डेली न्यूज़ (19 Mar, 2026)



ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026

प्रिलिम्स के लिये: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026, सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ, 2014, ट्रांसजेंडर, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये राष्ट्रीय परिषद, आयुष्मान भारत, विश्व बैंक, सकल घरेलू उत्पाद                 

मेन्स के लिये: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 में प्रस्तावित प्रमुख बदलाव और उनसे संबंधित चिंताएँ, ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के प्रमुख प्रावधान, भविष्य में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सशक्त बनाने के लिये आवश्यक कदम।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

चर्चा में क्यों?

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया है, जो ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में प्रमुख बदलाव प्रस्तावित करता है।

  • ट्रांसजेंडर कार्यकर्त्ताओं को भय है कि इन संशोधनों का उद्देश्य भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों के कानूनी ढाँचे को पुनर्गठित कर सकता है, जो सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ, 2014 के फैसले को अधिभावी कर सकता है।

सारांश

  • ट्रांसजेंडर व्यक्ति (संशोधन) विधेयक, 2026 स्व-पहचान के अधिकार को एक चिकित्सा प्रमाणन प्रक्रिया से बदलने का प्रस्ताव करता है, जो NALSA निर्णय (2014) के विपरीत है।
  • अपराधों के लिये सख्त दंड की प्रस्तुति करते हुए यह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा को संकुचित करता है।
  • इससे क्लिनिकल गेटकीपिंग और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के बहिष्कार के बारे में चिंताएँ बढ़ गई हैं।

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 में प्रस्तावित परिवर्तन क्या हैं?

  • स्व-पहचान का उन्मूलन: वर्ष 2026 का विधेयक अधिनियम 2019 की धारा 4(2) को हटा देता है, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति के रूप में स्व-पहचान करने का अधिकार निहित था। सरकार का तर्क है कि मूल परिभाषा "अस्पष्ट" थी और इससे "वास्तविक रूप से उत्पीड़ित" लाभार्थियों की पहचान करना मुश्किल हो गया था।
    • सरकार का यह भी मानना है कि मौज़ूदा परिभाषा कई आपराधिक, नागरिक और व्यक्तिगत कानूनों को "अव्यावहारिक" बनाती है और यह विभिन्न वैधानिक प्रावधानों के साथ "संगत नहीं" है। कानून का इच्छित उद्देश्य विविध लैंगिक पहचानों, स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान वाले व्यक्तियों के प्रत्येक वर्ग की रक्षा करना कभी नहीं था।
    • सीमित परिभाषा: ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति’ की परिभाषा को काफी सीमित कर दिया गया है। यह मुख्य रूप से उन लोगों को मान्यता देती है जिनकी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान होती है (जैसे– किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता) या ऐसे व्यक्तियों को, जिनमें जन्मजात जैविक भिन्नताओं की एक निर्धारित, चिकित्सकीय सूची (जैसे– गुणसूत्र पैटर्न, गोनैडल विकास आदि) पाई जाती है।
  • नाम परिवर्तन: इसमें प्रस्तावित किया गया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति अपने जन्म प्रमाण पत्र और पहचान दस्तावेज़ों में अपना पहला नाम बदल सकते हैं। इसके लिये व्यक्तियों को “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की नई प्रस्तावित वैधानिक परिभाषा को पूरा करना होगा।
  • चिकित्सकीय प्रमाणन की शुरुआत: यह पहचान पत्र जारी करने की प्रशासनिक प्रक्रिया को बदलकर एक चिकित्सा बोर्ड (मुख्य चिकित्सा अधिकारी की अध्यक्षता में) के अधीन कर देता है। अब पहचान प्रमाण पत्र जारी करने से पहले ज़िला मजिस्ट्रेट के लिये इस बोर्ड की सिफारिश पर विचार करना अनिवार्य होगा।
  • निगरानी में वृद्धि: राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये राष्ट्रीय परिषद में प्रतिनिधियों को अब संबंधित मंत्रालय या विभाग में कम-से-कम निदेशक स्तर का अधिकारी होना आवश्यक है, जो उच्च स्तर की नौकरशाही निगरानी को बढ़ावा देने का संकेत देता है।
  • जबरन पहचान के लिये नया आपराधिक प्रावधान: यह विधेयक ‘जबरन’ ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के मामलों को संबोधित करने हेतु एक अलग श्रेणी प्रस्तुत करता है। यह किसी व्यक्ति को बल, धोखे या प्रलोभन के माध्यम से ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिये मजबूर करने (जैसे– नपुंसकीकरण या हाॅर्मोनल बदलाव जैसी प्रक्रियाएँ करवाना) को दंडनीय बनाता है।
  • बढ़ी हुई सज़ाएँ: यह विधेयक कड़े दंडात्मक प्रावधानों को प्रस्तुत करता है।
    • किसी वयस्क का अपहरण कर उसे ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिये मजबूर करने पर न्यूनतम 10 वर्ष के कठोर कारावास (RI) की सज़ा हो सकती है, जो आजीवन कारावास तक बढ़ाई जा सकती है। यदि यही अपराध किसी बच्चे के साथ किया जाता है, तो आजीवन कठोर कारावास अनिवार्य है और न्यूनतम ₹5 लाख का जुर्माना लगाया जाएगा।
    • किसी वयस्क ट्रांसजेंडर व्यक्ति को भीख माँगने या बँधुआ मज़दूरी के लिये मजबूर करने पर 5 से 10 वर्ष तक की कठोर कारावास (RI) का प्रावधान है। वहीं यदि यही अपराध किसी बच्चे के साथ किया जाता है, तो 10 से 14 वर्ष तक का कारावास निर्धारित है।

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 से जुड़े प्रमुख भय/चिंताएँ क्या हैं?

  • स्व-पहचान के सिद्धांत का अस्वीकार: 2019 के अधिनियम की धारा 4(2) को हटाकर यह विधेयक सीधे तौर पर NALSA बनाम भारत संघ के मूल सिद्धांत के विपरीत जाता है, जिसने स्व-निर्धारण के अधिकार को मान्यता दी थी और यह कहा था कि इसे बाहरी, विशेष रूप से चिकित्सकीय माध्यमों से साबित करने की आवश्यकता नहीं है।
  • क्लिनिकल गेटकीपिंग: यह विधेयक, मुख्य चिकित्सा अधिकारी की अध्यक्षता वाले बोर्ड की सिफारिश को अनिवार्य बनाते हुए, ट्रांसजेंडर पहचान को व्यक्तिगत/सामाजिक पहचान की बजाय पुनः एक चिकित्सा आधारित स्थिति के रूप में स्थापित करता है।
    • किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति के लिये गहराई से जमी ट्रांसफोबिया वाली व्यवस्था में अपने अस्तित्व को साबित करना और डॉक्टरों के एक बोर्ड के सामने अपनी पहचान सिद्ध करना अत्यंत कठिन, अपमानजनक तथा पिछड़ापन दर्शाने वाला होगा।
  • जेंडर फ्लूइडिटी का बहिष्करण: स्पष्ट रूप से यह उल्लेख करके कि यह कानून ‘स्व-निर्धारित’ या ‘जेंडर फ्लूइड’ पहचान वाले लोगों के लिये नहीं है, यह समुदाय के एक बड़े हिस्से की अनदेखी करता है जो कठोर जैविक श्रेणियों (rigid biological categories) हेतु उपयुक्त नहीं होते हैं।
  • सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों से बाहर के व्यक्तियों के लिये खतरा: यद्यपि यह विधेयक हिजड़ा या किन्नर जैसे समूहों को मान्यता देता है, लेकिन यह उन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अवैध घोषित करने की क्षमता रखता है जो इन पारंपरिक प्रणालियों (जैसे– गुरु-चेला प्रणाली) से स्वतंत्र रहकर अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। इसके कारण वे बिना किसी कानूनी आधार या मान्यता के रह सकते हैं।
  • प्रगति का उलटाव और सांख्यिकीय प्रभाव: 2019 के अधिनियम के तहत अब तक 32,424 ट्रांसजेंडर प्रमाण पत्र तथा पहचान पत्र पहले ही जारी किये जा चुके हैं, लेकिन यह संशोधन अनिश्चितता की स्थिति पैदा करता है। यदि परिभाषा बदलती है, तो यह स्पष्ट नहीं है कि क्या इन व्यक्तियों को नए एवं अधिक कठोर चिकित्सा मानदंडों के तहत अपनी पहचान को ‘पुनः सिद्ध’ करना होगा।
  • ‘जबरन पहचान’ प्रावधानों पर चिंता: यह आशंका है कि इन प्रावधानों का दुरुपयोग कर ट्रांसजेंडर समुदायों या उन परिवारों को निशाना बनाया जा सकता है जो किसी नाबालिग के जेंडर परिवर्तन का समर्थन करते हैं और नई कड़ी परिभाषाओं के तहत इसे ‘प्रलोभन’ या ‘उकसावा’ बताया जा सकता है।

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019, जो NALSA बनाम भारत संघ के निर्णय के बाद लागू किया गया, भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को कानूनी मान्यता और अधिकार प्रदान करता है।

  • ट्रांसजेंडर की परिभाषा: ट्रांसजेंडर से तात्पर्य उस व्यक्ति से है जिसका लिंग जन्म के समय उसे दिये गए लिंग से मेल नहीं खाता है। इसमें ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, इंटरसेक्स व्यक्ति और किन्नर व हिजड़ा जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानें शामिल हैं, चाहे कोई चिकित्सकीय हस्तक्षेप हुआ हो या नहीं।
    • जनगणना 2011 के अनुसार, भारत में ट्रांसजेंडर जनसंख्या लगभग 4.88 लाख है, जिसमें उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र शीर्ष तीन राज्य हैं।
  • स्व-पहचान का अधिकार: यह स्व-निर्धारित लैंगिक पहचान का अधिकार प्रदान करता है। पहचान प्रमाण पत्र ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा एक पूर्णतः प्रशासनिक प्रक्रिया के माध्यम से जारी किया जाता है, जिसमें किसी प्रकार की चिकित्सकीय जाँच की आवश्यकता नहीं होती।
  • भेदभाव का निषेध: यह शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य सेवाओं और सार्वजनिक सुविधाओं में भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
  • संस्थागत तंत्र: यह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये एक राष्ट्रीय परिषद की स्थापना करता है, जो सरकार को कल्याणकारी नीतियों पर सलाह देने, उनके क्रियान्वयन की निगरानी करने और विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय स्थापित करने का कार्य करती है।
  • अपराध और दंड: बलपूर्वक श्रम, दुर्व्यवहार और अधिकारों से वंचित करने जैसे अपराधों के लिये कारावास (6 माह से 2 वर्ष) और जुर्माने का प्रावधान है।

LGBTQI+

भारत को भविष्य में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सशक्त बनाने हेतु कौन-से कदम उठाने चाहिये?

  • स्व-पहचान की बहाली: यह सुनिश्चित करने के लिये कि लैंगिक पहचान चिकित्सा प्रमाणन के बजाय व्यक्तिगत स्वायत्तता का विषय बनी रहे, राष्ट्रीय कानूनों को NALSA (2014) के निर्णय के अनुरूप बनाया जाए।
    • ज़िला मजिस्ट्रेटों, पुलिसकर्मियों और चिकित्सा बोर्डों को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाए कि वे समुदाय के साथ बिना पूर्वाग्रह और ‘गेटकीपिंग’ व्यवहार के संवाद कर सकें।
  • समग्र स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच: सरकारी अस्पतालों में जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी (GRS) और हार्मोन थेरेपी को मानकीकृत किया जाए, ताकि यह सुलभ और सुरक्षित बन सके।
    • आयुष्मान भारत जैसी सार्वजनिक योजनाओं में संक्रमण-संबंधी स्वास्थ्य सेवाओं को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए तथा मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान हेतु समर्पित हेल्पलाइन और समुदाय-नेतृत्व वाले परामर्श केंद्र स्थापित किये जाएँ।
  • रोज़गार के अवसर: कर्नाटक में सरकारी सेवाओं में 1% आरक्षण और टाटा स्टील की कॉर्पोरेट विविधता भर्ती जैसे सफल मॉडलों का विस्तार किया जाना चाहिये। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट (2021) के अनुसार, कार्यबल में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के समावेशन से भारत के GDP में 1.7% तक वृद्धि हो सकती है।
  • सामाजिक जागरूकता एवं सांस्कृतिक परिवर्तन: ‘मैं भी इंसान हूँ (I Am Also Human)’ जैसे निरंतर जन-जागरूकता अभियान और सम्मानजनक मीडिया प्रस्तुति, सामाजिक पूर्वाग्रह को चुनौती देने के लिये आवश्यक हैं। इसे कोवागम उत्सव (तमिलनाडु) जैसे सांस्कृतिक प्रयासों और मणिपुर की ‘या_ऑल स्पोर्ट्स क्लब’ जैसी समावेशी पहलों (संपूर्ण ट्रांसजेंडर फुटबॉल टीम) को बढ़ावा देकर सशक्त किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

प्रस्तावित ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों की सुरक्षा) संशोधन विधेयक, 2026 ने प्रशासनिक नियमन और NALSA (2014) के निर्णय में मान्यता प्राप्त स्व-पहचान के अधिकार के बीच संतुलन पर चर्चा उत्पन्न कर दी है। भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों और गरिमा को आगे बढ़ाने के लिये कानूनी मान्यता, सामाजिक समावेश, स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच और रोज़गार के अवसर सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक होगा।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. ट्रांसजेंडर व्यक्ति (संशोधन) विधेयक, 2026 द्वारा पेश किये गए मुख्य परिवर्तनों पर चर्चा कीजिये। ये परिवर्तन भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की कानूनी और सामाजिक मान्यता पर किस प्रकार प्रभाव डालते हैं?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 क्या है?
यह ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में संशोधन का प्रस्ताव करता है, जिसमें पहचान के लिये चिकित्सा प्रमाणन और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषाओं में संशोधन शामिल है।

2. NALSA बनाम भारत संघ (2014) के निर्णय का महत्त्व क्या था?
सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी और स्व-निर्धारित लिंग पहचान को मूल अधिकार के रूप में स्थापित किया।

3. 2026 का संशोधन विधेयक लैंगिक पहचान की प्रक्रिया में कैसे बदलाव करता है?
यह ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाण पत्र जारी करने से पहले चिकित्सा बोर्ड की अनिवार्य अनुशंसा को शामिल करता है।

4. जनगणना 2011 के अनुसार भारत में अनुमानित ट्रांसजेंडर जनसंख्या कितनी है?
भारत में लगभग 4.88 लाख ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की गणना हुई थी, जिसमें उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में सबसे अधिक जनसंख्या है।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

प्रिलिम्स 

प्रश्न. भारत में, विधिक सेवा प्रदान करने वाले प्राधिकरण (Legal Services Authorities) निम्नलिखित में से किस प्रकार के नागरिकों को नि:शुल्क विधिक सेवाएँ प्रदान करते हैं? (2020) 

  1. 1,00,000 रुपए से कम वार्षिक आय वाले व्यक्ति को 
  2.  2,00,000 रुपए से कम वार्षिक आय वाले ट्रांसजेंडर को 
  3.  3,00,000 रुपए से कम वार्षिक आय वाले अन्य पिछडे़ वर्ग (OBC) के सदस्य को 
  4.  सभी वरिष्ठ नागरिकों को 

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये: 

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3 और 4
(c) केवल 2 और 3
(d) केवल 1 और 4 

उत्तर: (a) 


मेन्स 

प्रश्न. भारत में महिला सशक्तीकरण के लिये जेंडर बजटिंग अनिवार्य है। भारतीय प्रसंग में जेंडर बजटिंग की क्या आवश्यकताएँ एवं स्थिति हैं? (2016)


भारतीय राजनीति में महिलाएँ

प्रिलिम्स के लिये: लोकसभा, 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन, संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023, SVEEP

मेन्स के लिये: भारत में महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व, लैंगिक समानता और लोकतांत्रिक गहनता, समावेशी लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की भूमिका

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी एक बड़े लोकतांत्रिक विरोधाभास को उजागर करती है। चुनावी भागीदारी में वृद्धि का समानुपाती राजनीतिक प्रतिनिधित्व या निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति में पर्याप्त रूप से रूपांतरण नहीं हुआ है। यह अंतर संरचनात्मक बाधाओं और सार्थक सुधारों की आवश्यकता पर निरंतर प्रकाश डालता है।

सारांश

  • भारत ने मतदाता भागीदारी में लगभग लैंगिक समानता प्राप्त कर ली है, लेकिन महिलाएँ विधानसभाओं में संरचनात्मक, संस्थागत और सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं के कारण कम प्रतिनिधित्व में बनी हुई हैं।
  • इस अंतर को पाटने हेतु आरक्षण नीतियों का प्रभावी कार्यान्वयन, राजनीतिक दलों में सुधार और निर्णय लेने में महिलाओं की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये बाधाओं का उन्मूलन आवश्यक है।

भारतीय राजनीति में महिलाओं की वर्तमान स्थिति क्या है?

  • मतदाता के रूप में: पिछले छह दशकों में महिला और पुरुष मतदाताओं के बीच मतदान भागीदारी का अंतर धीरे-धीरे घटा है, जो भारत के चुनावी परिदृश्य में एक गहन परिवर्तन को दर्शाता है।
    • 1967 के लोकसभा चुनाव में पुरुष मतदान दर 66.7% और महिला मतदान दर 55.5% थी अर्थात 11.2 प्रतिशत का अंतर, जो 1971 में संरचनात्मक बाधाओं, जैसे– कम साक्षरता और सीमित गतिशीलता के कारण 11.8 प्रतिशत हो  गया।
    • समय के साथ शिक्षा, जागरूकता, राजनीतिक पहुँच और गतिशीलता में सुधार के कारण यह अंतर लगातार घटा और वर्ष 2014 तक लगभग 1.5 प्रतिशत रह गया।
    • वर्ष 2019 और 2024 के सामान्य चुनावों में, महिलाएँ लगभग उसी दर से वोट डालती हैं जितना पुरुष (लगभग 66%)।
      • 1980 के दशक से कई राज्य विधानसभा चुनावों में महिलाओं की मतदान भागीदारी पुरुषों से भी अधिक रही है।
  • राजनीतिक अभियानों: हालाँकि पुरुषों और महिलाओं के बीच मतदाता भागीदारी लगभग बराबर हो गई है, अभियान स्तर पर भागीदारी में अभी भी लैंगिक अंतराल दिखाई देता है।
    • वर्ष 2009 से 2024 के बीच महिलाओं की चुनावी बैठकों और रैलियों में उपस्थिति 9% से बढ़कर लगभग 16% हुई, जबकि जुलूसों और घर-घर प्रचार में भागीदारी 5-6% से बढ़कर लगभग 11% हो गई, फिर भी पुरुषों की भागीदारी लगभग दोगुनी बनी हुई है।
  • प्रतिनिधियों के रूप में: रिकॉर्ड संख्या में मतदान करने के बावजूद महिलाएँ अधिकांशतः सत्ता के गलियारों से बाहर बनी हुई हैं।
    • 18वीं लोकसभा में केवल 74 महिला सांसद हैं, जो 543 सीटों का 13.6% है। यह 17वीं लोकसभा की तुलना में गिरावट है, जिसमें 78 महिला सांसद (14.4%) थीं, जो अब तक का सबसे उच्च प्रतिनिधित्व था। भारत का यह आँकड़ा वैश्विक औसत लगभग 26% से काफी कम है।
    • राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का औसत प्रतिनिधित्व अभी भी लगभग 9% से 10% के दयनीय स्तर पर है।
    • उज्ज्वल पहलू यह है कि स्थानीय स्वशासी संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 44% से अधिक है, जिसे पंचायती राज संस्थाओं (PRI) के तहत आरक्षण प्रावधानों द्वारा समर्थित किया गया है।

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सीमित करने वाली कौन-सी बाधाएँ हैं? 

  • संस्थागत और संरचनात्मक बाधाएँ: राजनीतिक दल प्रमुख द्वारपाल के रूप में कार्य करते हैं और अक्सर महिलाओं को टिकट देने से मना कर देते हैं, यह तर्क देते हुए कि उनकी ‘जीत की संभावना’ कम है, जबकि तथ्य यह है कि महिला उम्मीदवारों की सफलता दर अक्सर तुलनीय या अधिक होती है।
    • उम्मीदवारों का चयन और पार्टी के निर्णय पुरुष-प्रधान असाधिकारिक नेटवर्क के भीतर होते हैं, जिससे महिलाओं के लिए नेतृत्व पदों तक पहुँच सीमित रह जाती है।
    • निर्वाचित होने पर भी महिलाओं को अक्सर ‘सॉफ्ट मंत्रालय’ (जैसे- महिला एवं बाल विकास, संस्कृति) सौंपा जाता है, जबकि महत्त्वपूर्ण मंत्रालय, जैसे– गृह मंत्रालय या रक्षा मंत्रालय उनके लिये उपलब्ध नहीं होते।
  • आर्थिक बाधाएँ: चुनावी राजनीति अत्यधिक पूंजी-प्रधान होती है, जिससे महिलाओं के लिये नुकसान की स्थिति बनती है, क्योंकि उनके पास सामान्यतः संपत्ति, धन और चुनावी वित्तपोषण तक कम पहुँच होती है।
    • महिलाओं को अक्सर उन राजनीतिक और वित्तीय नेटवर्क से बाहर रखा जाता है जो चुनावी अभियानों के लिये धन और संसाधन मुहैया कराते हैं।
  • सामाजिक-सांस्कृतिक और पितृसत्तात्मक बाधाएँ: पितृसत्तात्मक मानदंड समाज को सार्वजनिक (पुरुष) और निजी (महिला) क्षेत्रों में बांटते रहते हैं, जिससे महिलाओं को राजनीति में प्रवेश करने से हतोत्साहित किया जाता है।
    • अवैतनिक देखभाल कार्य और घरेलू ज़िम्मेदारियों का बोझ महिलाओं की राजनीतिक गतिविधियों के लिये समय को सीमित कर देता है।
    • कुछ मामलों में प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व देखा जाता है (जैसे– ‘सरपंच पति’ संस्कृति), जहाँ पुरुष रिश्तेदार निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों पर प्रभाव या नियंत्रण रखते हैं।
  • प्रतिकूल राजनीतिक वातावरण: राजनीति में हिंसा, डराने-धमकाने और अपराधीकरण की स्थिति महिलाओं की भागीदारी को हतोत्साहित करती है।
    • महिला राजनेताओं को अक्सर लैंगिक हमलों, चरित्र हनन और ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, जिसमें धमकियाँ और डिजिटल दुर्व्यवहार शामिल हैं। ये कारक राजनीति में सक्रिय भागीदारी के मार्ग में गंभीर मनोवैज्ञानिक बाधाएँ उत्पन्न करते हैं।
  • क्षमता और नेतृत्व पथ का अभाव: महिलाओं को अक्सर छात्र संघों और कार्यकर्त्ता नेटवर्कों जैसे पारंपरिक राजनीतिक नेतृत्व पथ से बाहर रखा जाता है। मेंटरशिप (मार्गदर्शन) तथा नेतृत्व प्रशिक्षण की कमी उनकी राजनीतिक क्षमता को सीमित करती है, जिससे कभी-कभी शासन में पुरुष रिश्तेदारों पर निर्भरता (जैसे– 'प्रधान पति' संस्कृति) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  • चुनावी प्रणाली और वर्तमान पदधारक की बाधाएँ: फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP) चुनावी प्रणाली पार्टियों को “सुरक्षित” उम्मीदवार उतारने के लिये प्रोत्साहित करती है, जो आमतौर पर मज़बूत स्थानीय नेटवर्क वाले पुरुष वर्तमान पदधारक होते हैं।
    • चूँकि अधिकांश सीटें पहले से ही पुरुषों के पास हैं, इसलिये वर्तमान पदधारक का लाभ नए प्रवेशकों के अवसरों को और सीमित कर देता है, जिससे महिलाओं के लिये चुनाव लड़ने और जीतने के अवसर असमान रूप से प्रभावित होते हैं।

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा देने हेतु भारत की क्या पहलें हैं?

  • स्थानीय शासन के लिये संवैधानिक प्रावधान: 73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992) ने पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) और शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) में महिलाओं के लिये 33% आरक्षण अनिवार्य किया।
    • बीस से अधिक राज्यों (जैसे– बिहार, मध्य प्रदेश, केरल और गुजरात) ने इस आरक्षण को 50% तक बढ़ा दिया है।
    • इसके परिणामस्वरूप भारत में अब स्थानीय स्तर पर 14 लाख से अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं।
  • नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023: संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33% आरक्षण प्रदान करता है।
    • कार्यान्वयन जनगणना 2027 और परिसीमन के बाद शुरू होगा तथा यह प्रावधान 15 वर्षों तक लागू रहेगा।
  • भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की पहलें: SVEEP (सिस्टमैटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलेक्टोरल पार्टिसिपेशन) कार्यक्रम जागरूकता बढ़ाने और लक्षित अभियानों के माध्यम से महिलाओं के मतदान प्रतिशत को बढ़ाने के लिये काम करता है।
    • “सखी” या पिंक मतदान केंद्र पूरी तरह महिलाओं द्वारा संचालित होते हैं, ताकि मतदान के दौरान एक सुरक्षित और आरामदायक वातावरण सुनिश्चित किया जा सके।
    • विशेष मतदाता पंजीकरण अभियान पहली बार मतदान करने वाली महिलाओं और विवाह के बाद स्थानांतरित होने वाली महिलाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
  • क्षमता निर्माण और नेतृत्व प्रशिक्षण: पंचायती राज मंत्रालय और राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
    • ये कार्यक्रम शासन, वित्तीय प्रबंधन और विधायी प्रक्रियाओं में कौशल विकसित करते हैं।
  • राजनीतिक दल स्तर की पहलें: कुछ पार्टियों ने स्वेच्छा से उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाई है।
    • उदाहरण के लिये, तृणमूल कांग्रेस (TMC) और बीजू जनता दल (BJD) जैसी पार्टियों ने चुनावों में महिलाओं को 33% या उससे अधिक टिकट आवंटित किये हैं।
  • स्व-सहायता समूहों (SHGs) की भूमिका: आजीविका मिशन के तहत महिला स्व-सहायता समूह नेतृत्व विकास के प्लेटफॉर्म के रूप में कार्य करते हैं।
    • SHGs में भागीदारी महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता, सार्वजनिक बोलने की क्षमता और सामूहिक निर्णय लेने के कौशल को सुधारती है, जिससे वे स्थानीय राजनीति में प्रवेश करने के लिये प्रोत्साहित होती हैं।

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को कौन-से उपाय मज़बूत कर सकते हैं?

  • 1951 के प्रतिनिधित्व कानून (RPA) में कानूनी संशोधन: राजनीतिक दलों का पंजीकरण और मान्यता महिलाओं के लिये लागू किये जाने योग्य यह आंतरिक पार्टी आरक्षण के पालन के लिये कठोर रूप से बाध्य होगा।
    • पार्टियों को अपने संगठनात्मक पदों (संसदीय बोर्ड, केंद्रीय चुनाव समितियाँ) में से कम-से-कम 33% पद महिलाओं के लिये आवंटित करने होंगे।
    • चुनावी भ्रष्टाचार की कानूनी परिभाषा को अद्यतन किया जाना अनिवार्य है। महिला उम्मीदवारों के चरित्र हनन, लैंगिक-लक्षित डीपफेक की तैनाती और हथियारबंद डिजिटल स्त्री-द्वेष को स्पष्ट रूप से 'भ्रष्ट आचरण' के रूप में संहिताबद्ध किया जाना चाहिये, जिसके परिणामस्वरूप दोषी उम्मीदवार को तत्काल अयोग्य घोषित करने का प्रावधान हो।
  • द्वि-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों का पुनरुद्धार: भारत ने वर्ष 1952 और 1957 के चुनावों में द्वि-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों का सफलतापूर्वक उपयोग किया था।
    • एकल-सदस्यीय आरक्षित सीटों को बारी-बारी से बदलने के बजाय, कुछ चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्र दो प्रतिनिधियों को चुन सकते हैं—एक पुरुष और एक महिला।
      • यह पार्टियों को प्रत्येक क्षेत्र में महिला नेतृत्व को विकसित करने के लिये मजबूर करता है, बिना पुरुष नेताओं को विस्थापित किये।
  • सटीक वित्तीय इंजीनियरिंग: निर्वाचन आयोग लैंगिक आधार पर चुनावी खर्च की सीमा में संशोधन कर सकता है।
    • चुनावी ट्रस्टों और कॉर्पोरेट दानदाताओं को बढ़े हुए कर में छूट दी जा सकती है यदि उनका दान विशेष रूप से महिला उम्मीदवारों या महिला राजनेताओं के लिये क्षमता निर्माण कार्यक्रम हेतु निर्धारित किया गया हो।
  • "प्रॉक्सी" (सरपंच पति) घटना का कानूनी रूप से समापन: ग्राम पंचायत निधियों के लिये आधार-लिंक्ड बायोमेट्रिक प्राधिकरण को अनिवार्य करके ज़मीनी स्तर पर प्रतिनिधित्व को मज़बूत किया जा सकता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि केवल निर्वाचित महिला प्रतिनिधि ही वित्तीय नियंत्रण का प्रयोग करे, जिससे पुरुष रिश्तेदारों द्वारा प्रॉक्सी शासन को रोका जा सके।
  • शैडो कैबिनेट को औपचारिक रूप देना: विपक्ष को "शेडो कैबिनेट" सिस्टम (UK) को संस्थागत बनाने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
    • टॉप शैडो डिपार्टमेंट में महिलाओं को शामिल करना अनिवार्य बनाने से उन्हें सदन में वित्त और रक्षा पर बहस करने का मौका मिलता है, जिससे गंभीर प्रशासक के रूप में उनकी दृश्यता और सार्वजनिक विश्वसनीयता बढ़ती है।

निष्कर्ष

भारत में महिलाएँ मूक मतदाता होने की तुलना में सक्रिय राजनीतिक भागीदार बन गई हैं, जो ज़मीनी स्तर के लोकतंत्र की मज़बूती को दर्शाता है। हालाँकि वास्तविक प्रगति के लिये केवल मतदान की तुलना में अधिक प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की शक्ति की आवश्यकता है। इसके लिये नारी शक्ति वंदन अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन, पार्टी-स्तरीय सुधारों और संरचनात्मक एवं पितृसत्तात्मक बाधाओं को दूर करने की आवश्यकता है, जिससे महिलाओं का नेतृत्व समावेशी शासन और एक विकसित भारत के लिये आवश्यक हो जाता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भारत में महिलाएँ पुरुषों को समान या उनसे भी अधिक संख्या में मतदान करती हैं, फिर भी विधायिकाओं में उनका प्रतिनिधित्व कम बना हुआ है। इस विरोधाभास के पीछे के कारणों की विवेचना कीजिये।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की वर्तमान स्थिति क्या है?
18वीं लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी लगभग 13.6% है, उनकी भागीदारी मतदाताओं में कम है और यह वैश्विक औसत से काफी पीछे है।

2. नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 क्या है?
यह परिसीमन के बाद लागू होने वाली लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33% आरक्षण प्रदान करता है।

3. संविधान के 73वें और 74वें संशोधनों ने महिलाओं की किस प्रकार मदद की है?
इसमें पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों में न्यूनतम 33% आरक्षण अनिवार्य किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप ज़मीनी स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व 44% से अधिक हो गया है।

4. महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में प्रमुख बाधाएँ क्या हैं?
प्रमुख बाधाओं में पितृसत्ता, पार्टी टिकटों की कमी, वित्तीय बाधाएँ, अवैतनिक देखभाल संबंधी कार्य और राजनीतिक हिंसा शामिल हैं।

5. महिलाओं की मतदान भागीदारी अधिक होने के बावज़ूद प्रतिनिधित्व कम क्यों है?
सीमित पार्टी नामांकन, ढाँचागत असमानताओं और सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं के कारण भागीदारी सत्ता में तब्दील नहीं होती।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रश्न 1. भारत में महिलाओं के समक्ष समय और स्थान संबंधित निरंतर चुनौतियाँ क्या हैं? (2019)

प्रश्न 2. विविधता, समता और समावेशिता सुनिश्चित करने के लिये उच्चतर न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की वांछनीयता पर चर्चा कीजिये। (2021)