माहवारी के दौरान स्वास्थ्य एक मौलिक अधिकार | 04 Feb 2026

प्रिलिम्स के लिये: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, माहवारी, अनुच्छेद 21, जन औषधि केंद्र

मेन्स के लिये: अनुच्छेद 21 का बढ़ता दायरा: गरिमा, स्वास्थ्य और शारीरिक स्वायत्तता, अनुच्छेद 14 के तहत वास्तविक समानता और लैंगिक रूप से उत्तरदायी शासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवाधिकार संबंधी मुद्दे के रूप में माहवारी के दौरान स्वास्थ्य

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

चर्चा में क्यों?

भारत के सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार एवं अन्य (2026) मामले में, माहवारी के दौरान स्वास्थ्य एवं स्वच्छता (MHH) को अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा के अधिकार) के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में औपचारिक रूप से मान्यता दी।

  • न्यायालय ने एक अध्यादेश जारी करते हुए केंद्र तथा राज्यों को निर्देश दिया कि वे सभी विद्यालयों में निशुल्क सैनिटरी नैपकिन और कार्यशील शौचालयों की व्यवस्था सुनिश्चित करें।

सारांश

  • सर्वोच्च न्यायालय ने माहवारी के दौरान स्वास्थ्य और स्वच्छता (MHH) को अनुच्छेद 21 और 14 के तहत जीवन, गरिमा, दैहिक स्वतंत्रता, समता और शिक्षा के अधिकार का अभिन्न हिस्सा घोषित कर दिया है, जिससे यह एक कल्याणकारी मुद्दे से आगे बढ़कर बाध्यकारी संवैधानिक अधिकार बन गया है।
  • इस निर्णय के तहत निशुल्क सैनिटरी उत्पाद, महिला-पुरुष के लिये अलग शौचालय, सुरक्षित अपशिष्ट निपटान, छात्र-छात्राओं व शिक्षकों की संवेदनशीलता तथा सख्त जवाबदेही को अनिवार्य किया गया, साथ ही अधोसंरचना, वित्तपोषण और सामाजिक दृष्टिकोण से जुड़ी गंभीर क्रियान्वयन चुनौतियों को भी उजागर किया गया है।

माहवारी के दौरान स्वास्थ्य पर सर्वोच्च न्यायालय ने क्या निर्णय दिया?

  • अनुच्छेद 21 (गरिमा और दैहिक स्वतंत्रता): न्यायालय ने निर्णय दिया कि माहवारी के दौरान स्वास्थ्य एवं स्वच्छता (MHH) संबंधी सुविधाओं तक पहुँच की कमी से किशोरियाँ "पूर्वाग्रह, रूढ़िबद्धता और अपमान" का सामना करती है, जो उनके गरिमा के साथ जीने के अधिकार का प्रत्यक्ष रूप से उल्लंघन करती है।
    • जैविक वास्तविकताओं के कारण छात्रों की अनिवार्य अनुपस्थिति या स्कूल छोड़ना, शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन माना जाता है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि माहवारी के दौरान स्वास्थ्य एवं स्वच्छता (MHH) केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गरिमा के साथ जीवन जीने के लिये मौलिक हैं। यह अधिकार माहवारी के दौरान किशोरियों की दैहिक स्वतंत्रता, निजता और प्रजनन स्वास्थ्य को शामिल करता है।
  • वास्तविक समता (अनुच्छेद 14): यह निर्णय केवल “औपचारिक समता” (सभी के साथ समान व्यवहार) तक सीमित नहीं है। न्यायालय का तर्क है कि महिलाओं की विशिष्ट जैविक आवश्यकताओं की अनदेखी करने से एक संरचनात्मक बहिष्कार उत्पन्न होता है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वास्तविक समानता के लिये राज्य को इन कमियों को दूर करने की आवश्यकता है, ताकि किशोरियों को अपने पुरुष साथियों के साथ समान आधार पर रखा जा सके।
  • शिक्षा का अधिकार (RTE): RTE अधिनियम, 2009 के तहत न्यायालय ने फैसला सुनाया कि "मुफ्त" का अर्थ केवल ट्यूशन फीस माफ करना नहीं है। इसमें किसी भी वित्तीय बाधा (सैनिटरी उत्पादों की लागत सहित) को दूर करना शामिल है, जो एक बच्चे को अपनी शिक्षा पूरी करने से रोकती है।
    • RTE अधिनियम, 2009 के तहत अलग शौचालयों की आवश्यकता अब केवल एक "अवसंरचनात्मक" निर्देश नहीं रह गई है, बल्कि इसे एक "वास्तविक" आवश्यकता माना गया है। इन सुविधाओं की अनुपलब्धता अब एक "स्पष्ट संवैधानिक असफलता" के रूप में देखी जाती है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश

  • जवाबदेही और प्रतिक्रिया: ज़िला शिक्षा अधिकारियों (DEO) को समय-समय पर निरीक्षण करना होगा और महत्त्वपूर्ण रूप से, वास्तविक स्थिति का आकलन करने के लिये छात्रों से ही सर्वेक्षणों के माध्यम से "गुमनाम प्रतिक्रिया" प्राप्त करनी होगी।
  • उत्पादों की व्यवस्था: इन निर्देशों के अंतर्गत प्रत्येक स्कूल (सरकारी और निजी) को वेंडिंग मशीनों के माध्यम से मुफ्त ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन प्रदान करने होंगे।
  • माहवारी के दौरान स्वच्छता प्रबंधन (MHM) कॉर्नर: स्कूलों को आवश्यक वस्तुओं, जैसे– अतिरिक्त अंतःवस्त्र, यूनिफॉर्म और डिस्पोज़ेबल बैग से लैस डेडिकेटेड कॉर्नर स्थापित करने होंगे, ताकि "माहवारी संबंधी आकस्मिक स्थितियों" को सँभाला जा सके।
  • स्वच्छता अवसंरचना: सभी समय क्रियाशील, लिंग-आधारित पृथक् शौचालय, जिनमें जल आपूर्ति और साबुन की उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिये।
  • अपशिष्ट प्रबंधन: ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) नियम, 2026 के अनुसार सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल निपटान तंत्र एकीकृत किये जाने चाहिये।
  • पुरुष संवेदीकरण: न्यायालय ने आदेश दिया कि NCERT और SCERT अपने पाठ्यक्रम में 'जेंडर-रिस्पॉन्सिव' (लैंगिक-संवेदनशील) शिक्षण सामग्री शामिल करें। न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि उत्पीड़न को रोकने के लिये लड़कों को माहवारी की जैविक वास्तविकता के संबंध में शिक्षित किया जाना चाहिये।
    • सभी शिक्षकों को, चाहे उनका लैंगिक आधार कोई भी हो, माहवारी से गुज़र रही छात्राओं का समर्थन करने के लिये प्रशिक्षित किया जाना चाहिये।

SC_Rule_Menstrual_Health

क्या आप जानते हैं? 

  • माहवारी एक सामान्य और प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया है, जिसमें गर्भाशय की परत टूटकर योनि के माध्यम से रक्त और ऊतक के रूप में बाहर निकलती है। यह प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं और लड़कियों में तब होता है जब गर्भधारण नहीं होता।
  • माहवारी हॉर्मोनल बदलावों द्वारा नियंत्रित होता है और आमतौर पर किशोरावस्था (मेनार्के) से लेकर रजोनिवृत्ति तक हर महीने एक बार होता है। अधिकतर महिलाओं में माहवारी हर महीने कुछ दिनों तक होता है और जीवन भर में कुल मिलाकर लगभग सात वर्षों तक रहता है।
    • माहवारी प्रजनन स्वास्थ्य का एक प्रमुख संकेतक है और यह कोई बीमारी या अशुद्धि नहीं है, बल्कि महिला शरीर की एक स्वस्थ जैविक क्रिया है।
  • माहवारी के दौरान अस्वच्छता से प्रजनन और यूरिनरी ट्रैक्ट में संक्रमण हो सकता है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ साफ पानी और स्वच्छता की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
  • पॉलीसिस्टिक ओवेरियन डिजीज (PCOD) एक हॉर्मोनल विकार है जो माहवारी को बाधित कर सकता है, जिससे माहवारी अनियमित हो सकती है, देर से हो सकती है या पूरी तरह से बंद होने जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
    • भले ही किसी में PCOD हो, माहवारी एक सामान्य जैविक प्रक्रिया ही रहती है, यह कोई बीमारी या अशुद्धि नहीं है।

मौलिक अधिकार के रूप में माहवारी के दौरान स्वास्थ्य एवं स्वच्छता का क्या महत्त्व है?

  • ‘जैविक नागरिकता’ की स्थापना: इस फैसले ने अधिकारों की एक नई श्रेणी बनाई है, जिसमें राज्य को उस "जैविक कर" के लिये ज़िम्मेदार ठहराया गया है जो महिलाएँ देती हैं।
    • यदि कोई महिला एक प्राकृतिक प्रक्रिया (माहवारी) के कारण नुकसान या प्रतिकूल स्थिति में है, तो राज्य को उस स्थिति को समाप्त करने के लिये हस्तक्षेप करना चाहिये।
    • यह 'नकारात्मक स्वतंत्रता' — जहाँ राज्य आपको स्कूल जाने से नहीं रोकेगा — से 'सकारात्मक स्वतंत्रता' की ओर एक कदम है, जहाँ राज्य को पैड और शौचालय जैसी सुविधाएँ प्रदान करनी चाहिये ताकि आप वास्तव में स्कूल जा सकें।
  • RTE में 'निशुल्क' की परिभाषा का पुनर्निर्धारण: NFHS-5 के आँकड़ों से पता चलता है कि 15-24 वर्ष की केवल 77.3% महिलाएँ ही माहवारी के लिये स्वच्छ तरीकों का उपयोग करती हैं, जबकि लगभग एक-चौथाई महिलाएँ अभी भी बुनियादी माहवारी सहायता से वंचित हैं।
    • यह वंचना सीधे शैक्षिक बहिष्कार में बदलती है, जिससे लगभग 23% लड़कियाँ किशोरावस्था के बाद स्कूल छोड़ने या लगातार अनुपस्थित रहने का अनुभव करती हैं।
    • इस संबंध को मान्यता देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने स्वच्छता उत्पादों, पानी, शौचालय और सुरक्षित निपटान तक पहुँच की कमी को "माहवारी गरीबी" के रूप में पहचाना, जो शारीरिक स्वायत्तता को कमज़ोर करती है और किशोरियों को RTE का समान लाभ उठाने से रोकती है।
    • निशुल्क सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने का आदेश देकर न्यायालय ने “निशुल्क शिक्षा” की परिभाषा को इस तरह से पुनर्निर्धारित किया कि यह केवल नाममात्र की न होकर वास्तविक रूप से सक्षम बनाने वाली हो, जिससे RTE को वास्तविक रूप से लागू किया जा सके। 
  • सामाजिक-कानूनी सुधार: संवेदनशीलता और प्रशिक्षण को अनिवार्य करके न्यायालय कानून को समाज में बदलाव लाने का साधन बना रहा है। न्यायालय यह मानता है कि असंवेदनशील लड़के और पुरुष शिक्षक जो "असहज वातावरण" पैदा करते हैं, वही स्कूल छोड़ने का मुख्य कारण हैं।

माहवारी स्वच्छता में सुधार के लिये सरकारी उपाय

  • माहवारी स्वच्छता संवर्द्धन योजना: यह 10 से 19 वर्ष की आयु की किशोरियों को लक्षित करती है। यह जागरूकता, सैनिटरी नैपकिन तक पहुँच और पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित निपटान पर ज़ोर देती है।
  • स्कूल जाने वाली किशोरियों के लिये माहवारी स्वच्छता नीति: यह कम लागत वाले उत्पादों, लिंग-विशिष्ट शौचालयों (किशोरियों हेतु अलग शौचालय) और निपटान सुविधाओं को सुनिश्चित करती है। साथ ही यह स्कूल के पाठ्यक्रम में माहवारी स्वच्छता शिक्षा को एकीकृत (शामिल) करती है।
  • प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (PMBJP): 16,000 से अधिक जन औषधि केंद्रों पर ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल 'सुविधा' नैपकिन केवल 1 रुपये प्रति पैड की दर से उपलब्ध है।
    • नवंबर 2025 तक सैनिटरी पैड की कुल बिक्री 96 करोड़ के आँकड़े को पार कर गई।
  • आशा (ASHA) नेटवर्क: फ्रंटलाइन कार्यकर्त्ता सब्सिडी वाले पैकेट (6 नैपकिन के लिये 6 रुपये) वितरित करते हैं और सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने हेतु मासिक समुदायिक बैठकें आयोजित करते हैं।
  • महिला एवं बाल विकास पहल: माहवारी स्वास्थ्य जागरूकता 'मिशन शक्ति' (बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ), 'राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम' (RKSK) और 'किशोरियों के लिये योजना' (SAG) का एक प्रमुख हिस्सा है।
  • बुनियादी ढाँचा और शिक्षा:
    • समग्र शिक्षा (शिक्षा मंत्रालय): स्कूलों में सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीन और अपशिष्ट दहन केंद्रों (इंसीनेरेटरों) लगाने के लिये वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
    • स्वच्छ भारत मिशन: ग्रामीण क्षेत्रों में माहवारी प्रबंधन (MHM) के लिये राष्ट्रीय दिशा-निर्देश जारी करता है, जिसमें व्यवहार परिवर्तन और स्वच्छता पर ज़ोर दिया गया है।
    • UGC परामर्श: उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) को यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि सैनिटरी सुविधाएँ प्रमुख और आसानी से पहुँचने योग्य स्थानों पर उपलब्ध हों।

माहवारी के दौरान स्वास्थ्य एवं स्वच्छता दिशा-निर्देशों के कार्यान्वयन में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • अंतिम-मील अवसंरचना की कमी: कई स्थानों पर शौचालय केवल दस्तावेज़ों में मौजूद हैं, लेकिन ग्रामीण और दूरदराज़ के विद्यालयों में उपलब्ध पानी, साबुन, निस्तारण सुविधाएँ तथा वेंडिंग मशीनों की नियमित उपलब्धता और रख-रखाव अभी भी अनिश्चित बना हुआ है।
    • विशिष्ट सफाई कर्मचारियों की अनुपस्थिति और आवर्ती संचालन एवं रख-रखाव के बजट सुविधाओं के शीघ्र क्षरण का कारण बनते हैं।
  • खरीद और आपूर्ति संबंधी बाधाएँ: सीमित समय-सीमा में किफायती और गुणवत्तापूर्ण ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड्स की आपूर्ति को व्यापक रूप से क्रियान्वित करना राज्यों के लिये गंभीर लॉजिस्टिक चुनौती है।
    • पृथक् रूप से चिह्नित निधि के बिना माहवारी स्वच्छता प्रबंधन (MHM) पर होने वाला व्यय राज्य शिक्षा बजट पर बोझ डाल सकता है और मध्याह्न भोजन या शिक्षक भर्ती जैसी योजनाओं को प्रभावित कर सकता है।
  • असुरक्षित अपशिष्ट निस्तारण का जोखिम: अपशिष्ट दहन केंद्रों (इंसीनेरेटरों) के संचालन हेतु तकनीकी क्षमता की कमी और मानकीकृत माहवारी अपशिष्ट प्रोटोकॉल के अभाव से पर्यावरणीय अनुपालन पर खतरा उत्पन्न होता है।
  • फीडबैक की प्रामाणिकता पर चिंता: सत्ता संबंधी असमानताओं और छात्रों के मन में भय के कारण सर्वेक्षणों तथा शिकायत निवारण तंत्रों के माध्यम से ईमानदार रिपोर्टिंग बाधित हो सकती है।
    • सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएँ: WHO के दिशा-निर्देशों और शिक्षा मंत्रालय के 2021 के संवेदनशीलता संबंधी निर्देशों के बावजूद कई विद्यालयों में अभी भी लैंगिक पदानुक्रम को बढ़ावा दिया जाता है; माहवारी को ‘अपवित्र/हीन’ मानकर देखने से किशोरियों में असहजता, कलंक और बहिष्करण की स्थिति बनी रहती है।

माहवारी के दौरान स्वास्थ्य एवं स्वच्छता को सुदृढ़ करने हेतु कौन-से उपाय अपनाए जा सकते हैं?

  • समावेशिता: नीति में ट्रांस-पुरुषों और नॉन-बाइनरी व्यक्तियों को भी शामिल किया जाना चाहिये, जो माहवारी से गुज़रते हैं।
  • सशक्तीकरण: राज्य सरकारों को बायोडिग्रेडेबल नैपकिन के स्थानीय उत्पादन के लिये स्वयं सहायता समूहों (SHG) का उपयोग करना चाहिये।
  • सुनिश्चित जलापूर्ति: विद्यालयों के शौचालयों को जल जीवन मिशन से जोड़कर 24×7 उपलब्ध पानी सुनिश्चित किया जाना चाहिये, जो माहवारी स्वच्छता के लिये अनिवार्य है।
  • गोपनीयता-आधारित डिज़ाइन: शौचालयों में ‘प्राइवेसी स्क्रीन’, अंदर से बंद होने वाली कुंडी, दर्पण और हुक लगाए जाएँ, ताकि लड़कियाँ/छात्राएँ बिना संकोच सैनिटरी नैपकिन बदल सकें और स्वयं को स्वच्छ रख सकें।
  • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) का विकल्प: जहाँ आपूर्ति-शृंखला बाधित है, वहाँ सरकार ‘पैड क्रेडिट’ या छात्रा/किशोरी (या लड़की की माता) के खाते में DBT के माध्यम से राशि देने का विकल्प तलाश सकती है, ताकि स्वच्छ उत्पाद (Hygienic Products) खरीदे जा सकें।
  • निस्तारण-सेवा: स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत स्थानीय ‘सफाई मित्रों’ को माहवारी अपशिष्ट के संग्रह और प्रसंस्करण में शामिल किया जाए, ताकि यह सामान्य लैंडफिल में न पहुँचे।
  • मानकीकृत खरीद: राज्यों को एक केंद्रीकृत खरीद प्रकोष्ठ स्थापित करना चाहिये, ताकि वितरित किये जाने वाले सभी नैपकिन ASTM D-6954 या IS 17518 मानकों (जो पर्यावरण में प्लास्टिक के अपघटन के मूल्यांकन पर केंद्रित हैं) के अनुरूप हों और निम्न-गुणवत्ता, प्लास्टिक-प्रधान विकल्पों के वितरण को रोका जा सके।

निष्कर्ष

सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय एक सरल किंतु अत्यंत प्रभावशाली सत्य को संवैधानिक बल देता है, ‘विराम चिह्न वाक्य को समाप्त करता है, लड़की की शिक्षा को नहीं।’ माहवारी स्वास्थ्य को गरिमा, समानता और शिक्षा के केंद्र में मान्यता देकर यह निर्णय संरचनात्मक सुधार, राज्य की सतत ज़िम्मेदारी तथा वास्तविक लैंगिक न्याय के लिये मार्ग प्रशस्त करता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्नः “माहवारी स्वास्थ्य को मूल अधिकार के रूप में मान्यता दिया जाना, कल्याण‑उन्मुख दृष्टिकोण से अधिकार‑आधारित दृष्टिकोण की ओर परिवर्तन को दर्शाता है।” अनुच्छेद 21 के आलोक में इस कथन की जाँच कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. वर्ष 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने माहवारी स्वास्थ्य पर क्या निर्णय दिया?
इसने माहवारी स्वास्थ्य और स्वच्छता को जीवन, गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन स्वास्थ्य के अधिकार (अनुच्छेद 21) का अभिन्न हिस्सा माना।

2. यह निर्णय माहवारी स्वास्थ्य को शिक्षा के अधिकार से कैसे जोड़ता है?
न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि पीरियड पावर्टी एक वित्तीय बाधा है और सैनिटरी पैड या शौचालय की कमी संवैधानिक विफलता के समान मानी जाती है।

3. विद्यालयों को क्या प्रमुख निर्देश दिये गए?
विद्यालयों को निशुल्क ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड, कार्यात्मक लिंग-विशिष्ट शौचालय, माहवारी के दौरान स्वास्थ्य एवं स्वच्छता कॉर्नर, सुरक्षित अपशिष्ट निपटान और प्रशिक्षित स्टाफ प्रदान करना अनिवार्य है।

4. इस निर्णय में ‘सार्थक समानता’ की अवधारणा क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह मान्यता देता है कि सभी के साथ समान व्यवहार करना जैविक असमानताओं की अनदेखी करता है और राज्य को ऐसी संरचनात्मक असमानताओं को सक्रिय रूप से सुधारना चाहिये।

5. माहवारी के दौरान स्वास्थ्य एवं स्वच्छता दिशा-निर्देशों के मुख्य कार्यान्वयन चुनौतियाँ क्या हैं?
अंतिम स्तर की बुनियादी ढाँचे की कमी, पानी की कमी, गुणवत्तापूर्ण पैड की खरीद, अपशिष्ट निपटान क्षमता और वास्तविक छात्र प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्षों के प्रश्न (PYQ)

मेन्स 

प्रश्न. भारत में महिलाओं के समक्ष समय और स्थान संबंधित निरंतर चुनौतियाँ क्या-क्या हैं? (2019)