दिव्या सिंह एवरेस्ट बेस कैंप तक साइकिल से पहुँचने वाली पहली भारतीय महिला बनीं | उत्तर प्रदेश | 09 Apr 2026
चर्चा में क्यों?
गोरखपुर की 28 वर्षीय शिक्षिका दिव्या सिंह ने एवरेस्ट बेस कैंप तक साइकिल चलाने वाली पहली भारतीय महिला बनकर इतिहास रच दिया है।
मुख्य बिंदु:
- ऐतिहासिक उपलब्धि: दिव्या सिंह साइकिल से एवरेस्ट बेस कैंप पहुँचने वाली पहली भारतीय महिला और वैश्विक स्तर पर दूसरी महिला बन गई हैं।
- वह पेशे से एक स्कूल शिक्षिका हैं।
- उन्होंने काठमांडू से एवरेस्ट बेस कैंप तक हिमालय के दुर्गम रास्तों से गुज़रते हुए 14 दिनों में इस चुनौतीपूर्ण अभियान को पूरा किया।
- ऊँचाई: बेस कैंप समुद्र तल से लगभग 17,560 फीट (5,364 मीटर) की ऊँचाई पर स्थित है।
- चुनौतियाँ: यात्रा के दौरान, उन्होंने भीषण ठंड (लगभग −12°C), ऑक्सीजन के निम्न स्तर, तेज़ हवाओं और पहाड़ों के खड़े रास्तों का सामना किया, जिसमें वे अक्सर प्रतिदिन 10-12 घंटे साइकिल चलाती थीं।
- मार्ग: उनकी यात्रा सालेरी, सुरके, फाकडिंग, नामचे बाज़ार, लोबुचे और गोरक्षेप जैसे कठिन हिमालयी स्थानों से होकर गुजरी।
मेनका गुरुस्वामी भारत की पहली खुले तौर पर क्वीर सांसद बनीं | राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स | 09 Apr 2026
चर्चा में क्यों?
वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने राज्यसभा में शपथ लेकर भारत की पहली घोषित क्वीर सांसद बनकर इतिहास रच दिया है, जो भारतीय राजनीति में LGBTQ+ प्रतिनिधित्व के लिये एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
मुख्य बिंदु:
- ऐतिहासिक उपलब्धि: मेनका गुरुस्वामी राज्यसभा के सदस्य के रूप में शपथ लेने के बाद भारत की पहली घोषित क्वीर सांसद बन गई हैं।
- उन्हें पश्चिम बंगाल राज्य से अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा के लिये चुना गया था।
- कानूनी पृष्ठभूमि: वह एक प्रसिद्ध संवैधानिक कानून विशेषज्ञ और भारत के सर्वोच्च न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।
- वह भारत में नागरिक स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकारों और LGBTQ+ समानता के लिये एक प्रमुख आवाज़ रही हैं।
- ऐतिहासिक मामला: वह ऐतिहासिक 'नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ' मामले में शामिल वकीलों में से एक थीं।
- इस मामले के परिणामस्वरूप वर्ष 2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को निरस्त कर समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था।
- महत्त्व: संसद में उनके प्रवेश को शासन में LGBTQ+ प्रतिनिधित्व के लिये एक उपलब्धि माना जा रहा है और यह भारतीय राजनीति में क्वीर आवाज़ों की बढ़ती दृश्यता और स्वीकार्यता को दर्शाता है।