राज्यपाल का राज्य विधानमंडल को संबोधन
प्रारंभिक परीक्षा के लिये: राज्यपाल, अनुच्छेद 176, संविधान सभा, विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति,
मेन्स के लिये: राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति और शक्तियाँ, अनुच्छेद 163 के तहत सहायता और सलाह का सिद्धांत, राज्यपाल-राज्य सरकार संबंध और संघवाद
चर्चा में क्यों?
हाल ही में तमिलनाडु के राज्यपाल ने अपने पारंपरिक अभिभाषण के दौरान राज्य विधानसभा से वॉकआउट कर दिया। इसी समय, केरल के राज्यपाल ने अपने अभिभाषण के कुछ अनुच्छेदों को हटा दिया। इन घटनाओं ने राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों और अनुच्छेद 176 की गरिमा को लेकर बहस को पुनरुज्जीवित कर दिया है।
सारांश
- तमिलनाडु और केरल में विधानसभा अभिभाषण के दौरान राज्यपाल द्वारा किये गए हालिया वॉकआउट और कुछ अंशों को हटाने की घटनाओं ने अनुच्छेद 176 के तहत राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों की सीमाओं और निर्वाचित सरकारों की प्रधानता पर संवैधानिक बहस को पुनरुज्जीवित कर दिया है।
- संवैधानिक प्रावधान, परंपराएँ और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय लगातार यह पुष्टि करते हैं कि राज्यपाल का अभिभाषण एक औपचारिक कार्यपालिका का कर्त्तव्य है, जिसे मंत्रिपरिषद की सलाह और अनुशंसा पर ही दिया जाना चाहिये, इसमें राज्यपाल की व्यक्तिगत विवेकाधीन भूमिका अत्यंत सीमित है।
संविधान में राज्यपाल की भूमिका कैसे परिकल्पित की गई है?
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 176: यह प्रावधान करता है कि राज्यपाल प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र के प्रारंभ में विधानसभा (और द्विसदनीय राज्यों में दोनों सदनों) को संबोधित करेगा, ताकि वह विधायिका को उसके आह्वान (सत्र बुलाए जाने) के कारणों से अवगत करा सके।
- यह अभिभाषण राज्यपाल का संवैधानिक कर्त्तव्य है और वस्तुतः निर्वाचित राज्य सरकार की नीतियों का वक्तव्य होता है, न कि राज्यपाल की व्यक्तिगत राय का।
- अनुच्छेद 175: यह राज्यपाल को राज्य की विधानसभा या दोनों सदनों को संबोधित करने तथा विशेष रूप से विधेयकों के संबंध में संदेश भेजने का अधिकार प्रदान करता है।
- यह अधिकार कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र का हिस्सा है और इसे स्वतंत्र विवेकाधिकार नहीं माना जाता; यह मंत्रिपरिषद की सलाह और अनुशंसा के अधीन ही प्रयोग किया जाता है।
- अनुच्छेद 163: यह व्यवस्था करता है कि राज्यपाल, उन मामलों को छोड़कर जहाँ संविधान स्पष्ट रूप से विवेकाधिकार प्रदान करता है, मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कार्य करेगा।
संविधान सभा की दृष्टि में राज्यपाल की भूमिका
- संविधान सभा ने राज्यपाल को एक संवैधानिक प्रमुख के रूप में परिकल्पित किया था, न कि एक सर्वसत्तावादी प्राधिकारी के रूप में; उसे कर्त्तव्यों से तो संपन्न किया गया, पर स्वतंत्र शक्तियाँ नहीं दी गईं।
- राज्यपाल से अपेक्षा की जाती है कि वह संपूर्ण राज्य की जनता के निष्पक्ष प्रतिनिधि के रूप में कार्य करे, न कि एक राजनीतिक अभिनेता की तरह।
राज्यपाल की भूमिका पर सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय:
- तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल (2024): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों का उपयोग इस प्रकार नहीं किया जा सकता कि वे निर्वाचित सरकार के कामकाज को रोकने, बाधित करने या निष्फल करने का साधन बन जाएँ।
- नबाम रेबिया बनाम उपाध्यक्ष (2016): पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह निर्णय दिया है कि राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकार अत्यंत सीमित हैं और उनका स्पष्ट रूप से उल्लेख संविधान में किया गया है।
- शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974): सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह प्रतिपादित किया कि राज्यपाल एक संवैधानिक प्रमुख होता है और संविधान द्वारा जहाँ स्पष्ट रूप से विवेकाधिकार प्रदान किया गया है, उन मामलों को छोड़कर उसे सभी विषयों में मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अनुसार ही कार्य करना चाहिये।
- न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि कार्यपालिका से जुड़े मामलों में राज्यपाल अपने व्यक्तिगत विवेक का प्रयोग नहीं कर सकता।
समिति की सिफारिशें
- सरकारिया आयोग (1988) की सिफारिशें: इसने बल देते हुए कहा कि राज्यपाल केंद्र सरकार का एजेंट नहीं होना चाहिये, बल्कि उसे सक्रिय राजनीति से दूर रहते हुए संघीय व्यवस्था की “कड़ी” (lynchpin) के रूप में कार्य करना चाहिये।
- पुंछी आयोग (2007) की सिफारिशें: आयोग ने अनुशंसा की कि राज्यपाल को ऐसे पदों (जैसे– विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति) से नहीं जोड़ा जाना चाहिये, जो उसे राजनीतिक विवादों में उलझा दें; बल्कि उसका ध्यान केवल अपने संवैधानिक कर्त्तव्यों तक सीमित रहना चाहिये।
राज्यपाल के विधानसभा संबोधन में विवेकाधिकार के संबंध में क्या तर्क हैं?
राज्यपाल के विवेकाधिकार के पक्ष में तर्क
- संवैधानिक शपथ (अनुच्छेद 159): राज्यपाल संविधान की रक्षा, सुरक्षा और संरक्षण करने की शपथ ग्रहण करते हैं और उसे ऐसी सामग्री पढ़ने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता जो असंवैधानिक, तथ्यात्मक रूप से गलत, देशद्रोही या संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हो।
- असहमति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार: एक उच्च संवैधानिक प्राधिकरण के रूप में राज्यपाल केवल यांत्रिक कार्यकारी नहीं है और वह ऐसी सामग्री को स्वीकार करने से इनकार कर सकता है जो सीधे राज्यपाल के कार्यालय पर हमला करती हो।
- अनुच्छेद 175 और 176 राज्यपाल के संबोधन को अनिवार्य करते हैं, लेकिन स्पष्ट रूप से यह नहीं कहते कि राज्यपाल को इसे शब्दशः पढ़ना ही होगा, जिससे व्याख्यात्मक स्वतंत्रता बनी रहती है।
- इस संवैधानिक मौन को यह तर्क देने के लिये उद्धृत किया जाता है कि राज्यपाल का विवेकाधिकार पूरी तरह से समाप्त नहीं किया गया है।
- अनुच्छेद 175 और 176 राज्यपाल के संबोधन को अनिवार्य करते हैं, लेकिन स्पष्ट रूप से यह नहीं कहते कि राज्यपाल को इसे शब्दशः पढ़ना ही होगा, जिससे व्याख्यात्मक स्वतंत्रता बनी रहती है।
- केंद्र का प्रतिनिधि: संघ और राज्य के बीच संवैधानिक संबंध होने के आधार पर, यह तर्क दिया जाता है, कि राज्यपाल की ज़िम्मेदारी है कि वह ऐसे भाषणों को रोके जो राष्ट्रीय एकता या संघीय अखंडता हेतु जोखिम उत्पन्न करतें हैं।
- संस्थागत विरोधाभास को रोकना: यदि राज्यपाल के अभिभाषण में ऐसी बातें शामिल हों जो स्वयं उनके द्वारा पहले लिये गए संवैधानिक निर्णयों (जैसे कि विधेयकों पर सहमति देना, उन्हें सुरक्षित रखना या राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजना) के ठीक विपरीत हों, तो इसे एक 'संस्थागत विरोधाभास' माना जा सकता है।
राज्यपाल के विवेकाधिकार के विपक्ष में तर्क:
- सहायता और परामर्श सिद्धांत (अनुच्छेद 163): भारत में अपनाए गए वेस्टमिंस्टर मॉडल के तहत, राज्यपाल केवल औपचारिक अध्यक्ष है। वास्तविक शक्ति निर्वाचित मंत्रिपरिषद के पास होती है, इसलिये राज्यपाल को उनके "सहायता और परामर्श" पर कार्य करना चाहिये।
- राज्यपाल के संबोधन की प्रकृति: यह संबोधन राज्य सरकार की नीतियों का प्रतिनिधित्व करता है, न कि राज्यपाल की व्यक्तिगत राय का। अभिभाषण की विषय-वस्तु में परिवर्तन करना या उसे अस्वीकार करना, शासन की जवाबदेही को संकट में डालता है और विधानमंडल के प्रति सरकार के उत्तरदायित्वों को अस्पष्ट बना देता है।
- संघीय ढाँचे का क्षरण: केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल द्वारा एकतरफा संशोधन या बहिष्कार राज्य की स्वायत्तता में हस्तक्षेप माना जाता है और संघीय संतुलन को बाधित करता है।
- संबोधन में विवेकाधिकार की अनुमति देने से विशेष रूप से विपक्ष शासित राज्यों में चुनी हुई नीतियों में बाधा डालने का अवसर मिल सकता है। इससे राज्यपाल की अपेक्षित तटस्थता प्रभावित होती है और संवैधानिक पदों में जनता का भरोसा कमज़ोर होता है।
- संसदीय लोकतंत्र के लिये खतरा: नियमित कार्यकारी कार्यों में विवेकाधिकार की अनुमति देने से एक समानांतर प्राधिकरण बनने का खतरा उत्पन्न होता है, जो ज़िम्मेदार सरकार के मूल सिद्धांत को कमज़ोर करता है।
- विधायी विशेषाधिकार और स्वायत्तता: राज्यपाल का संबोधन विधानमंडल की कार्यवाही का हिस्सा होता है।
- हस्तक्षेप से विधानमंडल के उस विशेषाधिकार का उल्लंघन हो सकता है, जिसके तहत वे सरकार की नीतियों पर सदन में बहस और अस्वीकृति कर सकते हैं, बजाय इसके कि इसे पूर्व-निर्धारित कार्यकारी निर्णय के माध्यम से रोका जाए।
- न्यायिक समाधान उपलब्ध: यदि किसी सामग्री को असंवैधानिक माना जाता है, तो उसका उचित समाधान न्यायिक समीक्षा के माध्यम से ही होना चाहिये, न कि राज्यपाल द्वारा एकतरफा अस्वीकृति के माध्यम से।
- संवैधानिक निर्णय का क्षेत्र न्यायालयों का है, व्यक्तिगत संवैधानिक प्राधिकरणों का नहीं।
आगे की राह
- परंपराओं का संहिताकरण: ब्रिटिश संसदीय प्रणाली की उन 'संवैधानिक परंपराओं' को, जिनके तहत सम्राट या रानी कभी भी सरकार द्वारा तैयार अभिभाषण से विचलित नहीं होते, या तो औपचारिक रूप से संहिताबद्ध किया जाना चाहिये या उनका सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिये।
- सर्वोच्च न्यायालय संवैधानिक मार्गदर्शन जारी कर सकता है, जिसमें स्पष्ट किया जाए कि राज्यपाल का संबोधन एक अनिवार्य संवैधानिक कर्त्तव्य है और इसमें कोई विवेकाधिकार नहीं है। इससे बार-बार होने वाले मुकदमों में कमी आएगी और राज्यों में असंगत प्रथाओं को रोका जा सकेगा।
- राज्यपालों के लिये प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण: नवनियुक्त राज्यपालों को संघीय ढाँचा, संसदीय परंपराएँ तथा न्यायिक निर्णयों पर अनिवार्य संवैधानिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये। इससे उनके कर्त्तव्यों की स्पष्टता बढ़ेगी तथा संस्थागत टकराव कम होगा।
- रचनात्मक संवाद: मुख्यमंत्री और राज्यपाल को सार्वजनिक टकराव के बजाय सत्र शुरू होने से पहले मसौदा भाषण पर निजी परामर्श के माध्यम से "विश्वास अंतर" को कम करना चाहिये।
- समयबद्ध संवैधानिक संवाद तंत्र: एक औपचारिक, समयबद्ध ढाँचा होना चाहिये, जिसमें राज्यपाल को संबोधन पर किसी भी आपत्ति को निश्चित समय सीमा के भीतर लिखित रूप में संप्रेषित करना अनिवार्य हो।
- यदि इस अवधि के भीतर कोई उत्तर नहीं दिया जाता है, तो सहमति मान ली जानी चाहिये। इससे अनावश्यक विलंब समाप्त होगा, रणनीतिक मौन को रोका जा सकेगा और संवैधानिक प्रक्रियाएँ सुचारु रूप से सुनिश्चित होंगी।
निष्कर्ष
संवैधानिक बहस इस संतुलन पर केंद्रित है कि राज्यपाल का संविधान के प्रति शपथ-बंधित कर्त्तव्य और निर्वाचित कार्यकारी प्राधिकरण की प्रधानता के बीच कैसे संतुलन बनाया जाए। संवैधानिक प्रावधान, संसदीय परंपरा तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय राज्यपाल के विधानसभा संबोधन में विवेकाधिकार को काफी हद तक सीमित करते हैं।
|
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्र. “अनुच्छेद 176 के अंतर्गत राज्यपाल का अभिभाषण एक संवैधानिक कर्त्तव्य है, न कि विवेकाधीन शक्ति।” हाल के विवादों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के आलोक में इसका परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. संविधान का अनुच्छेद 176 क्या निर्धारित करता है?
यह प्रावधान करता है कि राज्यपाल प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में राज्य विधानमंडल को संबोधित करेगा, जिसमें निर्वाचित सरकार की नीतिगत कार्यसूची प्रस्तुत की जाती है।
2. क्या विधानसभा में दिये जाने वाले अभिभाषण की विषय-वस्तु पर राज्यपाल का विवेकाधिकार होता है?
नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक दृष्टांतों के अनुसार यह एक कार्यपालिका संबंधी कार्य है, जिसे मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर ही किया जाता है।
3. सर्वोच्च न्यायालय का कौन-सा निर्णय राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों को सीमित करता है?
शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) के मामले में यह स्थापित किया गया कि राज्यपाल एक संवैधानिक प्रमुख है और कार्यपालिका मामलों में उसके पास सामान्य विवेकाधिकार नहीं होता।
4. हाल के राज्यपालों के कार्यों को संवैधानिक रूप से समस्याग्रस्त क्यों माना जा रहा है?
अभिभाषण के चयनात्मक अंशों को हटाना या उसे प्रस्तुत करने से इंकार करना मंत्रिमंडलीय उत्तरदायित्व, संघीय संतुलन और संसदीय परंपराओं को अप्रभावी बनाता है।
5. ऐसे द्वंद्वों को रोकने के लिये कौन-से सुधार सुझाए गए हैं?
परंपराओं का संहिताकरण, सरकारिया एवं पुंछी आयोग की सिफारिशों का पालन तथा राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के बीच अधिक परामर्शात्मक संवाद।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)
- किसी राज्य के राज्यपाल के विरुद्ध उसकी पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में कोई दांडिक कार्यवाही संस्थित नहीं की जाएगी।
- किसी राज्य के राज्यपाल की परिलब्धियाँ और भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किये जाएंगे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (c)
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सी किसी राज्य के राज्यपाल को दी गई विवेकाधीन शक्तियाँ हैं? (2014)
1. भारत के राष्ट्रपति को राष्ट्रपति शासन अधिरोपित करने के लिये रिपोर्ट भेजना
2. मंत्रियों की नियुक्ति करना
3. राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कतिपय विधेयकों को भारत के राष्ट्रपति के विचार के लिये आरक्षित करना
4. राज्य सरकार के कार्य संचालन के लिये नियम बनाना
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2, 3 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (b)
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक सही है? (2013)
(a) भारत में एक ही व्यक्ति को एक ही समय में दो या अधिक राज्यों में राज्यपाल नियुक्त नहीं किया जा सकता
(b) भारत में राज्यों के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राज्य के राज्यपाल द्वारा नियुक्त किये जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाते हैं
(c) भारत के संविधान में राज्यपाल को उसके पद से हटाने हेतु कोई भी प्रक्रिया अधिकथित नहीं है
(d) विधायी व्यवस्था वाले संघ राज्यक्षेत्र में मुख्यमंत्री की नियुक्ति उपराज्यपाल द्वारा, बहुमत समर्थन के आधार पर, की जाती है
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. राज्यपाल द्वारा विधायी शक्तियों के प्रयोग की आवश्यक शर्तों का विवेचन कीजिये। विधायिका के समक्ष रखे बिना राज्यपाल द्वारा अध्यादेशों के पुनः प्रख्यापन की वैधता की विवेचना कीजिये। (2022)
प्रश्न. यद्यपि परिसंघीय सिद्धांत हमारे संविधान में प्रबल है और वह सिद्धांत संविधान के आधारिक अभिलक्षणों में से एक है, परंतु यह भी इतना ही सत्य है कि भारतीय संविधान के अधीन परिसंघवाद (फैडरलिज़्म) सशक्त केंद्र के पक्ष में झुका हुआ है। यह एक ऐसा लक्षण है जो प्रबल परिसंघवाद की संकल्पना के विरोध में है। चर्चा कीजिये। (2014)
अंतर्राष्ट्रीय डेटा गोपनीयता दिवस
प्रिलिम्स के लिये: काउंसिल ऑफ यूरोप, अंतर्राष्ट्रीय डेटा गोपनीयता दिवस, निजता का अधिकार, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना
मेन्स के लिये: भारत में डेटा गोपनीयता और डेटा संरक्षण कानून, डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के प्रमुख प्रावधान तथा मसौदा डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) नियम, 2025।
चर्चा में क्यों?
भारत ने 28 जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय डेटा गोपनीयता दिवस मनाया, जिसमें डिजिटल प्लेटफॉर्मों के तीव्र विस्तार के बीच ज़िम्मेदार डेटा प्रथाओं, जन-जागरूकता और विश्वास-आधारित डिजिटल शासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया।
- यह दिवस 2006 में काउंसिल ऑफ यूरोप द्वारा व्यक्तिगत डेटा के स्वचालित प्रसंस्करण से संबंधित व्यक्तियों के संरक्षण हेतु किये गए कन्वेंशन (Convention 108), जो डेटा संरक्षण पर विश्व की पहली कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय संधि है, के हस्ताक्षर की स्मृति में निर्धारित किया गया था।
सारांश
- अंतर्राष्ट्रीय डेटा गोपनीयता दिवस के अवसर पर भारत ने तीव्र डिजिटलीकरण और नागरिक डेटा के बढ़ते उपयोग के बीच ज़िम्मेदार डेटा प्रथाओं और विश्वास-आधारित डिजिटल शासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया।
- हालाँकि DPDP अधिनियम, 2023 और सहायक संस्थाएँ भारत के डेटा संरक्षण ढाँचे को सुदृढ़ करती हैं, लेकिन नियामक स्वतंत्रता, राज्य छूट, पीड़ितों के लिये राहत और AI युग के जोखिमों में अंतराल को संबोधित करना आवश्यक है, ताकि कानूनी सुरक्षा को वास्तविक गोपनीयता संरक्षण में बदला जा सके।
कन्वेंशन 108
- यह 1981 की एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जो स्वचालित रूप से प्रसंस्कृत व्यक्तिगत डेटा के बढ़ते सीमापार प्रवाह के बीच निजता के अधिकार की सुरक्षा करती है।
- कन्वेंशन को 1985 से आधुनिक बनाया गया है और वर्ष 2018 में महत्त्वपूर्ण अपडेट को मंज़ूरी दी गई, जिसमें अनिवार्य डेटा उल्लंघन रिपोर्टिंग, डेटा नियंत्रकों की अधिक सख्त जवाबदेही और एल्गोरिद्मिक निर्णय लेने तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से उत्पन्न जोखिमों के विरुद्ध नए सुरक्षा उपाय शामिल किये गए।
- सभी काउंसिल ऑफ यूरोप सदस्य देशों ने इसे अनुमोदित किया है और कई गैर-यूरोपीय देश भी इसके पक्ष में आए हैं। भारत ने कन्वेंशन 108 पर हस्ताक्षर या अनुमोदन नहीं किया है।
डिजिटल फुटप्रिंट क्या है और भारत का डेटा गोपनीयता ढाँचा कैसे विकसित हुआ?
- डिजिटल फुटप्रिंट: यह उन विशाल और गहन डिजिटल प्लेटफॉर्मों को संदर्भित करता है जो देश में शासन, सेवा प्रदाय और नागरिक भागीदारी को सुदृढ़ बनाते हैं।
- भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी डिजिटलीकृत अर्थव्यवस्था है, जिसमें 101.7 करोड़ ब्रॉडबैंड उपयोगकर्त्ता हैं, प्रति GB डेटा की अत्यंत कम लागत (USD 0.10) है और दैनिक जीवन में गहन डिजिटल पहुँच है, जो जनसंख्या स्तर पर व्यापक डिजिटल समावेशन को सक्षम बनाती है।
- डिजिटल फुटप्रिंट के डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI), जिसमें आधार, UPI, MyGov और eSanjeevani (44+ करोड़ डिजिटल स्वास्थ्य परामर्श) शामिल हैं, भागीदारी आधारित शासन और बड़े पैमाने पर सेवा प्रदायगी सुदृढ़ बनती है।
- डेटा गोपनीयता के लिये अनिवार्यता: इन प्लेटफॉर्मों के माध्यम से उत्पन्न व्यक्तिगत डेटा की विशालता एवं संवेदनशीलता डेटा के दुरुपयोग, साइबर खतरों और गोपनीयता उल्लंघनों के जोखिम को बढ़ाती है।
- भारत में फिशिंग, रैनसमवेयर, पहचान की चोरी, UPI और ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी जैसी घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही है। वर्ष 2024 में देश में 1.91 मिलियन साइबरक्राइम शिकायतें दर्ज हुईं, जो डिजिटल वित्तीय संवेदनशीलता के पैमाने को दर्शाती हैं।
- इससे यह स्पष्ट होता है कि डिज़ाइन के आधार पर गोपनीयता, दृढ़ कानूनी ढाँचे, साइबर सुरक्षा उपाय और संस्थागत जवाबदेही आवश्यक हैं ताकि सार्वजनिक न्यास, समावेशन और सुरक्षित डिजिटल शासन को बनाए रखा जा सके।
- ये उपाय सरकार द्वारा संचालित डिजिटल सेवाओं में जनविश्वास स्थापित करते हैं, जवाबदेही और पारदर्शिता को सुदृढ़ करते हैं तथा सुनिश्चित करते हैं कि डिजिटल नवाचार नागरिक-केंद्रित, नैतिक, समावेशी और शोषण-रहित बना रहे।
भारत का डेटा गोपनीयता ढाँचा
- सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000: भारत में डेटा संरक्षण की व्यवस्था मुख्य रूप से IT अधिनियम, 2000 के अंतर्गत की जाती रही है, जो देश का प्रमुख साइबर कानून है। यह इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों और डिजिटल हस्ताक्षरों को कानूनी मान्यता देता है तथा ई-शासन और डिजिटल वाणिज्य को सक्षम बनाता है।
- IT अधिनियम, 2000 के तहत CERT-In की स्थापना साइबर घटनाओं की प्रतिक्रिया हेतु की गई, साथ ही इसमें साइबर सुरक्षा, न्यायनिर्णयन और सामग्री विनियमन से जुड़े प्रमुख प्रावधान शामिल किये गए।
- CERT-In देश की साइबर सुरक्षा के लिये राष्ट्रीय नोडल एजेंसी है, जिसका उद्देश्य पूर्व-निवारक उपाय, त्वरित घटना-प्रतिक्रिया तथा भारत के संचार और सूचना अवसंरचना को सुरक्षित बनाना है।
- IT (इंटरमीडियरी दिशा-निर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (2025 में संशोधित): ये नियम मध्यस्थों के लिये ड्यू डिलिजेंस दायित्व निर्धारित करते हैं, समयबद्ध शिकायत निवारण को अनिवार्य बनाते हैं तथा भारत की डेटा सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप एक सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह ऑनलाइन पारिस्थितिक तंत्र सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखते हैं।
- इंटरमीडियरी (मध्यस्थ) ऐसे निकाय होते हैं जो दूसरों की ओर से डेटा का भंडारण या संप्रेषण करते हैं, जिनमें दूरसंचार और इंटरनेट सेवा प्रदाता, ऑनलाइन मार्केटप्लेस, सर्च इंजन तथा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म शामिल हैं।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023: इस अधिनियम का संबंध वर्ष 2017 के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ के फैसले में देखा जा सकता है, जहाँ गोपनीयता के अधिकार को आधिकारिक रूप से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी। हालाँकि इससे पहले भारत में एक समर्पित गोपनीयता कानून का अभाव था।
- सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 तथा भाग-III में निहित मौलिक स्वतंत्रता से उद्भूत होता है और इस पर प्रतिबंध केवल तभी लगाया जा सकता है जब राज्य की कार्रवाई त्रि-स्तरीय कसौटी पर खरी उतरे अर्थात उसके लिये विधायी आधार हो, वह किसी वैध राज्य के उद्देश्य की पूर्ति करती हो तथा लोकतांत्रिक समाज में न्यूनतम हस्तक्षेप के सिद्धांत के अनुरूप आनुपातिक हो।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 डिजिटल व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण को विनियमित करता है, जिसमें नवाचार और विकास हेतु डेटा के वैध उपयोग के साथ-साथ व्यक्तियों की निजता के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया गया है तथा यह अनुपालन के लिये SARAL (सरल, सुलभ, तर्कसंगत और क्रियान्वयन योग्य) दृष्टिकोण अपनाता है।
- डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया की स्थापना DPDP अधिनियम, 2023 के तहत अनुपालन की निगरानी करने, डेटा उल्लंघनों की जाँच करने और सुधारात्मक कार्रवाई लागू करने के लिये की गई थी। यह जवाबदेही, शिकायत निवारण और सार्वजनिक विश्वास को सुदृढ़ करता है।
- यह अधिनियम व्यक्तियों को डेटा प्रिंसिपल के रूप में सशक्त बनाता है, व्यक्तिगत डेटा पर स्पष्ट अधिकार और अधिक नियंत्रण प्रदान करता है, यह सुनिश्चित करता है कि संगठन ज़िम्मेदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ कार्य करें।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियम, 2025: ये नियम DPDP अधिनियम, 2023 को क्रियान्वित करते हैं, जिनके माध्यम से एक नागरिक-केंद्रित डेटा संरक्षण व्यवस्था स्थापित होती है एवं यह व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा को सुनिश्चित करते हैं तथा नवाचार और ज़िम्मेदार उपयोग को सक्षम बनाते हैं।
- DPDP अधिनियम के साथ ये नियम अधिकारों, ज़िम्मेदारियों और प्रवर्तन तंत्र को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं, संस्थागत जवाबदेही को सुदृढ़ करते हैं और भारत में सुरक्षित, पारदर्शी एवं भविष्य के लिये तैयार डिजिटल शासन सुनिश्चित करते हैं।
डेटा प्राइवेसी और सुरक्षा तैयारी पहल
|
पहल / तंत्र |
मुख्य विशेषताएँ एवं महत्त्व |
|
गृह मंत्रालय के नेतृत्व वाली नोडल संस्था, साइबर अपराधों की रोकथाम, पता लगाने और प्रतिक्रिया पर ध्यान केंद्रित करती है, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों पर। |
|
|
राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) और नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग और प्रबंधन प्रणाली (CFCFRMS) |
साइबर अपराध और वित्तीय धोखाधड़ी की वास्तविक समय में रिपोर्टिंग सक्षम बनाता है; राष्ट्रव्यापी पहुँच के लिये हेल्पलाइन 1930 द्वारा समर्थित। |
|
साइबर धोखाधड़ी निवारण केंद्र (CFMC) |
यह बैंकों, दूरसंचार एजेंसियों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में समन्वय स्थापित करने में मदद करता है ताकि खातों, सिम कार्डों और उपकरणों को ब्लॉक किया जा सके। |
|
सहयोग प्लेटफॉर्म और सस्पेक्ट रजिस्ट्री |
अवैध ऑनलाइन सामग्री को शीघ्रता से हटाने के लिये सहयोग और धोखाधड़ी से जुड़े डिजिटल पहचानकर्त्ताओं और अवैध खातों की पहचान के लिये संदिग्ध रजिस्ट्री। |
|
C-DAC साइबर सुरक्षा समाधान |
विदेशी प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता कम करने और डिजिटल संप्रभुता को बढ़ाने के लिये स्वदेशी उपकरणों का विकास। |
|
राष्ट्रीय साइबर फोरेंसिक प्रयोगशालाएँ |
डेटा उल्लंघन विश्लेषण, साक्ष्य संरक्षण और साइबर अपराध अभियोजन के लिये फोरेंसिक सहायता प्रदान करना। |
|
साइबर अपराध विश्लेषण, अंतर-राज्यीय समन्वय और साइबर अपराध अवसंरचना के भू-मानचित्रण के लिये राष्ट्रीय प्रबंधन सूचना प्रणाली |
|
|
साइट्रेन (2019) और साइबर कमांडो कार्यक्रम (2024) |
कानून प्रवर्तन एजेंसियों और संस्थानों में कुशल साइबर सुरक्षा कार्यबल को सुदृढ़ करना। |
|
यह बॉटनेट क्लीनिंग और मैलवेयर विश्लेषण केंद्र के रूप में कार्य करता है, जो फ्री मैलवेयर डिटेक्शन और रिमूवल टूल प्रदान करता है। यह डेली अलर्ट भी प्रदान करता है और साइबर सुरक्षा के सर्वोत्तम तरीकों का प्रसार करता है। |
भारत में डेटा संरक्षण की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
- राज्य द्वारा दी गई छूट और संवैधानिक असंतुलन: DPDP अधिनियम, 2023 राज्य को स्वतंत्र या न्यायिक निरीक्षण के बगैर अपने को मुख्य दायित्वों से छूट देने की अनुमति देता है।
- यह एक असमान गोपनीयता व्यवस्था बनाता है जहाँ नागरिक निजी कारकों से तो सुरक्षित हैं लेकिन सरकार से नहीं। यह असमानता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गोपनीयता के मौलिक अधिकार को कमज़ोर करती है।
- कार्यकारी नियंत्रित नियामक: डेटा संरक्षण बोर्ड का गठन और प्रशासन कार्यपालिका द्वारा किया जाता है, जो स्वयं सबसे बड़ा डेटा केंद्र है।
- यह नियामकीय स्वतंत्रता को कमज़ोर करता है और पक्षपातपूर्ण प्रवर्तन की चिंताएँ बढ़ाता है। प्रभावी डेटा संरक्षण के लिये एक दूरस्थ नियामक की आवश्यकता है, न कि कार्यकारी निरीक्षण की।
- पीड़ितों को प्रतिकर का अभाव: यद्यपि कानून डेटा न्यासी (डेटा फिड्यूशियरी) पर कठोर आर्थिक दंड लगाता है, फिर भी प्रभावित व्यक्तियों को प्रत्यक्ष मुआवज़े का कोई अधिकार प्रदान नहीं किया गया है।
- दंड राज्यों को संदर्भित होते हैं, पीड़ितों को नहीं, जिससे डेटा संरक्षण एक अधिकार ढाँचे के बजाय राजस्व तंत्र बन जाता है।
- नागरिकों को मुआवज़े के लिये दीवानी न्यायालयों का रुख करना पड़ता है, जो व्यवहार में गोपनीयता सुरक्षा को दुर्गम बनाता है।
- AI और "सार्वजनिक डेटा" का ग्रे ज़ोन: सार्वजनिक रूप से उपलब्ध व्यक्तिगत डेटा की छूट AI प्रशिक्षण और डेटा स्क्रैपिंग में अस्पष्टता उत्पन्न करती है।
- ऑनलाइन साझा की गई व्यक्तिगत जानकारी को सार्थक सहमति के बगैर पुन: उपयोग किया जा सकता है। यह जेनरेटिव AI और डीपफेक के युग में व्यक्तिगत नियंत्रण को कमज़ोर करता है।
- कमज़ोर उपाय और जटिल शिकायत निवारण: शिकायत तंत्र बहुस्तरीय है, जिसके लिये नागरिकों को कंपनी, नियामक और अधिकरण का क्रमिक रूप से रुख करना पड़ता है।
- यह जटिलता सामान्य उपयोगकर्त्ताओं को निजता उल्लंघन के मामलों में आगे बढ़ने से हतोत्साहित करती है, जिसके परिणामस्वरूप व्यवहार में न्याय तक पहुँच सीमित ही बनी रहती है।
- साइबर सुरक्षा क्षमता घाटा: कानूनी सुरक्षा उपाय साइबर प्रवर्तन क्षमता और कौशल की कमी से कमज़ोर होते हैं।
- AI-सक्षम धोखाधड़ी, डीपफेक और सोशल इंजीनियरिंग तकनीकी खामियों के बजाय मानवीय विश्वास का शोषण करते हैं। साइबर क्षमता के बिना डेटा संरक्षण काफी हद तक प्रतीकात्मक रहता है।
भारत में डेटा संरक्षण मज़बूत करने के लिये क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
- नियामक की संरचनात्मक स्वतंत्रता: भारत के डेटा संरक्षण बोर्ड को एक कार्यकारी निकाय के बजाय स्वतंत्र नियामक के रूप में काम करना चाहिये। कॉलेजियम-आधारित नियुक्ति प्रणाली अपनाने से इसे राजनीतिक प्रभाव से सुरक्षित रखा जा सकेगा।
- राज्य (सरकार) के खिलाफ विश्वसनीय निर्णय के लिये ऐसी संस्थागत स्वतंत्रता अनिवार्य है, क्योंकि राज्य सबसे बड़ा 'डेटा फिडुशियरी' (डेटा का संरक्षक) है।
- सरकारी छूट पर न्यायिक निगरानी: निगरानी के लिये पूर्व न्यायिक या स्वतंत्र अनुमति लागू करने से दुरुपयोग रोका जा सकता है, जिससे सुरक्षा चिंताओं और संवैधानिक गोपनीयता संरक्षण में संतुलन बना रहता है।
- पीड़ित-केंद्रित क्षतिपूर्ति तंत्र: वसूले गए जुर्मानों से संचालित एक समर्पित डेटा संरक्षण क्षतिपूर्ति कोष पीड़ितों को त्वरित राहत प्रदान करेगा। DPBI को एक्स-ग्रेशिया राहत देने का अधिकार देने से गोपनीयता प्रवर्तन नागरिक-केंद्रित बनेगा।
- द्विपक्षीय डेटा समझौतों को प्रोत्साहन: सुरक्षित डेटा आदान-प्रदान को सक्षम करने के लिये द्विपक्षीय और बहुपक्षीय समझौतों का समर्थन किया जाना चाहिये, बजाय इसके कि अलगाववादी या प्रतिबंधात्मक नीतियाँ अपनाई जाएँ।
- कंसेंट मैनेजर में प्राइवेसी बाय डिज़ाइन: खुले, इंटरऑपरेबल और गैर-लाभकारी मॉडल (जैसे– अकाउंट एग्रीगेटर) को अनिवार्य करने से दुरुपयोग और डार्क पैटर्न रोके जा सकते हैं। इससे उपयोगकर्त्ता की सहमति सार्थक, सूचित और उपयोगकर्त्ता-केंद्रित बनी रहती है।
निष्कर्ष
डेटा प्राइवेसी दिवस भारत के डिजिटल पारिस्थितिक तंत्र में विश्वास और डेटा सुरक्षा के महत्त्व को रेखांकित करता है। DPDP ढाँचा और मज़बूत साइबर सुरक्षा संस्थाओं के माध्यम भारत एक सुरक्षित डिजिटल भविष्य की ओर बढ़ रहा है। यह राज्य, प्लेटफॅार्म और नागरिकों के डिजिटल अधिकारों की सुरक्षा में साझा ज़िम्मेदारी को भी मज़बूती देता है।
|
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “डेटा संरक्षण डिजिटल रूप से शासित समाज में एक लोकतांत्रिक अनिवार्यता है।” भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. अंतर्राष्ट्रीय डेटा प्राइवेसी दिवस क्या है और इसे क्यों मनाया जाता है?
यह दिवस 28 जनवरी को मनाया जाता है, ताकि डेटा संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके और कन्वेंशन 108 को स्मरण किया जा सके, जो विश्व की पहली कानूनी रूप से बाध्यकारी डेटा संरक्षण संधि है।
2. भारत के डिजिटल फुटप्रिंट से क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ शासन, सेवाओं और दैनिक जीवन में आधार, UPI, MyGov और eSanjeevani जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का बड़े पैमाने पर उपयोग है।
3. DPDP अधिनियम, 2023 का क्या महत्त्व है?
यह एक नागरिक-केंद्रित डेटा संरक्षण ढाँचा स्थापित करता है, जिसमें व्यक्तियों को डेटा प्रिंसिपल के रूप में सशक्त किया गया है और डेटा सँभालने वालों की जवाबदेही सुनिश्चित की गई है।
4. DPDP अधिनियम के तहत डेटा संरक्षण लागू करने वाली संस्था कौन-सी है?
डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया, जो अनुपालन की निगरानी करता है, डेटा उल्लंघनों की जाँच करता है और सुधारात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करता है।
5. कानून के अलावा भारत साइबर सुरक्षा को कैसे मज़बूत करता है?
CERT-In, I4C, NCRP, CFMC, साइबर स्वच्छता केंद्र तथा CyTrain और साइबर कमांडो जैसे क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1: भारत में किसी व्यक्ति के साइबर बीमा कराने पर, निधि की हानि की भरपाई एवं अन्य लाभों के अतिरिक्त, सामान्यतः निम्नलिखित में से कौन-कौन से लाभ दिये जाते हैं? (2020)
- यदि कोई मैलवेयर कंप्यूटर तक उसकी पहुँच बाधित कर देता है, तो कंप्यूटर प्रणाली को पुनः प्रचालित करने में लगने वाली लागत
- यदि यह प्रमाणित हो जाता है कि किसी शरारती तत्त्व द्वारा जान-बूझकर कंप्यूटर को नुकसान पहुँचाया गया है तो नए कंप्यूटर की लागत
- यदि साइबर बलात्-ग्रहण होता है तो इस हानि को न्यूनतम करने के लिये विशेषज्ञ परामर्शदाता की सेवाएँ लेने पर लगने वाली लागत
- यदि कोई तीसरा पक्ष मुकदमा दायर करता है तो न्यायालय में बचाव करने में लगने वाली लागत
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1, 2 और 4
(b) केवल 1, 3 और 4
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (B)
प्रश्न 2: भारत में साइबर सुरक्षा घटनाओं पर रिपोर्ट करना निम्नलिखित में से किसके/किनके लिये विधितः अधिदेशात्मक है/हैं ? (2017)
- सेवा प्रदाता (सर्विस प्रोवाइडर)
- डेटा सेंटर
- कॉर्पोरेट निकाय (बॉडी कॉर्पोरेट)
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 3
(d) 1,2 और 3
उत्तर: (D)
मेन्स
प्रश्न. साइबर सुरक्षा के विभिन्न तत्त्व क्या हैं? साइबर सुरक्षा की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए समीक्षा कीजिये कि भारत ने किस हद तक एक व्यापक राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीति सफलतापूर्वक विकसित की है। (2022)
वर्षांत समीक्षा 2025: कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय
कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) ने वर्षांत समीक्षा 2025 जारी की है। इसमें इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि वर्ष 2014 में अपनी शुरुआत से, जिस समय लाखों युवा भारतीय हर साल उद्योग के लिये तैयार कौशलों के बिना कार्यबल में शामिल हो रहे थे, भारत का कौशल पारितंत्र किस प्रकार विकसित हुआ है।
कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय ने भारत की कौशल विकास प्रणाली को कैसे रूपांतरित किया?
- PMKVY 4.0: प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) के चौथे संस्करण में एक बड़ा बदलाव आया है, जहाँ अब 'लक्ष्य-आधारित नामांकन' के बजाय 'मांग-आधारित कौशल विकास' पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
- दिसंबर 2025 तक 38 क्षेत्रों और 732 ज़िलों में 27.08 लाख उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया जा चुका है, जो इसके वास्तविक अखिल भारतीय विस्तार को दर्शाता है।
- 102 भविष्य-उन्मुख कौशल भूमिकाओं और 77 अनुकूलित पाठ्यक्रमों की शुरुआत से यह दर्शाया गया है कि केवल सामान्य प्रशिक्षण का विस्तार करने के बजाय, 'औद्योगिक 4.0' और 'ग्रीन जॉब्स' जैसे प्रासंगिक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कौशल विकास किया गया है।
- "PMKVY को पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना, वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, पीएम-जनमन, पीएम स्वनिधि और जल जीवन मिशन जैसी प्रमुख फ्लैगशिप योजनाओं के साथ जोड़ा गया है। यह मुख्य विकास कार्यक्रमों के भीतर कौशल विकास को शामिल करने और सरकार के एकीकृत दृष्टिकोण को दर्शाता है।
- ITI के माध्यम से व्यावसायिक शिक्षा का पुनर्निर्माण: MSDE ने औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (ITI) का विस्तार और आधुनिकीकरण किया, ताकि वे कार्यबल तैयार करने में अपनी भूमिका को पुनः स्थापित कर सकें। ITI में नामांकन करने वाले प्रशिक्षुओं की संख्या 9.5 लाख से बढ़कर 14 लाख से अधिक हो गई।
- PM–SETU (प्रधानमंत्री स्किलिंग और रोज़गार योग्यतावर्द्धन परियोजना) का शुभारंभ: मई 2025 में PM–SETU की शुरुआत ने गुणवत्तापरक बदलाव को चिह्नित किया, जिसमें ITI को उद्योग-नेतृत्व वाले क्लस्टरों (हब-एंड-स्पोक मॉडल) तथा राज्य-विशेष आर्थिक क्षमताओं के अनुरूप जोड़ा गया जिससे लंबे समय से मौजूद रोज़गार योग्यतावाद तथा क्षेत्रीय असंगति की समस्याओं का समाधान हुआ।
- STRIVE परियोजना: विश्व बैंक द्वारा समर्थित STRIVE परियोजना ने ITI और उद्योग क्लस्टरों के आधुनिकीकरण के माध्यम से व्यावसायिक प्रशिक्षण को मज़बूत किया।
- रोज़गार के लिये प्रशिक्षु को एक व्यापक सेतु के रूप में: राष्ट्रीय प्रशिक्षु संवर्द्धन योजना (NAPS) के तहत अप्रेंटिसशिप को केवल एक पारंपरिक विकल्प नहीं, बल्कि मुख्य कौशल विकास मार्ग के रूप में व्यापक रूप से बढ़ाया गया।
- 2016 से अब तक 49.18 लाख से अधिक प्रशिक्षु उम्मीदवारों को शामिल किया गया है, जिनमें से केवल वित्तीय वर्ष 2024–26 के दौरान लगभग 18 लाख नियुक्तियाँ हुईं।
- महिलाओं की भागीदारी 11.3% (2018–19) से बढ़कर 22.84% (2024–25) हो गई, जो पैमाना और समावेशिता दोनों को दर्शाता है।
- पारंपरिक कौशल को मुख्यधारा में लाना: सितंबर 2023 में शुरू की गई PM विश्वकर्मा योजना ने पारंपरिक कारीगरों की संरचनात्मक उपेक्षा को दूर किया और उन्हें औपचारिक कौशल विकास तथा ऋण प्रणाली में शामिल किया।
- वर्ष 2025 तक 18 पारंपरिक व्यवसायों में 23.66 लाख कारीगरों को प्रशिक्षित और प्रमाणित किया जा चुका है।
- कौशल उन्नयन, उपकरण किट और बैंक ऋण का संयोजन दर्शाता है कि यह पहल केवल सांस्कृतिक संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि आय-केंद्रित कौशल आधुनिकीकरण की ओर बढ़ी है, जो विशेष रूप से अनौपचारिक और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं के लिये प्रासंगिक है।
- डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर: 2023 में लॉन्च किया गया स्किल इंडिया डिजिटल हब (SIDH) विस्तृत शासन का आधार बन गया।
- सितंबर 2025 तक SIDH में 1.6 करोड़ उम्मीदवारों का पंजीकरण हुआ, 30,000+ प्रशिक्षण केंद्र जुड़े और विभिन्न योजनाओं के तहत 1,100 करोड़ रुपये से अधिक का डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) संभव हुआ।
- वर्ष 2019 में शुरू किया गया 'भारत स्किल्स' पोर्टल, 'स्किल इंडिया डिजिटल हब' (SIDH) के पूरक के रूप में एक समृद्ध ऑनलाइन कंटेंट रिपॉज़िटरी की तरह कार्य करता है। 75.37 लाख से अधिक उपयोगकर्त्ताओं और 4.44 करोड़ हिट्स के साथ, यह ITI प्रशिक्षुओं और शिक्षकों को महत्त्वपूर्ण डिजिटल शिक्षण सहायता प्रदान कर रहा है।
- यह डेटा दर्शाता है कि डिजिटल एकीकरण ने MSDE को कौशल विकास को तेज़ी से बढ़ाने, साथ ही पारदर्शिता, निगरानी और वित्तीय नियंत्रण बनाए रखने में सक्षम बनाया।
- उद्यमिता: नौकरी सृजन के एक प्रमुख प्रेरक के रूप में उद्यमिता को मान्यता देते हुए, MSDE ने दिसंबर 2025 तक 12.75 लाख से अधिक व्यक्तियों को प्रशिक्षित किया, जिसके परिणामस्वरूप 26,000+ उद्यमों का सृजन हुआ। इसमें महिलाओं द्वारा संचालित उद्यमों को बढ़ावा देने के लिये स्वावलंबिनी महिला उद्यमिता कार्यक्रम, जो वर्ष 2025 की शुरुआत में लॉन्च हुआ, जैसे लक्षित प्रयासों का योगदान रहा।
- क्षमता निर्माण को पूरक बनाते हुए, क्रेडिट गारंटी फंड स्कीम फॉर स्किल डेवलपमेंट को वर्ष 2024 में पुनर्निर्मित किया गया, जिसमें पात्र ऋणदाताओं का दायरा बढ़ाया गया, ऋण सीमा 7.5 लाख रुपये तक बढ़ाई गई और गारंटी कवरेज में सुधार किया गया।
- जन शिक्षण संस्थान: इसने महिलाओं, जनजातीय और वंचित समूहों को लक्षित करके अंतिम छोर तक समावेश सुनिश्चित किया।
- वर्ष 2018 और दिसंबर 2025 के बीच 33.55 लाख लाभार्थियों को प्रशिक्षित किया गया, जिनमें से डिजिटल एकीकरण के बाद 7.08 लाख NCVET-अनुपालन प्रमाणपत्र जारी किये गए।
- इसने यह सुनिश्चित किया कि राष्ट्रव्यापी पैमाना केवल शहरी-केंद्रित न रहे, बल्कि श्रम शक्ति के अनौपचारिक और संवेदनशील वर्गों तक विस्तारित हो।
- भारतीय कौशल का वैश्वीकरण: कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) ने सरकार-से-सरकार (G2G) समझौतों और स्किल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर का लाभ उठाकर भारत को एक वैश्विक कौशल आपूर्तिकर्त्ता के रूप में स्थापित किया।
- नवंबर 2025 तक SIIC में 8,313 उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया गया था। यह अनौपचारिक प्रवासन से विनियमित, कौशल-आधारित वैश्विक गतिशीलता की ओर एक बदलाव को दर्शाता है, जो घरेलू कौशल को अंतर्राष्ट्रीय श्रम की मांग के साथ संरेखित करता है।
- सुदृढ़ शासन और गुणवत्ता:
- NCVET (2018): योग्यताओं को मानकीकृत करने, गुणवत्ता सुनिश्चित करने और राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचा (NSQF) के तहत व्यावसायिक शिक्षा को विनियमित करने के लिये शीर्ष नियामक के रूप में स्थापित किया गया।
- भारतीय कौशल विकास सेवा (ISDS) (2017): कौशल विकास योजनाओं के प्रशासन को पेशेवर बनाने और मज़बूत करने के लिये स्थापित की गई।
- संकल्प कार्यक्रम (2018–2025): आजीविका संवर्द्धन के लिये कौशल अधिग्रहण और ज्ञान के प्रति जागरूकता (संकल्प) कार्यक्रम, विश्व बैंक समर्थित पहल ने ज़िला और राज्य स्तरीय योजना के माध्यम से संस्थागत क्षमता को सुदृढ़ किया तथा कौशल विकास को विकेंद्रीकृत किया।
- कौशल अंतराल अध्ययन: घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मांग के साथ प्रशिक्षण को संरेखित करने के लिये राष्ट्रीय और वैश्विक कौशल अंतराल पर ध्यान केंद्रित किया।
राष्ट्रीय व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण परिषद (NCVET)
- NCVET भारत के तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण (TVET) तंत्र के लिये शीर्ष नियामक है।
- एनसीवीईटी (NCVET) पुरस्कार प्रदान करने एवं मूल्यांकन करने वाली संस्थाओं का विनियमन कर, NSQF-समन्वित योग्यताओं को अनुमोदित कर तथा प्रभावी पर्यवेक्षण और शिकायत निवारण सुनिश्चित करते हुए समान मानकों को लागू करता है। यह ढाँचा राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचा (NSQF) पर आधारित है तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और नेशनल क्रेडिट फ्रेमवर्क के अनुरूप संरेखित है।
- कौशल विकास क्षेत्र में विद्यमान बिखराव, असंगत मानकों और गुणवत्ता की कमियों को दूर करने के उद्देश्य से इसने पूर्ववर्ती राष्ट्रीय कौशल विकास एजेंसी (NSDA) तथा राष्ट्रीय व्यावसायिक प्रशिक्षण परिषद (NCVT) की भूमिकाओं को अपने अंतर्गत समाहित कर लिया।
- राष्ट्रीय कौशल योग्यता समिति के माध्यम से NCVET ने भविष्योन्मुखी योग्यता, माइक्रो-क्रेडेंशियल और इंडिया स्किल्स स्टैंडर्ड को सक्षम किया है।
- NCVET के तहत प्रमुख पहलें:
- कौशलवर्स (डिजिटल गवर्नेंस): वास्तविक समय, डेटा-संचालित निगरानी के लिये डिजिटल मान्यता, अनुमोदन, निगरानी और शिकायत निवारण।
- SOAR (AI रेडीनेस के लिये कौशल विकास): NSQF संरेखित सूक्ष्म-प्रमाणपत्रों के माध्यम से कक्षा 6-12 और शिक्षकों के लिये आधारभूत AI साक्षरता शुरू की।
- रोज़गार क्षमता और जीवन कौशल ढाँचा: सॉफ्ट स्किल्स, कार्यस्थल तत्परता और 21वीं सदी के दक्षताओं को मज़बूत करने के लिये एक राष्ट्रीय ढाँचा शुरू किया।
- अप्रेंटिसशिप क्रेडिटीकरण: अप्रेंटिसशिप लर्निंग के परिणामों को मानकीकृत किया और डिजी लॉकर एवं शैक्षणिक क्रेडिट बैंक के साथ क्रेडिट को जोड़ा।
- सेमीकंडक्टर कार्यबल रणनीति: सेमीकंडक्टर क्षेत्र के लिए भविष्य-उन्मुख प्रतिभा शृंखला तैयार करने के उद्देश्य से, उद्योग-नेतृत्वित और चरणबद्ध (स्टैकेबल) योग्यताओं का विकास किया गया है।
|
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत के कौशल विकास और उद्यमशीलता मंत्रालय ने भारत की स्किलिंग रणनीति को संख्या-केंद्रित से मांग-आधारित परिणामों की ओर स्थानांतरित कैसे किया है? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना 4.0 (PMKVY 4.0) क्या है और यह पिछले चरणों से कैसे अलग है?
PMKVY 4.0 नामांकन के मात्रात्मक लक्ष्यों पर नहीं, बल्कि मांग-आधारित कौशल विकास पर केंद्रित है, जिसमें उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप भविष्य-कौशल आधारित रोज़गार भूमिकाएँ तथा अनुकूलित पाठ्यक्रम शामिल किये गए हैं।
2. भारत के स्किलिंग ईकोसिस्टम में NCVET की क्या भूमिका है?
NCVET शीर्ष नियामक है जो योग्यताओं को मानकीकृत करता है, पुरस्कार और मूल्यांकन निकायों को विनियमित करता है एवं NEP 2020 के साथ संरेखित NSQF के तहत गुणवत्ता आश्वासन सुनिश्चित करता है।
3. हाल के वर्षों में अप्रेंटिसशिप भागीदारी में कैसे सुधार हुआ है?
राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रशिक्षण योजना (NAPS) के तहत वर्ष 2016 की तुलना में 49 लाख से अधिक अप्रेंटिस शामिल किये गए हैं, जिसमें महिलाओं की भागीदारी लगभग 23% तक बढ़ी है, जिसे डीबीटी और सरलीकृत अनुपालन से समर्थन मिला है।
4. स्किल इंडिया डिजिटल हब (SIDH) का क्या महत्त्व है?
SIDH कौशल विकास के लिये एक डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे के रूप में कार्य करता है, जो एंड-टू-एंड ट्रैकिंग, प्रमाणन, DBT और 1.6 करोड़ से अधिक पंजीकरण के साथ नौकरी मिलान को सक्षम बनाता है।
5. PM विश्वकर्मा योजना का क्या महत्त्व है?
PM विश्वकर्मा योजना पारंपरिक कारीगरों को औपचारिक कौशल प्रशिक्षण, ऋण तथा प्रमाणन प्रणालियों से जोड़ते हुए, सांस्कृतिक संरक्षण तक सीमित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर आय और उत्पादकता में वृद्धि पर केंद्रित है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के सन्दर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)
- यह श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय की फ्लैगशिप स्कीम है।
- यह, अन्य चीज़ों के साथ-साथ, सॉफ्ट स्किल, उद्यमवृत्ति, वित्तीय और डिजिटल साक्षरता में भी प्रशिक्षण उपलब्ध कराएगी।
- यह देश के अविनियमित कार्यबल की कार्यकुशलताओं को राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचा (नेशनल स्किल क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क) के साथ जोड़ेगी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (c)
मेंस
प्रश्न. "भारत में जनांकिकीय लाभांश तब तक सैद्धांतिक ही बना रहेगा जब तक कि हमारी जनशक्ति अधिक शिक्षित, जागरूक, कुशल और सृजनशील नहीं हो जाती।" सरकार ने हमारी जनसंख्या को अधिक उत्पादनशील और रोज़गार योग्य बनने की क्षमता में वृद्धि के लिये कौन-से उपाय किये हैं? (2016)



.webp)