पारबती गिरि की जन्म-शताब्दी | 21 Jan 2026
भारत के प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता सेनानी पारबती गिरि जी की जन्म-शताब्दी पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
- प्रारंभिक जीवन: पारबती गिरि का जन्म 19 जनवरी, 1926 को ओडिशा के बरगढ़ ज़िले के समलैपदर में हुआ था, वे अपने चाचा रामचंद्र गिरि द्वारा संचालित कांग्रेस गतिविधियों के माध्यम से राष्ट्रवादी विचारों से प्रेरित हुईं।
- स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश: वर्ष 1938 में, उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम में पूर्ण रूप से स्वयं को समर्पित करने के लिये घर छोड़ दिया। उन्होंने खादी, स्वावलंबन और रचनात्मक सामाजिक कार्य जैसे गांधीवादी आदर्शों को जीवन-शैली के रूप में अपनाया।
- राष्ट्रीय आंदोलनों में भूमिका: व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940) के दौरान ग्रामीणों को सक्रिय रूप से संगठित किया।
- उन्होंने खादी आंदोलन और स्वावलंबन को बढ़ावा दिया और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में तिरंगा लेकर रैलियों का नेतृत्व करते हुए एक साहसिक भूमिका निभाई।
- पारबती गिरि ने बरगढ़ न्यायालय में ब्रिटिश अधिकारियों को खुली चुनौती दी, जिसके कारण उन्हें दो वर्ष का कारावास हुआ।
- सामाजिक सुधार और मानवीय कार्य: पारबती गिरि ने वर्ष 1951 के ओड़िशा अकाल के दौरान राहत कार्यों का नेतृत्व किया।
- उन्होंने जेल सुधार, कुष्ठ उन्मूलन और निराश्रित एवं वंचित लोगों की कल्याणकारी योजनाओं पर व्यापक कार्य किया।
- विरासत और सम्मान: उन्हें "पश्चिमी ओड़िशा की मदर टेरेसा" की उपाधि मिली साथ ही उनको देशभक्ति के लिये समर्पित उन्हें "बन्ही कन्या" के नाम से भी जाना जाता था।
- संबलपुर विश्वविद्यालय द्वारा वर्ष 1988 में उन्हें मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया गया।
- पारबती गिरि का 17 अगस्त 1995 को निधन हो गया। उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भागीदारी के एक शक्तिशाली प्रतीक के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने सैन्य राष्ट्रवाद और गांधीवादी सामाजिक सेवा को सहज रूप से एकीकृत किया।
