मेघालय में रैट-होल माइनिंग | 07 Feb 2026

प्रिलिम्स के लिये: रैट-होल माइनिंग, राष्ट्रीय हरित अधिकरण, संविधान की छठी अनुसूची, एसिड माइन ड्रेनेज

मेन्स के लिये: रैट-होल माइनिंग और पर्यावरणीय शासन, छठी अनुसूची तथा संसाधन विनियमन की चुनौतियाँ, अवैध खनन और संस्थागत विफलता

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों? 

मेघालय के पूर्वी जयंतिया हिल्स में एक बड़ा हादसा सामने आया है, जहाँ अवैध रूप से संचालित रैट-होल कोयला खदान में हुए विस्फोट के बाद कम-से-कम 18 श्रमिकों की मौत हो गई।

सारांश

  • मेघालय में हाल की रैट-होल माइनिंग त्रासदी राष्ट्रीय हरित अधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद अवैध और असुरक्षित कोयला उत्खनन की निरंतरता को उजागर करती है, जो पतली कोयला परतों, आजीविका पर निर्भरता और छठी अनुसूची के अंतर्गत कमज़ोर प्रवर्तन से प्रेरित है।
  • रैट-होल माइनिंग से गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन और पर्यावरणीय क्षति होती है, जिसमें बाढ़ और दम घुटने से होने वाली मौतें, अम्लीय खदान अपवाह, वनों की कटाई और नदियों का प्रदूषण शामिल हैं। यह स्थिति मज़बूत निगरानी व्यवस्था और टिकाऊ आजीविका विकल्पों की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

रैट-होल माइनिंग क्या है?

  • परिचय: रैट-होल माइनिंग कोयला उत्खनन की एक प्राचीन और जोखिम भरी तकनीक है, इसमें बहुत संकीर्ण सुरंगें बनाई जाती हैं, जो केवल इतनी बड़ी होती है कि कोई व्यक्ति रेंगते हुए उसमें से गुज़र सके।
    • ये सुरंगें आमतौर पर 3–4 फीट ऊँची होती हैं, जिससे खनिकों को बुनियादी उपकरणों के साथ बैठकर या रेंगते हुए काम करना पड़ता है।
    • रैट-होल माइनिंग में कोई वैज्ञानिक योजना, वेंटिलेशन या संरचनात्मक समर्थन नहीं होता, जिससे यह अत्यंत खतरनाक बन जाता है।
    • हालाँकि यह मुख्यतः मेघालय में प्रचलित है, रैट-होल माइनिंग की रिपोर्टें भारत के अन्य पूर्वोत्तर राज्यों से भी सामने आई हैं।
  • प्रकार: साइड-कटिंग, जिसमें पहाड़ी ढालों में प्रकट कोयला परतों का अनुसरण करते हुए क्षैतिज सुरंगें खोदी जाती हैं।
    • बॉक्स-कटिंग, जिसमें पहले एक गहरा ऊर्ध्वाधर गड्ढा खोदा जाता है, तत्पश्चात उससे सभी दिशाओं में ऑक्टोपस की भुजाओं की भाँति अनेक क्षैतिज सुरंगें निकाली जाती हैं।
    • इस पद्धति में वैज्ञानिक योजना, वेंटिलेशन अथवा संरचनात्मक समर्थन का अभाव होता है, जिसके कारण यह अत्यंत जोखिमपूर्ण सिद्ध होती है।
  • विधिक स्थिति: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने वर्ष 2014 में इस प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया, इसे ‘अवैज्ञानिक एवं अवैध’ बताते हुए इससे होने वाली पर्यावरणीय क्षति को रेखांकित किया।
  • सतत बने रहने के कारण: 
    • भूवैज्ञानिक अनिवार्यता: मेघालय में कोयले की परतें अत्यंत सूक्ष्म/पतली हैं (अक्सर 2 मीटर से कम)। 
      • अन्य क्षेत्रों में प्रचलित ओपन-कास्ट खनन यहाँ आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है, क्योंकि इतनी पतली परतों तक पहुँचने हेतु अत्यधिक मात्रा में मृदा/शैल हटाना पड़ता है, जो अत्यधिक लागतपूर्ण सिद्ध होता है। रैट-होल माइनिंग में न्यूनतम अपशिष्ट हटाते हुए सीधे कोयला परत को लक्षित किया जाता है।
    • आर्थिक निर्भरता: अनेक स्थानीय समुदायों के लिये यह आजीविका का एकमात्र ज्ञात साधन है। कोयले से मिलने वाला ‘त्वरित धन’ संपूर्ण स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का सहारा बनता है।
    • विकल्पों का अभाव: क्षेत्र में उल्लेखनीय औद्योगिक विकास अथवा वैकल्पिक रोज़गार अवसरों का अभाव है, जिसके कारण जोखिमों के बावजूद स्थानीय लोग पुनः खदानों की ओर लौटने को विवश होते हैं।
    • मांग: स्थानीय तथा क्षेत्रीय उद्योग इस सस्ते, काले-बाज़ार के कोयले पर निरंतर निर्भर बने हुए हैं।
      • संस्थागत गठजोड़: विभिन्न रिपोर्ट्स प्रायः खदान मालिकों, स्थानीय प्राधिकरणों तथा राजनीतिक व्यक्तियों के बीच गठजोड़ की ओर संकेत करती हैं, जिसके चलते आधिकारिक प्रतिबंधों के बावजूद यह व्यापार जारी रहता है।

रैट-होल माइनिंग से संबंधित चिंताएँ क्या हैं?

  • सुरक्षा जोखिम: ये खदानें वस्तुतः डेथ ट्रैप (जानलेवा स्थान) हैं। इनमें न तो सहारा देने वाले स्तंभ होते हैं, न वेंटिलेशन प्रणालियाँ और न ही आपातकालीन निकास की कोई व्यवस्था।
    • मृत्यु के सामान्य कारण: छत का धँसना, बाढ़ आना (जैसा कि वर्ष 2018 के Ksan आपदा में देखा गया) तथा विषैली गैसों से दम घुटना प्रमुख कारण हैं।
    • बाल श्रम उल्लंघन: इन अत्यंत खतरनाक परिस्थितियों में बच्चों को नियोजित किया जाना गंभीर बाल श्रम उल्लंघनों को उजागर करता है।
  • जल प्रदूषण: इसका सबसे गंभीर प्रभाव एसिड माइन ड्रेनेज (AMD) है। जब कोयले में उपस्थित सल्फरयुक्त खनिज जल तथा ऑक्सीजन के संपर्क में आते हैं, तो सल्फ्यूरिक अम्ल का निर्माण होता है। 
    • इसके परिणामस्वरूप समीपवर्ती जल निकाय लौह, कैडमियम तथा क्रोमियम जैसी भारी धातुओं से प्रदूषित हो जाते हैं। 
    • कोपिली (असम-मेघालय सीमा), मिंतदू और लुखा (जयंतिया की पहाड़ियों में स्थित) जैसी नदियाँ इतनी अम्लीय हो गई हैं कि अब उनमें जलीय जीवन का संरक्षण संभव नहीं रह गया है।
  • वनों की कटाई एवं मृदा अपरदन: खनन के लिये बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से जैव विविधता का क्षय हुआ है और ऊपरी उपजाऊ मृदा अपरदन बढ़ गया है, जिससे भूमि बंजर होती जा रही है।
  • वायु प्रदूषण: खनन गतिविधियों के दौरान सूक्ष्म कण वाले पदार्थ तथा विषैली गैसों का उत्सर्जन होता है, जिससे वायु की गुणवत्ता में गंभीर कमी आती है। इसका दुष्प्रभाव जयंतिया, खासी तथा गारो जैसी अनुसूचित जनजातियों द्वारा संपन्न क्षेत्रों में विशेष रूप से देखा जाता है।
  • “ब्लैक लंग्स” डिज़ीज़: खनन श्रमिक, जिनमें अनेक बार बच्चे भी शामिल होते हैं, पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के अभाव में लंबे समय तक कोयले की धूल के संपर्क में रहने से सिलिकोसिस तथा न्यूमोकोनियोसिस से पीड़ित हो जाते हैं। 
    • अपर्याप्त वेंटिलेशन के कारण खदानों में फँसी गैसों से दम घुटने तथा विषाक्तता का जोखिम भी बढ़ जाता है।
  • नियामकीय चुनौतियाँ: छठी अनुसूची के अंतर्गत संरक्षित क्षेत्रों में भूमि तथा खनिजों का स्वामित्व स्थानीय समुदायों एवं स्वायत्त ज़िला परिषदों (ADC) के पास होता है, जिससे केंद्रीय पर्यवेक्षण सीमित हो जाता है तथा ADC के नियमों और खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR Act) जैसे राष्ट्रीय विधिक ढाँचों के बीच मतभेद उत्पन्न होता है।
    • MMDR अधिनियम, 1957 राज्यों को अवैध खनन पर अंकुश लगाने का अधिकार प्रदान करता है, हालाँकि मानव संसाधनों की कमी, भ्रष्टाचार तथा राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण इसके प्रवर्तन में गंभीर बाधाएँ उत्पन्न होती हैं।

रैट-होल माइनिंग के संकट को समाप्त करने के लिये कौन-से उपाय प्रभावी हो सकते हैं?

  • प्रौद्योगिकीय निगरानी: ड्रोन, उपग्रह चित्रण तथा GIS (ज्योग्राफिकल इन्फॉर्मेशन सिस्टम) मैपिंग का उपयोग कर दूरदराज़ क्षेत्रों में अवैध खनन की वास्तविक समय में पहचान करना और दोषियों व बार-बार होने वाले उल्लंघनों का रिकॉर्ड रखने हेतु इसे एक केंद्रीयकृत डाटाबेस विकसित किया जाए।
  • वैकल्पिक आजीविकाएँ: खनन पर निर्भरता कम करने के लिये सरकार को अनन्नास की कृषि, ईको-पर्यटन तथा अन्य कृषि–उद्यानिकी क्षेत्रों को प्रोत्साहित करते हुए वैकल्पिक आजीविकाओं का विकास करना चाहिये, जिनमें मेघालय की तुलनात्मक क्षमता सुदृढ़ है।
  • सशक्त “माइनिंग EAC”: खनन पर्यवेक्षण के लिये केवल एक ही मुख्य निष्पादन संकेतक (KPI) रखने वाले अतिरिक्त सहायक आयुक्तों (EAC) का एक अलग कैडर बनाना, जो सीधे राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) समिति को प्रतिवेदन दें तथा स्थानीय राजनीतिक दबाव से अप्रभावित रहें।
  • मेघालय पर्यावरण संरक्षण एवं पुनर्स्थापन कोष (MEPRF) का उपयोग: मेघालय पर्यावरण संरक्षण एवं पुनर्स्थापन कोष (MEPRF) को सख्त नियमों का पालन करते हुए पृथक् रखा जाए, ताकि पारिस्थितिक पुनर्स्थापन में संलग्न पूर्व खनिकों को मज़दूरी का भुगतान किया जा सके और एक समर्पित “ग्रीन कॉर्प्स” का गठन हो सके।
  • ओपन-कास्ट मेथड: यदि आर्थिक कारणों से खनन जारी रखना अनिवार्य हो, तो यह रैट-होल माइनिंग के रूप में नहीं हो सकता। राज्य को उन निर्दिष्ट क्षेत्रों में ओपन-कास्ट मेथड में निवेश करना चाहिये, जहाँ कोयला परत पर्याप्त रूप से मोटी हो।
    • यह व्यवस्था वायु-संचार, सुरक्षा स्तंभों तथा यंत्रीकृत खनन को संभव बनाती है, किंतु व्यवहार्य होने के लिये इसके अंतर्गत छोटी-छोटी भूमि जोतों का एकीकृत कर बड़े सहकारी समूहों में रूपांतरण आवश्यक है।

निष्कर्ष

रैट-होल माइनिंग के खतरे को समाप्त करने हेतु दो-आयामी रणनीति अपनानी होगी। पहला, सख्त तकनीकी निगरानी लागू करके अवैध खनन पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना और दूसरा, स्थायी आजीविका के अवसरों के वित्तपोषण के माध्यम से अवैध खनन पर आर्थिक निर्भरता को समाप्त करना।

दृष्टि मुख्य परीक्षा प्रश्न:

प्र. रैट-होल खनन के पर्यावरणीय एवं मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. रैट-होल माइनिंग क्या है?
रैट-होल खनन कोयला निकालने की एक आदिम विधि है, जिसमें सँकरी, बिना वेंटिलेशन वाली सुरंगें हाथ से खोदी जाती हैं। इसमें मज़दूरों को रेंगकर और झुककर काम करना पड़ता है, जिससे गंभीर सुरक्षा जोखिम उत्पन्न होते हैं।

2. मेघालय में रैट-होल माइनिंग पर प्रतिबंध क्यों लगाया गया?
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने वर्ष 2014 में बाढ़ और दम घुटने से होने वाली मृत्यु, गंभीर पर्यावरणीय क्षति तथा अवैज्ञानिक प्रकृति के कारण इस पर प्रतिबंध लगाया।

3. प्रतिबंध के बावजूद रैट-होल माइनिंग क्यों जारी है?
पतली कोयला परतें, आजीविका पर निर्भरता, वैकल्पिक रोज़गार की कमी, सस्ते कोयले की मांग तथा छठी अनुसूची के अंतर्गत कमज़ोर प्रवर्तन इसके जारी रहने के प्रमुख कारण हैं।

4. रैट-होल माइनिंग के प्रमुख पर्यावरणीय प्रभाव क्या हैं?
इसके कारण अम्लीय खदान जल निकासी, नदियों का अम्लीकरण, वनों की कटाई, मृदा अपरदन, वायु प्रदूषण तथा जलीय जीवन का ह्रास होता है।

5. रैट-होल माइनिंग संकट को समाप्त करने के लिये कौन-से उपाय सहायक हो सकते हैं?
तकनीकी निगरानी, वैकल्पिक आजीविका के अवसर, सशक्त निगरानी अधिकारी, MEPRF निधि से पारिस्थितिक पुनर्स्थापन तथा वैज्ञानिक खनन पद्धतियों की ओर संक्रमण।

6. रैट-होल माइनिंग के संकट को समाप्त करने हेतु प्रभावी समाधान क्या हैं?
तकनीकी निगरानी, वैज्ञानिक खनन पद्धतियों की ओर संक्रमण, वैकल्पिक आजीविका के अवसर, सशक्त निगरानी अधिकारी, MEPRF निधि से पारिस्थितिक पुनर्स्थापन।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

मेन्स

प्रश्न. "प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव के बावजूद कोयला खनन विकास के लिये अभी भी अपरिहार्य है।" विवेचना कीजिये। (2017)