भारतीय माध्यस्थम परिषद | 28 Jan 2026

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को उस याचिका पर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है, जिसमें भारतीय माध्यस्थम परिषद (ACI) की स्थापना तथा माध्यस्थम संस्थानों और मध्यस्थों के विनियमन, आचरण एवं प्रत्यायन के लिये समान दिशा-निर्देश तय करने की मांग की गई है।

  • माध्यस्थम् और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने ACI को संस्थागत माध्यस्थम के लिये केंद्रीय नियामक के रूप में परिकल्पित किया था, किंतु लगभग छह वर्ष बीत जाने के बाद भी परिषद का गठन अब तक नहीं हो पाया है।

भारतीय माध्यस्थम परिषद (ACI) क्या है?

  • परिचय: यह माध्यस्थम और सुलह अधिनियम 1996 के भाग IA (धारा 43A–43M) के अंतर्गत स्थापित एक वैधानिक निकाय है, जिसे माध्यस्थम और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2019 द्वारा जोड़ा गया। यह न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण समिति (2017) की सिफारिशों पर आधारित है।
  • संरचना एवं नियुक्ति:
    • अध्यक्ष: केंद्र सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर अध्यक्ष की नियुक्ति की जाती है। पात्र व्यक्तियों में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अथवा माध्यस्थम क्षेत्र के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ शामिल हैं।
    • अन्य सदस्य: इनमें प्रतिष्ठित माध्यस्थम विशेषज्ञ, शिक्षाविद तथा पदेन (ex officio) सरकारी प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
  • दायित्व एवं कार्य: यह संस्थागत माध्यस्थम के लिये केंद्रीय नियामक निकाय के रूप में कार्य करता है; माध्यस्थम संस्थानों का मूल्यांकन/श्रेणीकरण करता है; मध्यस्थों को मान्यता प्रदान करता है; माध्यस्थम पंचाट का अभिलेखागार बनाए रखता है; माध्यस्थम, सुलह आदि वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित करता है तथा समान एवं उच्च व्यावसायिक मानकों हेतु नीतियों का निर्माण करता है।
  • प्रमुख चिंताएँ:
    • सरकारी नियुक्तियों के वर्चस्व के कारण भारत की माध्यस्थम संस्थाओं की निष्पक्षता और दक्षता पर लगातार प्रश्नचिह्न बने हुए हैं। यह स्थिति विशेष रूप से तब गंभीर हो जाती है, जब स्वयं राज्य ही सबसे बड़ा वादकारी (litigant) हो।
    • नियामकीय चुनौतियाँ: असीमित संख्या में माध्यस्थम संस्थानों को प्रत्यायन देने की शक्ति से गुणवत्ता में कमी तथा प्रशासनिक बोझ बढ़ने की आशंका है। उदाहरण के तौर पर, भारत के विपरीत सिंगापुर और हॉन्गकॉन्ग में अनेक संस्थानों पर सरकारी नियामक के बजाय एक ही केंद्रीय माध्यस्थम संस्था पर निर्भरता है।
    • बहिष्करणकारी नीति: विदेशी विधि पेशेवरों को प्रत्यायन से बाहर रखने से वैश्विक मध्यस्थता केंद्र के रूप में भारत की आकर्षण क्षमता कम हो जाती है।
  • माध्यस्थम और सुलह (संशोधन) विधेयक, 2024 का प्रारूप: इसमें "माध्यस्थम संस्थान" की परिभाषा को संशोधित करके एक ऐसे निकाय या संगठन के रूप में परिभाषित किया गया है जो अपने स्वयं के प्रक्रियात्मक नियमों या पक्षकारों द्वारा सहमत नियमों के तहत माध्यस्थम का संचालन करता है। यह वर्ष 2019 के संशोधनों से अलग है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों द्वारा औपचारिक मान्यता अनिवार्य थी।
    • माध्यस्थम संस्थानों को माध्यस्थम पंचाटों की समय-सीमा बढ़ाने, माध्यस्थम पंचाट द्वारा किये गए विलंब की स्थिति में मध्यस्थ शुल्क को कम करने और प्रतिस्थापन मध्यस्थों की नियुक्ति करने का अधिकार प्राप्त होगा।
    • माध्यस्थम प्रक्रियाओं के दौरान अंतरिम राहत प्रदान करने की न्यायालय की शक्ति को सीमित कर दिया गया है और इसे आपातकालीन माध्यस्थम को हस्तांतरित कर दिया गया है।
    • वर्तमान व्यवस्था में, न्यायालय द्वारा पूर्व-माध्यस्थम अंतरिम राहत दिये जाने के 90 दिनों के भीतर माध्यस्थम की प्रक्रिया प्रारंभ करना अनिवार्य है। प्रस्तावित विधेयक में यह अवधि अंतरिम राहत हेतु आवेदन दायर किये जाने की तिथि से गिने जाने का प्रावधान किया गया है, ताकि लंबी न्यायिक प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाले विलंब को रोका जा सके।
    • प्रस्तावित नई धारा 9-A के अंतर्गत, माध्यस्थम की कार्यवाही आरंभ हो जाने के बाद किंतु मध्यस्थ अधिकरण के गठन से पूर्व, पक्षकारों को आपातकालीन मध्यस्थ से अंतरिम संरक्षणात्मक उपाय प्राप्त करने की अनुमति दी जाएगी।

नोट: भारत का मध्यस्थता परिषद (ACI) भारतीय मध्यस्थता परिषद (ICA) से अलग है, जो वर्ष 1965 में स्थापित एक गैर-सरकारी मध्यस्थता संस्थान है।

मध्यस्थता

  • परिचय: एक निजी, स्वैच्छिक और बाध्यकारी विवाद निवारण तंत्र है जिसमें एक निष्पक्ष मध्यस्थ तीसरे पक्ष के रूप में कार्य करता है। यह पारंपरिक न्यायालयीन प्रक्रिया के बाहर वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) का रूप है।
  • कानूनी ढाँचा: इसे मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जो UNCITRAL मॉडल कानून (1985) तथा UNCITRAL सुलह नियम (1980) पर आधारित है।
  • उपयोग का क्षेत्र: यह मुख्य रूप से वाणिज्यिक, नागरिक और अंतर्राष्ट्रीय विवादों के लिये पारंपरिक न्यायालयीन मुकदमेबाज़ी का विकल्प प्रदान करता है।
  • हाल के विकास: डॉ. टी.के. विश्वनाथन समिति (2024) ने संस्थागत मध्यस्थता को सुदृढ़ करने, न्यायालय हस्तक्षेप को कम करने और अधिक किफायती एवं समयबद्ध ढाँचा तैयार करने के लिये सुधारों की सिफारिश की है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत का मध्यस्थता परिषद (ACI) क्या है?
यह मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (2019 के संशोधन के माध्यम से प्रस्तुत) के तहत एक प्रस्तावित वैधानिक नियामक निकाय है, जिसका उद्देश्य मध्यस्थता संस्थानों को ग्रेड देना और मध्यस्थों को मान्यता प्रदान करना है, ताकि संस्थागत मध्यस्थता को बढ़ावा दिया जा सके।

2. ACI प्रस्तावित करने का आधार क्या था?
यह 2017 में न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर प्रस्तावित किया गया था, जिसका उद्देश्य भारत की मध्यस्थता व्यवस्था में सुधार और सुदृढ़ता लाना था।

3. मध्यस्थता विधेयक, 2024 के मसौदे में कौन-सा प्रमुख सुधार प्रस्तावित है?
इसमें न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित करने का प्रस्ताव है, जिसमें अदालतें मुख्यतः मध्यस्थता से पहले या बाद में अंतरिम राहत प्रदान कर सकेंगी और इसमें आपातकालीन मध्यस्थ की भूमिका को प्रस्तुत किया गया है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs) 

प्रश्न 1. लोक अदालतों के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? (2010)

(a) लोक अदालतों के पास पूर्व-मुकदमेबाज़ी के स्तर पर मामलों को निपटाने का अधिकार क्षेत्र है, न कि उन मामलों को जो किसी भी अदालत के समक्ष लंबित हैं।

(b) लोक अदालतें उन मामलों से निपट सकती हैं जो दीवानी हैं और फौजदारी प्रकृति के नहीं हैं।

(c) प्रत्येक लोक अदालत में या तो केवल सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी होते हैं और कोई अन्य व्यक्ति नहीं होता है।

(d) उपर्युक्त कथनों में से कोई भी सही नहीं है।

उत्तर: (d)


प्रश्न 2: लोक अदालतों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2009)

  1. लोक अदालत द्वारा किया गया अधिनिर्णय सिविल न्यायालय का आदेश (डिक्री) मान लिया जाता है और इसके विरुद्ध किसी भी न्यायालय में कोई अपील नहीं होती।
  2. विवाह-संबंधी/पारिवारिक विवाद लोक अदालत में सम्मलित नहीं होते हैं ।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो  1 और न ही  2

उत्तर: (a)