राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का 23वाँ स्थापना दिवस | 21 Feb 2026

स्रोत: पीआईबी

चर्चा में क्यों?

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) का 23वाँ स्थापना दिवस मनाया, जिसमें अनुसूचित जनजातियों (STs) के अधिकारों की सुरक्षा और संवर्द्धन के लिये NCST के संवैधानिक दायित्व तथा उद्देश्यों को रेखांकित किया गया।

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग क्या है?

  • परिचय: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसकी स्थापना संविधान के अनुच्छेद 338A के तहत 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के माध्यम से की गई थी। इस संशोधन द्वारा पूर्ववर्ती संयुक्त राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग का विभाजन किया गया, ताकि जनजातीय समुदायों की विशिष्ट समस्याओं और विकासात्मक आवश्यकताओं पर केंद्रित एवं प्रभावी ध्यान दिया जा सके।
  • संरचना: इसमें एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और 3 अन्य सदस्य (जिनमें कम-से-कम एक महिला सदस्य शामिल होती है) होते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर तथा मुहर सहित वारंट के माध्यम से की जाती है। सदस्यों की सेवा शर्तें एवं कार्यकाल राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किये जाते हैं।
  • कार्यकाल एवं सेवा शर्तें:  अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य 3 वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करते हैं। जिसमें अध्यक्ष केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के समकक्ष, उपाध्यक्ष राज्य मंत्री के समकक्ष और सदस्य भारत सरकार के सचिव के समकक्ष होते है।
    • कोई भी सदस्य दो से अधिक कार्यकाल के लिये नियुक्त नहीं किया जा सकता।
  • मुख्य कार्य: अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन की जाँच और पर्यवेक्षण करना, अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित विशिष्ट शिकायतों की जाँच करना, सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी और सलाह देना, विकास प्रगति का मूल्यांकन करना, राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करना, केंद्र/राज्य सरकारों को सिफारिशें करना।
    • अतिरिक्त कार्य (राष्ट्रपति द्वारा 2005 में निर्दिष्ट): लघु वन उपज (MFP) पर स्वामित्व और खनिज व जल संसाधनों पर अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, अवैध भूमि हस्तांतरण को रोकना, PESA अधिनियम, 1996 के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करना, विस्थापित आदिवासियों के लिये राहत और पुनर्वास में सुधार करना और झूम खेती को समाप्त करना शामिल है।
  • रिपोर्टिंग तंत्र: राष्ट्रपति को वार्षिक/आवधिक रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, राष्ट्रपति की ओर से संसद के समक्ष रिपोर्ट और की गई कार्रवाई का ज्ञापन प्रस्तुत किया जाता है, राज्य से संबंधित रिपोर्ट राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत करने के लिये भेजी जाती हैं।
  • शक्तियाँ: जाँच के लिये दीवानी न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त हैं—व्यक्तियों को तलब कर सकता है, दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की मांग कर सकता है, हलफनामे प्राप्त कर सकता है, सार्वजनिक अभिलेखों की मांग कर सकता है, अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने के लिये सशक्त है।
  • अनिवार्य परामर्श: केंद्र और राज्य सरकारों को अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले सभी प्रमुख नीतिगत मामलों पर आयोग से परामर्श करना होगा।

भारत में अनुसूचित जनजातियों से संबंधित प्रावधान

  • परिचय: भारत का संविधान अनुसूचित जनजातियों की कोई स्पष्ट परिभाषा प्रदान नहीं करता है, लेकिन अनुच्छेद 342 के माध्यम से उनकी पहचान की प्रक्रिया निर्धारित करता है। इसके साथ ही विशेष प्रशासनिक प्रावधान पाँचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची में निहित हैं तथा उनकी सुरक्षा के लिये विभिन्न संरक्षणात्मक कानूनों का भी प्रावधान किया गया है।
  • संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 366(25) के अनुसार, अनुसूचित जनजातियाँ (STs) वे जनजातियाँ या जनजातीय समुदाय अथवा उनके भाग हैं, जिन्हें संविधान के प्रयोजनों के लिये अनुच्छेद 342 के अंतर्गत अनुसूचित जनजाति माना गया है।
    • अनुच्छेद 342(1): यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को राज्यों के लिये राज्यपाल से परामर्श कर अनुसूचित जनजातियों के रूप में जनजातियों को निर्दिष्ट करने का अधिकार प्रदान करता है।
  • अनुसूचित क्षेत्र: पाँचवीं अनुसूची, छठी अनुसूची के राज्यों (असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम) के अलावा अन्य राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों (STs) के प्रशासन को नियंत्रित करती है।
    • छठी अनुसूची: यह असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों के लिये  स्वायत्त ज़िला परिषदों का प्रावधान करती है।
  • प्रमुख कानून: नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, पेसा अधिनियम, 1996 जिसके द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज का विस्तार किया गया, वन अधिकार अधिनियम, 2006 जिसके तहत वन अधिकारों को मान्यता दी गई।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) का संवैधानिक आधार क्या है?
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के माध्यम से अनुच्छेद 338-A के तहत एक संवैधानिक निकाय के रूप में की गई है, जिसका उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों (STs) के अधिकारों की सुरक्षा करना है।

2. संविधान के तहत अनुसूचित जनजातियों की पहचान कैसे की जाती है?
अनुच्छेद 342 के तहत राष्ट्रपति राज्यपाल से परामर्श कर अनुसूचित जनजातियों (STs) को निर्दिष्ट करते हैं; जबकि अनुच्छेद 366(25) संवैधानिक प्रयोजनों के लिये अनुसूचित जनजातियों की परिभाषा प्रदान करता है।

3. पाँचवीं और छठी अनुसूची में क्या अंतर है?
पाँचवीं अनुसूची अधिकांश राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन करती है, जबकि छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम में स्वायत्त ज़िला परिषदों का प्रावधान करती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रश्न. यदि किसी विशिष्ट क्षेत्र को भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अधीन लाया जाए, तो निम्नलिखित कथनों में कौन-सा एक, इसके परिणाम को सर्वोत्तम रूप से प्रतिबिंबित करता है?  (2022)

(a) इससे जनजातीय लोगों की ज़मीनें गैर-जनजातीय लोगों को अंतरित करने पर रोक लगेगी।

(b) इससे उस क्षेत्र में एक स्थानीय स्वशासी निकाय का सृजन होगा।

(c) इससे वह क्षेत्र संघ राज्यक्षेत्र में बदल जाएगा।

(d) जिस राज्य के पास ऐसे क्षेत्र होंगे, उसे विशेष कोटि का राज्य घोषित किया जाएगा।

उत्तर: (a)


प्रश्न. भारत के संविधान की किस अनुसूची के अधीन जनजातीय भूमि का, खनन के लिये निजी पक्षकारों को अंतरण अकृत और शून्य घोषित किया जा सकता है? (2019)

(a) तीसरी अनुसूची

(b) पाँचवीं अनुसूची

(c) नौवीं अनुसूची   

(d) बारहवीं अनुसूची

उत्तर: (b)


प्रश्न. भारत के संविधान में पाँचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची के उपबंध निम्नलिखित में से किसलिये किये गए हैं? (2015)

(a) अनुसूचित जनजातियों के हितों के संरक्षण के लिये

(b) राज्यों के बीच सीमाओं के निर्धारण के लिये

(c) पंचायतों की शक्तियों, प्राधिकारों और उत्तरदायित्वों के निर्धारण के लिये

(d) सभी सीमावर्ती राज्यों के हितों के संरक्षण के लिये

उत्तर: (a)