माइक्रोप्लास्टिक संकट को कम करना | 30 Mar 2026

प्रिलिम्स के लिये: माइक्रोप्लास्टिक, पॉलिमर, नैनोप्लास्टिक, स्थायी कार्बनिक प्रदूषक (POP), डीडीटी, भारी धातुएँ, प्लवक, रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR), अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO), विश्व आर्थिक मंच, ग्राम पंचायत, राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक (NAAQS), भारतीय मानक ब्यूरो (BIS)                      

मेन्स के लिये: माइक्रोप्लास्टिक से संबंधित प्रमुख तथ्य और उनसे जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ, माइक्रोप्लास्टिक से निपटने की पहल और आवश्यक कदम।

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

एक हालिया अध्ययन ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि चेन्नई के समुद्र तट अवसादों में माइक्रोप्लास्टिक की प्रचुरता वैश्विक औसत की तुलना में कम है, हालाँकि उच्च मात्रा में नायलॉन फाइबर गंभीर ईकोलॉजिकल रिस्क उत्पन्न करते हैं।

  • शोधकर्त्ताओं ने बल दिया कि पारिस्थितिक क्षति का निर्धारण साधारण संख्यात्मक प्रचुरता की तुलना में पॉलिमर के प्रकार, आकृति और उम्र बढ़ने की विशेषताएँ अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

सारांश

  • माइक्रोप्लास्टिक बायोमैग्नीफिकेशन और प्लास्टिस्फीयर में AMR हॉटस्पॉट के निर्माण के माध्यम से एक गंभीर जोखिम उत्पन्न करते हैं।
  • हालाँकि भारत ने QR-आधारित ट्रैकिंग और EPR 2.0 शुरू किया है, यह सफलता सिंथेटिक वस्त्रों और टायर के घिसाव जैसे अपस्ट्रीम स्रोतों को नियंत्रित करने पर निर्भर करती है।
  • समग्र प्रबंधन के लिये राष्ट्रीय वायु और जल गुणवत्ता सूचकांकों में माइक्रोप्लास्टिक मानकों को एकीकृत करने की आवश्यकता है।

माइक्रोप्लास्टिक क्या हैं?

  • परिचय: माइक्रोप्लास्टिक छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, जिनका आकार आमतौर पर 5 मिलीमीटर (5 मिमी.) से कम होता है - लगभग एक पेंसिल इरेज़र के आकार या उससे भी छोटे।
    • कुछ परिभाषाएँ निचली सीमा को 1 नैनोमीटर तक बढ़ा देती हैं, जो इससे भी छोटे नैनोप्लास्टिक (आमतौर पर 1 माइक्रोमीटर से कम) को अलग करती हैं जो अपने कोलाइडल गुणों के कारण अलग व्यवहार करते हैं।
  • माइक्रोप्लास्टिक के प्रकार: माइक्रोप्लास्टिक को उनकी उत्पत्ति के आधार पर दो मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:
    • प्राथमिक माइक्रोप्लास्टिक: ये विशिष्ट उपयोगों के लिये छोटे आकार में निर्मित किये जाते हैं। उदाहरण के लिये:
      • माइक्रोबीड्स: सौंदर्य प्रसाधनों (फेस स्क्रब, टूथपेस्ट) में एक्सफोलिएंट के रूप में उपयोग किये जाते हैं।
      • नर्डल्स: बड़े प्लास्टिक सामानों के निर्माण के लिये कच्चे माल के रूप में उपयोग किये जाने वाले प्लास्टिक पेलेट।
    • द्वितीयक माइक्रोप्लास्टिक: ये पर्यावरणीय प्रक्रियाओं, जैसे– फोटोडिग्रेडेशन (सूर्य के प्रकाश से), यांत्रिक घर्षण या सूक्ष्मजीवों द्वारा जैविक क्षरण के माध्यम से बड़ी प्लास्टिक वस्तुओं के टूटने से उत्पन्न होते हैं।
      • उदाहरण के लिये टूटे हुए प्लास्टिक बैग, बोतलें, पैकेजिंग, मत्स्यग्रहण में प्रयोग होने वाले गियर, सिंथेटिक वस्त्र, कार के टायर और सडकों पर की जाने वाली मार्किंग।

Microplastics

माइक्रोप्लास्टिक्स की समस्या से निपटने की पहल

वैश्विक

  • संयुक्त राष्ट्र वैश्विक प्लास्टिक संधि: अभी यह वार्त्ता के चरण में है और इसका प्राथमिक लक्ष्य एक ऐसा कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय साधन तैयार करना है जो प्लास्टिक के संपूर्ण जीवन चक्र की समस्या का समाधान कर सके।
  • समुद्री अपशिष्ट पर रणनीति और कार्ययोजना, 2026 (ड्राफ्ट): अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) ने समुद्री शिपिंग के दौरान भारी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक रिसाव को रोकने के लिये प्लास्टिक पेलेट्स (नर्डल्स - Nurdles) के परिवहन हेतु एक नया अनिवार्य कोड तैयार करने की सिफारिश की है।
  • यूरोपीय यूनियन माइक्रोप्लास्टिक प्रतिबंध: यूरोपीय यूनियन ने सौंदर्य प्रसाधन, डिटर्जेंट और कृत्रिम घास जैसे उत्पादों में जानबूझकर जोड़े गए माइक्रोप्लास्टिक्स पर चरणबद्ध प्रतिबंध लागू किया है।
  • ग्लोबल प्लास्टिक एक्शन पार्टनरशिप (GPAP): विश्व आर्थिक मंच के नेतृत्व में GPAP का उद्देश्य एक सर्कुलर प्लास्टिक अर्थव्यवस्था बनाना है, जहाँ प्लास्टिक का पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण और अधिक टिकाऊ तरीके से प्रबंधन किया जाता है।

भारत

  • प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2024: पहली बार भारतीय कानून में माइक्रोप्लास्टिक्स को औपचारिक रूप से किसी भी ठोस प्लास्टिक कण (1 से 1,000 माइक्रॉन) के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2025: अब सभी प्लास्टिक पैकेजिंग पर QR कोड या बारकोड होना अनिवार्य है, ताकि एक केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से अपशिष्ट की रियल-टाइम ट्रैकिंग की जा सके।
  • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) 2.0: EPR 2.0 के तहत अब उत्पादकों हेतु पुनर्चक्रित सामग्री (रीसाइकल्ड कंटेंट) के अनिवार्य लक्ष्य निर्धारित किये गए हैं। उदाहरण के लिये श्रेणी I (कठोर प्लास्टिक) में वित्त वर्ष 2026–27 में 40% पुनर्चक्रित सामग्री शामिल करना अनिवार्य होगा।
    • जो कंपनियाँ इन लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रहती हैं, उन्हें ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ के आधार पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति का भुगतान करना होगा।
  • राष्ट्रीय प्लास्टिक प्रदूषण न्यूनीकरण अभियान (NPPRC): वर्ष 2025 के अंत में शुरू किया गया यह अभियान विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों (ग्राम पंचायतों) को लक्षित करता है, ताकि कृषि में उपयोग होने वाला प्लास्टिक मिट्टी में टूटकर माइक्रोप्लास्टिक्स में न बदल सके।

माइक्रोप्लास्टिक्स से जुड़ी मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?

  • पारिस्थितिक और जैविक चुनौतियाँ: समुद्री और स्थलीय जीव अक्सर माइक्रोप्लास्टिक्स को गलती से भोजन समझ लेते हैं। इससे उन्हें शारीरिक चोट (पाचन मार्ग में अवरोध) और छद्म-तृप्ति यानी पेट भरा होने का झूठा एहसास होता है।
    • जैव-आवर्द्धन: यह वह प्रक्रिया है जिसमें खाद्य शृंखला के प्रत्येक उच्च स्तर पर विषाक्त पदार्थों की सांद्रता बढ़ती जाती है। माइक्रोप्लास्टिक्स समुद्री जल से प्रदूषकों को सोखकर इस समस्या को और गंभीर बना देते हैं; जैसे-जैसे शीर्ष शिकारी दूषित शिकार को खाते हैं, वे अपने शरीर में प्लास्टिक और रसायनों की अत्यधिक मात्रा जमा कर लेते हैं, जो अंततः मनुष्यों और पारिस्थितिक तंत्र के लिये गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करते हैं।
  • मानव स्वास्थ्य जोखिम: माइक्रोप्लास्टिक्स में अक्सर BPA (बिस्फेनॉल A) और फ्थेलेट्स जैसे योजक होते हैं, जो “हाॅर्मोन की नकल करने वाले” पदार्थ माने जाते हैं। ये प्रजनन स्वास्थ्य, चयापचय (मेटाबॉलिज़्म) और भ्रूण के विकास में बाधा डाल सकते हैं।
    • नैनोप्लास्टिक्स रक्त-मस्तिष्क बाधा (ब्लड-ब्रेन बैरियर) और प्लेसेंटल बाधा को पार करने में सक्षम होते हैं, जिससे कोशिकाओं में दीर्घकालिक सूजन (क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन) और ऑक्सीडेटिव तनाव उत्पन्न हो सकता है।
  • रासायनिक और विषाक्त चुनौतियाँ: माइक्रोप्लास्टिक्स रासायनिक रूप से ‘चिपचिपे’ (हाइड्रोफोबिक) होते हैं। वे आसपास के पानी से DDT जैसे स्थायी कार्बनिक प्रदूषकों (POPs) तथा भारी धातुओं को सोख लेते हैं एवं उन्हें सीधे जीवों के शरीर में पहुँचा देते हैं।
  • सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलता: यह अनुमान लगाया गया है कि प्लास्टिक प्रदूषण से वार्षिक 75 बिलियन अमेरिकी डॉलर का पर्यावरणीय नुकसान होता है। वाणिज्यिक मत्स्य पालन और नमक के मैदानों में माइक्रोप्लास्टिक संदूषण के कारण व्यापार प्रतिबंध और उपभोक्ता विश्वास में कमी आ सकती है, जो सीधे तौर पर नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) को प्रभावित करता है।
    • बड़ी प्लास्टिक बोतलों के विपरीत, माइक्रोप्लास्टिक्स को समुद्र से वैक्यूम करके हटाना संभव नहीं है, क्योंकि ऐसा करने पर प्लवक (प्लैंकटन) भी नष्ट हो जाएगा, जो पूरी खाद्य शृंखला का आधार है।
  • सुपरबग्स के लिये 'ट्रोजन हॉर्स': ‘प्लास्टिस्फीयर’ (प्लास्टिक पर जमी जैविक परत या बायोफिल्म) एक स्थिर और भीड़भाड़ वाला मंच प्रदान करता है, जहाँ बैक्टीरिया खुले पानी की तुलना में बहुत अधिक तेज़ी से एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन (ARGs) का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इसीलिये अपशिष्ट जल  मौजूद माइक्रोप्लास्टिक्स रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) के लिये एक 'परफेक्ट स्टॉर्म' (भयानक स्थिति) पैदा करते हैं।

माइक्रोप्लास्टिक्स की समस्या को नियंत्रित करने हेतु कौन-से उपाय आवश्यक हैं?

  • उत्पाद और निर्माण प्रतिबंध: फेस स्क्रब, टूथपेस्ट और शावर जेल में प्लास्टिक माइक्रोस्फीयर के उपयोग पर प्रतिबंध लगाना और इन्हें खूबानी के बीज या समुद्री नमक जैसे नेचुरल एक्सफोलिएंट से बदलना।
    • प्लास्टिक निर्माण कारखानों में सख्त ‘ज़ीरो पेलेट लॉस’ प्रोटोकॉल (जैसे– ऑपरेशन क्लीन स्वीप) लागू करना अनिवार्य करना, ताकि कच्चे प्री-प्रोडक्शन पेलेट्स नालियों में बहकर पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाएँ। 
  • उपभोक्ता तकनीक आदेश: टायर निर्माताओं के लिये ‘Euro 7’ जैसी मानक व्यवस्था लागू करना, ताकि सिंथेटिक रबर के पहनने-फटने की दर को कम किया जा सके। उन कपड़ा ब्रांडों को कर में छूट प्रदान करें, जो अपने उत्पादों में कम-से-कम 80% प्राकृतिक रेशों (कॉटन, ऊन, भांग/हेम्प) का उपयोग करते हैं, ताकि गैर-बायोडिग्रेडेबल सिंथेटिक माइक्रोफाइबर के प्रसार को कम किया जा सके।
  • अवसंरचना और अपशिष्ट प्रबंधन: शहरी प्लांटों में तृतीयक उपचार (जैसे- मेंब्रेन नबायोरिएक्टर या सैंड फिल्ट्रेशन) के उपयोग को अनिवार्य करना, जो प्राथमिक उपचार की तुलना में 99% तक माइक्रोप्लास्टिक्स को हटाने में सक्षम हैं।
    • सुनिश्चित करना कि ‘बायोडिग्रेडेबल’ प्लास्टिक्स केवल ‘अदृश्य’ माइक्रोप्लास्टिक्स सूक्ष्म कणों में न खंडित हो जाएँ, इन्हें प्रमाणित किया जाना चाहिये कि वे प्राकृतिक मिट्टी और जल परिस्थितियों में पूर्ण रूप से खनिजीकृत हो जाएँ।
  • वायु और जल गुणवत्ता सूचकांक में शामिल करना: ‘माइक्रोप्लास्टिक सांद्रता’ को राष्ट्रीय परिवेशीय वायु गुणवत्ता मानक (NAAQS) और पेयजल के लिये भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) में एक मानक पैरामीटर के रूप में जोड़ा जाए।
  • ‘ग्रीन केमिस्ट्री’ को प्रोत्साहित करना: उन स्टार्टअप्स को सरकारी अनुदान प्रदान करें जो जैव-आधारित पॉलिमर (जो समुद्री शैवाल या स्टार्च से बने हैं) विकसित कर रहे हैं, जो प्लास्टिक के गुणों की नकल करते हैं लेकिन वास्तव में बायोडिग्रेडेबल हैं।
    • फास्ट-फैशन ब्रांडों को सिंथेटिक वस्त्रों के जीवन चक्र के अंत में पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव के लिये वित्तीय रूप से उत्तरदायी बनाया जाना चाहिये, जैसे कि वर्तमान में प्लास्टिक पैकेजिंग के लिये नियम लागू हैं।

निष्कर्ष


वैश्विक माइक्रोप्लास्टिक संकट केवल समुद्री अपशिष्ट का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक जटिल जैव-रासायनिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति में बदल गया है। यद्यपि तलछट में इसकी संख्यात्मक मात्रा भिन्न होती है, नायलॉन जैसे विशिष्ट पॉलिमरों के स्थायित्व और ‘प्लास्टिस्फीयर’ के उद्भव के कारण मात्रा-आधारित निगरानी से जोखिम-आधारित नियामक ढाँचे और स्रोत-स्तरीय तकनीकी हस्तक्षेप की ओर बदलाव आवश्यक हो गया है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भोजन शृंखला में माइक्रोप्लास्टिक्स के पारिस्थितिक और स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों पर चर्चा कीजिये। इस ‘मौन’ पर्यावरणीय संकट को कम करने के लिये वैश्विक नियामक ढाँचे को लागू करने में आने वाली चुनौतियों का मूल्यांकन कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भारत में कानून के तहत माइक्रोप्लास्टिक्स की आधिकारिक परिभाषा क्या है?
प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2024 के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक्स को किसी भी ठोस प्लास्टिक कण के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसकी आकार सीमा 1 से 1,000 माइक्रोन के बीच हो।

2. ‘प्लास्टिस्फीयर’ क्या है और इसका महत्त्व क्यों है?
प्लास्टिस्फीयर वह बायोफिल्म है जो माइक्रोप्लास्टिक की सतह पर बनती है। इसका महत्त्व इसलिये है क्योंकि यह बैक्टीरिया के लिये एंटीबायोटिक प्रतिरोध जीन (ARG) के आदान-प्रदान का मंच प्रदान करता है, जिससे माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण और AMR (प्रतिरोधी रोगजनकों) के बीच संबंध स्थापित होता है।

3. नैनोप्लास्टिक्स मानव स्वास्थ्य के लिये माइक्रोप्लास्टिक्स की तुलना में अधिक जोखिमपूर्ण क्यों माने जाते हैं?
अपने अत्यंत सूक्ष्म आकार के कारण नैनोप्लास्टिक्स जैविक बाधाओं (रक्त-मस्तिष्क और गर्भाशय-रक्त बाधा) को पार कर सकते हैं, जिससे कोशिका स्तर पर ऑक्सीडेटिव तनाव और दीर्घकालिक सूजन हो सकती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स 

प्रश्न. पर्यावरण में निर्मुक्त हो जाने वाली 'सूक्ष्ममणिकाओं (माइक्रोबीड्स)' के विषय में अत्यधिक चिंता क्यों है?  (2019)

(a) ये समुद्री पारितंत्रों के लिए हानिकारक मानी जाती है।

(b) ये बच्चों में त्वचा कैंसर होने का कारण मानी जाती हैं।

(c) ये इतनी छोटी होती हैं कि सिंचित क्षेत्रों में फसल पादपों द्वारा अवशोषित हो जाती हैं।

(d) अक्सर इनका इस्तेमाल खाद्य-पदार्थों में मिलावट के लिये किया जाता है।

उत्तर: (a)


मेन्स 

प्रश्न: निरंतर उत्पन्न किये जा रहे फेंके गए ठोस कचरे की विशाल मात्राओं का निस्तारण करने में क्या-क्या बाधाएँ हैं? हम अपने रहने योग्य परिवेश में जमा होते जा रहे ज़हरीले अपशिष्टों को सुरक्षित रूप से किस प्रकार हटा सकते हैं? (2018)