भारत-ग्रीस संबंध | 11 Feb 2026

प्रिलिम्स के लिये: सूचना संलयन केंद्र–हिंद महासागर क्षेत्र, अलेक्जेंडर, गंधार कला, भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा

मेन्स के लिये: भारत–ग्रीस रणनीतिक साझेदारी और रक्षा कूटनीति, इंडो-पैसिफिक और भूमध्य सागर में समुद्री सुरक्षा, भारत की रक्षा औद्योगिक नीति और आत्मनिर्भर भारत

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों? 

भारत के रक्षा मंत्री ने नई दिल्ली में ग्रीस के राष्ट्रीय रक्षा मंत्री के साथ द्विपक्षीय बातचीत की।

  • इस बैठक के परिणामस्वरूप रक्षा उद्योग सहयोग को मज़बूत करने के लिये एक संयुक्त आशय घोषणा-पत्र (JDI) पर हस्ताक्षर हुए।
  • यह कदम दोनों प्राचीन समुद्री राष्ट्रों के बीच बढ़ते रणनीतिक संगम को उजागर करता है और उनकी रणनीतिक साझेदारी को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रोत्साहित करता है।

सारांश

  • भारत एवं ग्रीस ने रक्षा उद्योग सहयोग पर एक संयुक्त इरादे की घोषणा पर हस्ताक्षर करके और वर्ष  2026 के लिये एक सैन्य सहयोग योजना का आदान-प्रदान करके अपनी रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत किया, जो संरचित तथा दीर्घकालिक सहयोग की ओर एक महत्त्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है।
  • यह साझेदारी IFC-IOR के माध्यम से समुद्री सुरक्षा सहयोग को मज़बूत करती है, भारत के आत्मनिर्भर भारत दृष्टिकोण का समर्थन करती है और IMEC ढाँचे के तहत ग्रीस को यूरोप के लिये एक महत्त्वपूर्ण प्रवेश द्वार के रूप में स्थापित करती है।

भारत–ग्रीस द्विपक्षीय वार्त्ता के प्रमुख बिंदु क्या हैं?

  • संयुक्त आशय घोषणा-पत्र: भारत और ग्रीस ने द्विपक्षीय रक्षा उद्योग सहयोग को मज़बूत करने हेतु एक JDI पर हस्ताक्षर किये, जो दीर्घकालिक सहयोग के मार्गदर्शन के लिये संगठित पाँच-वर्षीय रोडमैप की नींव रखेगा।
    • इसके साथ ही दोनों पक्षों ने वर्ष 2026 के लिये द्विपक्षीय सैन्य सहयोग योजना का आदान-प्रदान किया, जिसमें उनकी सशस्त्र सेनाओं के बीच नियोजित सैन्य सहभागिताओं का विवरण दिया गया है।
    • यह सहयोग भारत की आत्मनिर्भर भारत पहल को ग्रीस के एजेंडा 2030 के तहत रक्षा सुधारों से जोड़ने का लक्ष्य रखता है, जिससे दोनों देशों की स्वदेशी रक्षा उद्योगों की क्षमता का विस्तार हो सके।
      • अस्थायी व्यवस्थाओं के बजाय लगातार औद्योगिक सहयोग को औपचारिक रूप देने से यह कदम भारत की उस व्यापक रणनीति को दर्शाता है, जिसमें पारंपरिक आपूर्तिकर्त्ताओं से परे रक्षा साझेदारियों का विस्तार करना शामिल है।
    • साथ में ये कदम स्पष्ट रूप से यह संकेत देते हैं कि संवाद-आधारित सहभागिता से संरचित और समयबद्ध सहयोग की ओर एक बदलाव हो रहा है।
  • समुद्री सुरक्षा सहयोग: ग्रीस ने गुरुग्राम स्थित सूचना संलयन केंद्र–हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR) में एक ग्रीक अंतर्राष्ट्रीय संपर्क अधिकारी की तैनाती की घोषणा की।
    • इस कदम का उद्देश्य समुद्री क्षेत्र जागरूकता (Maritime Domain Awareness - MDA) और सूचना साझा करने को बढ़ाना है, जो इंडो-पैसिफिक और भूमध्य सागर में दोनों देशों के साझा समुद्री हितों को दर्शाता है।

भारत-ग्रीस संबंध कैसे हैं?

  • ऐतिहासिक संबंध: भारत-ग्रीस के संबंध लगभग 2,500 वर्ष पुराने हैं। मौर्य साम्राज्य और ग्रीस के बीच व्यापारिक संपर्क प्राचीन सिक्कों और ग्रंथों में परिलक्षित होते हैं।
    • 326 ईसा पूर्व में सिकंदर उत्तर-पश्चिमी भारत में हाइफैसिस (व्यास नदी) तक पहुँचा और उसने पौरव राज्य के राजा पुरु (झेलम और चिनाब के बीच का क्षेत्र) तथा तक्षशिला पर शासन करने वाले राजा आंभी से युद्ध किया।
    • मौर्य वंश सिकंदर के समकालीन था। चाणक्य के अर्थशास्त्र  में चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी (यवन) राजदूत मेगस्थनीज़ का उल्लेख मिलता है।
    • इसके बाद गांधार कला शैली भारतीय और यूनानी सांस्कृतिक प्रभावों के सम्मिश्रण के रूप में विकसित हुई।
  • रणनीतिक साझेदारी: द्विपक्षीय संबंधों को अगस्त 2023 में ‘रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक उन्नत किया गया।
  • राजनयिक समर्थन: ग्रीस ने कश्मीर मुद्दे पर भारत के रुख तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के लिये भारत की दावेदारी का लगातार समर्थन किया है। इसके विपरीत, साइप्रस मुद्दे पर भारत ग्रीस के पक्ष का समर्थन करता है।
    • भारत साइप्रस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्तावों और अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुरूप द्वि-क्षेत्रीय, द्वि-सामुदायिक संघीय व्यवस्था का समर्थन करता है।

सहयोग का महत्त्व

  • यूरोप का प्रवेशद्वार: पूर्वी भूमध्यसागर में ग्रीस की रणनीतिक स्थिति भारत के लिये यूरोप तक पहुँच का एक महत्त्वपूर्ण प्रवेशद्वार (Gateway) प्रदान करती है।
    • ग्रीस, जिसका विशाल व्यापारी नौवहन बेड़ा वैश्विक शिपिंग की कुल वहन क्षमता के लगभग 20% पर नियंत्रण रखता है, भारत को यूरोपीय संघ (EU) बाज़ार में प्रवेश के लिये एक महत्त्वपूर्ण लॉजिस्टिक साझेदार प्रदान करता है।
    • यह प्रस्तावित भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) में एक महत्त्वपूर्ण केंद्र है, जहाँ पिराएस जैसे ग्रीक बंदरगाह भारतीय वस्तुओं के लिये संभावित प्रवेश बिंदु के रूप में कार्य कर सकते हैं।
  • भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों का संतुलन: ग्रीस के साथ घनिष्ठ संबंध तुर्की-पाकिस्तान धुरी के मुकाबले भारत को एक रणनीतिक संतुलन प्रदान करते हैं।
    • तुर्की का पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ सैन्य सहयोग भारत की ग्रीस के साथ साझेदारी (जो तुर्की का पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी है) को भू-राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बनाता है।
  • इंडो-पैसिफिक और भूमध्यसागर का अभिसरण: दोनों देश समुद्री शक्तियाँ हैं और नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था तथा नौवहन की स्वतंत्रता का समर्थन करते हैं, जिससे हिंद-प्रशांत और भूमध्यसागर क्षेत्रों में उनके हितों का समन्वय होता है।
    • इंडो-पैसिफिक महासागर पहल (IPOI) में ग्रीस की रुचि तथा भूमध्यसागर में भारत की नौसैनिक उपस्थिति (जैसे– INS तबर के अभ्यास) अरब सागर से लेकर एजियन सागर तक विस्तृत एक सुरक्षा निरंतरता क्षेत्र निर्मित करती है।

भारत-ग्रीस संबंधों में चुनौतियाँ क्या हैं?

  • आर्थिक अपेक्षाकृत निम्नस्तरीय प्रदर्शन: संभावनाओं के बावजूद द्विपक्षीय व्यापार लगभग 2 अरब अमेरिकी डॉलर (2022-23) के स्तर पर है।
    • यह जर्मनी, फ्राँस या इटली जैसे अन्य यूरोपीय देशों के साथ भारत के व्यापार की तुलना में काफी कम है।
    • व्यापार मुख्यतः प्राथमिक उत्पादों (एल्यूमिनियम, खनिज ईंधन, कपास) पर केंद्रित है, न कि उच्च-मूल्य प्रौद्योगिकी या सेवाओं पर, जिससे आर्थिक विस्तार सीमित रहता है।
  • संपर्क की कमी (Connectivity Deficit): प्रत्यक्ष नौवहन लाइनों के अभाव में ट्रांस-शिपमेंट करना पड़ता है, जिससे भारतीय निर्यातों को ग्रीक बंदरगाहों तक पहुँचने में समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं।
  • ‘चीन फैक्टर’: IMEC के माध्यम से ग्रीस को भारत के लिये ‘यूरोप का प्रवेशद्वार’ के रूप में देखा जाता है।
    • हालाँकि, ग्रीस का सबसे बड़ा बंदरगाह पिरियस (Piraeus) COSCO शिपिंग, जो एक चीनी सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी है, के बहुमत स्वामित्व में है।
    • भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी चीन के नियंत्रण वाले बंदरगाह पर भारत की रणनीतिक निर्भरता उसकी यूरोपीय आपूर्ति शृंखलाओं के लिये दीर्घकालिक सुरक्षा दुविधा उत्पन्न करती है।
  • संस्थागत निष्क्रियता: रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नयन के बावजूद भारत-ग्रीस संबंधों में 2+2 संवाद तथा विदेश नीति समीक्षा जैसे नियमित उच्चस्तरीय तंत्रों का अभाव है।
    • इससे निरंतरता, नीतिगत अनुवर्तन तथा दीर्घकालिक रणनीतिक समन्वय सीमित हो जाता है।

भारत-ग्रीस संबंधों को सुदृढ़ करने हेतु क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

  • IMEC का क्रियान्वयन: लाल सागर संकट के कारण पारंपरिक मार्गों के अस्थिर होने की स्थिति में, भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) को तीव्र गति से क्रियान्वित करना कनेक्टिविटी संबंधी चुनौतियों का समाधान करेगा जो ग्रीस को यूरोपीय संघ में भारतीय वस्तुओं के लिये प्रमुख प्रवेशद्वार का निर्माण करेगा।
  • श्रम संबंधी लाभ: ग्रीस गंभीर जनसांख्यिकीय संकट और श्रम की कमी (कृषि, निर्माण, पर्यटन) का सामना कर रहा है, जबकि भारत के पास कुशल कार्यबल की प्रचुरता है।
    • प्रवास एवं गतिशीलता साझेदारी समझौते (MMPA) के शीघ्र कार्यान्वयन से भारतीय श्रमिकों के वैध प्रवाह को प्रोत्साहन मिलेगा, अवैध प्रवासन पर अंकुश लगेगा तथा प्रेषण में वृद्धि होगी।
  • रणनीतिक समूहों का गठन: भारत को भारत–ग्रीस–साइप्रस–इज़राइल (या फ्राँस) को सम्मिलित करते हुए एक लघुपक्षीय समूह को औपचारिक रूप देना चाहिये। यह संभावित “भूमध्यसागरीय क्वाड” ऊर्जा सुरक्षा और संयुक्त नौसैनिक गश्त पर केंद्रित होगा, जिससे भारत की सुरक्षा परिधि का प्रभावी विस्तार होगा।
  • डिजिटल कनेक्टिविटी: ब्लू-रमन केबल सिस्टम (सबमरीन केबल) पर सहयोग करते हुए ग्रीस के माध्यम से भारत की डिजिटल अवसंरचना को यूरोप से जोड़ा जाए, जिससे स्वेज़ जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील अवरोध बिंदु को पार किया जा सके।

निष्कर्ष

भारत–ग्रीस संबंध ऐतिहासिक सद्भावना से आगे बढ़कर अब रक्षा, समुद्री सुरक्षा और कनेक्टिविटी पर आधारित एक संरचित और रणनीतिक साझेदारी में लगातार विकसित हो रहे हैं। यदि दोनों देश आर्थिक और तार्किक कमियों को दूर करते हुए साझा भू‑राजनीतिक हितों का लाभ उठाएँ, तो यह साझेदारी इंडो‑पैसिफिक को यूरोप से जोड़ने वाला एक महत्त्वपूर्ण सेतु बनकर उभर सकती है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भारत–ग्रीस रक्षा सहयोग प्रतीकात्मक कूटनीति से संरचित रणनीतिक सहभागिता की ओर हुए परिवर्तन को प्रतिबिंबित करता है। चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

1. भारत और ग्रीस के मध्य हस्ताक्षरित संयुक्त आशय घोषणा-पत्र (JDI) का क्या महत्त्व है?
यह रक्षा औद्योगिक सहयोग को संस्थागत स्वरूप प्रदान करता है तथा आत्मनिर्भर भारत और ग्रीस के एजेंडा 2030 के सुधारों के अनुरूप एक पाँच-वर्षीय रोडमैप तैयार करता है।

2. भारत–ग्रीस समुद्री सहयोग में IFC-IOR की क्या भूमिका है?
सूचना संलयन केंद्र–हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR) वास्तविक समय में सूचना साझाकरण और समन्वित समुद्री निगरानी के माध्यम से समुद्री क्षेत्र जागरूकता को बढ़ाता है।

3. IMEC भारत–ग्रीस संबंधों को कैसे सुदृढ़ करता है?
भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) ग्रीस को यूरोप के प्रवेशद्वार के रूप में स्थापित करता है, जहाँ पिरियस जैसे बंदरगाह यूरोपीय संघ के बाज़ार में भारतीय वस्तुओं के संभावित प्रवेश बिंदु बन सकते हैं।

4. भू-राजनीतिक दृष्टि से ग्रीस भारत के लिये रणनीतिक रूप से क्यों महत्त्वपूर्ण है?
ग्रीस तुर्किये–पाकिस्तान धुरी के प्रति संतुलन प्रदान करता है तथा पूर्वी भूमध्यसागर में भारत की उपस्थिति को सुदृढ़ करता है।

5. भारत–ग्रीस संबंधों में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
निम्न द्विपक्षीय व्यापार (लगभग 2 अरब अमेरिकी डॉलर), प्रत्यक्ष समुद्री कनेक्टिविटी का अभाव, यूरोपीय संघ के विनियामक प्रतिबंध तथा पिरियस बंदरगाह पर चीन का नियंत्रण—ये सभी गहन सहभागिता में बाधा उत्पन्न करते हैं।