भारत-इज़रायल संबंध | 27 Feb 2026

प्रिलिम्स के लिये: यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस, डी-हाइफनेशन पॉलिसी, I2U2 (इंडिया, इज़रायल, USA, UAE), बराक-8 मिसाइल सिस्टम, इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर

मेन्स के लिये: भारत-इज़रायल संबंधों का विकास और डी-हाइफनेशन पॉलिसी, रीजनल जियोपॉलिटिक्स, वेस्ट एशिया में संबंधों का संतुलन: इज़रायल, ईरान और खाड़ी देश

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों? 

भारतीय प्रधानमंत्री ने इज़रायल की ऐतिहासिक यात्रा की। इस यात्रा के दौरान द्विपक्षीय संबंधों को "शांति, नवाचार और समृद्धि के लिये विशेष सामरिक भागीदारी" तक बढ़ाया।

  • इसके अतिरिक्त, भारत-इज़रायल मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के लिये वार्त्ता का पहला दौर नई दिल्ली में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ, जो आर्थिक एकीकरण को गहरा करने के लिये एक प्रयास का संकेत देता है।

भारतीय प्रधानमंत्री के इज़रायल दौरे के प्रमुख परिणाम क्या हैं?

प्रौद्योगिकी:

  • भारत-इज़रायल साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CoE): भारत में भारत-इज़रायल साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CoE) स्थापित करने के लिये एक आशय पत्र (LoI) पर हस्ताक्षर किये गए, ताकि डिजिटल लचीलेपन को बढ़ावा दिया जा सके, उभरती प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन किया जा सके और सरकार, शिक्षा जगत एवं उद्योग के बीच तालमेल बिठाया जा सके।
  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI): नैतिक AI विकास, नागरिक अनुप्रयोगों और सार्वजनिक-निजी क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने के लिये एक समर्पित समझौता ज्ञापन (MoU)।
    • इसके अतिरिक्त, AI-सक्षम शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये गए, जो मानव-केंद्रित शिक्षण, अभिनव शिक्षाशास्त्र, AI तक समान पहुँच और शिक्षा प्रणाली में AI एवं डेटा साक्षरता के एकीकरण पर केंद्रित है।
  • होराइज़न स्कैनिंग: AI-संचालित उपकरणों के माध्यम से रणनीतिक दूरदर्शिता, जोखिम मूल्यांकन और दीर्घकालिक तकनीकी नियोजन में सहयोग हेतु एक आशय घोषणा (DoI) पर हस्ताक्षर किये गए हैं। 
  • भू-भौतिकीय अन्वेषण: संधारणीय खनिज अन्वेषण और डेटा साझाकरण के लिये उन्नत AI और भू-भौतिकीय प्रौद्योगिकियों के उपयोग को बढ़ावा देने हेतु समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये गए।
  • महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियाँ (iCET): दोनों देश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर संयुक्त आयोग (JCM) को मंत्री स्तर तक बढ़ाने पर सहमत हुए, उन्होंने महत्त्वपूर्ण एवं उभरती प्रौद्योगिकियों पर एक नई पहल शुरू की, जिसका नेतृत्व भारत और इज़रायल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (NSA) द्वारा किया जाएगा।

आर्थिक एकीकरण और वित्तीय सहयोग

  • UPI इंटीग्रेशन: भारत के स्वदेशी 'यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस' (UPI) का उपयोग करके भारत और इज़रायल के बीच सीमा-पार प्रेषण को सक्षम करने के लिये एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU)।
  • वित्तीय सेवा सहयोग: भारत के IFSCA (अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण) और इज़रायल प्रतिभूति प्राधिकरण (ISA) के बीच फिनटेक, रेगुलेटरी-टेक (regtech) और नियामक ढाँचे में सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने के लिये समझौता ज्ञापन।
  • वाणिज्यिक मध्यस्थता: वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को मज़बूत करने के लिये भारतीय माध्यस्थम परिषद (ICA) और इज़रायली वाणिज्यिक मध्यस्थता संस्थान (IICA) के बीच समझौता।

श्रम गतिशीलता और रोज़गार: भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को बढ़ावा देते हुए श्रम गतिशीलता पर तीन अलग-अलग कार्यान्वयन प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किये गए, जो इज़रायल में भारतीय श्रमिकों के लिये निम्नलिखित क्षेत्रों में विनियमित चैनलों की अनुमति देते हैं:

  • वाणिज्य और सेवाएँ: रिटेल (खुदरा), लॉजिस्टिक्स (रसद), आतिथ्य, स्वच्छता और वेयरहाउसिंग (भंडारण)।
  • विनिर्माण: वस्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, प्लास्टिक, धातु तथा खाद्य प्रसंस्करण।
  • रेस्तराँ: कैफे, रेस्तराँ और खाद्य बिक्री व्यवसायों के लिये भर्ती।

कृषि और संबद्ध क्षेत्र:

  • भारत-इज़रायल कृषि नवाचार केंद्र (IINCA): भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और MASHAV (इज़रायल की अंतर्राष्ट्रीय विकास सहयोग एजेंसी) के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये गए हैं। इसका उद्देश्य सटीक खेती, सिंचाई प्रौद्योगिकियों, कीट प्रबंधन तथा किसानों की क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना है।
    • भारत ने दोनों देशों के बीच कृषि सहयोग को और अधिक प्रगाढ़ बनाने के उद्देश्य से 'विलेजे ऑफ एक्सीलेंस' बनाने की घोषणा की है।
  • मत्स्य पालन और जलीय कृषि: एक नए उत्कृष्टता केंद्र के माध्यम से रोग प्रबंधन, मैरीकल्चर (समुद्री कृषि) और समुद्री शैवाल अनुसंधान एवं विकास सहित टिकाऊ, तकनीक-संचालित पद्धतियों पर सहयोग सुनिश्चित किया जाएगा।

संस्कृति, विरासत:

  • राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर (NMHC), लोथल: इज़रायल भारत के साथ मिलकर राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर (NMHC), लोथल, गुजरात के विकास में सहयोग करेगा। इस परियोजना के अंतर्गत प्रदर्शनियों और शोध गतिविधियों के माध्यम से दोनों देशों की साझा समुद्री विरासत का उत्सव मनाया जाएगा।
  • शैक्षणिक आदान–प्रदान: नालंदा विश्वविद्यालय और हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम के बीच संकाय एवं छात्र आदान–प्रदान के लिये एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये गए हैं। यह सहयोग बौद्ध अध्ययन, गणित, पुरातत्त्व तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध जैसे विषयों में शैक्षणिक सहयोग व अनुसंधान को प्रोत्साहित करेगा।

भारत-इज़रायल संबंध कैसे विकसित हुए हैं?

  • प्रारंभिक वर्ष: भारत ने इज़रायल को वर्ष 1950 में आधिकारिक रूप से मान्यता दी थी, लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित किये गए। इसका प्रमुख कारण शीतयुद्ध काल की अंतर्राष्ट्रीय ध्रुवीयता तथा फिलिस्तीनी मुद्दे के प्रति भारत का पारंपरिक और मज़बूत समर्थन रहा।
  • डी-हाइफनेशन नीति: वर्ष 2017 में भारतीय प्रधानमंत्री की पहली इज़रायल यात्रा ने आधिकारिक रूप से 'डी-हाइफनेशन' नीति की शुरुआत की। इसके तहत भारत ने फिलिस्तीन पर अपने रुख से प्रभावित हुए बिना, इज़रायल के साथ अपने संबंधों को स्वतंत्र रूप से संचालित करना शुरू किया।
  • वर्तमान स्थिति (2026): दोनों देशों के बीच संबंध एक सामान्य 'क्रेता-विक्रेता' के दायरे से बाहर निकलकर एक गहन रणनीतिक, तकनीकी और रक्षा साझेदारी में परिवर्तित हो चुके हैं।
  • आर्थिक एवं वाणिज्यिक संबंध: वर्ष 1992 से अब तक भारत और इज़रायल के बीच द्विपक्षीय व्यापार, क्षेत्रीय व्यवधानों के बावजूद, 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 3.75 अरब अमेरिकी डॉलर (वित्त वर्ष 2024–25) तक पहुँच गया है।
    • व्यापारिक स्थिति: भारत एशिया में वस्तु व्यापार के क्षेत्र में इज़रायल का दूसरा सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है।
    • व्यापार संरचना: भारत द्वारा निर्यात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में मोती एवं कीमती पत्थर, डीज़ल, रसायन, मशीनरी, वस्त्र तथा कृषि उत्पाद शामिल हैं। वहीं इज़रायल से आयात में हीरे, उर्वरक, पेट्रोलियम उत्पाद, मशीनरी तथा रक्षा उपकरण प्रमुख हैं।
    • निवेश संबंध: भारत का इज़रायल में संचयी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (ODI) 2000–25 की अवधि में 443 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा है। वहीं 2000–24 के दौरान इज़रायल का भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) 334.2 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। ये आँकड़े दोनों देशों के बीच निरंतर और सुदृढ़ होते द्विपक्षीय निवेश प्रवाह को दर्शाते हैं।
  • नवाचार एवं प्रौद्योगिकी: भारत-इज़रायल औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास और नवाचार कोष (I4F) (2023–27) जैसी पहलें संयुक्त अनुसंधान को बढ़ावा देने और दोनों देशों के बीच तकनीकी नवाचार एवं उन्नत प्रौद्योगिकियों के विकास को सशक्त करने का उद्देश्य रखती हैं।
  • रक्षा सहयोग: भारत और इज़रायल के बीच रक्षा संबंधों में नौसैनिक पोर्ट कॉल्स तथा ब्लू फ्लैग जैसे सैन्य अभ्यासों में भागीदारी शामिल है, जिससे दोनों देशों के बीच परिचालन समन्वय और रणनीतिक सहयोग को मज़बूती मिलती है।
    • रक्षा सहयोग का विस्तार: भारत इज़रायली रक्षा उपकरणों के सबसे बड़े आयातकों में से एक है और दोनों देशों ने संयुक्त रूप से बराक-8 मिसाइल प्रणाली का सह-विकास किया है। इसके अतिरिक्त इज़रायल के हाइफा बंदरगाह पर भारतीय नौसेना के नियमित पोर्ट कॉल्स भी दोनों देशों के गहरे समुद्री और रक्षा सहयोग को दर्शाते हैं।
  • कृषि सहयोग: भारत में 43 भारत-इज़रायल उत्कृष्टता केंद्र (CoE) स्थापित हैं। ये केंद्र उच्च-तकनीकी और गहन कृषि के महत्त्वपूर्ण केंद्र (Hubs) हैं, जिन्हें स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप इज़रायली कृषि-प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण की सुविधा प्रदान करने के लिये बनाया गया है।
  • जल सहयोग: वर्ष 2016 में हस्ताक्षरित जल संसाधन संबंधी समझौता ज्ञापन (MoU) संयुक्त प्रयासों को बढ़ावा देता है, जिसमें जल संरक्षण, सिंचाई सुधार और समग्र जल प्रबंधन जैसी पहलों का विकास शामिल है।
  • निकासी अभियान
    • ऑपरेशन अजय (2023): हमास के हमलों के बाद 1,300 से अधिक भारतीयों को सुरक्षित निकाला गया।
    • ऑपरेशन सिंधु (2025): इज़रायल–ईरान संघर्ष के दौरान लगभग 818 भारतीयों को जॉर्डन और मिस्र के रास्ते सुरक्षित निकाला गया।

भारत-इज़रायल संबंधों का क्या महत्त्व है?

भारत के लिये

  • रक्षा संबंधी तैयारियों का सशक्तीकरण: इज़रायल के सहयोग से भारत को उन्नत सैन्य प्रौद्योगिकियाँ प्राप्त होती हैं, जिनमें फाल्कन AWACS (हवाई चेतावनी और नियंत्रण प्रणाली), हेरॉन, सर्चियर-II और हारोप ड्रोन, स्पाइडर क्विक-रिएक्शन एंटी क्राफ्ट मिसाइल सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरण शामिल हैं। ये प्रौद्योगिकियाँ तनावपूर्ण सीमाएँ पर भारत की क्षमता के अंतर को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण को बढ़ावा: भारत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने के लिये केवल एक खरीदार के बजाय अब सह-विकासकर्त्ता  बनने की ओर अग्रसर है। बराक-8 मिसाइल प्रणाली जैसी संयुक्त विकास परियोजनाएँ इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम हैं, जो देश की रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भर बनने की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं।
  • जल सुरक्षा को बढ़ावा: इज़रायल की विलवणीकरण, ड्रिप सिंचाई और अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण में विशेषज्ञता भारत के जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों, विशेष रूप से पश्चिमी और प्रायद्वीपीय राज्यों में, जल सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिये स्थायी समाधान प्रदान करती है।
  • पश्चिम एशिया संतुलन रणनीति का समर्थन: इज़रायल के साथ मज़बूत संबंध, साथ ही खाड़ी देशों और ईरान के साथ मज़बूत संबंध पश्चिम एशिया में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-संरेखण रणनीति को दर्शाते हैं।
  • संपर्क और भू-आर्थिक महत्त्व: IMEC और I2U2 जैसी पहलों में सक्रिय भागीदारी के माध्यम से भारत यूरोपीय बाज़ारों तक अपनी पहुँच को सुदृढ़ कर रहा है। यह इसे उभरते व्यापार गलियारों में एक महत्त्वपूर्ण और प्रमुख नेतृत्वकर्त्ता के रूप में स्थापित करता है।
    • भारत पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता को अपनी सुरक्षा, ऊर्जा हितों और वहाँ रह रहे भारतीय प्रवासियों के कल्याण के लिये आवश्यक मानता है और इसकी पुष्टि करता है कि ये हित एक-दूसरे से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं।

इज़रायल के लिये

  • एशिया में रणनीतिक उपस्थिति का विस्तार: भारत के साथ साझेदारी वैश्विक दक्षिण में इज़रायल की राजनयिक पहुँच को मज़बूत करती है और पश्चिमी सहयोगियों से परे इसकी भू-राजनीतिक प्रासंगिकता को बढ़ाती है।
  • रक्षा उद्योग की स्थिरता: एक प्रमुख रक्षा साझेदार के रूप में भारत की स्थिति इज़रायल को एक विश्वसनीय बाज़ार, संयुक्त उत्पादन और नवाचार के अवसर प्रदान करती है।
  • श्रम की कमी को दूर करना: भारतीय श्रमिक इज़रायल के निर्माण, देखभाल और सेवा क्षेत्रों में योगदान करते हैं, जिससे आर्थिक स्थिरता और बुनियादी ढाँचे के विकास में सहायता मिलती है।

भारत-इज़रायल संबंधों के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं?

  • ईरान की दुविधा: इज़रायल ईरान को अपने अस्तित्व के लिये खतरा मानता है। वहीं दूसरी ओर, भारत ईरान को ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय संपर्क के लिये एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानता है, विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह के माध्यम से, जो पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच प्रदान करता है।
  • फिलिस्तीनी रुख: भारत ऐतिहासिक रूप से और आधिकारिक तौर पर इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष के लिये ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ का समर्थन करता है।  
    • मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के दौरान ‘डी-हाइफनेशन’ नीति को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
  • चीन का प्रभाव: एशिया में चीन इज़रायल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है। इज़रायली अवसंरचना और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में चीन के बड़े पैमाने पर निवेश के पिछले उदाहरण भारत के लिये सुरक्षा संबंधी संवेदनशीलताएँ बढ़ाते हैं। इसलिये भारत को साझा रक्षा प्रौद्योगिकियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये सावधानीपूर्वक राजनयिक रणनीति अपनाना आवश्यक है।
  • बौद्धिक संपदा अधिकार संबंधी चिंताएँ: इज़रायल, एक उच्च-प्रौद्योगिकी निर्यात अर्थव्यवस्था होने के कारण, भारत की बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) व्यवस्था को लेकर अक्सर चिंताएँ व्यक्त करता है, जो पश्चिमी देशों की तुलना में अधिक उदार है। ये चिंताएँ विशेष रूप से संवेदनशील सॉफ्टवेयर, डिजिटल नवाचारों और कृषि प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण में एक बाधा के रूप में कार्य करती हैं।
    • सोर्स कोड और गहन तकनीकी जानकारी हस्तांतरित करने में इज़रायल की अत्यधिक अनिच्छा भारत के ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा स्वदेशीकरण लक्ष्यों में प्रत्यक्ष रूप से बाधा उत्पन्न करती है।
  • मेगाप्रोजेक्ट्स (बड़ी परियोजनाओं) के लिये जोखिम: IMEC जैसी महत्त्वाकांक्षी ‘लघुपक्षवाद कनेक्टिविटी’ परियोजनाओं का लक्ष्य भारतीय वस्तुओं को यूरोपीय बाज़ारों से जोड़ने के लिये इज़रायली बुनियादी ढाँचे (जैसे– हाइफा बंदरगाह) का उपयोग करना है।
    • हालाँकि, इस क्षेत्र में बढ़ते सैन्य संघर्ष और शैडो वार इन अरबों डॉलर के बुनियादी ढाँचा नेटवर्कों की व्यवहार्यता और भौतिक सुरक्षा के लिये गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहे हैं।

भारत-इज़रायल संबंधों को और सुदृढ़ करने हेतु कौन-से उपाय आवश्यक हैं?

  • लघुपक्षवाद सहयोग का संस्थानीकरण: I2U2 को सुदृढ़ करते हुए नवीकरणीय ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा गलियारों के वित्तपोषण को बढ़ावा दिया जाए।
    • IMEC तथा हाइफा जैसे प्रमुख बंदरगाहों की सुरक्षा के लिये संयुक्त नौसैनिक अभ्यास सहित एक समुद्री सुरक्षा ढाँचा विकसित किया जाए।
  • रक्षा सह-उत्पादन की ओर परिवर्तन: खरीदार-विक्रेता मॉडल से आगे बढ़कर UAV और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों में संयुक्त अनुसंधान एवं विकास (R&D) तथा सह-स्वामित्व वाली रक्षा बौद्धिक संपदा विकसित की जाए।
    • भारत की विनिर्माण क्षमता का उपयोग करते हुए संयुक्त रूप से निर्मित रक्षा प्रणालियों का अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में निर्यात किया जाए।
  • नवाचार और श्रम समझौतों का क्रियान्वयन: रेमिटेंस लागत कम करने और व्यापारिक लेन-देन को बढ़ावा देने के लिये UPI लिंक को शीघ्र लागू किया जाए। क्षमता निर्माण और डिजिटल सुरक्षा के लिये साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस को क्रियाशील बनाया जाए।
  • व्यापार और प्रौद्योगिकी सहयोग का विविधीकरण: हीरे और रसायनों से आगे व्यापार का विस्तार करने हेतु मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप दिया जाए।
    • भारत के सेमीकंडक्टर ईकोसिस्टम और हरित प्रौद्योगिकियों में इज़रायल की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए।
  • शैक्षणिक और जन-स्तरीय सहभागिता को सुदृढ़ करना: विश्वविद्यालय साझेदारियों तथा AI, विलवणीकरण (Desalination) और शुष्क कृषि में संयुक्त अनुसंधान का विस्तार किया जाए।
    • भूराजनीतिक उतार-चढ़ाव से परे संबंधों को बनाए रखने के लिये ट्रैक-1.5 और ट्रैक-2 कूटनीति को प्रोत्साहित किया जाए।

निष्कर्ष


वर्ष 2026 के भारत-इज़रायल समझौते क्षेत्र-विशिष्ट सहयोग से आगे बढ़कर एक व्यापक और भविष्य-उन्मुख साझेदारी की ओर परिवर्तन को दर्शाते हैं। प्रौद्योगिकी, स्थिरता, गतिशीलता और सांस्कृतिक संबंधों के एकीकरण के माध्यम से दोनों देश ऐसा सुदृढ़ ढाँचा निर्मित कर रहे हैं जो नवाचार-आधारित विकास को समर्थन देता है तथा बदलती वैश्विक व्यवस्था में उनके रणनीतिक सामंजस्य को सुदृढ़ करता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: “भारत-इज़रायल संबंध लेन-देन आधारित रक्षा सहयोग से विकसित होकर एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी में परिवर्तित हो गए हैं।” इस परिवर्तन का परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. इंडो-इज़रायल साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का महत्त्व क्या है?
यह उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में सरकार, अकादमिक जगत और उद्योग के बीच सहयोग को बढ़ाते हुए डिजिटल अनुकूलनशीलता, साइबर सुरक्षा क्षमता निर्माण तथा सहयोग को सुदृढ़ करने का उद्देश्य रखता है।

2. इज़रायल के साथ UPI एकीकरण से द्विपक्षीय संबंधों को क्या लाभ होगा?
UPI लिंक से कम लागत वाली सीमा-पार प्रेषण सेवाएँ संभव होंगी, फिनटेक सहयोग को बढ़ावा मिलेगा तथा व्यापारिक लेन-देन अधिक सहज बनेंगे।

3. भारत-इज़रायल इनोवेशन सेंटर फॉर एग्रीकल्चर (IINCA) क्या है?
यह ICAR और MASHAV द्वारा स्थापित एक संयुक्त केंद्र है, जिसका उद्देश्य सटीक कृषि (प्रिसिज़न फार्मिंग), सिंचाई प्रौद्योगिकियों, कीट प्रबंधन तथा किसानों की क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना है।

4. भारत-इज़रायल मुक्त व्यापार समझौता (FTA) क्यों महत्त्वपूर्ण है?
इसका उद्देश्य हीरे और रसायनों से आगे व्यापार को विविध बनाना, बाज़ार पहुँच का विस्तार करना तथा आर्थिक एकीकरण को सुदृढ़ करना है।

5. भारत-इज़रायल संबंधों में डी-हाइफनेशन नीति क्या है?
यह नीति दर्शाती है कि भारत इज़रायल के साथ अपने संबंधों को फिलिस्तीन के प्रति अपनी नीति से अलग रखते हुए स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ाता है, जिससे रणनीतिक सहयोग को गहराई देने में सहायता मिलती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न. कभी-कभी समाचारों में उल्लिखित पद "टू स्टेट सॉल्यूशन" किसकी गतिविधियों के संदर्भ में आता है? (2018)

(a) चीन

(b) इज़रायल

(c) इराक

(d) यमन

उत्तर: (b)


मेन्स 

प्रश्न. “भारत के इज़रायल के साथ संबंधों ने हाल ही में एक ऐसी गहराई और विविधता हासिल की है, जिसकी पुनर्वापसी नहीं की जा सकती है।” विवेचना कीजिये। (2018)