बायोफार्मा SHAKTI योजना | 26 Mar 2026

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

केंद्रीय बजट 2026-27 में बायोफार्मा SHAKTI योजना पेश की गई, जिसका उद्देश्य घरेलू बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर उत्पादन में क्रांति लाना है। यह योजना पारंपरिक प्राणी परीक्षणों से बढ़कर उन्नत गैर-पशु आधारित विधियों (NAM) जैसे ऑर्गनॉइड्स का उपयोग करती है।

बायोफार्मा SHAKTI योजना क्या है?

  • परिचय: बायोफार्मा SHAKTI (ज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा उन्नति के लिये रणनीति) योजना एक प्रमुख पहल है, जिसे भारत को साधारण जेनेरिक दवाओं के क्षेत्र से उच्च-मूल्य वाले बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर के लिये वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में ले जाने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
    • यह योजना राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन (NBM), 2017 के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य भारत को वर्ष 2025 तक USD 100 बिलियन के अग्रणी वैश्विक बायोटेक उद्योग में बदलना और वैश्विक फार्मास्यूटिकल बाज़ार का 5% हिस्सा प्राप्त करना है।
  • वित्तीय आवंटन: सरकार ने 5 वर्षों के लिये (वित्तीय वर्ष 2026-27 से शुरू) उन्नत बायोफार्मास्यूटिकल्स के लिये एंड-टू-एंड ईकोसिस्टम बनाने हेतु ₹10,000 करोड़ आवंटित किये हैं।
  • रोग पर ध्यान: यह योजना गैर-संचारी रोगों (NCD), जैसे– कैंसर, मधुमेह और ऑटोइम्यून विकारों के लिये किफायती घरेलू थेरैपी उत्पादन को प्राथमिकता देती है।
  • विनिर्माण में बदलाव: यह योजना ऑर्गनॉइड्स, ऑर्गन-ऑन-ए-चिप और 3D बायोप्रिंटिंग जैसी गैर-पशु आधारित विधियों (NAM) को अपनाने को प्रोत्साहित करती है, ताकि लागत कम हो और दवा की सुरक्षा की भविष्यवाणी अधिक सटीक हो (मानव जीवविज्ञान की प्रतिकृति पशु कोशिकाओं की तुलना में अधिक सटीक रूप से)।
  • इन्फ्रास्ट्रक्चर और अकादमिक क्षेत्र: 3 नए राष्ट्रीय फार्मास्यूटिकल शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (NIPER) की स्थापना की जाएगी।
    • 7 मौजूदा NIPER को ट्रांसलेशनल अनुसंधान के उत्कृष्ट केंद्रों में उन्नत किया जाएगा।
    • 1,000 से अधिक मान्यता प्राप्त क्लिनिकल ट्रायल साइट्स का राष्ट्रीय नेटवर्क बनाया जाएगा, ताकि दवा विकास को गति प्रदान की जा सके।
  • नियामक सुधार: केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) को एक समर्पित ‘वैज्ञानिक समीक्षा कैडर’ के साथ दृढ़ किया जाएगा, ताकि अनुमोदन समय-सीमाएँ अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हों।
  • महत्त्व: यह पहल मधुमेह, कैंसर और हृदय रोग जैसे गैर-संचारी रोगों (NCD) की बढ़ती संख्या के प्रति प्रतिक्रिया है, जो वर्तमान में भारत में सभी मृत्यु का 63% है। इसके अतिरिक्त, यह पहल ब्रांडेड और पेटेंटेड दवाओं पर 100% (और संभावित 250%) अमेरिकी शुल्क का सामना करने के लिये भी तैयार की गई है।

भारत का दवा क्षेत्र

  • वैश्विक बाज़ार में स्थिति: मात्रा के हिसाब से भारत तीसरा सबसे बड़ा दवा उत्पादक (मूल्य के हिसाब से 11वाँ) बना हुआ है, जो वैश्विक जेनेरिक दवाओं का 20% और विश्व के अधिकांश डिफ्थीरिया, टेटनस और पर्टुसिस (DPT), बैसिलस कैलमेट-गुएरिन (BCG) और खसरा के टीकों की आपूर्ति करता है।
  • आर्थिक पैमाना: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में इस क्षेत्र का वार्षिक व्यापार 4.72 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया, जिसमें 10,500 से अधिक विनिर्माण इकाइयाँ शामिल हैं तथा पिछले दशक में निर्यात में 7% की CAGR वृद्धि हुई है।
  • चिकित्सा प्रौद्योगिकी क्षेत्र में विस्तार: भारत चिकित्सा उपकरणों के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बन गया है और MRI स्कैनर, सीटी स्कैनर और कार्डियक स्टेंट जैसे उच्च स्तरीय उपकरणों का निर्यात 187 देशों को करता है।

बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स

  • बायोलॉजिक्स (इनोवेटर ड्रग्स): बायोलॉजिक्स को रासायनिक संश्लेषण द्वारा बनने वाली पारंपरिक ‘स्मॉल मॉलिक्यूल’ दवाओं (जैसे– एस्पिरिन) से अलग समझा जाता है। बायोलॉजिक्स जीवित प्रणालियों (जैसे– बैक्टीरिया, खमीर या पशु कोशिकाओं) का उपयोग करके उत्पादित किये जाते हैं, इसलिये इन्हें इनोवेटर ड्रग्स भी कहा जाता है।
    • ये (बायोलॉजिक्स) विशालकाय होते हैं, जिनकी जटिल त्रिविमीय संरचना होती है। ये अक्सर रासायनिक दवाओं की तुलना में 200 से 1000 गुना बड़े होते हैं। इनके उदाहरणों में इंसुलिन, कैंसर के लिये मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (एमएबी), टीके और जीन थेरैपी शामिल हैं।
  • बायोसिमिलर (बायोलॉजिक्स के जेनेरिक): बायोसिमिलर वे बायोलॉजिक उत्पाद हैं जो पहले से स्वीकृत 'रेफरेंस' बायोलॉजिक उत्पाद के समान होते हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इनकी सुरक्षा या प्रभावकारिता में मूल उत्पाद से चिकित्सकीय रूप से कोई खास अंतर नहीं होता है। एक बड़ा फायदा यह है कि ये आमतौर पर मूल बायोलॉजिक की तुलना में 30% से 70% तक सस्ते होते हैं।
    • क्योंकि ये जीवित कोशिकाओं में बनते हैं, इसलिये इनकी हूबहू नकल बनाना असंभव है। अतः ये ‘समान’ (सिमिलर) हैं, ‘जेनेरिक’ नहीं।

गैर-पशु पद्धतियाँ (NAMs) क्या हैं?

  • परिचय: NAMs, जिसे न्यू अप्रोच मेथोडोलॉजी के नाम से भी जाना जाता है, नवीन वैज्ञानिक प्रौद्योगिकियों का एक समूह है जिसका उपयोग पारंपरिक पशु परीक्षण पर निर्भर किये बिना दवाओं, रसायनों और जैविक पदार्थों की सुरक्षा व प्रभावकारिता का आकलन करने के लिये किया जाता है।
    • NAMs मानव-प्रासंगिक डेटा को प्राथमिकता देते हैं, जिसके लिये मानव कोशिकाओं, ऊतकों और उन्नत कंप्यूटर मॉडल का उपयोग किया जाता है। इनका मुख्य उद्देश्य अनुसंधान में जानवरों के उपयोग को प्रतिस्थापित (Replace) करना, कम (Reduce) करना या परिष्कृत (Refine) करना (3R) है।
  • NAMs की मुख्य प्रौद्योगिकियाँ:
    • ऑर्गन-ऑन-ए-चिप (OoC): यह जीवित मानव कोशिकाओं से निर्मित एक सूक्ष्म द्रव उपकरण है। यह उपकरण विशिष्ट अंगों के भौतिक वातावरण और यांत्रिक प्रभावों (जैसे– रक्त के प्रवाह या श्वास) की सफलतापूर्वक नकल करता है।
    • ऑर्गनॉइड्स: मानव स्टेम कोशिकाओं से विकसित त्रि-आयामी, स्व-संगठित ‘मिनी ऑर्गन’ जो रोगी के वास्तविक अंग की जटिल संरचना और आनुवंशिक प्रोफाइल की प्रतिकृति बनाते हैं।
    • 3D बायोप्रिंटिंग: इसमें ‘बायो-इंक’ (जीवित कोशिकाओं और पोषक तत्त्वों का मिश्रण) का उपयोग करके मानव ऊतक संरचनाओं को परत-दर-परत प्रिंट किया जाता है। यह शोधकर्त्ताओं को यह अध्ययन करने की अनुमति देता है कि दवाएँ ठोस ट्यूमर या त्वचा में कितनी गहराई तक किस प्रकार प्रवेश करती हैं।
    • इन सिलिको मॉडल्स: ये उन्नत AI और कंप्यूटर सिमुलेशन पर आधारित मॉडल होते हैं, जो ज्ञात रासायनिक अभिक्रियाओं के विशाल डेटा के आधार पर यह अनुमान लगाते हैं कि कोई नया अणु मानव शरीर के साथ कैसे अंतःक्रिया करेगा।
    • एक्स विवो सिस्टम्स: इसमें मानव ऊतकों या अंगों (अक्सर सर्जरी से बचे हिस्सों या दाताओं से प्राप्त) का उपयोग किया जाता है, जिन्हें शरीर के बाहर सीमित समय के लिये जीवित रखकर परीक्षण किया जाता है।
  • दवा विकास के लिये लाभ: गैर-पशु पद्धतियाँ (NAM) मानव जीवविज्ञान का उपयोग करके अधिक सटीक पूर्वानुमान प्रदान करती हैं। ये वर्ष 2006 के नॉर्थविक पार्क परीक्षण जैसी घटनाओं से बचने में मदद कर सकती हैं, जहाँ बंदरों पर सुरक्षित पाई गई दवा मनुष्यों के लिये विषैली साबित हुई और कई अंगों के विफल होने का कारण बनी।
    • लागत और समय दक्षता: ये दवा विकास में लागत और समय—दोनों की बचत करते हैं। NAMs दवा विकास की लागत को लगभग 10–26% तक घटा सकते हैं तथा संभावित दवा उम्मीदवारों की पहचान की प्रक्रिया को करीब 20% तक तेज़ कर देते हैं।
    • यह रोगी-व्युत्पन्न ऑर्गनॉइड्स के माध्यम से व्यक्तिगत उपचार के लिये प्रिसिजन मेडिसिन को संभव बनाता है।
    • नियामकीय समर्थन भी मज़बूत हुआ है, जैसे– भारत के नई दवाएँ और नैदानिक  परीक्षण (संशोधन) नियम, 2023 में NAMs को पशु-आधारित डेटा के वैध विकल्प के रूप में औपचारिक मान्यता दी गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. बायोफार्मा SHAKTI योजना क्या है?
यह 10,000 करोड़ रुपये की एक प्रमुख पहल (केंद्रीय बजट 2026-27) है, जिसका उद्देश्य NAM के उपयोग से बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है।

2. गैर-पशु पद्धतियाँ (NAMs) क्या हैं?
ऑर्गेनॉइड्स और ऑर्गन-ऑन-ए-चिप जैसी नवीन तकनीकें मानव कोशिकाओं का उपयोग करके मानव जीवविज्ञान की नकल करती हैं, जो पशु परीक्षण की तुलना में अधिक सटीक पूर्वानुमान प्रदान करती हैं।

3. यह योजना भारत के रोगों के बोझ का समाधान कैसे करती है?
यह गैर-संचारी रोगों (NCDs) के लिये किफायती उपचारों को प्राथमिकता देती है, जो भारत में होने वाली कुल मौतों का 63% हिस्सा है।

4.बायोलॉजिक्स के परीक्षण के लिये ऑर्गनॉइड्स पशु मॉडलों की तुलना में बेहतर क्यों हैं?
ऑर्गनॉइड्स मानव स्टेम कोशिकाओं से विकसित किये जाते हैं, जिससे वे मानव कोशिकाओं की तुलना में रिसेप्टर बाइंडिंग और प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं की अधिक सटीक नकल कर सकते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-से, भारत में सूक्ष्मजैविक रोगजनकों में बहु-औषध प्रतिरोध के होने के कारण हैं? (2019)

  1. कुछ व्यक्तियों में आनुवंशिक पूर्ववृत्ति (जेनेटिक प्रीडिस्पोज़ीशन) का होना।  
  2. रोगों के उपचार के लिये वैज्ञानिकों (एंटीबॉयोटिक्स) की गलत खुराक लेना।  
  3. पशुधन फार्मिंग प्रतिजैविकों का इस्तेमाल करना।  
  4. कुछ व्यक्तियों में चिरकालिक रोगों की बहुलता होना।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये: 

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1, 3 और 4

(d) केवल 2, 3 और 4 

उत्तर: (b)