भारत के अंतरिक्ष अभियान का पुनरुद्धार | 17 Jan 2026

यह एडिटोरियल 15/01/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित “A call to reenergise the Indian space ecosystem​” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। लेख में इस बात का विश्लेषण किया गया है कि हाल ही में हुए प्रक्षेपण संबंधी असफलताओं ने भारत के अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र में संरचनात्मक, रणनीतिक और संस्थागत कमज़ोरियों को उजागर किया है। इसमें तर्क दिया गया है कि आगामी दशक में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये अंतरिक्ष शासन को सुदृढ़ करना आवश्यक है।

प्रिलिम्स के लिये: : IN-SPACe, ISRO, भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग का उदय, अंतरिक्ष प्रक्षेपण यान, स्पेसएक्स(SpaceX), नाविक(NavIC) 

मेन्स के लिये: भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में वर्तमान विकास, भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़े प्रमुख मुद्दे। 

भारत का अंतरिक्ष पारितंत्र, जो ISRO के नेतृत्व में विकसित हुआ है, एक विकासात्मक कार्यक्रम से आगे बढ़कर अब एक रणनीतिक और वाणिज्यिक क्षेत्र बन चुका है। भारत उन छह देशों में शामिल हो गया है जिनके पास अंतरिक्ष क्षेत्र में एंड-टू-एंड (पूर्ण शृंखला) क्षमताएँ हैं। हालाँकि, उल्लेखनीय मिशनों को सफल बनाने और वर्ष 2017 में वैश्विक लघु उपग्रह प्रक्षेपण बाज़ार में 35% हिस्सेदारी रखने के बावजूद, हाल के वर्षों में प्रक्षेपण, विनिर्माण और नीतिगत अड़चनों के कारण भारत की हिस्सेदारी में तीव्र गिरावट हुई है। जनवरी 2026 में PSLV-C62 मिशन की विफलता ने इन चुनौतियों को और अधिक स्पष्ट किया है।

ऐसे समय में जब अंतरिक्ष क्षेत्र नौवहन, संचार, आपदा प्रबंधन और सैन्य अभियानों की रीढ़ बन चुका है, भारत के अंतरिक्ष पारितंत्र की मज़बूती एक आधारभूत राष्ट्रीय विकास आवश्यकता के रूप में उभरकर सामने आई है।

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में वर्तमान में क्या विकास हो रहा है?

  • मानव अंतरिक्ष उड़ान - गगनयान मिशन: ISRO मानवरहित कक्षीय परीक्षण उड़ान, G1  मिशन की तैयारी कर रहा है। 
    • यह महत्त्वपूर्ण परीक्षण उड़ान मानवरूपी रोबोटिक पेलोड व्योममित्र को अंतरिक्ष में ले जाएगी, जो मानवीय क्रियाओं का अनुकरण करेगा और जीवन-समर्थन प्रणालियों की पुष्टि करेगा।
    • पहली मानवयुक्त उड़ान, जिसमें 4 भारतीय अंतरिक्षयात्री (गगनयात्री) शामिल होंगे, को निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में भेजने का लक्ष्य वर्ष 2027 तक रखा गया है।
    • ये उड़ानें विशेष रूप से प्रक्षेपण के विभिन्न चरणों के दौरान आपातकालीन निरस्तीकरण (एबॉर्ट) परिदृश्यों की जाँच करने तथा स्वदेशी जीवन-समर्थन और पर्यावरण नियंत्रण प्रणालियों की विश्वसनीयता परखने के लिये डिज़ाइन की गई हैं।
  • अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यानों की ओर निरंतर प्रयास: हालाँकि, ISRO द्वारा दिसंबर 2025 में LVM3-M6 रॉकेट का उपयोग करके 6,100 किलोग्राम वज़नी (अब तक के सबसे वजनी) उपग्रह, ब्लू बर्ड ब्लॉक-2 का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया।
    • भारत की प्रक्षेपण रणनीति में सुनियोजित बदलाव अब आईएसआरओ के नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) पर केंद्रित है, जिसे निम्न पृथ्वी कक्षा में 30 टन तक के भार को स्थापित करने के लिये डिज़ाइन किया गया है, जो भारी भार वहन और पुन: प्रयोज्य श्रेणी की क्षमताओं की दिशा में एक निर्णायक कदम है। 
      • NGLV कार्यक्रम का उद्देश्य पुनरावृत्ति और नियमितता के माध्यम से विश्वास स्थापित करना है, जो पेलोड की नवीनता के बजाय चरण-स्तरीय प्रदर्शन सत्यापन पर ध्यान केंद्रित करता है।
    • अतिरिक्त रूप से, कुलसेकरपट्टिनम में विकसित किया जा रहा नया लघु उपग्रह प्रक्षेपण स्थल विशेष रूप से SSLV तथा निजी प्रक्षेपणों के समर्थन के लिये समर्पित होगा।
      • यह समर्पित अंतरिक्ष प्रक्षेपण स्थल उद्योग को मांग-आधारित प्रक्षेपण सुविधा प्रदान करके निजी क्षेत्र की भागीदारी को संस्थागत रूप प्रदान करेगा, जिससे भारत के वाणिज्यिक प्रक्षेपण पारितंत्र को और मज़बूती मिलेगी।
  • वाणिज्यिक विकास एवं आर्थिक पैमाना: भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का मूल्य 8.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर (वैश्विक हिस्सेदारी का 2%) है और उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण सेवाओं और डाउनस्ट्रीम डेटा अनुप्रयोगों में बढ़ती निजी भागीदारी के कारण वर्ष 2033 तक लगभग 44 बिलियन अमेरिकी डॉलर (वैश्विक हिस्सेदारी का 8%) तक बढ़ने का अनुमान है।
    • उदाहरण के लिये, न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड द्वारा अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों के लिये वाणिज्यिक प्रक्षेपण अनुबंध प्राप्त  करना और ध्रुव स्पेस जैसी निजी कंपनियों द्वारा वैश्विक ग्राहकों के लिये एंड-टू-एंड उपग्रह मिशनों का निष्पादन—ये सभी नीतिगत सुधारों से सक्षम हुई, मापनीय वाणिज्यिक परिपक्वता का संकेत देते हैं।
  • अंतरिक्ष आधारित निगरानी के माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा को मज़बूत करना: भारत अंतरिक्ष आधारित निगरानी उपग्रहों के समूह को आगे बढ़ा रहा है, तथा राष्ट्रीय सुरक्षा और वास्तविक समय की स्थितिजन्य जागरूकता को बढ़ाने के लिये वर्ष 2029-30 तक 52 रिमोट सेंसिंग एवं खुफिया उपग्रहों को तैनात करने की योजना बना रहा है।
    • हाल की प्रगति में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा रक्षा-समर्पित पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों का समर्थन करना और रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी के तहत अंतरिक्ष सुरक्षा संरचना का संचालन करना, सीमाओं, समुद्री क्षेत्रों और महत्त्वपूर्ण संपत्तियों की निगरानी को मज़बूत करना शामिल है।
  • भारत की अंतरिक्ष परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका: भारत के निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र ने हाल के वर्षों में ठोस प्रगति देखी है, जिसे IN-SPACe से नियामक समर्थन और न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड द्वारा वाणिज्यिक सुविधा प्रदान करने का समर्थन प्राप्त है। 
    • IN-SPACe ने निजी कंपनियों को उड़ान के लिये तैयार सैटेलाइट प्लेटफॉर्म तक पहुँच प्रदान करने के लिये सैटेलाइट बस एज़ ए सर्विस (SBaaS) पहल शुरू की है, जिससे प्रवेश संबंधी बाधाएँ और कम होंगी तथा नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।
    • भारत में प्रक्षेपण प्रणालियों, उपग्रह निर्माण, प्रणोदन, पृथ्वी अवलोकन एवं डाउनस्ट्रीम विश्लेषण सहित विभिन्न क्षेत्रों में 300 से अधिक अंतरिक्ष स्टार्टअप मौजूद हैं, जो निजी क्षेत्र के तीव्र विस्तार को दर्शाते हैं। 
      • स्काईरूट के विक्रम- S, अग्निकुल के अग्निबाण SOrTeD और पिक्सल के हाइपरस्पेक्ट्रल नक्षत्र विकास जैसी प्रमुख उपलब्धियाँ बढ़ती तकनीकी परिपक्वता और व्यावसायिक तत्परता का संकेत देती हैं।
  • संप्रभु कक्षीय उपस्थिति की रूपरेखा (भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन): भारत वर्तमान में भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) के विकासात्मक चरण के माध्यम से अंतरिक्ष में अपनी स्थायी संप्रभु उपस्थिति को साकार करने की दिशा में कार्य कर रहा है। इस प्रक्रिया में डिज़ाइन अवधारणाओं से आगे बढ़कर हार्डवेयर की खरीद तक का चरण शामिल है, ताकि वर्ष 2035 तक एक रणनीतिक कक्षीय चौकी सुरक्षित की जा सके।
    • यह पूर्व-परिचालन चरण डॉकिंग और मॉड्यूल एकीकरण जैसे महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकी प्रदर्शनों पर केंद्रित है, जो भविष्य के सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण अनुसंधान एवं चंद्र गेटवे के लिये ISS को दरकिनार करने की नींव रखता है।
    • केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा सितंबर 2024 में औपचारिक रूप से रोडमैप को मंजूरी दी, जिसका लक्ष्य वर्ष 2028 तक प्रथम मॉड्यूल BAS-1 को लॉन्च करना है।
  • राजकोषीय और नियामक उदारीकरण: सरकार ने वित्तीय संरचनात्मक सुधार लागू किया है, जिसमें नियामक बाधाओं को हटाना और जोखिम पूंजी का निवेश शामिल है, जिससे डीप-टेक क्षेत्र के स्टार्टअप्स द्वारा सामना की जाने वाली "डेथ वैल"' का समाधान किया जा सके।
    • भारत अब उपग्रह निर्माण और संचालन, उपग्रह डेटा उत्पाद, तथा ग्राउंड सेगमेंट और यूज़र सेगमेंट जैसे अंतरिक्ष क्षेत्रों में 100 प्रतिशत तक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) की अनुमति देता है।
  • हाई-टेक कूटनीति और वैश्विक निगरानी: अंतरिक्ष अब भारत की विदेश नीति का एक केंद्रीय स्तंभ बन गया है, जैसे कि अमेरिका के साथ iCET (इनिशिएटिव ऑन क्रिटिकल एंड इमरजिंग टेक्नोलॉजी) जैसी सहयोग परियोजनाओं के माध्यम से, जहाँ हाई-रिज़ॉल्यूशन संबंधी निगरानी डेटा को कूटनीतिक साधन के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।
    • उदाहरण के लिये, NASA-ISRO SAR (निसार) उपग्रह (वर्ष 2025 में लॉन्च) डुअल-फ्रीक्वेंसी L-बैंड और S-बैंड राडार का उपयोग करके पृथ्वी की स्थलाकृति को प्रति 12 दिन में सेंटीमीटर-स्तरीय सटीकता के साथ मानचित्रित करता है।
    • इसके अतिरिक्त, आर्टेमिस समझौतों में भारत की भागीदारी उन्नत प्रशिक्षण, तकनीकी प्रगतियों और वैज्ञानिक अवसरों तक पहुँच को सुगम बनाती है।

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?

  • रणनीतिक विश्वसनीयता को प्रभावित करने वाला प्रक्षेपण विश्वसनीयता संकट: PSLV-C62 की विफलता (वर्ष 2026) ने पिछले 7 वर्षों में ISRO के 5वीं प्रक्षेपण विफलता को चिन्हित किया, जिससे भारत की एक भरोसेमंद प्रक्षेपण प्रदाता के रूप में विश्वसनीयता पर प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ा। 
    • यह विफलता मई 2025 में तीसरे चरण के मोटर की समस्या के कारण PSLV-C61 मिशन के विफल घोषित होने के एक वर्ष से भी कम समय में हुई है।
    • वाणिज्यिक अंतरिक्ष बाज़ार में, लागत की तुलना में विश्वसनीयता अधिक मायने रखती है, जिसके परिणामस्वरूप भारत ने वैश्विक छोटे उपग्रह प्रक्षेपणों में अपनी 35% हिस्सेदारी (2017) को वर्ष 2024 तक लगभग शून्य कर दिया है, जबकि स्पेसएक्स ने अकेले वर्ष 2024 में 130 से अधिक सफल प्रक्षेपण किये हैं।
  • सांरचनात्मक बाधा: भारत की अंतरिक्ष प्रक्षेपण क्षमता संरचनात्मक रूप से सीमित बनी हुई है, क्योंकि यह लगभग पूरी तरह से श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र पर निर्भर है। यह स्थिति चीन से स्पष्ट रूप से भिन्न है, जिसके पास 4-5 प्रक्षेपण स्थल हैं, और संयुक्त राज्य अमेरिका से, जहाँ कई नागरिक और सैन्य अंतरिक्षपोर्ट संचालित होते हैं। 
    • यह भारत की तत्काल प्रतिक्रिया या अतिरिक्त प्रक्षेपण करने की क्षमता को सीमित कर देता है, जो संकट या युद्ध के समय सैटेलाइट की तीव्र पुनःपूर्ति हेतु महत्त्वपूर्ण होते हैं।
    • इसका अर्थ यह भी है कि श्रीहरिकोटा में मौसम संबंधी बाधाएँ संपूर्ण मिशन कैलेंडर पर प्रभाव डाल सकती हैं, जिससे नागरिक, वाणिज्यिक और रणनीतिक प्रक्षेपणों में एक साथ देरी हो सकती है। 
  • नौवहन संप्रभुता खतरे में: भारत को सुनिश्चित क्षेत्रीय कवरेज के लिये सात परिचालनशील NavIC उपग्रहों की आवश्यकता है, लेकिन वर्ष 2026 तक केवल चार ही पूरी तरह से कार्यशील हैं, दो अपने जीवनकाल के अंत के करीब हैं, और NVS-02 (2025) अपनी अंतिम कक्षा तक पहुँचने में विफल रहा, जिससे इसकी प्रणालीगत विश्वसनीयता कमज़ोर हो गई है। 
    • इस क्षरण से मिसाइल मार्गदर्शन, यूएवी नेविगेशन, रसद सटीकता और नागरिक स्थिति निर्धारण सेवाओं में कमी आती है, जिससे कारगिल युद्ध के दौरान सामरिक अस्वीकृति के जोखिमों पर सीखे गए सबक के बावजूद, विदेशी प्रणालियों, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रणालियों पर निरंतर निर्भरता बनी रहती है।
  • आईटीयू में विलंबित आवेदन और कक्षीय संप्रभुता को नुकसान: अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ में भारत द्वारा विलंबित आवेदन, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन द्वारा किये गए प्रारंभिक और बड़े पैमाने पर दावों के बिल्कुल विपरीत हैं, जिससे प्रमुख भू-स्थैतिक कक्षा (GEO) स्लॉट्स और भविष्य में स्पेक्ट्रम तक पहुँच स्थायी रूप से खोने का खतरा उत्पन्न होता है।
    • यह भारत को उभरती मेगा-कॉन्स्टेलेशनों से बाहर कर सकता है और वैश्विक रूप से स्पेस गवर्नेंस में उसकी सौदेबाज़ी की शक्ति को गंभीर रूप से कमज़ोर कर सकता है, क्योंकि कक्षीय स्थिति सीमित हैं और देरी अपरिवर्तनीय रणनीतिक हानि में बदल जाती है।
  • कमज़ोर सैन्य अंतरिक्ष संरचना: भारत की रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (वर्ष 2019 में स्थापित) अभी भी पूरी तरह सशक्त नहीं है। यह मुख्यतः एक समन्वयात्मक संस्था के रूप में कार्य करती है और इसके पास पूर्ण संचालनात्मक कमान का अधिकार नहीं है। इसके अतिरिक्त, यह सेना–नौसेना–वायुसेना के डेटा स्ट्रीम्स के बीच अलग-थलग तरीके से कार्य करती रहती है।
    • इसके विपरीत, अमेरिकी अंतरिक्ष बल एक स्वतंत्र सशस्त्र सेवा के रूप में कार्य करता है। 
      • यहाँ तक ​​कि पाकिस्तान भी साइबर युद्ध से एकीकृत एक पूर्णतः कार्यरत अंतरिक्ष कमान (2024) के साथ आगे बढ़ चुका है, जो भारत की सापेक्ष संस्थागत पिछड़ेपन को उजागर करता है।
  • विदेशी खुफिया, निगरानी और अन्वेषण (ISR) डेटा पर अत्यधिक निर्भरता: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, भारत को अपनी स्वदेशी उपग्रह पुनः निरीक्षण समय में महत्त्वपूर्ण सीमाओं का सामना करना पड़ा (विशेष स्थानों के लिये प्रायः 14 दिनों तक)।
    • इस प्रकार की निर्भरता डेटा अस्वीकृति, चयनात्मक पहुँच, और रणनीतिक आश्चर्य के जोखिम को बढ़ा देती है, विशेष रूप से संकट के दौरान।
    • इसके विपरीत, चीन का याओगान रीकानिसन्स सैटेलाइट नेटवर्क, एकीकृत ELINT क्षमताओं के साथ, निरंतर अंतरिक्ष-आधारित निगरानी प्रदान करता है, जिससे इसे ISR प्रभुत्व में निर्णायक बढ़त मिलती है।
      • इस वजह से सशस्त्र बलों को लक्ष्य सत्यापन और क्षति मूल्यांकन में उपयोग की जाने वाली दैनिक उच्च-रिज़ॉल्यूशन छवियों के लिये मैक्सार जैसे अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक प्रदाताओं पर निर्भर रहना पड़ा।
    • इसके विपरीत, अटलांटिक काउंसिल द्वारा 2025 में किये गए सिग्नल इंटेलिजेंस इंटरसेप्ट के अनुसार, चीन ने अपने गाओफेन उपग्रहों से लगभग वास्तविक समय में उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाली छवियाँ पाकिस्तान को प्रदान कीं, जिसमें सात-दसवें सेकंड (seven-tenths of a second) से भी कम की विलंबता थी, जो ISR समर्थन में विषमताओं को रेखांकित करती है। 
      • इसके अतिरिक्त, भारत की अंतरिक्ष-आधारित इलेक्ट्रॉनिक खुफिया (ELINT) क्षमता एक ही समर्पित उपग्रह (EMISAT) तक सीमित है, जिसमें कोई स्थायी ELINT या अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता समूह नहीं है, जिससे विदेशी ISR डेटा पर निर्भरता और बढ़ जाती है। 
  • वाणिज्यिक-रणनीतिक विसंगति: भारत गूगल मैप्स जैसे विदेशी प्लेटफॉर्मों को बाज़ार में गहरी पैठ बनाने की अनुमति देता है, जबकि मैपमाईइंडिया जैसे घरेलू विकल्प बेहतर स्थानीय सटीकता प्रदान करते हैं तथा भारत स्टारलिंक जैसे सैटेलाइट इंटरनेट प्रदाताओं का भी स्वागत कर रहा है। 
    • यह रणनीतिक रूप से जोखिम भरा है, क्योंकि यूक्रेन संघर्ष के दौरान स्टारलिंक के एक्सेस को चुनिंदा रूप से प्रतिबंधित किये जाने के उदाहरण सामने आए हैं, जो बाह्य नियंत्रण के प्रति संवेदनशीलता को उजागर करते हैं। 
    • इस तरह की खुली नीति से डेटा लीक होने, राजस्व हानि और रणनीतिक निर्भरता का खतरा है, जो चीन के बिल्कुल विपरीत है, जो संप्रभुता को बनाए रखने के लिये विदेशी GNSS और मानचित्रण प्रभुत्व को सख्ती से प्रतिबंधित करता है।
  • स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस (SSA) में अंतराल: भारत अपने साधनों (नेविगेशनल इंटेलिजेंस सिस्टम, आईआरएस) का विस्तार कर रहा है, जिससे सूक्ष्म मलबे (<10 सेमी) की निगरानी करने की उसकी क्षमता में वृद्धि हुई है, किंतु ELO में मलबे की व्यापक वृद्धि की तुलना में यह अभी भी अपर्याप्त है, जिससे BAS के लिये केसलर सिंड्रोम जैसी घटनाओं का खतरा बना हुआ है। 
    • वर्तमान NETRA परियोजना की भौगोलिक तथा दृश्य कवरेज अमेरिका एवं रूस की तुलना में सीमित है, जिसके परिणामस्वरूप विविध कक्षाओं में “ब्लाइंड स्पॉट” टक्करों के प्रति भारतीय अंतरिक्ष परिसंपत्तियाँ अधिक संवेदनशील बनी रहती हैं
      • उदाहरणस्वरूप, ISRO ने पिछले 14 वर्षों में अपनी भू-कक्षा में स्थित उपग्रहों के लिये 122 Collision Avoidance Manoeuvres (CAM) सम्पन्न किये हैं।
  • घटक निर्भरता और आपूर्ति शृंखला की भेद्यता: आत्मनिर्भर भारत” पहल के बावजूद, अंतरिक्ष क्षेत्र में उच्च-स्तरीय अंतरिक्ष-ग्रेड इलेक्ट्रॉनिक्स, ट्रैवलिंग वेव ट्यूब्स (TWTs) तथा कार्बन फाइबर जैसे महत्त्वपूर्ण घटकों के लिये आयात पर निर्भरता बनी हुई है, जो कार्यक्रमों को भू-राजनीतिक आपूर्ति संकट के प्रति संवेदनशील बनाती है।
    • “स्पेस-ग्रेड” सेमीकंडक्टर्स के स्वदेशीकरण की धीमी गति के कारण रणनीतिक मिशन अभी भी पश्चिमी देशों की निर्यात नियंत्रण नीतियों अथवा ताइवान से जुड़ी आपूर्ति सीमाओं से बँधे हुए हैं।
      • उदाहरण के लिये, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के आयात पर भारत का व्यय, अंतरिक्ष-संबंधित निर्यात से होने वाले राजस्व की तुलना में बारह गुना अधिक है।
  • सुधारों में परिकल्पना और क्रियान्वयन के बीच अंतर: हालाँकि IN-SPACe ने औपचारिक रूप से भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिये खोल दिया है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर क्रियान्वयन में महत्त्वपूर्ण कमियाँ बनी हुई हैं।
    • निजी क्षेत्र के प्रतिस्पर्द्धियों को अभी भी सुनिश्चित और पूर्वानुमानित प्रक्षेपण अभिगम्यता प्राप्त नहीं है, रक्षा-श्रेणी के उपग्रहों की मांग के संकेत अभी भी अस्पष्ट हैं तथा चीन के राज्य व सैन्य समर्थित अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र की तुलना में वित्तपोषण की कमी है।
    • ये सभी बाधाएँ मिलकर भारत की विशाल सैटेलाइट समूहों को विकसित करने तथा अंतरिक्ष क्षेत्र में निरंतर प्रभुत्व हासिल करने की क्षमता को सीमित करती हैं।

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है? 

  • प्रक्षेपण की विश्वसनीयता स्थापित करना और प्रक्षेपण की आवृत्ति बढ़ाना: भारत को मिशन-केंद्रित परीक्षण प्रणाली से आगे बढ़कर फ्लीट-स्तरीय विश्वसनीयता अभियांत्रिकी अपनानी चाहिये। इसके अंतर्गत SpaceX जैसी प्रणालियों से प्रेरणा लेते हुए ब्लॉक अपग्रेड, त्वरित फीडबैक चक्र तथा क्रमिक डिज़ाइन सत्यापन को अपनाया जाना आवश्यक है।
    • प्रक्षेपण असफलताओं के कारण प्रक्षेपण कार्यक्रम बाधित न हों, इसके लिये एक समर्पित लॉन्च एश्योरेंस फंड का सृजन किया जाना चाहिये।
    • साथ ही, अल्पावधि में प्रक्षेपण यानों की भूमिका का स्पष्ट विभाजन आवश्यक है (PSLV को वाणिज्यिक अभियानों के लिये, LVM3 को रणनीतिक तथा मानव अंतरिक्ष उड़ानों के लिये और SSLV को त्वरित तथा लघु उपग्रह प्रक्षेपणों के लिये), जिससे अवरोध कम होंगे तथा समग्र प्रणाली अधिक सुदृढ़ बनेगी।
  • बहुविकल्पीय एवं त्वरित प्रक्षेपण अवसंरचना का विकास: भारत को एकमात्र प्रक्षेपण स्थल पर निर्भरता से आगे बढ़ते हुए पूर्वी तट पर अनेक अंतरिक्ष बंदरगाहों को परिचालन में लाना चाहिये तथा पश्चिमी और दक्षिणी प्रक्षेपण विकल्पों का भी विकास करना चाहिये। इससे मौसम-जनित व्यवधानों का जोखिम घटेगा और प्रणाली की प्रत्यास्थता बढ़ेगी। 
    • श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के साथ-साथ कुलसेकरपट्टिनम जैसी सुविधाएँ त्वरित टर्नअराउंड और विकेंद्रीकृत प्रक्षेपण क्षमता प्रदान कर सकती हैं।
    • इसके समानांतर, पूर्व-एकीकृत उपग्रहों के साथ समर्पित सैन्य प्रक्षेपण विंडो विकसित कर वास्तविक ‘लॉन्च-ऑन-डिमांड’ क्षमता प्राप्त की जा सकती है, जो युद्धकालीन त्वरित आपूर्ति और संकट प्रतिक्रिया के लिये महत्त्वपूर्ण होगी।
  • ऑर्बिटल स्लॉट और स्पेक्ट्रम की युद्धस्तरीय सुरक्षा: भारत को अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) में GEO, LEO और MEO कक्षाओं के लिये शीघ्र फाइलिंग सुनिश्चित करने हेतु एक राष्ट्रीय ITU टास्क फोर्स गठित करनी चाहिये, जिसमें मेगा-कॉन्स्टेलेशन एवं द्वि-उपयोगी पेलोड को प्राथमिकता दी जाए। 
    • ऑर्बिटल स्लॉट और स्पेक्ट्रम को रणनीतिक अचल संपत्ति के रूप में देखा जाना चाहिये, क्योंकि एक बार ये सीमित संसाधन प्रारंभिक दावेदारों द्वारा कब्ज़ा कर लिये जाने पर पुनः प्राप्त नहीं किये जा सकते तथा इससे दीर्घकाल में राष्ट्रीय अंतरिक्ष शक्ति क्षीण होती है।
  • नेविगेशन संप्रभुता का पुनर्निर्माण (NavIC 2.0): भारत को NavIC उपग्रहों की पुनःपूर्ति में तेज़ी लानी चाहिये ताकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के तहत ऑन-ऑर्बिट स्पेयर और तेज़ प्रतिस्थापन चक्रों द्वारा समर्थित, हर समय 7 से अधिक परिचालन उपग्रह सुनिश्चित किये जा सकें।  
    • NavIC की संगतता को स्मार्टफोन, वाहन, UAV तथा महत्त्वपूर्ण अवसंरचना में मानकों और सरकारी खरीद नीतियों के माध्यम से अनिवार्य एवं प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
      • साथ ही मिसाइल, ड्रोन, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और आपदा-मोचन प्रणालियों में NavIC का गहन एकीकरण आवश्यक है, ताकि GPS-निषेध अथवा संघर्ष की स्थिति में भी प्रणाली सुदृढ़ बनी रहे।
  • एक पूर्ण-स्पेक्ट्रम सैन्य अंतरिक्ष संरचना का निर्माण: भारत को स्पष्ट परिचालन अधिकार, विशेषीकृत कैडर और स्वतंत्र बजट के साथ एक पूर्णतः सशक्त अंतरिक्ष कमान की स्थापना करनी चाहिये।
    •  इस कमान को एकल-उपग्रह अभियानों से आगे बढ़कर ISR, ELINT और अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता के लिये कॉन्स्टेलेशन-आधारित संरचनाओं को अपनाना चाहिये, जिससे फॉर्मेशन फ्लाइंग और रिडंडेंसी के माध्यम से निरंतर कवरेज सुनिश्चित हो सके।
    • सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि अंतरिक्ष से प्राप्त डाटा को थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बीच साझा साझा परिचालन चित्र में समेकित किया जाना चाहिये, जिससे मल्टी-डोमेन अभियानों में वास्तविक काल में संयुक्त निर्णय संभव हो सके।
  • विदेशी डाटा और सैटकॉम पर निर्भरता में कमी: सीमा निगरानी, समुद्री क्षेत्र जागरूकता और संकट प्रबंधन के लिये भारत को स्वदेशी ISR क्षमताओं का आधारभूत ढाँचा विकसित करना चाहिये तथा विदेशी उपग्रह डाटा का उपयोग केवल पूरक रूप में किया जाना चाहिये।
    • विदेशी सैटकॉम साझेदारियों में डाटा स्थानीयकरण, सुनिश्चित पहुँच गारंटी और किल-स्विच सुरक्षा जैसी कड़ी शर्तें आवश्यक हैं, ताकि भू-राजनीतिक संकटों में सेवा बाधित न हो।
    • रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करने और पिछली सैन्य कार्रवाइयों के दौरान उजागर हुई कमज़ोरियों से बचने के लिये ऐसे उपाय अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
  • काउंटर-स्पेस खतरों के विरुद्ध प्रणाली की सुदृढ़ता: जैमिंग, साइबर हस्तक्षेप और निकटवर्ती ऑर्बिटल गतिविधियों के बढ़ते खतरे को देखते हुए भारत को उपग्रह सुदृढ़ीकरण में निवेश करना चाहिये— जिसमें पुनरावृत्ति, त्वरित पुनर्स्थापन क्षमता, कक्षीय गतिशीलता, मज़बूत एन्क्रिप्शन एवं ऑन-ऑर्बिट सर्विसिंग शामिल हों।
    • इसके साथ ही भूमि-आधारित और अंतरिक्ष-आधारित दोनों प्रकार के अंतरिक्ष स्थिति जागरूकता (SSA) नेटवर्क का विस्तार किया जाना चाहिये, जिससे शत्रुतापूर्ण गतिविधियों की शीघ्र पहचान हो सके।
    • भारत को अंतरिक्ष-आधारित जवाबी हथियारों पर निर्भर रहने के बजाय, समुत्थानशीलता द्वारा प्रतिरोध की रणनीति का अनुसरण करना चाहिये, यह सुनिश्चित करते हुए कि उसकी अंतरिक्ष प्रणालियाँ हमले की स्थिति में भी सुरक्षित रह सकें, अनुकूलन कर सकें और कार्य करती रहें।
  • वाणिज्यिक विकास और रणनीतिक आवश्यकताओं का समन्वय: निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र को विस्तार देने के लिये भारत को एंकर प्रोक्योरमेंट मॉडल अपनाना चाहिये, जिसमें सरकार नागरिक एवं रक्षा सेवाओं के लिये दीर्घकालिक खरीद प्रतिबद्धता दे, जिससे निजी उपग्रह समूहों का जोखिम कम हो।
    • निर्यात वित्त, बीमा और क्रेडिट गारंटी की उपलब्धता भारतीय प्रक्षेपण एवं उपग्रह कंपनियों को वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में सक्षम बनाएगी।
    • साथ ही नीतिगत फोकस केवल प्रक्षेपण तक सीमित न रहकर कृषि, शहरी नियोजन, आपदा प्रबंधन और जलवायु संबंधी सेवाओं जैसे डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में मांग सृजन पर होना चाहिये, जिससे भारत अधिक मूल्य संवर्द्धन कर सके।

निष्कर्ष: 

आने वाले दशक में, भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को मिशन-आधारित उपलब्धियों से हटकर, रणनीतिक स्पष्टता और क्रियान्वयन अनुशासन पर आधारित, पारिस्थितिकी तंत्र-स्तरीय क्षमता निर्माण की ओर अग्रसर होने की आवश्यकता है। IN-SPACe की दशकात्मक दृष्टि एवं रणनीति निजी क्षेत्र के एकीकरण, प्रक्षेपण क्षमता के विस्तार और डाउनस्ट्रीम मूल्य सृजन को भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के विकास के प्रमुख इंजन के रूप में उचित रूप से रेखांकित करती है।  

हालाँकि, इस दृष्टि को ठोस परिणामों में रूपांतरित करने के लिये सशक्त सैन्य अंतरिक्ष प्रशासनिक व्यवस्था, सुनिश्चित डेटा सॉवरेनिटी और संस्थानों के बीच समयबद्ध जवाबदेही अनिवार्य होगी। केवल तभी भारत एक बढ़ते हुए प्रतिस्पर्द्धात्मक और विवादित अंतरिक्ष क्षेत्र में रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता तथा विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता सुनिश्चित कर सकेगा।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

IN-SPACe के दशकीय विज़न और रणनीति के आलोक में भारत के अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र को मज़बूत करने में निजी क्षेत्र की भूमिका का मूल्यांकन कीजिये। वाणिज्यिक विकास को भारत की रक्षा और रणनीतिक अंतरिक्ष आवश्यकताओं के साथ किस प्रकार संरेखित किया जा सकता है?

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. आज भारत के लिये अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है?
क्योंकि अंतरिक्ष एक प्रतिस्पर्द्धी रणनीतिक वातावरण में राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा सॉवरेनिटी और आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा का आधार है।

प्रश्न 2. भारत के अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र में सबसे बड़ी संरचनात्मक कमज़ोरी क्या है?
निम्न प्रक्षेपण आवृत्ति तथा नागरिक, वाणिज्यिक और सैन्य अंतरिक्ष संस्थानों के बीच संस्थागत विखंडन।

प्रश्न 3. विदेशी उपग्रह डेटा पर निर्भरता जोखिमपूर्ण क्यों है?
क्योंकि संकट की परिस्थितियों में विदेशी डेटा में विलंब, अस्वीकृति या चयनात्मक साझेदारी हो सकती है, जिससे रणनीतिक स्वायत्तता कमज़ोर होती है।

प्रश्न 4. IN-SPACe की ‘Decadal Vision’ का मूल उद्देश्य क्या है?
निजी क्षेत्र की भागीदारी का विस्तार करना, डाउनस्ट्रीम सेवाओं को सशक्त बनाना तथा वाणिज्यिक विकास को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ एकीकृत करना।

प्रश्न 5. एकल उपग्रहों की तुलना में उपग्रह समूह को क्यों प्राथमिकता दी जाती है?
क्योंकि ये अतिरिक्त सुरक्षा (Redundancy), निरंतरता (Persistence) और विफलताओं या शत्रुतापूर्ण कार्रवाइयों के विरुद्ध समुत्थानशीलता (Resilience) प्रदान करते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. भारत के उपग्रह प्रमोचित करने वाले वाहनों के सन्दर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (2018)

  1. PSLV से वे उपग्रह प्रमोचित किये जाते हैं जो पृथ्वी के संसाधनों के मानीटरन में उपयोगी हैं, जबकि GSLV को मुख्यत: संचार उपग्रहों को प्रमोचित करने के लिये अभिकल्पित किया गया है। 
  2. PSLV द्वारा प्रमोचित उपग्रह आकाश में एक ही स्थिति में स्थायी रूप में स्थिर रहते प्रतीत होते हैं जैसा कि पृथ्वी के एक विशिष्ट स्थान से देखा जाता है। 
  3. GSLV Mk III, एक चार-स्टेज वाला प्रमोचन वाहन है, जिसमें प्रथम और तृतीय चरणों में ठोस रॉकेट मोटरों का तथा द्वितीय और चतुर्थ चरणों में द्रव रॉकेट इंजनों का प्रयोग होता है।

उपर्युत्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a)    केवल 1    

(b)    2 और 3

(c)    1 और 2   

(d)    केवल 3

उत्तर: (a) 


मेन्स 

प्रश्न 1. भारत के तीसरे चंद्रमा मिशन का मुख्य कार्य क्या है जिसे इसके पहले के मिशन में हासिल नहीं किया जा सका? जिन देशों ने इस कार्य को हासिल कर लिया है उनकी सूची दीजिये। प्रक्षेपित अंतरिक्ष यान की उपप्रणालियों को प्रस्तुत कीजिये और विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के 'आभासी प्रक्षेपण नियंत्रण केंद्र' की उस भूमिका का वर्णन कीजिये जिसने श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण में योगदान दिया है। (2023) 

प्रश्न 2. भारत की अपना स्वयं का अंतरिक्ष केंद्र प्राप्त करने की क्या योजना है और हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम को यह किस प्रकार लाभ पहुँचाएगी? (2019) 

प्रश्न 3. अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों की चर्चा कीजिये। इस प्रौद्योगिकी का प्रयोग भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में किस प्रकार सहायक हुआ है? (2016)