आत्मनिर्भरता और सामरिक सामंजस्य — भारत की संतुलित रणनीति | 13 Feb 2026

यह एडिटोरियल 08/02/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित “Balancing strategic alignment with economic nationalism” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। एडिटोरियल में इस बात का विश्लेषण किया गया है कि भारत बढ़ते भू-राजनीतिक मतभेद और व्यापारिक रणनीतिकरण के बीच आर्थिक राष्ट्रवाद की रक्षा करते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ रणनीतिक संरेखण को किस प्रकार संतुलित कर रहा है।

प्रिलिम्स के लिये: फ्रेंड-शोरिंग, रिवर्स ड्यूटी स्ट्रक्चर, पारस्परिक शुल्क, उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन योजना

मेन्स के लिये: आर्थिक राष्ट्रवाद के साथ रणनीतिक संरेखण को संतुलित करना, प्रमुख मुद्दे और उपाय।

भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा के बढ़ते दौर में व्यापार मात्र आर्थिक लेन-देन के बजाय रणनीतिक प्रभाव का एक शक्तिशाली साधन बनकर उभरा है। भारत-अमेरिका का अंतरिम व्यापार समझौता नई दिल्ली के व्यावहारिक पुनर्विचार को दर्शाता है, क्योंकि रणनीतिक स्वायत्तता ऊर्जा सुरक्षा और बाज़ार अभिगम्यता के साथ लगातार अंतर्विरोध का सामना कर रही है। टैरिफ में छूट और सुनियोजित रणनीतिक तालमेल के बीच संतुलन बनाकर, भारत ने महत्त्वपूर्ण साझेदारियों को नुकसान पहुँचाए बिना घरेलू आर्थिक हितों की रक्षा करने का प्रयास किया है। यह घटनाक्रम इस बात को रेखांकित करता है कि आज आर्थिक राष्ट्रवाद को तेज़ी से लेन-देन आधारित वैश्विक व्यवस्था की सीमाओं के भीतर ही काम करना होगा।

आर्थिक राष्ट्रवाद क्या है? 

  • परिचय: आर्थिक राष्ट्रवाद उन नीतियों के लिये एक व्यापक शब्द है, जो अर्थव्यवस्था पर घरेलू नियंत्रण को प्राथमिकता देती हैं, भले ही इसके लिये राज्य का हस्तक्षेप करना पड़े या वैश्विक व्यापार को सीमित करना पड़े।
    • मूल रूप से, यह वैश्विक मुक्त बाज़ार की 'दक्षता' से ऊपर राष्ट्र के हितों को प्राथमिकता देता है।
    • जहाँ वैश्विकतावादी यह तर्क देते हैं कि प्रत्येक देश को वह करना चाहिये जिसमें वह सबसे अच्छा है (तुलनात्मक लाभ), वहीं आर्थिक राष्ट्रवादी यह तर्क देते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये एक देश को आत्मनिर्भर होना चाहिये।
  • मुख्य नीति तंत्र
    • राज्य हस्तक्षेपवाद: राष्ट्रीय संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिये सरकार रणनीतिक क्षेत्रों (जैसे: सेमीकंडक्टर, रक्षा या हरित ऊर्जा) की ओर निवेश निर्देशित करने में निर्णायक भूमिका निभाती है।
    • व्यापार अवरोध: विदेशी संस्थाओं की तुलना में घरेलू उत्पादकों को प्राथमिकता देने के लिये शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं (जैसे कि कठोर लाइसेंसिंग या तकनीकी मानक) दोनों का उपयोग।
    • मौद्रिक संप्रभुता: अंतर्राष्ट्रीय निर्यात में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ बनाये रखने के लिये कभी-कभी पूँजी नियंत्रण या मुद्रा के प्रबंधन जैसे उपाय भी अपनाये जाते हैं।
  • भारत में आर्थिक राष्ट्रवाद का विकास
    • औपनिवेशिक काल: प्रतिरोध की नींव
      • भारत में आर्थिक राष्ट्रवाद का उद्भव 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ब्रिटिश शोषण की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। यह राजनीतिक आंदोलन बनने से पहले एक बौद्धिक आंदोलन था।
      • ड्रेन थ्योरी: दादाभाई नौरोजी द्वारा प्रस्तावित इस सिद्धांत में तर्क दिया गया था कि ब्रिटेन बिना किसी प्रतिफल के भारत से व्यवस्थित रूप से धन की निकासी कर रहा था।
      • स्वदेशी आंदोलन (1905): यह आर्थिक राष्ट्रवाद का एक व्यावहारिक अनुप्रयोग था। 
        • विदेशी (ब्रिटिश) कपड़ों का बहिष्कार करके और स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देकर, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं का उद्देश्य ‘आत्मनिर्भरता’ प्राप्त करना था।
  • स्वतंत्रता-उपरांत चरण (1947-1991): राज्य के नेतृत्व में आत्मनिर्भरता
    • वर्ष 1947 के बाद औपनिवेशिक शोषण के अनुभव के कारण भारत ने आर्थिक राष्ट्रवाद के ‘समाजवाद-उन्मुख’ मॉडल को अपनाया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि भविष्य में कोई भी विदेशी शक्ति भारतीय अर्थव्यवस्था को नियंत्रित न कर सके।
      • आयात प्रतिस्थापन: नवोदित उद्योगों की रक्षा के लिये आयात पर उच्च शुल्क लगाए गए थे।
      • लाइसेंस राज: एक जटिल नियामक प्रणाली जहाँ राज्य यह तय करता था कि क्या उत्पादित किया जाएगा, किसके द्वारा और कितनी मात्रा में।
      • सार्वजनिक क्षेत्र का प्रभुत्व: निजी या विदेशी एकाधिकार को रोकने के लिये महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों (इस्पात, बिजली, बैंकिंग) को राज्य के लिये आरक्षित रखा गया था।
      • आलोचना: यद्यपि इससे एक मज़बूत औद्योगिक आधार का निर्माण हुआ, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा और नवोन्मेष की कमी के कारण अंततः इससे धीमी विकास दर हुई।
  • आधुनिक चरण (2014-वर्तमान): आत्मनिर्भर भारत
    • वर्ष 2014 के बाद भारत ‘आर्थिक राष्ट्रवाद 2.0’ की ओर अग्रसर हुआ है। यह पूर्व-1991 काल की भाँति विश्व से दूरी बनाने का प्रयास नहीं है, बल्कि सशक्त स्थिति से विश्व के साथ जुड़ने की रणनीति है।
      • उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI): आयात पर प्रतिबंध लगाने के बजाय, सरकार आत्मनिर्भर भारत के तहत भारत के भीतर उत्पादन करने के लिये कंपनियों (भारतीय और विदेशी दोनों) को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है।
      • वोकल फॉर लोकल: घरेलू ब्रांडों को बढ़ावा देने और स्थानीय आपूर्ति शृंखलाओं को वैश्विक बाज़ार में एकीकृत करने का एक अभियान।
      • तकनीकी-राष्ट्रवाद: भारत अपने डिजिटल संसाधनों पर संप्रभुता का दावा तेज़ी से कर रहा है।
        • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (2023) और घरेलू सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को बढ़ावा देना, डिजिटल युग में राष्ट्रीय हितों की रक्षा के प्रमुख उदाहरण हैं।
      • रणनीतिक व्यापार नीति: भारत द्वारा RCEP (क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी) से बाहर निकलने का निर्णय घरेलू डेयरी और MSME क्षेत्रों को सस्ते चीनी आयात की बाढ़ से बचाने के लिये उठाया गया एक विशिष्ट राष्ट्रवादी कदम था।

भारत आर्थिक राष्ट्रवाद और रणनीतिक संरेखण के बीच संतुलन किस प्रकार बना रहा है?

  • आत्मनिर्भर भारत - संकट प्रबंधन से लेकर रणनीतिक औद्योगिक नीति तक: वर्ष 2020 में शुरू किया गया आत्मनिर्भर भारत अभियान एक व्यापक 'भारत-प्रथम' औद्योगिक रणनीति में विकसित हो चुका है।
    • यह अलगाववादी कदम नहीं है, बल्कि 'लचीली अंतर-निर्भरता' की खोज है, जहाँ भारत निर्भरता की स्थिति के बजाय घरेलू ताकत की स्थिति से वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत होता है।
    • केंद्रीय बजट- 2026 में, सरकार ने MSMEs के लिये रिस्क कैपिटल का समर्थन करने हेतु आत्मनिर्भर भारत कोष में अतिरिक्त ₹2,000 करोड़ की राशि जोड़ी। इसके अलावा, सितंबर 2025 तक PLI योजना ने ₹2 लाख करोड़ से अधिक के निवेश को गति प्रदान की है।
  • व्यापार नीति - वैश्विक पारस्परिक निर्भरता से चयनात्मक एकीकरण तक: भारत ने घरेलू उद्योग को खतरे में डालने वाले विशाल बहुपक्षीय व्यापार गुटों से दूरी बना ली है और इसके बजाय 'विश्वसनीय' लोकतांत्रिक साझेदारों के साथ द्विपक्षीय समझौतों का विकल्प चुना है। 
    • यह रणनीति चीन जैसी गैर-बाज़ार अर्थव्यवस्थाओं के प्रति जोखिम को कम करती है, जबकि पश्चिम में उच्च मूल्य वाले बाज़ारों तक पहुँच सुनिश्चित करती है।
    • उदाहरण के लिये, भारत वर्ष 2019 में 15 सदस्यीय RCEP से बाहर रहा, लेकिन फरवरी 2026 में यूरोपीय संघ के साथ एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) पर हस्ताक्षर किये।
    • इसके अलावा, भारत ने अंतरिम ढाँचे के तहत चुनिंदा अमेरिकी औद्योगिक और कृषि वस्तुओं पर टैरिफ कम कर दिये हैं या समाप्त कर दिये हैं, फिर भी इसने एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते से परहेज किया है जो राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को जोखिम में डाल सकता है। 
      • अमेरिका द्वारा लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ (पारस्परिक शुल्क) को प्रभावी 50% (जिसमें रूस से संबंधित 25% जुर्माना शामिल था) से घटाकर 18% कर दिया गया, जिससे वस्त्र एवं रसायन जैसे भारतीय क्षेत्रों की प्रतिस्पर्द्धात्मकता स्थापित हो गई।
  • रणनीतिक ऊर्जा विविधीकरण: ऊर्जा सुरक्षा भारत के आर्थिक राष्ट्रवाद का केंद्रीय आधार बनी हुई है। 
    • वर्ष 2025 में, रूस ने भारत के कच्चे तेल के आयात का 40% से अधिक हिस्से की आपूर्ति की, जिससे मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने तथा विकास को स्थिर करने में सहायता मिली। 
      • हालाँकि, रूस से तेल आयात पर अमेरिका द्वारा लगाए गए दंडात्मक शुल्कों ने आर्थिक दबाव उत्पन्न किया। 
    • भारत ने अमेरिकी ऊर्जा आपूर्ति की ओर आकस्मिक संक्रमण के बजाय धीरे-धीरे विविधता लाने का संकेत दिया, जिससे भू-राजनीतिक संरेखण और आर्थिक विवेक के बीच संतुलन बना रहा।
      • उदाहरणस्वरूप, भारत ने पाँच वर्षों में प्रस्तावित 500 अरब डॉलर की आयात योजना के अंतर्गत संयुक्त राज्य अमेरिका से पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा आयात करने का संकेत दिया।  
  • डिजिटल और तकनीकी राष्ट्रवाद: भारत अपनी आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़– डेटा को विदेशी बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों या शत्रुतापूर्ण राज्यों द्वारा नियंत्रित होने से बचाने के लिये 'डिजिटल सॉवरेनिटी' का दावा कर रहा है। 
    • इसमें विदेशी डेटा फ्लो को विनियमित करते हुए स्वदेशी 'डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना' (DPI) का निर्माण करना शामिल है।
    • उदाहरण के लिये, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (2023) ने डेटा सिक्योरिटी को मज़बूत किया है तथा इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के शुभारंभ ने स्थानीय चिप उत्पादन को गति प्रदान की है। वर्ष 2025 में, भारत ने अपने पहले स्वदेशी रूप से उत्पादित चिप्स की घोषणा की।
  • रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण - 'मेक इन इंडिया' और वैश्विक सह-उत्पादन के बीच संतुलन: भारत विश्व के सबसे बड़े रक्षा उपकरण आयातक से निर्माता बनने की ओर अग्रसर है, जिसके लिये वह उच्च स्वदेशी सामग्री को अनिवार्य बना रहा है और साथ ही विदेशी ओईएम को स्थानीय स्तर पर कारखाने स्थापित करने के लिये आमंत्रित कर रहा है। 
    • इससे एक 'दोहरे उपयोग' वाली अर्थव्यवस्था का निर्माण होता है जहाँ रक्षा निर्यात से घरेलू अनुसंधान एवं विकास को वित्त पोषित किया जाता है, जिससे आयात पर होने वाला वित्तीय बोझ कम हो जाता है।
    • ‘सुधार वर्ष 2025’ के अंतर्गत साधारण संयोजन से आगे बढ़कर जेट इंजन तथा पनडुब्बी प्रौद्योगिकियों के सह-विकास पर बल दिया गया है, जिससे संघर्ष की स्थिति में आपूर्ति अवरोध से बचा जा सके।
    • उदाहरण के लिये, वित्त वर्ष 2025 में स्वदेशी रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड ₹1.54 लाख करोड़ तक पहुँच गया। सह-विकास के संदर्भ में भी, ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस द्वारा संयुक्त रूप से विकसित एक प्रमुख, उच्च गति वाली, दो-चरण वाली सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल है।
  • महत्त्वपूर्ण खनिज सुरक्षा - हरित संक्रमण आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित करना: यह मानते हुए कि 'हरित क्रांति' कुछ देशों द्वारा नियंत्रित खनिजों पर निर्भर करती है, भारत अपने ऊर्जा भविष्य को सुरक्षित करने के लिये सक्रिय रूप से 'खनिज कूटनीति' का अनुसरण कर रहा है।
    • इसमें पारंपरिक बाधाओं को दूर करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों के साथ-साथ घरेलू खनन सुधार शामिल हैं।
    • उदाहरण के लिये, भारत लिथियम और कोबाल्ट तक दीर्घकालिक अभिगम्यता सुनिश्चित करने के लिये खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP) में अपनी सदस्यता का लाभ उठा रहा है, साथ ही साथ इन खनिजों को संसाधित करने के लिये घरेलू स्तर पर 'रेयर अर्थ कॉरिडोर' शुरू कर रहा है।
    • इसके अलावा, केंद्रीय बजट- 2026 में ₹7,280 करोड़ की रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) विनिर्माण योजना द्वारा समर्थित समर्पित रेयर अर्थ कॉरिडोर की घोषणा की गई।
  • वित्तीय संप्रभुता - वैश्विक व्यापार का 'रुपये का रूपांतरण': भारत अपनी अर्थव्यवस्था को 'डॉलर-आघात' और पश्चिमी प्रतिबंधों से बचाने के लिये रुपये (INR) के अंतर्राष्ट्रीयकरण को बढ़ावा दे रहा है।
    • यह 'डॉलर-विरोधी' अभियान नहीं है, बल्कि रूस और UAE जैसे विविध साझेदारों के साथ व्यापार की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिये 'जोखिम-मुक्त' रणनीति है।
    • वर्ष 2025 तक, लगभग 22 देशों ने प्रत्यक्ष व्यापार निपटान के लिये विशेष रुपी वोस्त्रो खाते (SRVAs) को परिचालन में ला दिया है। 
      • इसके अलावा, BRICS न्यू डेवलपमेंट बैंक मार्च 2026 तक अपना पहला रुपये-मूल्यवर्गित बॉण्ड जारी करने के लिये तैयार है, जो मुद्रा में वैश्विक संस्थागत विश्वास का संकेत देता है।
  • सैद्धांतिक सामरिक स्वायत्तता से लेन-देन संबंधी स्वायत्तता की ओर संक्रमण: भारत के पारंपरिक सामरिक स्वायत्तता सिद्धांत ने प्रमुख शक्तियों के बीच समान दूरी पर ज़ोर दिया। 
    • भारत ने 'रणनीतिक संकोच' के सिद्धांत को 'रणनीतिक व्यावहारिकता' से प्रतिस्थापित कर दिया है, जहाँ यह एक बहुध्रुवीय विश्व में एकल 'ध्रुव' के रूप में कार्य करता है, स्थायी गठबंधनों के बजाय क्षेत्रवार सामंजस्य के आधार पर भागीदारों का चयन करता है।
    • उदाहरण के लिये, QUAD जैसे विविध मंचों में भागीदारी के साथ-साथ BRICS में निरंतर जुड़ाव मुद्दों पर आधारित संरेखण को दर्शाता है।

भारत के आर्थिक राष्ट्रवाद की ओर अग्रसर होने से कौन-कौन से मुद्दे उत्पन्न हो रहे हैं? 

  • 'असेंबली-आधारित' व्यापार घाटा और घटक निर्भरता: उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) ने अंतिम संयोजन को भारत में स्थानांतरित करने में सफलता प्राप्त की है, परंतु इसके विपरीत मध्यवर्ती घटकों के लिये चीन पर आयात निर्भरता बढ़ गयी है।
    • इससे एक 'सतही आत्मनिर्भरता' का निर्माण होता है, जहाँ मूल्यवर्द्धन कम रहता है और आपूर्ति शृंखला की कमज़ोरियों को समाप्त करने के बजाय केवल उन्हें ऊपरी स्तर पर स्थानांतरित कर दिया जाता है। 
    • उदाहरण के लिये, भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स आयात प्रोफाइल में उच्च सघनता जोखिम परिलक्षित होता है; एकीकृत परिपथों का आयात वर्ष 2025 की पहली छमाही में 5.46 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जो वर्ष 2017 से वार्षिक 79% की दर से बढ़ रहा है, जिसमें से 88% चीन से प्राप्त किया गया है। 
  • नीतिगत अनिश्चितता से निवेश पर पड़ने वाला नकारात्मक प्रभाव: लैपटॉप और टैबलेट पर आकस्मिक लाइसेंस अनिवार्यता जैसे तदर्थ संरक्षणवादी उपाय ‘लाइसेंस राज’ की वापसी का संकेत देते हैं, जिससे नियामक स्थिरता को प्राथमिकता देने वाले दीर्घकालिक विदेशी निवेशक आशंकित होते हैं।
    • यह अस्थिरता वैश्विक पूँजी को ‘प्रतीक्षा और अवलोकन’ की नीति अपनाने के लिये बाध्य करती है, जिससे ‘चाइना प्लस वन’ के अंतर्गत भारत जिन लाभों को प्राप्त करना चाहता है वे मंद पड़ जाते हैं।  
    • उदाहरण के लिये, अगस्त 2025 में निवल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रवाह में 159% की गिरावट आई (साल-दर-साल) क्योंकि नये प्रवाह की तुलना में पूँजी का प्रत्यावर्तन अधिक रहा, जो उच्च सकल आँकड़ों के बावजूद निवेशकों की सतर्कता को दर्शाता है।
  • इनपुट टैरिफ से MSMEs को होने वाला मुद्रास्फीतिक आघात: इस्पात और ताँबा जैसे कच्चे माल पर उच्च सीमा शुल्क, जिनका उद्देश्य घरेलू प्राथमिक उत्पादकों का संरक्षण है, असमानुपातिक रूप से निम्न-स्तरीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों की लागत-प्रतिस्पर्धात्मकता को क्षीण कर देते हैं।
    • यह 'रिवर्स ड्यूटी स्ट्रक्चर' छोटे निर्यातकों को वैश्विक बाज़ारों से बाहर होने या बेहद कम मार्जिन पर काम करने के लिये विवश करती है, जिससे उस क्षेत्र का विकास अवरुद्ध होता है जो सर्वाधिक रोज़गार उपलब्ध कराता है।
    • उदाहरण के लिये, दिसंबर 2025 में, भारत ने सस्ते चीनी शिपमेंट पर अंकुश लगाने के लिये चुनिंदा स्टील आयात पर 11-12% का तीन वर्ष का टैरिफ लगाया। 
      • घरेलू उत्पादकों की रक्षा के उद्देश्य से बनाया गया यह विधेयक, इनपुट लागत बढ़ा सकता है, निर्यात प्रतिस्पर्द्धा को कमज़ोर कर सकता है, प्रतिशोधात्मक कदम आमंत्रित कर सकता है और WTO अनुपालन संबंधी चिंताओं को बढ़ा सकता है।
  • 'सब्सिडी भार' और राजकोषीय विचलन का जोखिम: 14 क्षेत्रों में PLI योजनाओं के लिये भारी राजकोषीय व्यय सार्वजनिक खजाने पर दीर्घकालिक देनदारी उत्पन्न करता है, साथ ही यह गारंटी भी नहीं देता कि सब्सिडी समाप्त होने के बाद कंपनियाँ वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बन जाएँगी। 
    • यह ‘विजेताओं का चयन’ रणनीति ऐसे ‘नवोदित उद्योगों’ को जन्म देने का जोखिम रखती है जो विकसित होने से इंकार कर देते हैं, जिससे महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य और शिक्षा अवसंरचना से धन का विचलन हो सकता है।
    • PLI के लिये 1.97 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसका अधिकांश उपयोग पूँजी-गहन क्षेत्रों द्वारा किया गया है, जिससे वर्ष 2025–26 के लिये वार्षिक बजट लक्ष्य के 54.5% के स्तर तक पहुँच चुके राजकोषीय घाटे में उल्लेखनीय योगदान हुआ है।
  • हरित संक्रमण और कार्बन संरक्षणवाद का अंतर्विरोध: भारत द्वारा घरेलू सौर मॉड्यूल विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिये लागू ALMM सूची ने सस्ते आयात को प्रभावी रूप से अवरुद्ध किया है, जिससे वर्ष 2030 के जलवायु लक्ष्यों की पूर्ति हेतु आवश्यक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता वृद्धि की गति मंद हुई है।
    • जलवायु संबंधी तात्कालिकता पर औद्योगिक नीति को प्राथमिकता देने से, घरेलू बिजली उत्पादकों के लिये हरित संक्रमण की लागत कृत्रिम रूप से बढ़ गई है।
    • उदाहरण के लिये, मूल सीमा शुल्क लागू होने के बाद भी भारतीय सौर सेल की कीमतें चीन के विकल्पों की तुलना में 1.5 से 2 गुना अधिक हैं।
  • खंडित वैश्विक व्यवस्था में प्रतिशोधात्मक संवेदनशीलता: जब भारत संरक्षणवादी उपायों (QCOs, आयात प्रतिबंध) का प्रयोग करता है, तब व्यापार भागीदारों द्वारा प्रतिकारी कदम उठाये जाने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे भारत के सेवा क्षेत्र के निर्यात (IT, व्यवसाय प्रक्रिया सेवाएँ) प्रतिशोध की चपेट में आ सकते हैं।
    • खंडित होती वैश्विक अर्थव्यवस्था में ‘संरक्षणवादी’ के रूप में देखे जाने से वह सॉफ्ट पावर क्षीण होती है जिसके आधार पर भारत स्वयं को ‘विश्वगुरु’ अथवा सेतु-निर्माता के रूप में स्थापित करना चाहता है।
    • भारत के डिजिटल हार्डवेयर प्रतिबंधों के प्रत्युत्तर में संयुक्त राज्य अमेरिका ने वर्ष 2025 में धारा 301 की समीक्षा प्रारंभ की, जिससे भारत के IT सेवा निर्यात पर शुल्क लगने का खतरा उत्पन्न हुआ।
  • अल्पाधिकारवादी बाज़ार संकेंद्रण: आलोचकों का तर्क है कि आर्थिक राष्ट्रवाद प्रायः बड़े घरेलू औद्योगिक समूहों (‘राष्ट्रीय चैंपियन’) का पक्ष लेने की प्रवृत्ति रखता है, जिनके पास जटिल अनुपालन का सामना करने और सब्सिडी प्राप्त करने की क्षमता होती है, जिससे लघु नवोन्मेषी उद्यम दबाव में आ जाते हैं।
    • इससे घरेलू प्रतिस्पर्द्धा कम हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय उपभोक्ताओं के लिये कीमतें बढ़ जाती हैं और कंपनियों को कुशलतापूर्वक नवोन्मेष करने के लिये कम प्रोत्साहन मिलता है। 
    • वर्ष 2024 में भारत के शीर्ष 20 औद्योगिक समूहों ने सूचीबद्ध कॉरपोरेट क्षेत्र के 70% लाभ पर अधिकार किया, जो तीव्र बाज़ार संकेंद्रण (मार्सेलस इन्वेस्टमेंट एनालिसिस- 2025) को दर्शाता है।

भारत आर्थिक राष्ट्रवाद और रणनीतिक संरेखण के बीच संतुलन बनाने के लिये कौन से उपाय अपना सकता है? 

  • 'फ्रेंड-शोरिंग' प्रोटोकॉल फ्रेमवर्क को संस्थागत रूप देना: भारत को औपचारिक 'विश्वसनीय भूगोल' प्रोटोकॉल स्थापित करने चाहिये जो घरेलू मुख्य दक्षताओं को बनाए रखते हुए राजनीतिक रूप से संरेखित देशों के साथ आपूर्ति शृंखला एकीकरण को प्राथमिकता दें। 
    • इसमें कानूनी रूप से बाध्यकारी 'विश्वास के क्षेत्र' का निर्माण शामिल है, जहाँ लोकतांत्रिक मूल्यों और सुरक्षा मानकों को साझा करने वाले साझेदारों के लिये ही टैरिफ बाधाओं को कम किया जाता है। 
    • इस तरह का ढाँचा भारत को रक्षा और ऊर्जा जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर आर्थिक संप्रभुता बनाए रखने के साथ-साथ सहयोगियों के लिये बाज़ार पहुँच को सक्रिय रूप से गहरा करने में सहायक होता है।
      • यह उपाय व्यापक वैश्वीकरण को लक्षित, उच्च-विश्वास वाले क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण से प्रतिस्थापित करके 'जोखिम-कम करने' की रणनीतियों को प्रभावी ढंग से क्रियान्वित करता है।
  • विदेशी निवेश की सामंजस्यपूर्ण परीक्षण के लिये तंत्र: भारत को ऐसे अंतर-संचालनीय 'निवेश सुरक्षा' मानक विकसित करने चाहिये जो वैध आर्थिक सहयोग को बाधित किये बिना राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों के लिये आने वाली पूंजी की कड़ी जाँच करें। 
    • सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग और जैव प्रौद्योगिकी जैसी संवेदनशील प्रौद्योगिकियों के लिये स्क्रीनिंग मानदंडों को रणनीतिक साझेदारों के साथ संरेखित करके, देश शत्रुतापूर्ण राज्य-समर्थित संस्थाओं को खुले बाज़ारों का फायदा उठाने से रोक सकते हैं। 
      • इससे महत्त्वपूर्ण अधोसंरचना के लिये एक 'सुरक्षा कवच' बनता है, साथ ही उन सहयोगी देशों के बीच पूंजी का सुचारू प्रवाह सुनिश्चित होता है, जो एक-दूसरे की नियामक सतर्कता पर भरोसा करते हैं।
  • समन्वित औद्योगिक सब्सिडी युक्तिकरण: सहयोगियों के बीच 'सब्सिडी की न्यूनतम सीमा तक पहुँचने की होड़' को रोकने के लिये, भारत को 'ग्रीन लेन' औद्योगिक नीति समझौतों पर वार्ता करनी चाहिये जो घरेलू सब्सिडी की अनुमति तभी दें जब वे सामूहिक रणनीतिक लचीलेपन के लिये फायदेमंद हों। 
    • यह सुनिश्चित करता है कि घरेलू विनिर्माण प्रोत्साहन, जैसे कि उत्पादन-लिंक्ड योजनाएँ, रणनीतिक साझेदारों के औद्योगिक आधारों का पूरक हों, न कि उनका प्रतिकार करें। 
    • यह सामंजस्य 'सहयोगात्मक स्वायत्तता' को बढ़ावा देता है जहाँ घरेलू ताकत गठबंधन की स्थिरता का समर्थन करती है।
  • अंतर-संचालनीय डिजिटल सॉवरेनिटी संरचनाएँ: डेटा गवर्नेंस और डिजिटल अवसंरचना के लिये साझा मानकों का विकास राष्ट्रीय डेटा गोपनीयता जनादेश और सीमा पार खुफिया एवं वाणिज्यिक प्रवाह की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाने के लिये आवश्यक है। 
    • इस उपाय में 'डेटा ट्रस्ट कॉरिडोर' बनाना शामिल है, जहाँ भारत अन्य देशों के साथ समान प्राइवेसी और सिक्योरिटी प्रोटोकॉल पर सहमत होता है, जिससे गैर-संवेदनशील औद्योगिक डेटा की मुक्त आवाजाही की अनुमति मिलती है, जबकि सॉवरेन सिटिज़न डेटा को सख्ती से स्थानीयकृत किया जाता है। 
    • वाणिज्यिक डेटा एकीकरण को राष्ट्रीय सुरक्षा डेटा संरक्षण से अलग करके, भारत अपनी साइबर सॉवरेनिटी या खुफिया स्वायत्तता से समझौता किये बिना एक एकीकृत डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे सकता है।
  • संप्रभु विनिर्माण अधिकारों वाले लघुपक्षीय नवोन्मेष गलियारे: भारत को व्यापक बहुपक्षीय व्यापार समझौतों से हटकर 6G और संलयन ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में पूर्व-प्रतिस्पर्द्धी अनुसंधान एवं विकास की उच्च लागतों को साझा करने पर केंद्रित विशिष्ट 'लघुपक्षीय प्रौद्योगिकी समूहों' की ओर रुख करना चाहिये।
    • यहाँ महत्त्वपूर्ण नवोन्मेष एक 'वितरणात्मक विनिर्माण समझौता' है, जहाँ साझा अनुसंधान एवं विकास के परिणामस्वरूप प्रत्येक सदस्य को अंतिम उत्पाद का घरेलू स्तर पर निर्माण करने का गारंटीकृत अधिकार प्राप्त होता है। 
    • इससे 'नवोन्मेष-उत्पादन के बीच असंतुलन' को रोका जा सकता है, जहाँ एक सहयोगी आविष्कार करता है और दूसरा उसका उत्पादन करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि प्रत्येक भागीदार वैज्ञानिक खोज के भार को साझा करते हुए अपने स्वयं के औद्योगिक आधार को मज़बूत करे।
  • अवसंरचना की दक्षता बनाए रखना: आर्थिक राष्ट्रवाद को व्यवहार्य बनाने के लिये, भारत वैश्विक मानकों के अनुरूप व्यापार करने की लागत को सक्रिय रूप से कम कर रहा है। 
    • इससे यह सुनिश्चित होता है कि घरेलू संरक्षणवाद के कारण ऐसी 'ज़ॉम्बी इंडस्ट्रीज़' का उदय न हो जो स्थानीय स्तर पर उच्च लागत के कारण प्रतिस्पर्द्धा करने में असमर्थ हों।
    • राज्य सरकार बंदरगाहों पर लगने वाले समय को कम करने के लिये डिजिटल व्यापार प्रणालियों को भौतिक अधोसंरचना के साथ एकीकृत कर रही है, जिससे भारतीय निर्यात स्थापित विनिर्माण केंद्रों के निर्यात की तरह ही दक्ष और विश्वसनीय बन सके।

निष्कर्ष

आर्थिक राष्ट्रवाद और रणनीतिक संरेखण के बीच संतुलन बनाए रखने के लिये प्रतिक्रियात्मक संरक्षणवाद से हटकर सक्रिय, नियम-आधारित आर्थिक कूटनीति की ओर एक परिष्कृत परिवर्तन की आवश्यकता है। व्यापार तर्क में सुरक्षा संबंधी अनिवार्यताओं को सीधे शामिल करके, राष्ट्र अलगाववाद की ओर बढ़े बिना अपने संप्रभु हितों की रक्षा कर सकते हैं। अंततः, लक्ष्य एक ऐसी आर्थिक संरचना का निर्माण करना है जो भू-राजनीतिक आघातों का सामना करने के लिये पर्याप्त रूप से समुत्थानशील हो, फिर भी समृद्धि को बढ़ावा देने के लिये पर्याप्त रूप से खुली हो।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

इस तथ्य का विश्लेषण कीजिये कि व्यापार और ऊर्जा भू-राजनीति के बढ़ते शस्त्रीकरण के प्रत्युत्तर में भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को किस प्रकार पुनर्गठित कर रहा है।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. भारत-अमेरिका के अंतरिम व्यापार समझौते का मुख्य उद्देश्य क्या है?
भू-राजनीतिक दबावों के बीच निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता और रणनीतिक संरेखण के बीच संतुलन बनाए रखना।

प्रश्न 2. भारत के आर्थिक राष्ट्रवाद में ऊर्जा सुरक्षा इतनी महत्त्वपूर्ण क्यों है?
क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा किफायती तेल आयात मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और विकास को बनाए रखने में सहायता करती है।

प्रश्न 3. 'लेन-देन संबंधी रणनीतिक स्वायत्तता' से क्या तात्पर्य है?
स्थायी गुटीय प्रतिबद्धताओं के बिना मुद्दों पर आधारित सहमति।

प्रश्न 4. भारत पूर्ण मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को लेकर सतर्क क्यों है?
कृषि और लघु एवं मध्यम उद्यमों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा के लिये।

प्रश्न 5. संरक्षणवाद से भारत को क्या जोखिम है?
सेवाओं के निर्यात के विरुद्ध जवाबी कार्रवाई और निवेशकों के विश्वास में कमी।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

मेन्स 

प्रश्न 1. 'भारत और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच संबंधों में खटास के प्रवेश का कारण वाशिंगटन का अपनी वैश्विक रणनीति में अभी तक भी भारत के लिए किसी ऐसे स्थान की खोज करने में विफलता है, जो भारत के आत्म-समादर और महत्वाकांक्षा को संतुष्ट कर सके।' उपयुक्त उदाहरणों के साथ स्पष्ट कीजिये। (2019)

प्रश्न 2. "वैश्वीकरण के क्षीण होने के साथ, शीत युद्ध के बाद की दुनिया संप्रभु राष्ट्रवाद का स्थल बनती जा रही है।" स्पष्ट कीजिये। (2025)