न्यायिक विविधता पर निजी सदस्य विधेयक | 21 Feb 2026
प्रिलिम्स के लिये: निजी सदस्य विधेयक, भारत का सर्वोच्च न्यायालय, न्यायिक नियुक्तियाँ, भारत के मुख्य न्यायाधीश, कॉलेजियम प्रणाली
मेन्स के लिये: न्यायिक नियुक्तियाँ और कॉलेजियम प्रणाली में सुधार, उच्च न्यायपालिका में विविधता और प्रतिनिधित्व, न्याय तक पहुँच और सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठें
स्रोत: TH
चर्चा में क्यों?
संसद में एक निजी सदस्य विधेयक पेश किया गया है जिसमें संविधान में संशोधन करके उच्च न्यायिक नियुक्तियों में सामाजिक विविधता को अनिवार्य बनाने और भारत के सर्वोच्च न्यायालय (SC) की क्षेत्रीय पीठों की स्थापना करने की मांग की गई है, जिसका उद्देश्य देश भर के नागरिकों के लिये सर्वोच्च न्यायालय को अधिक सुलभ बनाना है।
न्यायिक विविधता के लिये नए निजी सदस्य विधेयक में क्या प्रस्ताव हैं?
- चालू घाटा: आनुपातिक प्रतिनिधित्व: विधेयक में यह अनिवार्य किया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), धार्मिक अल्पसंख्यकों और महिलाओं को उनकी जनसंख्या के अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिये।
- आँकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2018 और वर्ष 2024 के बीच उच्च न्यायपालिका में नियुक्त होने वाले व्यक्तियों में से केवल लगभग 20% अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से थे।
- इसके अलावा, महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व क्रमशः 15% और 5% से कम है।
- आँकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2018 और वर्ष 2024 के बीच उच्च न्यायपालिका में नियुक्त होने वाले व्यक्तियों में से केवल लगभग 20% अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से थे।
- समयबद्ध नियुक्तियाँ: इसमें मनमानी देरी को रोकने के लिये यह प्रस्ताव है कि केंद्र सरकार कॉलेजियम द्वारा की गई सिफारिशों को अधिकतम 90 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से अधिसूचित करे।
- सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों का प्रस्ताव: विधेयक में यह प्रस्ताव किया गया है कि नियमित अपीलों का निपटारा करने के उद्देश्य से सर्वोच्च न्यायालय की स्थायी क्षेत्रीय अपीलीय पीठें नई दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में स्थापित की जाएँगी।
- राष्ट्रीय संवैधानिक महत्त्व के मामले विशेष रूप से दिल्ली स्थित संविधान पीठ के अधिकार क्षेत्र में रहेंगे।
- वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय की बैठक केवल नई दिल्ली में होती है, जिससे सुदूर दक्षिणी, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों में रहने वाले आम नागरिकों और वादियों के लिये न्याय तक पहुँच गंभीर रूप से प्रतिबंधित हो जाती है।
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ और न्यायिक नियुक्तियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 130: इस अनुच्छेद के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में स्थापित होगा या ऐसे अन्य स्थान या स्थानों पर होगा जिन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति से समय-समय पर नियत करें।
- अनुच्छेद 124: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों से परामर्श करके की जाती है।
- अनुच्छेद 217: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल तथा संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके की जाती है।
- अस्थायी न्यायाधीश (अनुच्छेद 127): यदि उच्चतम न्यायालय (SC) के न्यायाधीशों का कोरम नहीं है, तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) (राष्ट्रपति की सहमति से) किसी उच्च न्यायालय (HC) के न्यायाधीश से उच्चतम न्यायालय में बैठने का अनुरोध कर सकते हैं।
- अनुच्छेद 224A: उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा भेजे गए संदर्भ पर, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, किसी सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उच्च न्यायालय के तदर्थ (Ad hoc) न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने का अनुरोध किया जा सकता है।
- कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश (अनुच्छेद 126): पद रिक्त होने या न्यायाधीश की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय के उपलब्ध सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को नियुक्त किया जाता है।
- सेवानिवृत्त न्यायाधीश (अनुच्छेद 128): राष्ट्रपति की सहमति से मुख्य न्यायाधीश (CJI) उच्चतम न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश से एक निर्दिष्ट अवधि के लिये उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने का अनुरोध कर सकते हैं।
- नियुक्ति प्रक्रिया:
- भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI): निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश अपने उत्तराधिकारी की सिफारिश करते हैं, जो आमतौर पर वरिष्ठता के आधार पर होती है।
- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश: मुख्य न्यायाधीश (CJI) कॉलेजियम के सदस्यों और उम्मीदवार से संबंधित उच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश से परामर्श करके सिफारिश करते हैं। उनकी राय लिखित रूप में दर्ज की जाती है।
- कॉलेजियम की सिफारिश कानून मंत्री को प्रेषित की जाती है, तत्पश्चात प्रधानमंत्री को, जो नियुक्ति के लिये राष्ट्रपति को सलाह देते हैं।
- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश: किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाती है।
- पुइस्ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी समान है, इसमें संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाता है।
न्यायिक नियुक्तियों में विविधता को रोकने वाली चुनौतियाँ क्या हैं?
- पारदर्शिता की कमी: कॉलेजियम, जिसके पास उच्च न्यायपालिका के लिये न्यायाधीशों की सिफारिश करने की शक्ति है, बंद दरवाज़ों के पीछे कार्य करता है।
- चूँकि इन चयनों के लिये कोई सार्वजनिक रूप से परिभाषित मानदंड, बाध्यकारी विविधता मानक या बैठक का विवरण प्रकाशित नहीं किया जाता है, इसलिये यह प्रक्रिया 'अचेतन पूर्वाग्रहों' के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
- "अंकल जज" सिंड्रोम: भाई-भतीजावाद और पारिवारिक प्रभाव निरंतर आलोचना के विषय रहे हैं। उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों का एक महत्त्वपूर्ण प्रतिशत पूर्व न्यायाधीशों या संभ्रांत कानूनी परिवारों से संबंधित है।
- यह पहली पीढ़ी के वकीलों, विशेष रूप से कमज़ोर पृष्ठभूमि से आने वालों के लिये एक अदृश्य और बहिष्करणकारी बाधा उत्पन्न करता है।
- कोई संवैधानिक अधिदेश नहीं: विधायिका या सार्वजनिक रोज़गार के विपरीत, भारतीय संविधान (अनुच्छेद 124 और 217 के तहत) उच्च न्यायपालिका में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) या महिलाओं के लिये आरक्षण अनिवार्य नहीं करता है।
- औपचारिक कोटा न होने के कारण विविधता पूरी तरह से कॉलेजियम के विवेक पर निर्भर करती है, जिससे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व बेहद कम बना हुआ है।
- "लीकी पाइपलाइन" (The Leaky Pipeline): हालाँकि महिलाएँ कानून की पढ़ाई और अवर न्यायपालिका में बड़ी संख्या में प्रवेश करती हैं (प्रायः राज्य-स्तरीय आरक्षण की सहायता से), लेकिन उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के स्तर पर उनकी उपस्थिति कम हो जाती है।
- दिसंबर 2024 तक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में केवल लगभग 14% महिलाएँ थीं। 25 उच्च न्यायालयों में से केवल दो में महिला मुख्य न्यायाधीश हैं।
- कार्यस्थल की वास्तविकताएँ: वाद की चुनौतीपूर्ण प्रकृति, देखभाल संबंधी विषम ज़िम्मेदारियों और संस्थागत समर्थन की कमी (जैसे कि कुछ अधीनस्थ न्यायालयों में बाल देखभाल सुविधाएँ या बुनियादी ढाँचा) के कारण कई महिलाओं को न्यायाधीश बनने के लिये आवश्यक पारंपरिक, निर्बाध कॅरियर मार्ग से वियुक्त होना पड़ता है।
- "ओल्ड बॉयज़ क्लब" मानसिकता: बार से न्यायाधीश बनने तक का सफर काफी हद तक पेशेवर प्रतिष्ठा, वरिष्ठ पदों और विशिष्ट विधिक वर्गों से प्राप्त सिफारिशों पर निर्भर करता है।
- ये वर्ग परंपरागत रूप से पुरुष-प्रधान एवं पितृसत्तात्मक रहे हैं। इन स्थापित नेटवर्कों से बाहर के अधिवक्ताओं को न्यायाधीश पद के विचारार्थ किये जाने हेतु आवश्यक पहचान प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
- भौगोलिक और आर्थिक केंद्रीकरण: सर्वोच्च न्यायालय से संबंधित विधिक क्रियाकलाप व्यापक रूप से नई दिल्ली में केंद्रीकृत हैं।
- राजधानी में स्थानांतरण तथा वकालत करने में अत्यधिक वित्तीय एवं व्यवस्थागत लागत दूरस्थ क्षेत्रों (जैसे– पूर्वोत्तर या दक्षिणी भारत के सुदूर भागों) के अत्यंत प्रतिभाशाली अधिवक्ताओं को सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नति हेतु आवश्यक पहचान अर्जित करने से वंचित कर देती है।
- विविधता मानकों एवं लेखापरीक्षण का अभाव: न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये वर्तमान प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) में अभ्यर्थियों के जनसांख्यिकीय आँकड़ों के प्रकटीकरण की आवश्यकता नहीं है। नियमित लेखापरीक्षण के अभाव में प्रगति की निगरानी करना अथवा समावेशन के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना कठिन बना रहता है।
न्यायिक नियुक्तियों में विविधता को सुदृढ़ करने हेतु क्या उपाय किये जा सकते हैं?
- अनुच्छेद 130 के माध्यम से क्षेत्रीय पीठों का कार्यान्वयन: जैसा कि पूर्व में भारत के विधि आयोग की 229वीं रिपोर्ट (वर्ष 2009) तथा संसदीय स्थायी समितियों (वर्ष 2021–22) द्वारा अनुशंसित किया गया है, क्षेत्रीय पीठों की स्थापना के लिये सर्वोच्च न्यायालय को आवश्यक रूप से संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता नहीं है।
- मुख्य न्यायाधीश अनुच्छेद 130 के वर्तमान प्रावधानों के अंतर्गत इन्हें चरणबद्ध एवं समयबद्ध तरीके से स्थापित कर सकते हैं।
- कार्यस्थल अवसंरचना: अधीनस्थ एवं उच्च न्यायालयों में बुनियादी आधारभूत संरचना (जैसे– क्रेच, सुरक्षित शौचालय तथा सख्त उत्पीड़न-निरोधी समितियाँ) में सुधार करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि महिलाएँ न्यायाधीश बनने हेतु आवश्यक वरिष्ठता प्राप्त करने से पूर्व वाद-विवाद क्षेत्र से बाहर न हों।
- औपचारिक मार्गदर्शन: प्रथम पीढ़ी के दलित, आदिवासी तथा अल्पसंख्यक अधिवक्ताओं के लिये संस्थागत मार्गदर्शन कार्यक्रमों की स्थापना, जिससे वे अपनी वकालत को सुदृढ़ कर सकें, पहचान प्राप्त कर सकें तथा न्यायिक भूमिकाओं के लिये तैयार हो सकें।
- NJAC: विशेषज्ञ राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के संशोधित स्वरूप को पुनः लागू करने की वकालत करते हैं।
- न्यायपालिका, कार्यपालिका, बार काउंसिलों तथा नागरिक समाज/शैक्षणिक जगत के प्रतिनिधियों को सम्मिलित करने से चयन प्रक्रिया लोकतांत्रिक बनती है, जिससे पक्षपात में कमी आती है तथा प्रतिभा की खोज का दायरा व्यापक होता है।
- औपचारिक मानक: वर्तमान प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) (न्यायाधीशों की नियुक्ति की नियम-पुस्तिका) मुख्यतः योग्यता एवं वरिष्ठता पर केंद्रित है, किंतु इसमें विविधता से संबंधित बाध्यकारी प्रावधानों का अभाव है।
- प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) में संशोधन कर जनसांख्यिकीय विविधता (जाति, लिंग, धर्म एवं क्षेत्र) को प्रमुख मानदंड के रूप में सम्मिलित करने से कॉलेजियम को विविध पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों की सक्रिय पहचान एवं चयन के लिये बाध्य किया जा सकता है।
निष्कर्ष
भारत की उच्च न्यायपालिका में विविधता सुनिश्चित करना एक ऐसी विधिक व्यवस्था के निर्माण के लिये आवश्यक है जो वास्तव में अपने सभी नागरिकों के वास्तविक अनुभवों और वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करती हो। पारदर्शी चयन के मानदंड और क्षेत्रीय पीठों जैसे संरचनात्मक सुधारों को लागू करने से न्यायालयों में ऐतिहासिक बाधाओं और अभिजात वर्ग के उन्मूलन में सहायता मिलेगी। अंततः एक प्रतिनिधित्वपूर्ण न्यायपीठ विधि के शासन को सुदृढ़ करती है, संवैधानिक न्यायशास्त्र को समृद्ध करती है और न्याय प्रणाली में लोक विश्वास को गहरा करती है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. "न्यायपालिका में विविधता पर्याप्त न्याय के लिये आवश्यक है।" भारत की उच्च न्यायिक नियुक्तियों के संदर्भ में इसका परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. संविधान का अनुच्छेद 130 क्या प्रावधान करता है?
यह दिल्ली को उच्चतम न्यायालय के मुख्यालय के रूप में घोषित करता है, हालाँकि मुख्य न्यायाधीश को, राष्ट्रपति के अनुमोदन से, कहीं अन्य स्थान पर भी न्यायालय की बैठकों का आयोजन करने की अनुमति देता है।
2. प्रस्तावित निजी सदस्य विधेयक का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उच्च न्यायपालिका की नियुक्तियों में सामाजिक विविधता को अनिवार्य करना और न्याय तक बेहतर पहुँच के लिये उच्चतम न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों की स्थापना करना।
3. न्यायपालिका में विविधता को महत्त्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
यह प्रतिनिधित्व में सुधार करती है, संवैधानिक व्याख्या को समृद्ध करती है और न्याय व्यवस्था में लोक विश्वास को सुदृढ़ करती है।
4. कॉलेजियम प्रणाली की मुख्य आलोचना क्या है?
पारदर्शिता की कमी, विविधता संबंधी मानकों का अभाव और भाई-भतीजावाद ("अंकल जज" सिंड्रोम) के प्रति संवेदनशीलता।
5. क्षेत्रीय पीठें न्यायिक रूप से लंबित मामलों को कैसे कम कर सकती हैं?
अपीलीय कार्यभार का विकेंद्रीकरण करके, सुलभता में सुधार करके और मामलों के तेज़ी से निपटान को सक्षम बनाकर।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा
प्रश्न. भारतीय न्यायपालिका के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)
- भारत के राष्ट्रपति की पूर्वानुमति से भारत के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त किसी न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के पद पर बैठने और कार्य करने हेतु बुलाया जा सकता है।
- भारत में किसी भी उच्च न्यायालय को अपने निर्णय के पुनर्विलोकन की शक्ति प्राप्त है, जैसा कि उच्चतम न्यायालय के पास है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: A
मेंस
प्रश्न. भारत में उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014' पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (2017)
