कच्छल द्वीप पर मैंग्रोव आवरण में कमी | 12 Aug 2022

प्रिलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय वैमानिकी और अंतरिक्ष प्रशासन (नासा), निकोबार द्वीपसमूह, मैंग्रोव आवरण।

मेन्स के लिये:

मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र का महत्त्व।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में राष्ट्रीय वैमानिकी और अंतरिक्ष प्रशासन (नासा) के एक अध्ययन में भारत के निकोबार द्वीपसमूह के कच्छल द्वीप पर मैंग्रोव आवरण में आने वाली कमी पर प्रकाश डाला गया है।

  • इस अध्ययन से यह पता चलता है कि पिछले दो दशकों में वैश्विक स्तर पर मैंग्रोव किस हद तक नष्ट हो गए हैं।

मैंग्रोव:

  • परिचय:
    • मैंग्रोव उष्णकटिबंधीय पौधे हैं जो दलदल, खारे समुद्री जल और समय-समय पर आने वाले ज्वार से जलमग्न होने के अनुकूलित होते हैं।
  • विशेषताएँ:
    • लवणीय वातावरण: ये अत्यधिक प्रतिकूल वातावरण, जैसे उच्च लवण और निम्न ऑक्सीजन की स्थिति में भी जीवित रह सकते हैं।
    • ऑक्सीजन की निम्न मात्रा: किसी भी पौधे के भूमिगत ऊतक को श्वसन के लिये ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। लेकिन मैंग्रोव वातावरण मिट्टी में ऑक्सीजन की मात्रा सीमित रूप में या शून्य होती है।
      • साँस लेने के उद्देश्य से वे न्यूमेटोफोर नामक विशेष जड़ें विकसित करते हैं।
    • चरम स्थितियों में उत्तरजीविता: जलमग्न रहने के कारण मैंग्रोव के पेड़ गर्म, कीचड़युक्त और लवणीय परिस्थितियों में विकसित होते हैं, जिसमें दूसरे पौधों जीवित नहीं रह पाते हैं।
    • विवियोपोरस: उनके बीज मूल वृक्ष से जुड़े रहते हुए अंकुरित होते हैं। एक बार अंकुरित होने के बाद ये बढ़ने लगते है।
      • परिपक्व अंकुर जल या कीचड़-युक्त स्थान में गिर जाता है और किसी अलग स्थान पर पहुँच कर ठोस ज़मीन में जड़ें जमा लेता है।
  • महत्त्व:
    • मैंग्रोव तटीय पारिस्थितिकी तंत्र में विभिन्न कार्बनिक पदार्थों, रासायनिक तत्त्वों और महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्वों को बाँधते हैं।
    • वे समुद्री जीवों के लिये एक बुनियादी आहार शृंखला संसाधन प्रदान करते हैं।
    • वे समुद्री जीवों की एक विस्तृत विविधता के लिये भौतिक आवास और नर्सरी मैदान प्रदान करते हैं, जिनमें से कई महत्त्वपूर्ण मनोरंजक या वाणिज्यिक मूल्य रखते हैं।
    • मैंग्रोव उथले तटरेखा क्षेत्रों में हवा और लहर की क्रिया को कम करके तूफान बफर के रूप में भी कार्य करते हैं।

आच्छादित क्षेत्र

  • वैश्विक मैंग्रोव कवर
    • विश्व में कुल 1,50,000 वर्ग किलोमीटर मैंग्रोव आच्छादित क्षेत्र है।
    • विश्व भर में मैंग्रोव की सबसे बड़ी संख्या एशिया में है।
      • दक्षिण एशिया में दुनिया के मैंग्रोव कवर का 6.8% हिस्सा शामिल है।
  • भारतीय मैंग्रोव कवर:
    • दक्षिण एशिया में कुल मैंग्रोव कवर में भारत का योगदान 45.8% है।
    • भारतीय राज्य वन स्थिति रिपोर्ट, 2021 के अनुसार, भारत में मैंग्रोव कवर 4992 वर्ग किलोमीटर है जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 0.15% है।
    • सबसे बड़ा मैंग्रोव वन: पश्चिम बंगाल में सुंदरवन दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन क्षेत्र है। यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध है।
    • भितरकनिका मैंग्रोव: भारत में दूसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव वन ओडिशा में भितरकनिका है, जो ब्राह्मणी और बैतरनी नदी के दो नदी डेल्टाओं द्वारा बनाया गया है।
      • यह भारत में सबसे महत्त्वपूर्ण रामसर आर्द्रभूमि में से एक है।
    • गोदावरी-कृष्णा मैंग्रोव, आंध्र प्रदेश: गोदावरी-कृष्णा मैंग्रोव ओडिशा से तमिलनाडु तक फैले हुये हैं।

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प्रमुख बिंदु

  • अध्ययन पूर्वी हिंद महासागर में निकोबार द्वीप समूह के कच्छल द्वीप पर वर्ष 1992 और 2019 के बीच विलुप्त ज्वारीय आर्द्रभूमि की वास्तविक सीमा को दर्शाता है।
  • अध्ययन में पाया गया कि तीन प्रकार की ज्वारीय आर्द्रभूमियों में से मैंग्रोव की क्षति का अनुपात सबसे अधिक था।
    • अन्य दो ज्वारीय आर्द्रभूमियों में ज्वारीय मडफ्लैट्स और दलदल थे।
  • मैंग्रोव वन में वर्ष 1999 और 2019 के बीच 3,700 वर्ग किलोमीटर की अनुमानित शुद्ध कमी आई है।
    • क्षति के बावजूद 2,100 वर्ग किलोमीटर का लाभ हुआ है जो इन वनों की गतिशीलता को दर्शाता है।
  • क्षति के कारण:
    • प्राकृतिक कारण:
      • वर्ष 2004 की सुनामी के दौरान 9.2 की तीव्रता वाला भूकंप आया था, जिसके दौरान द्वीपों की भूमि 3 मीटर (10 फीट) तक नीचे धंस गई थी। 
        • इसने कई मैंग्रोव पारिस्थितिक तंत्रों को जलमग्न कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में 90% से अधिक मैंग्रोव का नुकसान हुआ।
    • अन्य कारक:
  • मानव प्रेरित:
    • लगभग 27% नुकसान और लाभ सीधे मानव गतिविधि के कारण हुए हैं।
      • मानव आर्द्रभूमि को विकास, जल परिवर्तन परियोजनाओं के माध्यम से या भूमि को कृषि या जलीय कृषि में परिवर्तित कर नष्ट कर देते हैं।
  • वर्तमान स्थिति:
    • मैंग्रोव कवर नष्ट होने के बाद दोबारा उत्पन्न होना बहुत कठिन है हालाँकि अन्य जगहों पर उनकी संख्या में वृद्धि हुई है क्योंकि वे स्वतः उत्पन्न होकर आगे विकसित होतें हैं।

आगे की राह

  • संरक्षण को सक्रिय सामुदायिक भागीदारी, पर्यावरण सुरक्षा, और प्राकृतिक आपदाओं से किसी भी जोखिम को कम करने के साथ व्यापक परिप्रेक्ष्य से जोड़ने की आवश्यकता है।
    • ऐसे उपायों को अग्रिम अनुकूलन उपायों के तौर पर अधिक समग्र रूप से अपनाने की आवश्यकता है जो सफल और प्रभावी प्रबंधन कर चुके हैं।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पिछले वर्ष के प्रश्न:

प्रारंभिक परीक्षा:

प्रश्न. भारत के निम्नलिखित क्षेत्रों में से किस एक में मैंग्रोव वन, सदापर्णी वन और पर्णपाती वनों का संयोजन है?

(a) उत्तर तटीय आंध्र प्रदेश
(b) दक्षिण-पश्चिम बंगाल
(c) दक्षिणी सौराष्ट्र
(d) अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह

उत्तर: (d)

व्याख्या:

उत्तर तटीय आंध्र प्रदेश में मैंग्रोव और शुष्क सदाबहार वन हैं।

  • दक्षिण पश्चिम बंगाल में मैंग्रोव और सदाबहार वन हैं।
  • दक्षिणी सौराष्ट्र में मैंग्रोव, शुष्क पर्णपाती, उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन आदि हैं।
  • अंडमान और निकोबार के उष्णकटिबंधीय द्वीपों में मैंग्रोव वन, सदाबहार वन और पर्णपाती वन का संयोजन है।

अतः विकल्प (d) सही उत्तर है।


प्रश्न. मैंग्रोवों के रिक्तीकरण के कारणों पर चर्चा कीजिये और तटीय पारिस्थितिकी का अनुरक्षण करने में इनके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये। (मुख्य परीक्षा-2019)

स्रोत: डाउन टू अर्थ