जलवायु-स्वास्थ्य संकट प्रबंधन में AI की अग्रणी भूमिका | 02 Mar 2026

यह एडिटोरियल 26/02/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित Climate crisis and health, and AI at the intersectionशीर्षक वाले लेख पर आधारित है। एडिटोरियल में इस बात का विश्लेषण किया गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता किस प्रकार भारत में जलवायु-स्वास्थ्य संबंधी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली में क्रांति ला सकती है, जिससे अग्रिम और अति-स्थानीय जोखिम पूर्वानुमान संभव हो सकेगा। इसमें उन संस्थागत, नैतिक तथा शासन-संबंधी चुनौतियों को भी स्पष्ट किया गया है, जिनका सुदृढ़ समाधान तकनीकी क्षमताओं को प्रभावी जीवनरक्षक हस्तक्षेपों में रूपांतरित करने में सहायक होगा।

प्रिलिम्स के लिये: एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम, नगरीय ऊष्मा द्वीप प्रभाव, आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन, वेक्टर जनित रोग 

मेन्स के लिये: जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न स्वास्थ्य संकटों को कम करने में AI की भूमिका, जलवायु-स्वास्थ्य अंतर्संबंधों से निपटने के लिये AI के उपयोग में प्रमुख बाधाएँ।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जलवायु विज्ञान ने अब यह संभव बना दिया है कि संकट उत्पन्न होने की प्रतीक्षा करने के बजाय महीनों पहले ही अत्यधिक स्थानीय स्तर पर ताप-तनाव और रोग-जोखिमों का पूर्वानुमान लगाया जा सके। भारत में वर्ष 2024 के दौरान लोगों ने लगभग 20 दिन भीषण हीट-वेव्स का अनुभव किया, जिनमें से लगभग 6–7 दिन प्रत्यक्ष रूप से जलवायु परिवर्तन से संबद्ध थे, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों पर तीव्र दबाव पड़ा। जैसे-जैसे वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, गर्मी से होने वाली मौतें और डेंगू का खतरा भी बढ़ रहा है। हालाँकि आपदा प्रबंधन की प्रवृत्ति अब भी मुख्यतः प्रतिक्रियात्मक बनी हुई है। आज वास्तविक चुनौती क्षमता की नहीं, बल्कि सुभेद्य आबादी की सुरक्षा के लिये सक्रिय, डेटा-आधारित तैयारियों को संस्थागत रूप देने की है।

जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न स्वास्थ्य संकटों को न्यूनतम करने में AI क्या भूमिका निभा सकता है?

  • वेक्टर जनित रोगों के लिये अति-स्थानीय पूर्वानुमानित निगरानी: पारंपरिक मौसम मॉडल में प्रायः सबसे कमज़ोर शहरी आबादी के लिये विशिष्ट 'ताप-स्वास्थ्य कार्य योजनाएँ' शुरू करने के लिये आवश्यक सटीकता की कमी होती है।
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपग्रह छवियों को सामाजिक-आर्थिक आँकड़ों के साथ समेकित करके नगरीय ऊष्मा द्वीपों का अभिनिर्धारण करने तथा स्वचालित, अति-स्थानीय अलर्ट जारी करने में सहायता करती है, जिससे रिकॉर्ड तोड़ तापीय घटनाओं के दौरान लोगों की जान बचाई जा सकती है। 
      • इससे 'ज़िला-व्यापी' चेतावनियों से हटकर सड़क-स्तर पर स्वास्थ्य जोखिम मानचित्रण की ओर संक्रमण संभव हो पाता है, विशेष रूप से गर्मी और बाढ़ के दौरान। 
    • उदाहरण के लिये, स्वदेशी भारत पूर्वानुमान प्रणाली अब 6 किमी. के रिज़ॉल्यूशन के साथ पूर्वानुमान प्रदान करती है। वर्ष 2025 तक इस मॉडल ने अत्यधिक वर्षा के पूर्वानुमानों की सटीकता में 30% सुधार प्रदर्शित किया है। 
      • इसके अलावा, यह अर्का और अरुणिका सुपरकंप्यूटिंग सुविधाओं द्वारा संचालित है, जो भारत के मौसम, जलवायु एवं महासागर पूर्वानुमान क्षमताओं में क्रांति लाने के लिये बनाई गई हैं।
  • प्रेडिक्टिव वेक्टर-बोर्न डिजीज़ (VBD) मॉडलिंग: AI आर्द्रता और स्थिर जल-प्रतिरूप जैसे नॉन-लीनियर क्लाइमेट वेरिएबल्स को महामारी-विज्ञान संबंधी आँकड़ों के साथ संयोजित कर प्रकोपों का सप्ताहों पहले पूर्वानुमान करता है।
    • इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य की कार्यप्रणाली प्रतिक्रियात्मक 'महामारी प्रबंधन' से आगे बढ़कर सक्रिय 'लार्वा नियंत्रण' तथा संसाधनों की पूर्व-व्यवस्थापन पर केंद्रित हो जाती है।
    • उदाहरण के लिये, केरल में डेंगू और मलेरिया के हॉटस्पॉट का उच्च सटीकता के साथ पता लगाने के लिये रैंडम फॉरेस्ट और लॉन्ग शॉर्ट-टर्म मेमोरी (LSTM) मॉडल तैनात किये गए हैं।
      • ये मॉडल जटिल गैर-रेखीय जलवायु-स्वास्थ्य सहसंबंधों को समझने में सक्षम होने के कारण परंपरागत सांख्यिकीय विधियों से अधिक प्रभावी सिद्ध हुए हैं।
  • जलवायु संबंधी आघातों के लिये स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना का अनुकूलन: जलवायु परिवर्तन आपदाओं के दौरान बिजली कटौती और रोगियों की संख्या में आकस्मिक वृद्धि के माध्यम से अस्पताल की अवसंरचना पर 'क्रमिक तनाव' डालता है।
    • AI 'जलवायु-स्मार्ट अस्पताल' की अवधारणा को सुदृढ़ करते हुए ऊर्जा-प्रधान शीतलन प्रणालियों का प्रबंधन करता है तथा स्थानीय जलवायु आपात स्थितियों के समय कर्मचारियों की तैनाती और भंडार प्रबंधन को पूर्वानुमानात्मक विश्लेषण द्वारा स्वचालित बनाता है।
    • उदाहरण के लिये, डेलॉयट के वर्ष 2025 के ग्लोबल एनालिसिस के अनुसार AI-सक्षम अवसंरचना समुत्थानशीलता वर्ष 2050 तक प्रतिवर्ष लगभग 65 अरब यूरो के नुकसान को रोक सकती है।
      • आपदा-प्रतिक्रिया के क्षेत्र में, IIT बॉम्बे जैसे संस्थानों ने स्पैडानेट (SpADANet) नामक एक AI मॉडल विकसित किया है, जो चक्रवात और आपदा से हुए नुकसान का त्वरित आकलन करने के लिये ड्रोन एवं उपग्रह इमेजरी का उपयोग करता है, जिससे अधोसंरचना की त्वरित मैपिंग एवं लक्षित चिकित्सा तैनाती संभव हो पाती है।
  • जीनोमिक निगरानी और रोगजनक विकास: जलवायु परिवर्तन रोगजनकों के आवासों को बदलता है, AI विशाल जीनोमिक डेटासेट को संसाधित करके यह ट्रैक करता है कि तापमान में बदलाव वास्तविक समय में वायरल उत्परिवर्तन को कैसे प्रभावित करते हैं।
    • यह 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है कि निदान उपकरण और टीके जलवायु-अनुकूलित संक्रमणों के प्रति प्रभावी बने रहें।
      • वन हेल्थ मिशन के तहत, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने जीनोमिक निगरानी के लिये AI-आधारित उपकरण लॉन्च किये हैं, जो पशु-पक्षियों से मनुष्यों में संक्रमण होने से पहले ही संभावित जूनोटिक प्रकोपों ​​का पूर्वानुमान करने में सक्षम हैं।
    • वर्ष 2026 में लॉन्च किया गया BODH (स्वास्थ्य AI के लिये बेंचमार्किंग ओपन डेटा प्लेटफॉर्म) AI मॉडल के व्यवस्थित मूल्यांकन को सक्षम बनाता है।
      • यह जलवायु संबंधी रोगजनकों के प्रसार सहित रोग निगरानी के लिये AI मॉडल का परीक्षण, बेंचमार्किंग और सत्यापन करने के लिये पहचान-रहित वास्तविक-विश्व स्वास्थ्य आँकड़ों का उपयोग करता है।
  • जलवायु परिवर्तन के अनुकूल श्वसन संबंधी जाँच और TB उन्मूलन: जलवायु परिवर्तन से धूल, आर्द्रता और विस्थापन में वृद्धि के कारण फेफड़ों का स्वास्थ्य बिगड़ता है, जिससे सुभेद्य और प्रवासी आबादी की जाँच के लिये AI-संचालित नैदानिक ​​उपकरण आवश्यक हो जाते हैं।
    • दूरस्थ क्षेत्रों में पोर्टेबल AI इमेजिंग की तैनाती से स्वास्थ्यकर्मी TB और जलवायु-संबंधी निमोनिया की त्वरित पहचान कर सकते हैं, जिससे केंद्रीकृत एवं ऊर्जा-प्रधान अस्पताल अवसंरचना पर निर्भरता कम होती है।
    • उदाहरण के लिये, CA-TB उपकरणों से लैस AI-सक्षम हैंडहेल्ड एक्स-रे मशीनों ने मामलों का पता लगाने में 16% की वृद्धि की है, जिससे निदान सीधे 'अंतिम बिंदु' तक पहुँच गया है।
      • इसके अलावा, AI-आधारित पूर्वानुमान मॉडल ने नकारात्मक उपचार परिणामों में 27% की कमी हासिल की है, जिससे जलवायु-प्रेरित व्यवधानों के बावजूद रोगी की उपचार के प्रति प्रतिबद्धता सुनिश्चित हुई है।
  • AI-अनुकूलित जल सुरक्षा और आंत्र रोग निवारण: अनियमित मानसून और बढ़ते समुद्री जलस्तर से भूजल दूषित हो जाता है, जिससे हैजा और आर्सेनिकोसिस जैसी जलजनित बीमारियों के प्रकोप का पूर्वानुमान करने के लिये AI आवश्यक हो जाता है।
    • AI मॉडल भू-विज्ञान संबंधी आँकड़ों और जल-विज्ञान संबंधी परिवर्तनों का विश्लेषण कर 'उच्च-जोखिम क्षेत्रों' का मानचित्रण करते हैं, जिससे जल जीवन मिशन जलवायु-संवेदनशील ज़िलों में निस्यंदन अवसंरचना को प्राथमिकता दे सकता है।
    • उदाहरण के लिये, IIT खड़गपुर के शोधकर्त्ताओं ने भारत के पेयजल में आर्सेनिक प्रदूषण का पता लगाने के लिये एक AI-आधारित पूर्वानुमान मॉडल विकसित किया है, जो गंगा तटवर्ती क्षेत्रों में लाखों लोगों को प्रभावित करने वाले संकट से निपटने में सहायक है।
  • शहरी वायु गुणवत्ता और श्वसन-जोखिम मानचित्रण: AI ने वायु-गुणवत्ता प्रबंधन को केवल निगरानी से आगे बढ़ाकर 'पूर्वानुमानात्मक स्वास्थ्य-संरक्षण' में परिवर्तित कर दिया है, जिसके माध्यम से विषाक्त स्मॉग बनने से पहले ही आकस्मिक प्रदूषण-वृद्धि का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।
    • ये मॉडल ज़मीनी सेंसरों के साथ उपग्रह इमेजरी को एकीकृत करते हैं ताकि सड़क-स्तर का AQI डेटा प्रदान किया जा सके, जिससे अस्पतालों को बच्चों में अस्थमा और बुजुर्गों में हृदय संबंधी संकट के मामलों में अचानक वृद्धि के लिये तैयार रहने में सहायता मिलती है।
    • उदाहरण के लिये, न्यू ट्रांसफॉर्मर-आधारित न्यूरल नेटवर्क PM2.5 सांद्रता का पूर्वानुमान 24 घंटे पहले तक अच्छी सटीकता के साथ लगा सकते हैं।
      • इससे अस्पतालों को स्मॉग की घटना चरम पर पहुँचने से घंटों पहले ऑक्सीजन की आपूर्ति और नेबुलाइजेशन स्टेशनों को बढ़ाने में सहायता मिल सकती है।

जलवायु–स्वास्थ्य अंतर्संबंधों से निपटने में AI के उपयोग की प्रमुख बाधाएँ क्या हैं?

  • इंटर-एजेंसी डेटा साइलोज़ और मेटाडेटा फ्रिक्शन : IMD, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और ISRO जैसी एजेंसियों में खंडित डेटा-समुच्चय एक ‘एकीकृत सत्य’ के निर्माण में बाधा उत्पन्न करते हैं, जिसके कारण AI मॉडल अपूर्ण या विलंबित सूचना पर कार्य करते हैं।
    • मानकीकृत अंतर-संचालनीयता प्रोटोकॉल के बिना, पर्यावरणीय और नैदानिक ​​डेटा का वास्तविक समय में समावेशन एक बाधा बना रहता है, जिससे बहु-आपदा घटनाओं पर समन्वित प्रतिक्रिया अवरुद्ध हो जाती है।
      • भीषण हीट-वेव्स के दौरान, IMD ज़िला-स्तरीय लू संबंधी चेतावनी जारी करता है, लेकिन स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (IDSP) द्वारा जारी हीट-वेव्स से संबंधित बीमारियों और मौतों के आँकड़े हफ्तों-महीनों के विलंब से सामने आते हैं, जिससे वास्तविक समय में स्वास्थ्य संबंधी प्रतिक्रिया सीमित हो जाती है।
    • इसी प्रकार, ISRO के उपग्रह प्रतिदिन उच्च-रिज़ॉल्यूशन भूमि-सतह तापमान और जलभराव से संबंधित डेटा क्रिएट करते हैं, परंतु यह नगरपालिका स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ वास्तविक काल में अंतर-संगत नहीं है, जिससे ताप–डेंगू जैसी बहु-आपदा कार्रवाइयों में विलंब होता है।
  • एल्गोरिदम आधारित व्यापक पूर्वाग्रह और 'डिजिटल उपनिवेशवाद': ग्लोबल साउथ में उपयोग किये जाने वाले कई AI मॉडल उच्च आय वाले देशों के डेटासेट पर प्रशिक्षित होते हैं, जो भारत की विशिष्ट आनुवंशिक, भाषाई और पर्यावरणीय विविधता को ध्यान में रखने में विफल रहते हैं। 
    • तटस्थता का यह 'मिथक' ऐसी प्रणालियों को जन्म देता है जो उपेक्षित समुदायों, जातियों या ग्रामीण आबादी में पाए जाने वाले पैटर्न का कम निदान कर सकती हैं या उन्हें अनदेखा कर सकती हैं, जिनका प्रशिक्षण डेटा में प्रतिनिधित्व नहीं होता है।
    • उदाहरण के लिये, मच्छर जनित बीमारियों पर अधिकांश AI/ML पूर्वानुमान अध्ययनों में महत्त्वपूर्ण कार्यप्रणालीगत कमियाँ दिखाई देती हैं, जिनमें से 98 अध्ययनों में से 63 को प्रोबास्ट मूल्यांकन के तहत पूर्वाग्रह के उच्च जोखिम की श्रेणी में रखा गया है तथा केवल 24 को कम जोखिम की श्रेणी में रखा गया है, साथ ही बाह्य सत्यापन भी सीमित है। 
      • इससे वास्तविक दुनिया में जलवायु-स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने में उनकी विश्वसनीयता, सामान्यीकरण क्षमता और परिचालन तत्परता के बारे में गंभीर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं। 
  • ऊर्जा तीव्रता बनाम नेट-ज़ीरो प्रतिबद्धताओं की गणना: अत्यधिक स्थानीय, चौबीसों घंटे चलने वाले जलवायु–स्वास्थ्य अनुकरणों हेतु आवश्यक विशाल गणनात्मक क्षमता एक विरोधाभासी प्रतिपुष्टि चक्र उत्पन्न करती है, जहाँ AI जलवायु जोखिम को कम करने का दावा करते हुए स्वयं कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय वृद्धि करता है।
    • उच्च-प्रदर्शन GPU क्लस्टरों का संचालन, यदि जीवाश्म-ईंधन-प्रधान राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड से पृथक न किया जाए, तो भारत के ‘हरित विकास’ लक्ष्यों के विपरीत पड़ता है।
    • भारत में डेटा केंद्रों की परिचालन विद्युत माँग के वर्ष 2025 में 1 GW से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2031-2032 तक 13 GW होने का अनुमान है, जो बड़े पैमाने के विश्लेषण की ऊर्जा तीव्रता को दर्शाता है तथा AI तैनाती के जलवायु-संबंधी प्रतिफलों को रेखांकित करता है।
  • डिजिटल डिवाइड और अंतिम-बिंदु अपवर्जन: AI का लाभ उठाने के लिये प्रायः स्थिर इंटरनेट और स्मार्टफोन की आवश्यकता होती है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक सुभेद्य आबादी, जैसे प्रवासी श्रमिक और ग्रामीण वृद्ध जनों, के लिये एक बाधा उत्पन्न होती है।
    • इस 'मापन पूर्वाग्रह' का अर्थ है कि डिजिटल स्वास्थ्य पहल प्रायः उन लोगों को बाहर कर देती हैं जिनके पास उच्च स्तरीय तकनीक नहीं है, जिससे स्वास्थ्य समानता का अंतर और बढ़ सकता है। यह ‘मापन पक्षपात’ दर्शाता है कि डिजिटल स्वास्थ्य पहलें प्रायः उच्च-स्तरीय तकनीक से वंचित समूहों को अपवर्जित कर देती हैं, जिससे स्वास्थ्य समानता का अंतराल और भी गंभीर हो सकती है।
    • विगत स्वास्थ्य आपदाओं के दौरान, आरोग्य सेतु जैसे ऐप्स ने इस कमी को उजागर किया; वर्तमान में, कई ज़िलों में प्राथमिक स्वास्थ्य क्लीनिकों में अभी भी बुनियादी बिजली और इंटरनेट की कमी है, जिससे AI-संचालित 'रियल-टाइम इंटरवेंशन कई लोगों के लिये एक असंभव वास्तविकता बना रहता है।
  • पारदर्शिता की कमी और नैदानिक ​​'ब्लैक-बॉक्स' विश्वास संकट: जटिल तंत्रिका नेटवर्क की अपारदर्शी प्रकृति स्वास्थ्यकर्मियों में ‘विश्वास अभाव’ उत्पन्न करती है, जो अस्पष्ट AI आउटपुट के आधार पर महंगे आपातकालीन प्रोटोकॉल को शुरू करने में संकोच करते हैं।
    • भारत में 40% से अधिक चिकित्सक अब अपने अभ्यास में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग कर रहे हैं, जो इसके तेज़ी से अंगीकरण को दर्शाता है, हालाँकि, AI-संचालित निर्णय लेने में पारदर्शिता, व्याख्यात्मकता (एक्सप्लेनेबल AI) और जवाबदेही महत्त्वपूर्ण चिंताएँ बनी हुई हैं।
  • नैतिक गोपनीयता और निगरानी का अतिरेक: आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत संवेदनशील व्यक्तिगत स्वास्थ्य अभिलेखों (PHR) के साथ बारीक जलवायु डेटा को एकीकृत करने से बीमा कंपनियों या राज्य संस्थाओं द्वारा ‘जलवायु-आधारित प्रोफाइलिंग’ की आशंकाएँ उत्पन्न होती हैं।
    • मज़बूत, स्वास्थ्य-विशिष्ट AI शासन के अभाव में यह जोखिम बना रहता है कि ‘हॉटस्पॉट मानचित्रण’ जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों में निवास करने वाले समुदायों के कलंकीकरण या हाशियाकरण का कारण बन सकता है।  
    • जुलाई 2025 तक, भारत में 79.71 करोड़ आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाते बनाए जा चुके हैं तथा 65.09 करोड़ स्वास्थ्य रिकॉर्ड लिंक किये गए हैं। 
      • यदि इन्हें वार्ड-स्तरीय ताप या रोग-जोखिम मानचित्रों के साथ संयोजित किया जाए, तो यह आशंका बढ़ जाती है कि जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों के निवासियों को लक्षित कल्याण सहायता के स्थान पर बीमा भेद-भाव या गहन निगरानी का सामना करना पड़े।
  • संस्थागत जड़ता और 'द्विभाषी' कौशल अंतर: भारत में ऐसे ‘द्विभाषी’ पेशेवरों की गंभीर कमी है, जो जलवायु गतिशीलता और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों में दक्ष हों, जिसके परिणामस्वरूप AI उपकरण तकनीकी रूप से सक्षम होते हुए भी क्षेत्रीय अधिकारियों के लिये अप्रासंगिक रह जाते हैं।
    • इसके अलावा, कठोर प्रशासनिक संरचनाएँ प्रायः प्रतिक्रियात्मक 'कमांड-एंड-कंट्रोल' आपदा प्रबंधन से AI द्वारा आवश्यक सक्रिय, डेटा-संचालित ढाँचे की और संक्रमण का विरोध करती हैं।
    • AI-आधारित रोग पूर्वानुमानों के लिये स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों को संभाव्य जोखिम परिणामों की व्याख्या करने की आवश्यकता होती है, फिर भी अधिकांश ज़िला निगरानी अधिकारियों को केवल पूर्वव्यापी मामले की रिपोर्टिंग में प्रशिक्षित किया जाता है, न कि पूर्वानुमानात्मक विश्लेषण में।
  • चेतावनी ग्रिडों की साइबर-भौतिक भेद्यता: AI-निर्भर प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ प्रतिकूल साइबर आक्रमणों और जलवायु-जनित अवसंरचनात्मक विफलताओं, जैसे महाचक्रवातों के दौरान विद्युत ग्रिड ध्वस्त होने, के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती हैं, जो प्रतिक्रिया तंत्र को अक्षम बना सकती हैं।
    • केंद्रीकृत AI आर्किटेक्चर पर अत्यधिक निर्भरता एकल-विफलता बिंदु निर्मित करती है, जहाँ किसी स्थानीय तकनीकी त्रुटि या लक्षित हैक के परिणामस्वरूप व्यापक दहशत या घातक निष्क्रियता उत्पन्न हो सकती है।

जलवायु–स्वास्थ्य अंतर्संबंधों के समाधान में AI के उपयोग को सशक्त बनाने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?

  • परस्पर-संगत पर्यावरण–महामारी विज्ञान डेटा संरचना का निर्माण:  मौसम विज्ञान, पर्यावरण तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबद्ध मंत्रालयों के बीच एकीकृत, वास्तविक-काल डेटा-साझाकरण प्रोटोकॉल को स्थापित करना संस्थागत बाधाओं को समाप्त करने के लिये अनिवार्य है।
    • इस आर्किटेक्चर में मानकीकृत API हैंडशेक और मेटाडेटा सामंजस्य को अनिवार्य किया जाना चाहिये, जिससे आर्द्रता, रोग-वाहक घनत्व तथा अस्पताल में भर्ती जैसे विविध चर एक केंद्रीकृत तंत्रिका नेटवर्क में बिना अवरोध समाहित किये जा सकें।
    • एक समन्वित राष्ट्रीय डेटा ग्रिड के निर्माण से पूर्वानुमानात्मक एल्गोरिदम बिना किसी विलंब के समग्र पर्यावरणीय तनाव-कारकों का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • नैदानिक ​​विश्वास के लिये व्याख्या योग्य AI (XAI) को अनिवार्य बनाना: स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों के बीच विश्वास की कमी को दूर करने के लिये, सभी पूर्वानुमानात्मक स्वास्थ्य डैशबोर्डों के भीतर व्याख्या योग्य AI स्तरों के एकीकरण को अनिवार्य बनाना महत्त्वपूर्ण है।  
    • अपारदर्शी एल्गोरिदम 'ब्लैक बॉक्स' से हटकर, इन पारदर्शी मॉडलों में यह स्पष्ट रूप से दर्शाया जाना चाहिये कि कौन-से वेटेड वेरिएबल्स (जैसे विशिष्ट तापीय उछाल या वर्षा-विसंगतियाँ) किसी रोग-प्रकोप चेतावनी को सक्रिय करते हैं।
  • ग्रिड की मज़बूती के लिये एज कंप्यूटिंग को तैनात करना: गंभीर जलवायु आघातों के दौरान परिचालन निरंतरता बनाए रखने के लिये प्रारंभिक चेतावनी अवसंरचना को केंद्रीकृत क्लाउड निर्भरता से स्थानीयकृत एज कंप्यूटिंग नेटवर्क में स्थानांतरित करना आवश्यक है। 
    • दूरस्थ स्वचालित मौसम स्टेशनों या ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों जैसे स्रोतों पर ही महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय और स्वास्थ्य डेटा को संसाधित करके, यह प्रणाली बाधित इंटरनेट एवं विद्युत ग्रिड की संवेदनशीलताओं से बचाव करती है।
    • यह विकेंद्रीकृत संरचना सुनिश्चित करती है कि चरम मौसमी घटनाओं के दौरान व्यापक संचार चैनलों के विफल होने पर भी अति-स्थानीय पूर्वानुमान संबंधी चेतावनियाँ उत्पन्न हों तथा उन पर कार्रवाई की जाए।
  • स्थानीय भाषा और ऑफलाइन अंतिम-बिंदु प्रसार को संस्थागत रूप देना: चेतावनी शृंखला के अंतिम बिंदु को सुदृढ़ करने के लिये ऐसे संचार इंटरफेस विकसित किये जाने चाहिये जो सांस्कृतिक रूप से अनुकूल, बहुभाषी और निरंतर उच्च-गति इंटरनेट के बिना भी कार्यक्षम हों।
    • मौसम संबंधी पूर्वानुमान संबंधी जानकारियों को जटिल मौसम विज्ञान की शब्दावली से स्वचालित रूप से क्रियाशील, स्थानीय सलाहों में अनुवादित किया जाना चाहिये, जिन्हें SMS, रेडियो प्रसारण और समुदाय-आधारित ऑफलाइन नेटवर्क जैसे कम बैंडविड्थ वाले चैनलों के माध्यम से प्रसारित किया जाना चाहिये। 
    • यह समावेशी दृष्टिकोण डिजिटल निरक्षरता और संरचनात्मक वंचना की बाधाओं को पार करते हुए, हाशिये पर स्थित और ऑफ-ग्रिड आबादी तक जोखिम-सूचनाएँ पहुँचाता है।
  • एक बहु-विषयक 'द्विभाषी' कार्यबल का विकास: तकनीकी नवाचार और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यान्वयन के बीच संज्ञानात्मक अंतराल को दूर करने के लिये दोनों क्षेत्रों में निपुण एक विशेष कार्यबल के व्यवस्थित विकास की आवश्यकता है।
    • चिकित्सा पाठ्यक्रम और आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जलवायु-AI मॉड्यूल को एकीकृत करने से पेशेवरों का एक नया वर्ग तैयार होगा जो जटिल महामारी विज्ञान संबंधी वास्तविकताओं के संदर्भ में एल्गोरिदम आउटपुट को समझने में सक्षम होगा। 
    • क्षमता निर्माण का यह उपाय कठोर प्रशासनिक जड़ता को समाप्त करता है, जिससे एक सक्रिय संस्थागत संस्कृति को बढ़ावा मिलता है जो डिजिटल दूरदर्शिता को सामरिक ज़मीनी अभियानों में तेज़ी से परिवर्तित कर सकती है। 
  • गोपनीयता-संरक्षणकारी विकेंद्रीकृत विश्लेषण का प्रवर्तन: जैसे-जैसे जलवायु और स्वास्थ्य डेटा का तेज़ी से अंतर्संयोजन बढ़ता जा रहा है, संवेदनशील व्यक्तिगत स्वास्थ्य अभिलेखों की सुरक्षा के लिये फेडरेटेड लर्निंग जैसे सुदृढ़ क्रिप्टोग्राफिक सुरक्षा-तंत्रों का क्रियान्वयन अनिवार्य हो गया है।
    • यह दृष्टिकोण AI मॉडल को व्यक्तिगत रूप से पहचान योग्य जानकारी को निकाले या केंद्रीकृत किये बिना विकेंद्रीकृत, स्थानीयकृत डेटासेट पर प्रशिक्षित करने की अनुमति देता है, जिससे बड़े पैमाने पर निगरानी या डेटा उल्लंघन के खतरे को बेअसर किया जा सकता है।   
    • कठोर नैतिक ढाँचों की स्थापना यह सुनिश्चित करती है कि पूर्वानुमानात्मक मानचित्रण का दुरुपयोग न हो और उच्च-जोखिम समुदायों को भेदभाव या कलंक के बजाय सहायक हस्तक्षेप प्राप्त हों।
  • एल्गोरिदम आधारित पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को अनिवार्य बनाना: यह सुनिश्चित करने के लिये कि तकनीकी समाधान अंतर्निहित जलवायु समस्या को और न बढ़ा दे, कंप्यूटिंग-गहन AI प्रणालियों की तैनाती को अनिवार्य पर्यावरणीय पदचिह्न लेखापरीक्षाओं द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिये। 
    • नियामक ढाँचों के माध्यम से डेवलपर्स को ऊर्जा-कुशल मॉडल संरचनाओं के उपयोग तथा डेटा केंद्रों को नवीकरणीय ऊर्जा ग्रिड से जोड़ने के लिये बाध्य किया जाना चाहिये, जिससे यह पूर्वानुमानात्मक अवसंरचना अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन उत्पन्न न करे।
    • ग्रीन-कंप्यूटिंग मानकों का यह संस्थानीकरण उन्नत तंत्रिका नेटवर्क की परिचालन आवश्यकताओं को देश की व्यापक नेट-ज़ीरो पारिस्थितिक प्रतिबद्धताओं के साथ संरेखित करता है।

निष्कर्ष:

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) भारत को आपदाओं के प्रति अनुक्रियात्मक प्रबंधन से हटकर जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशासन की ओर बढ़ने का एक ऐतिहासिक अवसर प्रदान करती है। हालाँकि, इसकी वास्तविक क्षमता तभी साकार होगी जब पारदर्शिता, समानता, ऊर्जा स्थिरता और डेटा अंतर-संचालनीयता को संस्थागत रूप से समाहित किया जाएगा। एक उत्तरदायित्वपूर्वक संचालित AI इकोसिस्टम सतत विकास लक्ष्यों— SDG 3, SDG 13 और SDG 9 को एक साथ आगे बढ़ा सकता है। अंततः जलवायु-अनुकूल स्वास्थ्य प्रणालियों को न केवल स्मार्ट होना चाहिये, बल्कि न्यायसंगत, पर्यावरण के अनुकूल और समावेशी भी होना चाहिये।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

भारत में जलवायु-स्वास्थ्य संबंधी प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता किस प्रकार क्रांति ला सकती है? इससे जुड़ी संस्थागत और नैतिक चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. जलवायु-संबंधी स्वास्थ्य चेतावनी के लिये AI क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह हीट-स्ट्रोक और बीमारियों के जोखिमों के लिये अति-स्थानीय, पूर्वानुमानित अलर्ट प्रदान करता है।

2. भारत में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
संस्थागत अलगाव और अंतर-संचालनीय डेटा प्रणालियों का अभाव।

3. किन आबादी समूहों को सर्वाधिक लाभ मिलता है?
अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक, वृद्धजन, शहरी निर्धन तथा जलवायु-संवेदनशील समुदाय।

4. प्रमुख नैतिक चिंताएँ क्या हैं?
निगरानी, ​​प्रोफाइलिंग और एल्गोरिदम संबंधी पूर्वाग्रह का खतरा।

5. आगे की राह क्या है?
शासन व्यवस्था में समेकित, व्याख्या योग्य एवं निजता-संरक्षणकारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास और प्रयोग।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

मेन्स

प्रश्न 1. 'जलवायु परिवर्तन' एक वैश्विक समस्या है। भारत जलवायु परिवर्तन से किस प्रकार प्रभावित होगा ? जलवायु परिवर्तन के द्वारा भारत के हिमालयी और समुद्रतटीय राज्य किस प्रकार प्रभावित होंगे ? (2017)

प्रश्न 2. “एक कल्याणकारी राज्य की नैतिक अनिवार्यता के अलावा, प्राथमिक स्वास्थ्य संरचना धारणीय विकास की एक आवश्यक पूर्व शर्त है।" विश्लेषण कीजिये। (2021)