भारत में प्राकृतिक कृषि का मुख्यधारा में समावेशन | 19 Mar 2026

Fयह लेख 17/03/2026 को द हिंदू बिजनेस लाइन में प्रकाशित ‘Why a transition to natural farming is a necessity’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख जलवायु जोखिमों और आगत लागतों को कम करने के साथ-साथ 'संक्रमण जुर्माना' और बायोमास की कमी जैसी संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने के लिये प्राकृतिक कृषि की ओर संक्रमण की रणनीतिक आवश्यकता का विश्लेषण करता है।

प्रिलिम्स के लिये:  प्राकृतिक कृषि हेतु राष्ट्रीय मिशन (NMNF), कृषि विज्ञान केंद्र, किसान उत्पादक संगठन, प्राकृतिक कृषि।

मेन्स के लिये: प्राकृतिक कृषि का महत्त्व, प्रमुख मुद्दे और आवश्यक उपाय। 

भारत की खाद्य प्रणालियाँ आज ऊर्जा आधारित आगतों पर अत्यधिक निर्भर हैं, जिससे कृषि उर्वरक तथा ऊर्जा बाज़ारों के उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनी रहती है। इस संदर्भ में, प्राकृतिक कृषि एक रणनीतिक विकल्प के रूप में उभरी है, जो पारंपरिक ज्ञान पर आधारित कम लागत तथा पारिस्थितिकी-अनुकूल खेती को प्रोत्साहित करती है। मृदा स्वास्थ्य, जलवायु अनुकूलन और आगत लागत में कमी लाने की इसकी क्षमता को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने प्राकृतिक कृषि हेतु राष्ट्रीय मिशन (NMNF) जैसी पहलें आरंभ की हैं। साथ ही आंध्र प्रदेश में शून्य बजट प्राकृतिक कृषि (ZNBF) के सफल प्रायोगिक कार्यान्वयन ने इसे सतत, अनुकूलित तथा किसान-केंद्रित कृषि प्रणाली के रूप में एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में स्थापित किया है।

भारत में प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देने की आवश्यकता के पीछे कौन-से प्रमुख कारक हैं?

  • आर्थिक अनुकूलन और आगत लागतों में कमी: शून्य बजट प्राकृतिक कृषि (ZNBF) की ओर संक्रमण, आयातित सिंथेटिक कृषि रसायनों पर निर्भरता को समाप्त कर कृषि अर्थव्यवस्था को अस्थिर वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से सुरक्षित बनाता है। 
    • स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैविक संसाधनों के उपयोग से यह मॉडल कृषि को पूंजी-प्रधान प्रणाली से परिवर्तित कर एक आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी उद्यम में बदल देता है। 
    • आँकड़ों के अनुसार, यह पद्धति प्रमुख फसलों की कृषि लागत को लगभग 5–10% तथा कुछ मामलों में 20–55% तक कम कर सकती है, जबकि फसलों, पशुधन और पेड़ों को एकीकृत करने वाली विविधीकृत प्राकृतिक कृषि प्रणाली पारंपरिक एकल फसल प्रणाली की तुलना में 20–40% अधिक शुद्ध आय प्रदान कर सकती है।
    • इसका सर्वाधिक लाभ लघु और सीमांत किसानों को मिलता है, जो भारत की कृषि संरचना का 85% से अधिक हिस्सा है, क्योंकि इससे उनकी आगत निर्भरता घटती है और लाभप्रदता बढ़ती है।
  • कार्बन पृथक्करण के माध्यम से जलवायु परिवर्तन का शमन: प्राकृतिक कृषि अवनत भूमि को सक्रिय कार्बन सिंक में परिवर्तित कर जलवायु परिवर्तन शमन का एक प्रभावी माध्यम बनती है। 
    • मल्चिंग, हरित आवरण और शून्य-जुताई जैसी तकनीकों का समेकित उपयोग मृदा सूक्ष्मजीव पारिस्थितिकी को सुदृढ़ करता है, जिससे वायुमंडलीय CO₂ को सक्रिय रूप से कम किया जा सकता है।  
    • वर्ष 2026 में पूर्वी भारत में किये गए एक अध्ययन के अनुसार, प्राकृतिक कृषि से मृदा जैविक कार्बन (SOC) भंडार में लगभग 0.62 मिलीग्राम/हेक्टेयर की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि पारंपरिक कृषि में गिरावट देखी गई। 
    • इसी प्रकार, ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (CEEW) के अध्ययन के अनुसार, प्राकृतिक कृषि से पारंपरिक विधियों की तुलना में 55–85% कम उत्सर्जन होता है, जो इसे जलवायु-अनुकूल कृषि मॉडल के रूप में स्थापित करता है।
  • जल संरक्षण और जलभंडार पुनर्भरण: कृषि क्षेत्रों में घटते भूजल स्तर को संतुलित करने हेतु रासायनिक आधारित कृषि से दूरी बनाना आवश्यक है। 
    • कार्बनिक पदार्थों की अधिकता से मृदा की संरचना, सरंध्रता, जल अंतर्प्रवाह दर तथा नमी धारण क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होता है। 
    • यह सूखा-रोधी तंत्र ऊर्जा-गहन सिंचाई पर निर्भरता को कम करते हुए अनियमित मानसून परिस्थितियों में भी पारिस्थितिकी तंत्र की नमी बनाए रखता है। 
    • CEEW के अध्ययन के अनुसार, सिंचित फसलों के लिये प्राकृतिक कृषि में 45–70% कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो इसे संसाधन-कुशल बनाता है।
  • भू-राजनीतिक संघर्षों के विरुद्ध व्यापक आर्थिक स्थिरता: कृषि पारिस्थितिकी की ओर संक्रमण, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को वैश्विक भू-राजनीतिक संघर्षों और ऊर्जा संकटों के प्रभावों से सुरक्षित करता है। 
    • आधुनिक कृषि की जीवाश्म ईंधन आधारित उर्वरकों पर निर्भरता के कारण खाद्य मुद्रास्फीति वैश्विक व्यापार व्यवधानों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है। 
    • उदाहरणतः लाल सागर में जहाजरानी संकट और वर्ष 2024–25 की ऊर्जा अस्थिरता के दौरान उर्वरक कीमतों में तीव्र उतार-चढ़ाव ने पारंपरिक कृषि की लाभप्रदता को प्रभावित किया। इसके विपरीत, प्राकृतिक कृषि मॉडल ने वर्ष 2025 में इन आपूर्ति झटकों के बावजूद उत्पादन लागत को स्थिर और अनुमानित बनाए रखा, जो इसकी संरचनात्मक स्थिरता को दर्शाता है।
  • जैव विविधता बहाली और पारिस्थितिक संतुलन: रसायन-मुक्त कृषि का व्यापक प्रसार कृषि जैव विविधता और परागणकारी जीवों की घटती आबादी को पुनर्जीवित करने में सहायक है। 
    • विषाक्त कीटनाशकों के त्याग से मृदा के जटिल खाद्य जाल का पुनर्निर्माण होता है, जिससे केंचुए, लाभकारी कीट तथा सूक्ष्मजीव सक्रिय रूप से विकसित होते हैं। 
    • यह प्रक्रिया एक स्व-विनियमित पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करती है, जहाँ प्राकृतिक कीट-नियंत्रण तंत्र कृत्रिम उपायों का स्थान ले लेते हैं। 
    • वर्ष 2026 में कृषि विज्ञान केंद्र के सूक्ष्मजीवविज्ञानी परीक्षणों से यह प्रमाणित हुआ कि प्राकृतिक कृषि अपनाने से लाभकारी जीवाणु और कवक की संख्या में 40–47% वृद्धि हुई, जिससे मृदा जैव विविधता तथा पारिस्थितिकी अनुकूलन सुदृढ़ हुआ।
  • जन स्वास्थ्य एवं पोषण सुरक्षा: रासायनिक-मुक्त कृषि की ओर संक्रमण एक महत्त्वपूर्ण जन स्वास्थ्य हस्तक्षेप के रूप में उभरता है, जो आहार-संबंधी गैर-संक्रामक रोगों की बढ़ती चुनौती का प्रत्यक्ष समाधान प्रस्तुत करता है। 
    • कृत्रिम कीटनाशकों के उन्मूलन से खाद्य शृंखला तथा जल स्रोतों में विषाक्त अवशेषों के जैव-संचय को रोका जा सकता है। 
    • इसके अतिरिक्त, जैविक रूप से सक्रिय एवं पोषक तत्त्वों से समृद्ध मृदा में उत्पादित फसलें बेहतर फाइटोकेमिकल प्रोफाइल प्रदर्शित करती हैं, जिससे पोषण सुरक्षा सुदृढ़ होती है।
    • उदाहरण के लिये, पंजाब का कीटनाशक-प्रधान मालवा क्षेत्र रासायनिक जैव संचय के जोखिमों को उजागर करता है, जबकि आंध्र प्रदेश की सामुदायिक-प्रबंधित प्राकृतिक कृषि जैसी पहलें दर्शाती है कि प्राकृतिक पद्धतियाँ मृदा स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित कर सुरक्षित एवं पोषक तत्त्वों से भरपूर फसलें पैदा कर सकती हैं।
  • परिपत्र अर्थव्यवस्था और अपशिष्ट का मूल्यवर्द्धन: प्राकृतिक कृषि, कृषि एवं पशुधन अपशिष्ट को उच्च मूल्य वाले जैविक आगत में परिवर्तित कर परिपत्र अर्थव्यवस्था का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती है। 
    • इस मॉडल में पशुधन के एकीकरण को अनिवार्य बनाया गया है, जिससे गोबर एवं मूत्र जैसे उप-उत्पादों का पूर्ण पुनर्चक्रण कर उन्हें प्रभावी जैव-आगतों के रूप में उपयोग किया जा सके।
    • गोबर धन योजना के माध्यम से ऐसे जैव-कृषि संसाधनों को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही 10,000 बायो-आगत रिसॉर्स सेंटरों की स्थापना इस चक्रीय मॉडल को सुदृढ़ करते हुए ग्रामीण रोज़गार सृजन और बड़े पैमाने पर जैव-उर्वरक उत्पादन को प्रोत्साहित करती है, जिससे कृषि अधिक सतत और आत्मनिर्भर बनती है।

भारत में प्राकृतिक कृषि के प्रसार में कौन-कौन-सी चुनौतियाँ हैं? 

  • कृषि संबंधी जोखिम – ‘संक्रमणकालीन जुर्माना’: प्राकृतिक कृषि की ओर परिवर्तन की प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती प्रारंभिक चरण में उत्पन्न होने वाला ‘संक्रमणकालीन जुर्माना’ है, जिसके अंतर्गत किसानों को रासायनिक उर्वरकों के परित्याग के तुरंत बाद उपज में उल्लेखनीय गिरावट का सामना करना पड़ता है। 
    • प्राकृतिक कृषि की ओर संक्रमण से उपज में अल्पकालिक गिरावट आती है। वर्ष 2022 के एक अध्ययन में पाया गया कि पारंपरिक जुताई पद्धतियों की तुलना में प्राकृतिक कृषि के कारण चावल की उत्पादकता में 59.5% और गेहूँ की उत्पादकता में 34% की कमी आई।
    • इसके अतिरिक्त, पोषक तत्त्वों से ग्रस्त मृदा में सूक्ष्मजीव तंत्र के पुनर्निर्माण और पोषक चक्र की बहाली में कई वर्ष लग जाते हैं, जिससे अल्पकालिक तीव्र वित्तीय संकट उत्पन्न होता है।
    • पर्याप्त आय-सुरक्षा उपायों और संक्रमणकालीन समर्थन के अभाव में लघु एवं सीमांत किसान इस अस्थायी झटके को सहन करने में असमर्थ रहते हैं।
  • आपूर्ति शृंखला - जैव द्रव्यमान की कमी: प्राकृतिक कृषि के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु स्थानीय स्तर पर जैविक आगतों की पर्याप्त उपलब्धता आवश्यक होती है, किंतु देश में स्वदेशी पशुधन की घटती संख्या के कारण यह एक प्रमुख अवरोध बन गया है।
    •  ‘जीवामृत जैसे प्रमुख जैव-संक्रमणकारी पदार्थ, मुख्यतः देशी गायों के गोबर एवं मूत्र पर निर्भर करते हैं, जिनकी उपलब्धता कृषि मशीनीकरण के कारण घटती जा रही है।
    • साथ ही फसल अवशेषों का उपयोग चारे एवं औद्योगिक ईंधन के रूप में होने से मल्चिंग एवं कंपोस्टिंग हेतु आवश्यक बायोमास सीमित हो जाता है।
    • 20वीं पशुधन जनगणना (2019) के अनुसार, पिछली जनगणना की तुलना में कुल स्वदेशी (वर्णित और गैर-वर्णित दोनों) मवेशियों की संख्या में 6% की गिरावट दर्ज की गई, जिससे विशेषकर सीमांत किसानों के लिये स्थानीय जैव-आगतों की उपलब्धता एक गंभीर चुनौती बन गई है।
  • प्राकृतिक कृषि में कमज़ोर मूल्य प्राप्ति: प्राकृतिक कृषि उत्पादों के लिये समर्पित एवं पारदर्शी आपूर्ति शृंखलाओं के अभाव के कारण किसान प्रायः अपनी रसायन-मुक्त उपज को पारंपरिक बाज़ार दरों पर बेचने के लिये विवश होते हैं। 
    • प्राकृतिक एवं रासायनिक उत्पादों के बीच स्पष्ट अंतर की अनुपस्थिति के चलते बिचौलिये अक्सर दोनों को मिला देते हैं, जिससे किसानों को मिलने वाला प्रीमियम मूल्य समाप्त हो जाता है।
    • उदाहरणस्वरूप, FMCG क्षेत्र में कुल बिक्री का मात्र 15% ही प्रीमियम सेगमेंट में आता है, जो उत्पादन एवं वास्तविक मूल्य प्राप्ति के बीच विद्यमान अंतर को रेखांकित करता है।
    • यद्यपि खुदरा आँकड़ों से पता चलता है कि शहरी क्षेत्रों में जैविक उत्पादों की मांग निरंतर बढ़ रही है, किंतु ग्रामीण आपूर्ति शृंखलाओं की खंडित संरचना इस अवसर का समुचित लाभ उठाने में बाधक बनी हुई है।
  • संरचनात्मक नीतिगत मुद्दा – सब्सिडी असंतुलन: भारत की उर्वरक सब्सिडी प्रणाली संरचनात्मक रूप से रासायनिक कृषि को बढ़ावा देती है, जिससे प्राकृतिक कृषि की ओर संक्रमण हतोत्साहित होता है।
    • यूरिया एवं DAP जैसे उर्वरकों पर अत्यधिक सब्सिडी उन्हें कृत्रिम रूप से सस्ता एवं सुलभ बनाए रखती है, जबकि कृषि पारिस्थितिकी को बढ़ावा देने के प्रयास अपेक्षाकृत सीमित रहते हैं।
    • वित्त वर्ष 2026 के लिये उर्वरक सब्सिडी लगभग 1.86 लाख करोड़ रुपये आँकी गई है, जो बजट अनुमान से 11%अधिक है तथा प्राकृतिक कृषि हेतु राष्ट्रीय मिशन के लिये आवंटित संसाधनों की तुलना में कहीं अधिक है।
    • यह नीतिगत असंतुलन पारंपरिक, रासायनिक-प्रधान कृषि को किसानों के लिये एक आर्थिक रूप से सुरक्षित विकल्प बनाए रखता है, जिससे प्राकृतिक कृषि के विस्तार में बाधा उत्पन्न होती है।
  • सामाजिक गतिशीलता – उच्च श्रम-प्रधानता: प्राकृतिक कृषि एक ज्ञान-आधारित तथा श्रम-प्रधान प्रणाली है, जो वर्तमान ग्रामीण परिदृश्य में बढ़ते श्रम प्रवास की प्रवृत्ति के साथ असंगति उत्पन्न करती है। 
    • जैव-आगतों की नियमित तैयारी, बहु-फसली प्रबंधन तथा खरपतवार नियंत्रण जैसे कार्यों के लिये निरंतर और अधिक श्रमबल की आवश्यकता होती है।
    • फरवरी 2026 में पंजाब में किये गए एक अध्ययन के अनुसार, 36% किसानों ने श्रम-प्रधानता को रासायनिक-मुक्त कृषि अपनाने में प्रमुख बाधा बताया। 
    • विशेष रूप से ‘जीवामृत’ जैसे जैव-संक्रमणकारी पदार्थों की तैयारी एवं बहु-फसली प्रणाली का संचालन, पारंपरिक कृषि की तुलना में अधिक मैन्युअल प्रयास की मांग करता है।
  • संस्थागत बाधाएँ: प्राकृतिक कृषि के प्रमाणीकरण तंत्र की जटिलता छोटे किसानों के लिये एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती बनी हुई है। 
    • सहभागी गारंटी प्रणाली (PGS), यद्यपि किसान-हितैषी मॉडल के रूप में विकसित की गई है, फिर भी यह प्रशासनिक विलंब, क्रियान्वयन संबंधी शिथिलता तथा उपभोक्ता विश्वास की कमी से प्रभावित है।
    • इसके अतिरिक्त, PGS-इंडिया के अंतर्गत बारहमासी फसलों के लिये आवश्यक 36 माह की रूपांतरण अवधि किसानों के लिये एक गंभीर संक्रमणकालीन बाधा उत्पन्न करती है।
  • खंडित भूमि जोत: भारत में अत्यधिक भूमि विखंडन प्राकृतिक कृषि के लिये पारिस्थितिकी शुद्धता बनाए रखना कठिन बनाता है। 
    • वर्तमान कृषि जनगणना के अनुसार, 86% से अधिक किसान 2 हेक्टेयर से कम भूमि पर कृषि करते हैं, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर पारिस्थितिकीय अलगाव सांख्यिकीय रूप से लगभग असंभव हो जाता है।
    • इस स्थानिक असुरक्षा के कारण किसानों को महॅंगे बफर क्षेत्र विकसित करने पड़ते हैं, जिससे उनकी उपयोगी कृषि भूमि और उत्पादकता दोनों प्रभावित होती है। 
    • साथ ही मानसूनी प्रवाह के कारण समीपवर्ती रासायनिक कृषि क्षेत्रों से बहकर आने वाला पानी प्राकृतिक खेतों को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि भारी बारिश के बाद भूजल में नाइट्रेट का रिसाव और जलक्षेत्रों में कीटनाशकों की गतिशीलता बढ़ जाती है। 
  • विस्तार सेवाओं की कमी – सूचना विषमता: प्राकृतिक कृषि के सफल क्रियान्वयन हेतु क्षेत्र-विशिष्ट एवं वैज्ञानिक मार्गदर्शन आवश्यक है, किंतु वर्तमान में ऐसी विस्तार सेवाओं की गंभीर कमी विद्यमान है। 
    • यह प्रणाली मृदा के सूक्ष्मजीवों तथा कीट-भक्षक संबंधों की गहन समझ की अपेक्षा करती है, जिसे पारंपरिक कृषि विस्तार तंत्र पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं करा पाता।
    • विशेष रूप से कृषि विज्ञान केंद्र के अधिकांश वैज्ञानिक अभी भी हरित क्रांति आधारित पद्धतियों में प्रशिक्षित हैं, जिससे प्राकृतिक कृषि के लिये विशेषज्ञ प्रशिक्षकों की कमी बनी हुई है। 
      • परिणामस्वरूप, प्राकृतिक कृषि हेतु राष्ट्रीय मिशन के लक्ष्यों की प्राप्ति में यह एक महत्त्वपूर्ण बाधा के रूप में उभरती है।

भारत अपनी कृषि प्रणाली में प्राकृतिक कृषि को प्रभावी रूप से मुख्यधारा में कैसे शामिल कर सकता है?

  • विकेंद्रीकृत जैव-आगत सूक्ष्म उद्यम: जैव-मास की कमी की चुनौती से निपटने हेतु नीति को ग्राम-स्तरीय, विकेंद्रीकृत जैव-आगत संसाधन केंद्रों के विकास को प्रोत्साहित करना चाहिये, जिनका संचालन विशेष रूप से महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा किया जाए। 
    • इससे वनस्पति अर्क एवं सूक्ष्मजीवनाशकों का स्थानीय स्तर पर सतत उत्पादन सुनिश्चित होगा तथा सीमांत किसानों के लिये आपूर्ति शृंखला संबंधी बाधाएँ दूर होंगी।
    • जैव-आगत उत्पादन को औपचारिक ग्रामीण सूक्ष्म उद्यम के रूप में विकसित कर राज्य न केवल आवश्यक संसाधनों की सुलभ एवं किफायती उपलब्धता सुनिश्चित कर सकता है, बल्कि स्थानीय स्तर पर आर्थिक गुणक प्रभाव भी उत्पन्न कर सकता है, जिससे लंबी दूरी के परिवहन संबंधी अवरोध समाप्त होंगे।
  • पैरामीट्रिक ग्रीन क्रेडिट एवं बीमा ढाँचा: कृषि पारिस्थितिकी के कृषि संबंधी जोखिमों के लिये विशेष रूप से तैयार किये गए विशिष्ट ग्रीन क्रेडिट उपकरण और पैरामीट्रिक बीमा प्रदान करने के लिये वित्तीय संरचना को मौलिक रूप से पुनर्गठित किया जाना चाहिये।
    • पारंपरिक उपज-आधारित बीमा के स्थान पर मौसम-सूचकांकित एवं पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित बीमा विकसित किया जाना चाहिये, जो मृदा पुनर्स्थापन के प्रारंभिक वर्षों में किसानों को सुरक्षा प्रदान करे।
    • इसके साथ ही, बैंकों द्वारा रसायन-मुक्त कृषि अपनाने वाले किसानों को रियायती ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध कराना आवश्यक है, जिससे उपज में संभावित उतार-चढ़ाव के आर्थिक प्रभावों को न्यूनतम किया जा सके।
  • ग्रामीण रोज़गार ढाँचों के साथ एकीकरण: कृषि पारिस्थितिकी को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिये प्राकृतिक कृषि उद्देश्यों का व्यापक ग्रामीण रोज़गार गारंटी ढाँचों के साथ रणनीतिक समन्वय आवश्यक है ताकि श्रम की तीव्र मांग को सुचारू रूप से पूरा किया जा सके। 
    • जैविक मृदा प्रबंधन, बहु-स्तरीय रोपण एवं मल्चिंग जैसी गतिविधियों को औपचारिक रूप से मुआवज़ा प्राप्त सार्वजनिक कार्यों के रूप में  वर्गीकृत करके, राज्य कार्यात्मक रूप से संक्रमण लागतों को वहन करता है।
      • यह समन्वित दृष्टिकोण पारिस्थितिकी बहाली को एक अनियंत्रित निजी परिचालन व्यय के बजाय  निरंतर वित्तपोषित ग्रामीण आजीविका संपत्ति में सक्रिय रूप से परिवर्तित करता है।
  • समर्पित संस्थागत क्रय गलियारे: राज्य को प्राकृतिक कृषि उत्पादों के लिये अलग एवं समर्पित आपूर्ति शृंखला गलियारों की स्थापना करते हुए सार्वजनिक खरीद में प्राथमिक कोटा सुनिश्चित करना चाहिये। 
    • इन रसायन-मुक्त उत्पादों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली तथा स्कूली पोषण कार्यक्रमों से जोड़ने पर किसानों को गारंटीकृत बाज़ार एवं उचित मूल्य प्राप्त होगा।
      • यह व्यवस्था संक्रमणकालीन किसानों के लिये आय सुरक्षा सुनिश्चित करती है तथा रासायनिक कृषि से प्राकृतिक कृषि की ओर संक्रमण को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाती है।
  • उत्पादक समूहों के माध्यम से भू-दृश्य स्तर पर संतृप्ति: रासायनिक बहाव से उत्पन्न क्रॉस-संदूषण के जोखिम को कम करने हेतु संक्रमण रणनीतियों को व्यक्तिगत खेत-आधारित दृष्टिकोण से हटाकर भू-दृश्य स्तर (landscape-level) के समग्र मॉडल की ओर स्थानांतरित करना आवश्यक है।
    • इसके लिये किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के माध्यम से आस-पास के क्षेत्रों में सामूहिक रूपांतरण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, जिससे सुदृढ़ पारिस्थितिक बफर ज़ोन विकसित हो सकें और मृदा बायोम की अखंडता संरक्षित रह सके।
      • यह समुदाय-आधारित संस्थागत मॉडल न केवल व्यक्तिगत किसानों की सीमा-सुरक्षा लागत को कम करता है, बल्कि समग्र प्रणाली में पारिस्थितिकी समन्वय  एवं उत्पादन अनुकूलन को भी अधिकतम करता है।
  • एआई-आधारित कृषि पारिस्थितिकी विस्तार मंच: प्राकृतिक कृषि के प्रसार हेतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता समर्थित, अति-स्थानीय डिजिटल विस्तार प्लेटफॉर्मों की स्थापना अनिवार्य है, जो पारंपरिक कृषि प्रणालियों में विद्यमान सूचना विषमता को प्रभावी रूप से समाप्त कर सकें।
    • स्थानीय मृदा सूक्ष्मजीवों एवं सूक्ष्म-जलवायु पैटर्न के विश्लेषण के आधार पर ये डिजिटल उपकरण किसानों को वनस्पति कीट प्रबंधन के लिये वास्तविक समय में पूर्वानुमानित सलाह उपलब्ध कराते हैं।
    • इस प्रकार ये तकनीकी नवाचार पारंपरिक, संसाधन-सीमित विस्तार तंत्र की कमियों को दूर करते हुए तत्काल, स्थल-विशिष्ट जैविक समाधान एवं स्वचालित समस्या-निवारण सुनिश्चित करते हैं।
  • डिजिटल घर्षणरहित सहभागी प्रमाणन: विकेंद्रीकृत डिजिटल बहीखातों को स्थानीय सहभागी गारंटी प्रणालियों (PGS) के साथ एकीकृत कर जैविक अनुपालन से जुड़े जटिल नौकरशाही को समाप्त किया जा सकता है।
    • यह प्रौद्योगिकी-आधारित दृष्टिकोण रसायन-मुक्त प्रथाओं के सहकर्मी-से-सहकर्मी सत्यापन को त्वरित रूप से डिजिटाइज़ करता है, जिससे बाज़ार विश्वास की एक पारदर्शी, अपरिवर्तनीय और सार्वभौमिक रूप से सत्यापन योग्य शृंखला विकसित होती है।
    • महॅंगे तृतीय-पक्ष कॉर्पोरेट ऑडिट पर निर्भरता को समाप्त करते हुए, यह डिजिटल तंत्र छोटे किसान समूहों को अपनी पारिस्थितिकीय साख को प्रीमियम संस्थागत खरीदारों के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रमाणित करने में सक्षम बनाता है।
  • कृषि संस्थानों के पाठ्यक्रम में सुधार: एक व्यवस्थित, दीर्घकालिक विस्तार के लिये राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थानों के भीतर पाठ्यक्रम के पूर्ण वैचारिक और व्यावहारिक सुधार की आवश्यकता है। 
    • पेट्रोकेमिकल-प्रधान कृषि विज्ञान से हटकर मृदा सूक्ष्मजीव विज्ञान, समग्र पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं और पुनर्योजी बहुकृषि की ओर शैक्षणिक केंद्र को स्थानांतरित करने से आवश्यक बौद्धिक क्षमता का निर्माण होता है। 
      • इस शैक्षिक पुनर्गठन से कृषि विज्ञानियों का एक विशाल, विशिष्ट समूह तैयार होता है, जिन्हें प्राकृतिक कृषि पद्धतियों के भीतर समर्थन, निगरानी और नवाचार करने के लिये संरचनात्मक रूप से प्रशिक्षित किया जाता है। 

निष्कर्ष:

भारत में प्राकृतिक कृषि को प्रोत्साहित करने के लिये आवश्यक है कि वित्तीय प्रोत्साहनों को जैविक वास्तविकताओं के अनुरूप पुनर्संरचित किया जाए, ताकि रासायनिक निर्भरता से हटकर पारिस्थितिकी अनुकूलन की ओर एक व्यवस्थित संक्रमण सुनिश्चित हो सके। संस्थागत खरीद तथा श्रम-एकीकृत सब्सिडी के माध्यम से ‘संक्रमण संबंधी बाधाओं’ का प्रभावी निराकरण कर राज्य एक अनुकूलित, किसान-केंद्रित खाद्य प्रणाली का निर्माण सुनिश्चित कर सकता है। यह प्रतिमान परिवर्तन न केवल मृदा उर्वरता के पुनर्स्थापन में सहायक है, बल्कि अस्थिर वैश्विक पेट्रोकेमिकल आघातों के विरुद्ध राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को भी सुदृढ़ करता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

‘प्राकृतिक कृषि की ओर संक्रमण केवल एक कृषि-तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिये एक रणनीतिक आवश्यकता है।’ वैश्विक भू-राजनीतिक एवं ऊर्जा बाज़ार की अस्थिरता के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. 'संक्रमण जुर्माना' क्या है?
यह प्रारंभिक 2–3 वर्षों में होने वाली फसल उत्पादकता की अस्थायी गिरावट (लगभग 15–30%) को संदर्भित करता है, जब मृदा अपने प्राकृतिक सूक्ष्मजीव संतुलन को पुनर्स्थापित कर रही होती है।

प्रश्न 2. प्राकृतिक कृषि से जल की बचत कैसे होती है?
कार्बनिक पदार्थों की वृद्धि तथा मल्चिंग के माध्यम से मृदा की सरंध्रता और नमी धारण क्षमता में सुधार होता है, जिससे जल की आवश्यकता लगभग 50–60% तक घट जाती है।

प्रश्न 3. NMNF क्या है?
राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन (NMNF) केंद्र सरकार की एक पहल है, जिसका उद्देश्य रसायन-मुक्त, कम लागत वाली तथा जलवायु-अनुकूल कृषि प्रणालियों को प्रोत्साहित करना है।

प्रश्न 4. इस मॉडल में पशुधन की भूमिका क्यों महत्त्वपूर्ण है?
स्वदेशी मवेशी द्वारा प्रदत्त गोबर एवं मूत्र के माध्यम से जीवामृत जैसे जैव-संक्रमणकारी तत्त्वों का निर्माण होता है, जो मृदा में सूक्ष्मजीव गतिविधि को सक्रिय कर उसकी उर्वरता एवं पारिस्थितिक संतुलन को सुदृढ़ करते हैं।

प्रश्न 5. यह राष्ट्रीय सुरक्षा को कैसे सुदृढ़ करता है?
यह उर्वरक सब्सिडी के राजकोषीय बोझ (लगभग ₹1.64 लाख करोड़ रुपये) को कम करता है तथा वैश्विक तेल एवं गैस कीमतों में उतार-चढ़ाव से खाद्य मूल्यों की स्थिरता सुनिश्चित करता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न 1. स्थायी कृषि (पर्माकल्चर), पारंपरिक रासायनिक कृषि से किस प्रकार भिन्न है? (2021) 

  1. स्थायी कृषि एकधान्य कृषि पद्धति को हतोत्साहित करती है, किंतु पारंपरिक रासायनिक कृषि में एकधान्य कृषि पद्धति की प्रधानता है।  
  2.  पारंपरिक रासायनिक कृषि के कारण मृदा की लवणता में वृद्धि हो सकती है किंतु इस तरह की परिघटना स्थायी कृषि में नहीं देखी जाती है। 
  3.  पारंपरिक रासायनिक कृषि अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में आसानी से संभव है किंतु ऐसे क्षेत्रों में स्थायी कृषि इतनी आसानी से संभव नहीं है।  
  4.  मल्च बनाने की प्रथा (मल्चिंग) स्थायी कृषि में काफी महत्त्वपूर्ण है किंतु पारंपरिक रासायनिक कृषि में ऐसी प्रथा आवश्यक नहीं है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये: 

(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 1, 2 और 4
(c) केवल 4 
(d) केवल 2 और 3 

उत्तर: (b) 


प्रश्न 2. निम्नलिखित कृषि पद्धतियों पर विचार कीजिये: (2012)

  1. समोच्च बाँध
  2.  अनुपद सस्यन
  3.  शून्य जुताई

वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में, उपर्युक्त में से कौन-सा/से मृदा में कार्बन प्रच्छादन/संग्रहण में सहायक है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 3

(c) 1, 2 और 3

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर: (b)