‘कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइज़ेशन’ (CCU) तकनीक | 26 Feb 2026
चर्चा में क्यों?
कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइज़ेशन (CCU) एक उभरती हुई जलवायु शमन तकनीक है जो औद्योगिक उत्सर्जन से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को संगृहीत करके तथा वर्ष 2070 तक भारत को चक्रीय अर्थव्यवस्था और नेट-ज़ीरो लक्ष्य की ओर ले जाने में मदद कर सकती है।
कार्बन कैप्चर और उसका उपयोग क्या है?
- CCU: यह उन तकनीकों को संदर्भित करता है जो औद्योगिक स्रोतों से या सीधे हवा से CO₂ उत्सर्जन को संगृहीत करके उन्हें ईंधन, रसायन और निर्माण सामग्री जैसे उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करती हैं।
- कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (CCS) CO₂ को स्थायी रूप से भूमिगत रूप से संगृहीत करने पर केंद्रित है, जबकि CCUS में कैप्चर किये गए कार्बन को आर्थिक उपयोग में लाया जाता है।
- भारत के लिये प्रासंगिकता: भारत चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद विश्व का तीसरा सबसे बड़ा CO₂ उत्सर्जक है। देश में उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा विद्युत्, सीमेंट, इस्पात और रसायन उद्योगों से आता है। इन औद्योगिक प्रक्रियाओं को कार्बनमुक्त करने के लिये भारत को कार्बन कैप्चर और यूटिलाइज़ेशन (CCU) तकनीक की आवश्यकता है, क्योंकि इन्हें केवल नवीकरणीय ऊर्जा से पूरी तरह से कार्बनमुक्त करना चुनौतीपूर्ण है।
- भारत की वर्तमान स्थिति और पहलें:
- सरकारी पहल: केंद्रीय बजट 2026-27 में अगले 5 वर्षों में रसायन क्षेत्र सहित प्रमुख उद्योगों में कार्बन कैप्चर, यूटिलाइज़ेशन और स्टोरेज (CCUS) प्रौद्योगिकियों के विकास के समर्थन हेतु 20,000 करोड़ रुपये के आवंटन की घोषणा की गई है।
- विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने CCU के लिये एक विशिष्ट अनुसंधान एवं विकास संबंधी रूपरेखा तैयार की है।
- पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने CCUS के लिये वर्ष 2030 का मसौदा रूपरेखा प्रस्तुत किया है।
- निजी क्षेत्र की परियोजनाएँ: अंबुजा सीमेंट, एक परियोजना के तहत, IIT बॉम्बे के सहयोग से एक भारत-स्वीडन पायलट परियोजना पर कार्य कर रही है। इस परियोजना का लक्ष्य संगृहीत कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को ईंधन और उपयोगी सामग्रियों में परिवर्तित करना है।
- जेके सीमेंट हल्के कंक्रीट ब्लॉक और ओलेफिन जैसे अनुप्रयोगों के लिये CO₂ को कैप्चर करने हेतु एक CCU टेस्टबेड पर सहयोग कर रहा है।
- ऑर्गेनिक रीसाइक्लिंग सिस्टम्स लिमिटेड (ORSL) भारत के पहले बायो-कार्बन कैप्चर और यूटिलाइजेशन (Bio-CCU) पायलट प्रोजेक्ट का संचालन कर रही है, जो बायोगैस स्ट्रीम से CO₂ को बायो-अल्कोहल और विशेष रसायनों में परिवर्तित कर रही है।
- सरकारी पहल: केंद्रीय बजट 2026-27 में अगले 5 वर्षों में रसायन क्षेत्र सहित प्रमुख उद्योगों में कार्बन कैप्चर, यूटिलाइज़ेशन और स्टोरेज (CCUS) प्रौद्योगिकियों के विकास के समर्थन हेतु 20,000 करोड़ रुपये के आवंटन की घोषणा की गई है।
- वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ: यूरोपीय संघ की बायो-इकोनॉमी स्ट्रेटजी और चक्रीय अर्थव्यवस्था कार्य योजना CO₂ को फीडस्टॉक में परिवर्तित करने के लिये कार्बन कैप्चर एवं उसके उपयोग का स्पष्ट रूप से समर्थन करती है, इसे सर्कुलरिटी और सस्टेनेबिलिटी संबंधी लक्ष्यों से जोड़ती है।
- बेल्जियम में एक परियोजना इस्पात और रासायनिक उत्पादन के लिये कैप्चर की गई CO₂ को कार्बन मोनोऑक्साइड में परिवर्तित करने की तकनीक का परीक्षण कर रही है।
- अमेरिका कार्बन कैप्चर एवं उसके उपयोग को बढ़ाने के लिये टैक्स क्रेडिट और वित्तपोषण के संयोजन का उपयोग करता है।
- संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की अल रियाद परियोजना और आगामी 'CO₂-टू-केमिकल्स' हब, हरित हाइड्रोजन के साथ कार्बन कैप्चर एवं उपयोग (CCU) के एकीकरण का उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जो टिकाऊ औद्योगिक विकास को नई दिशा दे रहे हैं।
- भारत के लिये प्रमुख चुनौतियाँ:
- लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता: कार्बन कैप्चर एवं उसकाउपयोग ऊर्जा-गहन और महंगा है; नीतिगत प्रोत्साहनों के बगैर, उत्पाद सस्ते जीवाश्म-आधारित विकल्पों के साथ प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर सकते।
- अवसंरचना तत्परता: सह-स्थित औद्योगिक क्लस्टर और विश्वसनीय CO₂ परिवहन की आवश्यकता है, जो असमान रूप से विकसित हैं।
- नीति एवं मानक अंतराल: स्पष्ट मानकों, प्रमाणन और बाज़ार संकेतों का अभाव निवेशकों के लिये अनिश्चितता उत्पन्न करते हैं।
कार्बन कैप्चर में उपयोग होने वाली प्रौद्योगिकियाँ क्या हैं?
कैप्चर फेज़
- पोस्ट-कंबशन कैप्चर: ईंधन दहन के पश्चात् फ्लू गैसों से पृथक्करण, सामान्यतः रासायनिक विलायकों (जैसे– एमीन-आधारित अवशोषण) का उपयोग करके।
- प्री-कंबशन कैप्चर: ईंधन का सिनगैस मिश्रण में रूपांतरण, उसके बाद दहन से पूर्व CO₂ पृथक्करण।
- ऑक्सी-फ्यूल कंबशन: आसान कैप्चर के लिये CO₂-समृद्ध निकास धारा उत्पन्न करने हेतु ईंधन को लगभग शुद्ध ऑक्सीजन में जलाना।
- डायरेक्ट एयर कैप्चर (DAC): सॉर्बेंट या सॉल्वेंट का उपयोग करके वायु से CO₂ निष्कर्षण, यद्यपि निम्न वायुमंडलीय सांद्रता के कारण यह अधिक ऊर्जा-गहन है।
यूटिलाइज़ेशन फेज़
- प्रत्यक्ष उपयोग (गैर-रूपांतरण): यह CO₂ का उसके भौतिक गुणों के लिये उपयोग करता है, बिना उसके आणविक संरचना को बदले। प्रमुख अनुप्रयोगों में शामिल हैं:
- संवर्द्धित तेल की पुनःप्राप्ति (EOR): अधिक तेल निकालने के लिये कैप्चर की गई CO₂ को समाप्त होते तेल क्षेत्रों में इंजेक्ट करना। यह सबसे परिपक्व अनुप्रयोग है, किंतु विवादास्पद है क्योंकि यह आगे जीवाश्म ईंधन निष्कर्षण को सक्षम बनाता है।
- खाद्य एवं पेय उद्योग: पेय पदार्थों को कार्बोनेटेड बनाने और शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिये संशोधित पैकेजिंग में उपयोग किया जाता है।
- ग्रीनहाउस एवं शैवाल संवर्द्धन: पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देने और शैवाल उगाने के लिये CO₂ एक उर्वरक के रूप में कार्य करती है।
- रेफ्रिजरेंट और ड्राई आइस: औद्योगिक शीतलन प्रणालियों तथा परिवहन के दौरान शीतलन बनाए रखने के लिये उपयोग किये जाते हैं।
- रसायनों एवं ईंधनों में रूपांतरण: इसमें CO₂ को रासायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से जटिल अणुओं में परिवर्तित किया जाता है, जिसके लिये पर्याप्त ऊर्जा और उत्प्रेरकों की आवश्यकता होती है।
- सिंथेटिक ईंधन (ई-फ्यूल): कैप्चर किये गए CO₂ को ग्रीन हाइड्रोजन के साथ संयोजित करने पर मेथनॉल, गैसोलीन या जेट ईंधन जैसे ‘ड्रॉप-इन रेडी’ ईंधन तैयार किये जा सकते हैं। हालाँकि, इनके उत्पादन में अत्यधिक ऊर्जा लगती है और जलने पर ये पुनः CO₂ को वायुमंडल में त्याग देते हैं।
- रसायन: CO₂ का उपयोग पॉलिमर, प्लास्टिक तथा यूरिया (एक प्रमुख उर्वरक घटक) के उत्पादन में किया जा सकता है।
- खनिजीकरण (CO₂ से खनिज): यह प्रक्रिया प्राकृतिक भू-रासायनिक चक्रों का अनुकरण करती है, जिसमें CO₂ को खनिजों अथवा औद्योगिक क्षारीय अपशिष्टों के साथ अभिक्रिया कराकर स्थायी एवं ठोस कार्बोनेट में रूपांतरित किया जाता है। इस प्रकार CO₂ का दीर्घकालिक और स्थायी रूप से सुरक्षित भंडारण सुनिश्चित होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. कार्बन अभिग्रहण उपयोग (CCU) क्या है?
CCU एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें CO₂ को औद्योगिक स्रोतों या सीधे वायु से कैप्चर कर उसे ईंधन, रसायन और निर्माण सामग्री जैसे उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है, जिससे परिपत्र कार्बन अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है।
2. CCU CCS से किस प्रकार भिन्न है?
CCS में कैप्चर किये गए CO₂ को स्थायी रूप से भूमिगत भंडारित किया जाता है ताकि वह वायुमंडल में न जाए, जबकि CCU में उसी CO₂ का विभिन्न आर्थिक एवं औद्योगिक उपयोगों के लिये पुनः प्रयोग किया जाता है।
3. भारत के लिये CCU क्यों महत्त्वपूर्ण है?
भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा CO₂ उत्सर्जक है, इसलिये सीमेंट और इस्पात जैसे हार्ड-टू-एबेट क्षेत्रों के डीकार्बोनाइज़ेशन के लिये CCU आवश्यक है, क्योंकि ये क्षेत्र केवल नवीकरणीय ऊर्जा पर निर्भर होकर उत्सर्जन में कमी नहीं ला सकते।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. निम्नलिखित कृषि पद्धतियों पर विचार कीजिये: (2012)
1. समोच्च बांध
2. अनुपद सस्यन
3. शून्य जुताई
वैश्विक उलवायु परिवर्तन के संदर्भ में, उपर्युक्त में से कौन-सा/से मृदा में कार्बन प्रच्छादन/संग्रहण में सहायक है/ हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(cj 1, 2 और 3
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर: (b)
प्रश्न 2. कार्बन डाइऑक्साइड के मानवोद्भवी उत्सर्जनों के कारण आसन्न भूमंडलीय तापन के न्यूनीकरण के संदर्भ में, कार्बन प्रच्छादन हेतु निम्नलिखित में से कौन-सा/से संभावित स्थान हो सकता/सकते है/हैं?
1. परित्यक्त एवं गैर-लाभकारी कोयला संस्तर
2. निःशेष तेल एवं गैस भंडार
3. भूमिगत गभीर लवणीय शैलसमूह
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये: (2017)
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1,2 और 3
उत्तर: (d)
