल 1% की गिरावट आई है, फिर भी यह क्षेत्र वायु प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन में एक प्रमुख योगदानकर्त्ता बना हुआ है। 
    • आर्थिक विकास और पर्यावरणीय उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाए रखना एक जटिल नीतिगत चुनौती बनी हुई है।
    • इसके अलावा कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों में फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन (FGD) तकनीक को स्थापित करने में लगातार हो रही देरी से राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता और सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा बना हुआ है।
  • आपूर्ति शृंखला और महत्त्वपूर्ण खनिजों से संबंधित जोखिम: इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बैटरी और उच्च दक्षता वाले सौर सेल के लिये आयातित महत्त्वपूर्ण खनिजों पर भारत की भारी निर्भरता ऊर्जा संक्रमण को गंभीर भू-राजनीतिक आघातों और "संसाधनयुक्त राष्ट्रवाद" के प्रति संवेदनशील बनाती है।
    • हाल ही में प्रमुख वैश्विक आपूर्तिकर्त्ताओं (जैसे चीन) द्वारा दुर्लभ-मृदा चुंबकों पर वर्ष 2025 से लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों ने भारतीय ऑटोमोबाइल निर्माताओं को उत्पादन लक्ष्यों में कटौती करने के लिये बाध्य कर दिया है, जो एकल विफलता बिंदु को उजागर करता है। 
      • उदाहरण के लिये वर्ष 2025 के मध्य में, मारुति सुजुकी ने दुर्लभ धातुओं की कमी के कारण अपने पहले इलेक्ट्रिक वाहन ई-विटारा के अल्पकालिक उत्पादन लक्ष्यों में दो-तिहाई की कटौती की थी।

भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ करने के लिये कौन-से उपाय अपना सकता है?

  • ऊर्जा संरचना में विविधीकरण: ऊर्जा सुरक्षा का एक प्रमुख स्तंभ विविधीकरण है। वर्तमान में, भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 85% और प्राकृतिक गैस का 50% से अधिक आयात करता है, जिससे यह भू-राजनीतिक जोखिमों और वैश्विक मूल्य आघातों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
    • नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और स्वच्छ तकनीकों के साथ घरेलू कोयले की हिस्सेदारी बढ़ाने से आयातित ईंधनों पर निर्भरता कम हो सकती है। 
    • भारत की 50% से अधिक गैर-जीवाश्म क्षमता की उपलब्धि यह दर्शाती है कि विविधीकरण पहले से ही चल रहा है और इसे तीव्र करना आवश्यक है।
  • ग्रिड अवसंरचना और ऊर्जा भंडारण को सुदृढ़ बनाना: ऊर्जा सुरक्षा केवल उत्पादन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी आपूर्ति भी महत्त्वपूर्ण है। अंतर-राज्यीय पारेषण नेटवर्क, ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर और स्मार्ट ग्रिड में निवेश प्रणाली की अनुकूलन क्षमता और स्थिरता को सुदृढ़ करता है। 
    • नवीकरणीय ऊर्जा की अनिश्चितता को प्रबंधित करने और चरम मांग को पूरा करने के लिये पंप हाइड्रो, बैटरी स्टोरेज और उभरती प्रौद्योगिकियों के माध्यम से ऊर्जा भंडारण आवश्यक है। 
  • घरेलू उत्पादन और रणनीतिक भंडार बढ़ाना: कोयला, तेल और गैस का घरेलू उत्पादन बढ़ाना निकट और मध्यम अवधि की सुरक्षा के लिये महत्त्वपूर्ण है।
    • साथ ही, स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व (SPR) का विस्तार अल्पकालिक आपूर्ति व्यवधानों को संतुलित करने में मदद करता है।
    • भारत की मौजूदा SPR क्षमता, जो कई दिनों के आयात की पूर्ति करती है, का विस्तार किया जा रहा है (जैसे कर्नाटक का पादुर और ओडिशा का चाँदीखोल) ताकि वैश्विक आपूर्ति आघातों के प्रति अनुकूलन क्षमता बढ़ाया जा सके।
  • ऊर्जा दक्षता और मांग-प्रबंधन में सुधार: ऊर्जा सुरक्षा केवल आपूर्ति बढ़ाने से नहीं, बल्कि अपव्यय कम करने से भी सुदृढ़ होती है। पिछले दशक में भारत की ऊर्जा तीव्रता दक्षता उपायों के कारण काफी घट गई है।
    • LED लाइटिंग, ऊर्जा-कुशल उपकरण, औद्योगिक ऊर्जा ऑडिट और समय-समय पर मूल्य निर्धारण जैसे कार्यक्रम मांग वृद्धि को नियंत्रित करने में सहायक हैं।
    • कम ऊर्जा तीव्रता आयात निर्भरता और अवसंरचना पर दबाव कम करती है और सतत विकास को समर्थन देती है।
  • परिवहन का विद्युतीकरण और वैकल्पिक ईंधन: परिवहन भारत का सबसे बड़ा तेल खपत करने वाला क्षेत्र है। नवीकरणीय ऊर्जा-संचालित चार्जिंग अवसंरचना द्वारा समर्थित इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने से तेल आयात में काफी कमी आ सकती है।
    • इसके समानांतर, जैव ईंधन, इथेनॉल मिश्रण, संपीड़ित बायोगैस और हरित हाइड्रोजन परिवहन और उद्योग के लिये ईंधन विकल्पों में विविधता ला सकते हैं।
    • भारत का इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम पहले ही 20% मिश्रण को पार कर चुका है, जिससे कच्चे तेल के आयात में कमी आई है और ईंधन सुरक्षा में वृद्धि हुई है।
  • वितरण क्षेत्र सुदृढ़ करना: ऊर्जा सुरक्षा के लिये आर्थिक रूप से व्यवहार्य और कुशल डिस्कोम आवश्यक हैं। 
    • स्मार्ट मीटरिंग, टैरिफ सामान्यीकरण, AT&C हानियों में कमी को कम करना और बाज़ार आधारित ऊर्जा व्यापार जैसे चल रहे सुधार विश्वसनीयता बढ़ाते हैं और निवेश को आकर्षित करते हैं।
    • एक मज़बूत वितरण क्षेत्र यह सुनिश्चित करता है कि उत्पादित ऊर्जा को बिना किसी प्रणालीगत दबाव के कुशलतापूर्वक उपभोक्ताओं तक पहुँचाया जाए। 
  • घरेलू विनिर्माण और तकनीकी आत्मनिर्भरता: ऊर्जा सुरक्षा तकनीकी आत्मनिर्भरता से घनिष्ठ रूप से संबंधित है। 
    • उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं (PLI) के तहत सौर मॉड्यूल, बैटरी, इलेक्ट्रोलाइजर और विद्युत उपकरणों के घरेलू उत्पादन का विस्तार करने से आयात पर निर्भरता कम होती है और आपूर्ति शृंखलाएँ मज़बूत होती हैं। 
    • इससे रोज़गार के अवसर भी पैदा होते हैं और भारत एक वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा केंद्र के रूप में स्थापित होता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों का एकीकरण: भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन की प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है। स्वच्छ ऊर्जा, विद्युतीकरण और दक्षता में सुधार बढ़ती मांग को पर्यावरणीय स्थिरता के साथ संतुलित करते हैं। 
    • ऊर्जा कूटनीति, आयात के विविध स्रोत और क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग भारत की रणनीतिक स्थिति को और सुदृढ़ करते हैं।

निष्कर्ष: 

भारत का ऊर्जा संक्रमण सार्वभौमिक विद्युतीकरण प्राप्त करके और जीवाश्म ईंधन-रहित ऊर्जा क्षमता को 50% से अधिक तेज़ी से बढ़ाते हुए सतत विकास लक्ष्य 7 (सस्ते और स्वच्छ ऊर्जा) को मज़बूती से आगे बढ़ा रहा है। आयात निर्भरता कम करके, ग्रिड विश्वसनीयता सुधारकर और दक्षता व स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहित करके, ऊर्जा अब बाधा नहीं, बल्कि समावेशी विकास का प्रेरक बन रही है। आने वाला दशक यह निर्धारित करेगा कि भारत इस गति को दीर्घकालिक सुरक्षा, सस्ती और सतत ऊर्जा में कितनी प्रभावी रूप से परिवर्तित करता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

“भारत की ऊर्जा सुरक्षा उपलब्धता सुनिश्चित करने से विकसित होकर अनुकूलन क्षमता और सतत विकास सुनिश्चित करने की दिशा में अग्रसर हुई है।” भारत के बदलते ऊर्जा संरचना और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. भारत का वर्तमान ऊर्जा परिवर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता से नवीकरणीय ऊर्जा आधारित, सुरक्षित और सतत ऊर्जा की ओर बढ़ना।

प्रश्न 2. भारत के ऊर्जा क्षेत्र सुधारों से सबसे प्रत्यक्ष रूप से कौन-सा सतत विकास लक्ष्य (SDG) जुड़ा हुआ है?
SDG 7 – सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा।

प्रश्न 3. भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिये नवीकरणीय ऊर्जा क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह आयात पर निर्भरता और कीमतों में अस्थिरता को कम करती है।

प्रश्न 4. क्या भारत ने सार्वभौमिक विद्युतीकरण प्राप्त कर लिया है?
हाँ, अब सभी घरों में विद्युत की सुविधा उपलब्ध है।

प्रश्न 5. वर्ष 2030 के लिये भारत का प्रमुख स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य क्या है?
जीवाश्म ईंधन से मुक्त 500 गीगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता प्राप्त करना।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी लिमिटेड (IREDA) के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? (2015)

  1. यह एक पब्लिक लिमिटेड सरकारी कंपनी है।
  2. यह एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये।

(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c) 


मेन्स:

प्रश्न. "सतत, विश्वसनीय, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को प्राप्त करने के लिये अनिवार्य है।" इस संबंध में भारत में हुई प्रगति पर टिप्पणी कीजिये। (2018)