भारत में घृणास्पद भाषण/हेट स्पीच | 13 Apr 2026
प्रिलिम्स के लिये: विधि आयोग, अनुच्छेद 19(1)(a), एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955, अस्पृश्यता, एंड-टू-एंड एंक्रिप्शन, निजता का अधिकार, फास्ट-ट्रैक कोर्ट, मशीन लर्निंग, मानवाधिकार।
मेन्स के लिये: घृणास्पद भाषण/हेट स्पीच और घृणा अपराध/हेट क्राइम पर OSLC की प्रमुख सिफारिशें, घृणास्पद भाषण और घृणा अपराध से संबंधित प्रमुख तथ्य, घृणास्पद भाषण और घृणा अपराध पर अंकुश लगाने में चुनौतियाँ और आगे की राह।
चर्चा में क्यों?
ओडिशा राज्य विधि आयोग (OSLC) ने ओडिशा घृणापूर्ण भाषण और घृणा अपराध (निवारण) अधिनियम, 2026 के लिये एक व्यापक सिफारिश प्रस्तुत की है, जिसका उद्देश्य कठोर दंडात्मक एवं निवारक उपायों के माध्यम से घृणास्पद भाषण और घृणा अपराधों पर अंकुश लगाना है।
सारांश
- ओडिशा एक कठोर घृणापूर्ण भाषण अधिनियम का प्रस्ताव करता है, जिसमें संज्ञेय अपराध, डिजिटल सामग्री को हटाने और बार-बार होने वाले अपराधों के लिये 7 वर्ष के कारावास का प्रावधान है।
- मौज़ूदा बीएनएस प्रावधान और न्यायिक दिशानिर्देश ऑनलाइन घृणा के खिलाफ अपर्याप्त बने हुए हैं।
- अनुच्छेद 19 में स्वतंत्रता को सार्वजनिक व्यवस्था के साथ संतुलित करने के लिये स्पष्ट परिभाषाओं, AI मॉडरेशन और सामाजिक लचीलापन की आवश्यकता है।
घृणास्पद भाषण/हेट स्पीच और घृणा अपराध/हेट क्राइम पर OSLC की प्रमुख सिफारिशें
- दंडात्मक प्रावधान: ड्राफ्ट पहली बार अपराध करने वालों के लिये 1 से 5 वर्ष की कैद (10,000 रुपये के जुर्माने के साथ) और बार-बार अपराध करने वालों के लिये 7 वर्ष तक की कैद (50,000 रुपये के ज़ुर्माने के साथ) का प्रस्ताव करता है।
- अपराधों का वर्गीकरण: ओडिशा घृणापूर्ण भाषण और घृणा अपराध (निवारण) अधिनियम, 2026 के तहत अपराधों को संज्ञेय और गैर-ज़मानती के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा, जो वारंट के बगैर गिरफ्तारी की अनुमति देता है और ज़मानत के लिये सख्त न्यायिक जाँच की आवश्यकता होगी।
- व्यापक परिभाषा: यह "घृणास्पद भाषण" को किसी भी सार्वजनिक अभिव्यक्ति (वाचिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक) के रूप में परिभाषित करता है, जिसका उद्देश्य धर्म, जाति, नस्ल, लैंगिक, भाषा, विकलांगता या जन्म-स्थान के आधार पर घृणा या द्वेष उत्पन्न करना है।
- पीड़ित-उन्मुख दृष्टिकोण: कानून में प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेटों को हुए नुकसान की गंभीरता के आधार पर पीड़ितों को वित्तीय मुआवज़ा देने का अधिकार प्रदान किया गया है।
- निवारक उपाय: कार्यकारी मजिस्ट्रेट और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत विश्वसनीय खुफिया जानकारी के आधार पर सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिये कार्यवाही शुरू कर सकते हैं।
- डिजिटल विनियमन: एक नामित अधिकारी (अपर ज़िला मजिस्ट्रेट रैंक के समकक्ष) को मध्यस्थों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों को घृणास्पद सामग्री को ब्लॉक करने या हटाने का निर्देश देने का अधिकार होगा।
- संगठनात्मक दायित्व: अधिनियम संगठनों तक आपराधिक दायित्व का विस्तार करता है, इसके संचालन के लिये ज़िम्मेदार प्रत्येक व्यक्ति को जवाबदेह ठहराता है, जब तक कि वे उचित परिश्रम या जानकारी की कमी साबित न करें।
- सार्वजनिक हित के लिये छूट: दंड उन सामग्रियों (कला, विज्ञान या साहित्य) पर लागू नहीं होंगे जो आम जनता के हित में हों या वास्तविक धार्मिक/विरासत उद्देश्यों के लिये उपयोग की जाती हैं।
हेट स्पीच और हेट क्राइम क्या हैं?
- परिचय: विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट (2017) के अनुसार, हेट स्पीच से तात्पर्य उन शब्दों या कार्यों से है जिनका उद्देश्य नस्ल, जातीयता, लिंग, धर्म या यौन अभिविन्यास के आधार पर समूहों के प्रति घृणा उत्पन्न करना है। इसमें भय या हिंसा भड़काने के उद्देश्य से बनाए गए दृश्य, संकेत या भाषण शामिल हैं।
- हेट क्राइम ऐसी आपराधिक गतिविधियों (जैसे कि मॉब लिंचिंग अथवा शारीरिक हिंसा) को संदर्भित करते हैं, जो किसी व्यक्ति की विशिष्ट पहचान, जैसे– उसकी अक्षमता, राष्ट्रीय मूल या रंग के विरुद्ध पूर्वाग्रह द्वारा संचालित होते हैं।
- कानूनी उपाय:
- संवैधानिक: अनुच्छेद 19(1)(A) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा और अपराधों को उकसाने से रोकने के लिये अनुच्छेद 19(2) के तहत "उचित प्रतिबंधों" के अधीन है।
- कानूनी ढाँचा:
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: धारा 196 (पूर्व में IPC 153A) समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने को दंडित करती है तथा धारा 299 (पूर्व में IPC 295A) धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के इरादे से किये गए कृत्यों को दंडित करती है।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951: विशेष रूप से, धारा 8 सांप्रदायिक असामंजस्य को बढ़ावा देने के दोषी उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराती है।
- विशेष कानून: अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 और सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 पहचान आधारित अपमान और अस्पृश्यता की प्रथा को लक्षित करते हैं।
- हेट स्पीच पर अंकुश लगाने संबंधी प्रमुख निर्णय:
- शाहीन अब्दुल्ला बनाम भारत संघ (2022): सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस को औपचारिक शिकायत की प्रतीक्षा किये बिना हेट स्पीच (घृणास्पद भाषण) के मामलों में स्वतः संज्ञान लेते हुए FIR दर्ज करने का निर्देश दिया।
- तहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ (2018): न्यायालय ने मॉब लिंचिंग पर अंकुश लगाने के लिये दिशा-निर्देश जारी किये और ज़िला नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की सिफारिश की।
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015): इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 66A को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त कर दिया गया। न्यायालय का मानना था कि "अपमान" या "परेशानी" जैसे अस्पष्ट आधारों पर अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगाना अनुच्छेद 19(1)(A) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
- प्रवासी भलाई संगठन बनाम भारत संघ (2014): सर्वोच्च न्यायालय ने विधि आयोग को हेट स्पीच की स्पष्ट परिभाषा तैयार करने का निर्देश दिया ताकि इसके विनियमन के दौरान किसी भी प्रकार के "न्यायिक अतिचार" (Judicial Overreach) को रोका जा सके।
- संबंधित समितियाँ:
- विश्वनाथन समिति (2015): IPC में धारा 153C(B) और 505A को शामिल करने की सिफारिश की, जिसमें धर्म, लिंग और विकलांगता सहित विशिष्ट पहचानों के खिलाफ उकसाने को अधिकतम 2 वर्ष की जेल और 5,000 रुपये के जुर्माने से दंडित किया गया है।
- बेजबरुआ समिति (2014): IPC की धारा 153C (मानव गरिमा को लक्षित करना) को 5 वर्ष की सज़ा के साथ और IPC की धारा 509A (नस्लीय अपमान से निपटना) को 3 साल तक के कारावास या जुर्माने के साथ अद्यतन करने का सुझाव दिया।
हेट स्पीच और हेट क्राइम की रोकथाम में कौन-सी बाधाएँ हैं?
- परिभाषा का अभाव और विधिक अस्पष्टता: "हेट" (घृणा) शब्द की कोई सटीक और वैश्विक स्तर पर स्वीकृत परिभाषा न होने के कारण कानूनी और अवधारणात्मक संशय की स्थिति बनी रहती है। इसके परिणामस्वरूप या तो अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है या फिर वास्तव में उकसाने वाली गतिविधियों का उचित नियमन नहीं हो पाता है।
- अदालतों को अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 19(2) (उचित निर्बंधन) के बीच संतुलन बनाने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है, जिसके कारण "समर्थन" (वैध) और "उकसावे" (अवैध) के बीच स्पष्ट अंतर करना आवश्यक हो जाता है।
- तकनीकी चुनौतियाँ और "डिजिटल हाइड्रा": सामग्री के तेज़ी से प्रसार और विखंडित प्रवर्तन तंत्र के कारण डिजिटल नियमन एक कठिन चुनौती बन गया है, अक्सर प्रतिबंधित सामग्री मिरर अकाउंट्स या अनाम मंचों के माध्यम से तत्काल पुनः प्रसारित हो जाती है।
- निजता बनाम पुलिसिंग: व्हाट्सएप जैसे प्लेटफार्मों पर एंड-टू-एंड एंक्रिप्शन भड़काऊ संदेशों के "प्रथम प्रवर्तक" (first originator) का पता लगाने को जटिल बनाता है, जिससे निजता के अधिकार (अनुच्छेद 21) और जवाबदेही की आवश्यकता के बीच संघर्ष उत्पन्न होता है।
- अंतर्राष्ट्रीय कानूनी संघर्ष: सीमा पार कंटेंट होस्टिंग क्षेत्राधिकार संबंधी बाधाएँ उत्पन्न करती है। अक्सर कोई सामग्री या भाषण उन देशों (जैसे– अमेरिका) में उत्पन्न होता है, जहाँ कानूनी मानक अलग हैं, लेकिन वही सामग्री भारत में सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) के लिये संकट उत्पन्न कर देती है।
- तकनीकी प्रतिध्वनि कक्ष: सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म अक्सर उपयोगकर्त्ताओं को कट्टरपंथ के चक्र में फँसा देते हैं। इसके साथ ही, 'लोन वुल्फ' (अकेले कार्य करने वाले हमलावर) की घटना उन कट्टरपंथी व्यक्तियों के खिलाफ पूर्व-निवारक सुरक्षा कार्रवाई करना अत्यंत कठिन बना देती है जो किसी समूह के बिना अकेले कार्य करते हैं।
- चुनावी लाभ: न्यायपालिका ने पाया कि कुछ राजनीतिक अभिनेता लामबंदी (mobilization) के लिये 'बहिष्कारी विमर्श' (exclusionary narratives) का उपयोग करते हैं, जिससे घृणा फैलाना "राजनीतिक रूप से लाभप्रद" बन जाता है।
हेट स्पीच और हेट क्राइम पर अंकुश लगाने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- विधिक सुदृढ़ीकरण: भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 में ऐसे सुस्पष्ट प्रावधानों को समाहित करना अत्यंत आवश्यक है जो “घृणा भड़काने” को स्पष्टता से परिभाषित करते हों। यह सुधार टी.के. विश्वनाथन समिति (2015), बेजबरुआ समिति (2014) एवं 267वीं विधि आयोग की रिपोर्ट (2017) की अनुशंसाओं के अनुरूप होना चाहिये ताकि कानून के अति-विस्तृत विनियोजन के जोखिम को कम किया जा सके।
- न्यायिक सक्रियता: उत्तेजक सामग्री के विरुद्ध त्वरित न्याय प्रक्रिया सुनिश्चित करने हेतु फास्ट-ट्रैक न्यायालयों अथवा विशेष पीठों का गठन अनिवार्य है, ताकि किसी भी अभिव्यक्ति को लिंचिंग या शारीरिक हमलों में तब्दील होने से रोका जा सके।
- रबात थ्रेशोल्ड टेस्ट: विधि विशेषज्ञ “हानि” की सीमा को मानकीकृत करने के लिये वर्ष 2012 की संयुक्त राष्ट्र रबात कार्ययोजना का समर्थन करते हैं, जो छह-भागीय परीक्षण—संदर्भ, वक्ता, उद्देश्य, सामग्री, विस्तार और हानि की संभावना—प्रदान करती है, ताकि संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आपराधिक उकसावे के बीच अंतर किया जा सके।
- AI-संचालित मॉडरेशन: टेक प्लेटफॉर्मों को सक्रिय मॉडरेशन के लिये मशीन लर्निंग का उपयोग करना चाहिये, जिसमें घृणा प्रतीकों का ‘शैडो-बैनिंग’ और बार-बार उल्लंघन करने वालों की सामग्री को एल्गोरिद्मिक रूप से कम प्राथमिकता देना शामिल है, ताकि विभाजनकारी सामग्री के वायरल प्रसार को सीमित किया जा सके।
- सामाजिक सुदृढ़ता: निवारक उपायों में प्रतिवाद कथाओं (सकारात्मक अभिव्यक्ति) को बढ़ावा देना और नागरिकों को प्रचार तथा ‘अन्यीकरण’ कथाओं की पहचान करने में सक्षम बनाने के लिये NCERT पाठ्यक्रम में मीडिया साक्षरता को शामिल करना शामिल है।
- वैश्विक सहयोग: चूँकि घृणास्पद सामग्री के स्रोत अक्सर अंतर्राष्ट्रीय होते हैं, इसलिये सीमा-पार डेटा साझा करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ आवश्यक हैं, ताकि विदेशी सर्वरों से साक्ष्य एकत्र किया जा सके और साथ ही वैश्विक मानवाधिकार मानकों का पालन भी सुनिश्चित हो सके।
निष्कर्ष
हेट स्पीच पर नियंत्रण के लिये अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 19(2) के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। ओडिशा का प्रस्तावित कानून, जिसे AI-आधारित मॉडरेशन और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया का समर्थन प्राप्त है, सांप्रदायिक सौहार्द को संस्थागत रूप देने का एक व्यापक प्रयास है। इसकी सफलता सटीक कानूनी परिभाषाओं तथा डिजिटल नीतियों और ज़मीनी स्तर पर उनके प्रभावी क्रियान्वयन के बीच की खाई को पाटने पर निर्भर करेगी।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न."हेट स्पीच (घृणास्पद भाषण) ही हेट क्राइम (घृणा अपराध) का अग्रदूत है।" इस कथन के आलोक में सांप्रदायिक वैमनस्य से निपटने हेतु भारत में विद्यमान कानूनी ढाँचों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. हेट स्पीच और हेट क्राइम के बीच मुख्य अंतर क्या है?
हेट स्पीच उन शब्दों या कार्यों को संदर्भित करता है जिनका उद्देश्य किसी समूह के विरुद्ध घृणा फैलाना होता है, जबकि हेट क्राइम ऐसे आपराधिक कृत्य होते हैं (जैसे– हमला या मॉब लिंचिंग) जो किसी व्यक्ति की पहचान के प्रति पूर्वाग्रह से प्रेरित होते हैं।
2. रबात थ्रेशोल्ड टेस्ट क्या है?
यह संयुक्त राष्ट्र की रबात कार्ययोजना से लिया गया एक छह-भागीय परीक्षण (संदर्भ, वक्ता, मंशा, सामग्री, विस्तार और संभावना) है, जिसका उपयोग संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आपराधिक उकसावे के बीच वस्तुनिष्ठ रूप से अंतर करने के लिये किया जाता है।
3. शाहीन अब्दुल्ला बनाम भारत संघ (2022) मामले में सर्वोच्च न्यायालय का क्या निर्देश था?
न्यायालय ने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे हेट स्पीच के मामलों में बिना औपचारिक शिकायत की प्रतीक्षा किये, स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) लेकर तुरंत FIR दर्ज करें और यह अपराधी के धर्म की परवाह किये बिना किया जाए।
4. विश्वनाथन और बेजबरुआ समितियाँ हेट स्पीच विनियमन में कैसे योगदान देती हैं?
विश्वनाथन समिति (2015) ने पहचान के आधार पर उकसावे के लिये विशेष दंडात्मक प्रावधानों की सिफारिश की, जबकि बेजबरुआ समिति (2014) ने नस्लीय अपमान और मानव गरिमा से संबंधित मामलों से निपटने हेतु कानून में संशोधन पर ध्यान केंद्रित किया।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. 'निजता का अधिकार' भारत के संविधान के किस अनुच्छेद के तहत संरक्षित है? (2021)
(a) अनुच्छेद 15
(b) अनुच्छेद 19
(c) अनुच्छेद 21
(d) अनुच्छेद 29
उत्तर: (c)
प्रश्न 2. निजता के अधिकार को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के आंतरिक भाग के रूप में संरक्षित किया गया है। भारत के संविधान में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा उपर्युक्त वाक्य को सही एवं उचित रूप से लागू करता है? (2018)
(a) अनुच्छेद 14 और संविधान के 42वें संशोधन के तहत प्रावधान।
(b) अनुच्छेद 17 और भाग IV में राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत।
(c) अनुच्छेद 21 और भाग III में गारंटीकृत स्वतंत्रता।
(d) अनुच्छेद 24 और संविधान के 44वें संशोधन के तहत प्रावधान।
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. आप 'वाक् और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य' संकल्पना से क्या समझते हैं? भारत में फिल्में अभिव्यक्ति के अन्य रूपों से तनिक भिन्न स्तर पर क्यों हैं? चर्चा कीजिये। (2014)