भारत में इच्छामृत्यु पर बहस | 19 Jan 2026
प्रिलिम्स के लिये: भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023, सर्वोच्च न्यायालय, अनुच्छेद 21, विधि आयोग, उच्च न्यायालय, आयुष्मान भारत, आशा।
मेन्स के लिये: इच्छामृत्यु का अवलोकन, जिसमें इसकी प्रमुख परिभाषाएँ, इसके वैधानिकीकरण के पक्ष और विपक्ष के मुख्य तर्क तथा संभावित आगे की राह शामिल है।
चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय हरीश राणा बनाम भारत संघ (2025) मामले की सुनवाई कर रहा है जिसमें जीवन-रक्षक उपचार को वापस लेने के माध्यम से निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देने की याचिका दायर की गई है।
- याचिकाकर्त्ता पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर हैं और चौथी मंज़िल से गिरने के कारण सिर की गंभीर चोटों के बाद 100% क्वाड्रिप्लेजिक विकलांगता (quadriplegic disability) से पीड़ित हैं।
सारांश
- सर्वोच्च न्यायालय ने हरीश राणा बनाम भारत संघ (2025) मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रखा है, जो निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देने से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण मामला है।
- सक्रिय इच्छामृत्यु अवैध है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत ‘गरिमा के साथ मरने के अधिकार’ को बनाए रखने के लिये सख्त दिशा-निर्देशों के अंतर्गत निष्क्रिय इच्छामृत्यु (उपचार वापस लेना) को वैध कर दिया है।
- यह मामला उस नैतिक संघर्ष को फिर से उजागर करता है, जिसमें गरिमापूर्ण मृत्यु के लिये व्यक्तिगत स्वायत्तता बनाए रखने और संवेदनशील जनसंख्या के खिलाफ संभावित दुरुपयोग को रोकने के बीच संतुलन स्थापित करना शामिल है।
इच्छामृत्यु क्या है?
- परिचय: इच्छामृत्यु का अर्थ है किसी अपरिहार्य या घातक रोग के कारण उत्पन्न असहनीय कष्ट को कम करने के लिये मृत्यु को जानबूझकर शीघ्र करना। इसका उद्देश्य जानबूझकर और बिना दर्द के हस्तक्षेप के माध्यम से शारीरिक दर्द, मानसिक पीड़ा और आध्यात्मिक कष्ट को कम करना है।
- इच्छामृत्यु पर बहस केवल चिकित्सकीय नहीं है, यह नैतिक मूल्यों, मानवाधिकारों और सामाजिक विश्वासों में गहराई से निहित है।
- इच्छामृत्यु के रूप और वर्गीकरण: इसे मुख्यतः दो प्रकारों में बांटा गया है: सक्रिय इच्छामृत्यु (जानबूझकर की जाने वाली क्रिया, जैसे– घातक इंजेक्शन) और निष्क्रिय इच्छामृत्यु (जीवन-रक्षक उपचार को रोकना या वापस लेना)।
- इन्हें आगे स्वैच्छिक (रोगी की सहमति के साथ), अस्वैच्छिक (असमर्थ रोगी के लिये निर्णय) और अनैच्छिक (बिना सहमति के, व्यापक रूप से अवैध) रूपों में विभाजित किया गया है।
- भारत में कानूनी ढाँचा:
- भारतीय कानून सक्रिय इच्छामृत्यु को स्पष्ट रूप से निषेध करता है। भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत किसी भी जानबूझकर की गई मृत्यु को धारा 100 (दोषपूर्ण हत्या) या धारा 101 (हत्या) के अंतर्गत अपराध माना गया है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त नियामक ढाँचे के अंतर्गत निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध कर दिया है, और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के अंतर्गत गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी है।
- विधि आयोग की 241वीं रिपोर्ट (2012) में स्पष्ट किया गया कि किसी सक्षम रोगी द्वारा जीवन-रक्षक उपचार को अस्वीकार करना कानूनी रूप से मान्य है और ऐसी सूचित इच्छाओं का पालन करने वाले चिकित्सकों पर प्रोत्साहन या दोषपूर्ण हत्या का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
- भारत में इच्छामृत्यु से संबंधित निर्णय:
- मारुति श्रीपति दुबाल बनाम महाराष्ट्र राज्य (1987): बॉम्बे उच्च न्यायालय ने यह माना कि मरने का अधिकार अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का हिस्सा है, जिससे असाध्य रोग से पीड़ित या अत्यधिक पीड़ा में जीवन समाप्त करने की अनुमति दी गई।
- गियान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996): सर्वोच्च न्यायालय ने इस दृष्टिकोण को पलटते हुए कहा कि जीवन का अधिकार मरने के अधिकार को शामिल नहीं करता है और जीवन के संरक्षण पर बल दिया।
- अरुणा शानबाग बनाम भारत संघ (2011): सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त कानूनी और चिकित्सकीय सुरक्षा उपायों के अंतर्गत निष्क्रिय इच्छामृत्यु (जीवन-सहायता रोकना) की अनुमति दी, यहाँ तक कि उन रोगियों के लिये भी जो सहमति देने में असमर्थ हैं।
- कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018): सर्वोच्च न्यायालय ने सक्रिय इच्छामृत्यु (अनुमति नहीं) को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (दुर्लभ मामलों में अनुमति प्राप्त) से अलग किया और गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी, जिसमें लिविंग विल (अग्रिम चिकित्सा निर्देश) के माध्यम से उपचार से इनकार शामिल है।
- भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया:
- सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2018 के निर्देशों ने एक प्राथमिक और एक द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड द्वारा दो-चरणीय चिकित्सा समीक्षा अनिवार्य की।
- प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड: अस्पताल द्वारा गठित, जिसमें उपचार विभाग के प्रमुख और सामान्य चिकित्सा, हृदय रोग विज्ञान, तंत्रिका विज्ञान, नेफ्रोलॉजी, मनोचिकित्सा या ऑन्कोलॉजी जैसे क्षेत्रों के कम-से-कम तीन वरिष्ठ विशेषज्ञ शामिल होते हैं, प्रत्येक के पास 20 वर्षों का अनुभव होता है।
- द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड: ज़िला कलेक्टर द्वारा गठित, जिसकी अध्यक्षता मुख्य ज़िला चिकित्सा अधिकारी करते हैं, साथ ही समान चिकित्सा विशेषज्ञों के तीन विशेषज्ञ डॉक्टर भी इसमें शामिल हैं।
- वर्ष 2023 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने प्रक्रिया को सरल बनाते हुए दोनों बोर्डों को बनाए रखा, जबकि विशेषज्ञ अनुभव की अनिवार्य अवधि को 20 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया। साथ ही, उनकी राय देने के लिये 48 घंटे की सख्त समय-सीमा भी निर्धारित की गई।
- द्वितीयक बोर्ड में भी संशोधन किया गया, जिसमें मुख्य ज़िला चिकित्सा अधिकारी के स्थान पर ज़िला चिकित्सा अधिकारी के द्वारा नामित व्यक्ति को अध्यक्ष बनाया गया और अब दोनों बोर्डों में प्रत्येक में तीन-तीन सदस्य शामिल हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2018 के निर्देशों ने एक प्राथमिक और एक द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड द्वारा दो-चरणीय चिकित्सा समीक्षा अनिवार्य की।
- इच्छामृत्यु पर वैश्विक कानूनी परिदृश्य: नीदरलैंड, बेल्जियम, लक्ज़मबर्ग, स्पेन, क्यूबेक (कनाडा) और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के कुछ भागों में सख्त शर्तों के तहत इच्छामृत्यु और चिकित्सक-सहायक आत्महत्या दोनों की अनुमति है।
- स्विट्ज़रलैंड ऐसा देश है, जो गैर-चिकित्सकों द्वारा सहायक आत्महत्या की अनुमति देता है लेकिन सक्रिय इच्छामृत्यु पर प्रतिबंध लगाता है।
- स्वीडन और फ्राँस निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देते हैं, जबकि इटली उपचार से इनकार करने के अधिकार को मान्यता देता है।
- नैतिक और व्यावहारिक विवाद: इच्छामृत्यु पर बहस मूल रूप से दो तर्कों में विभाजित है — एक तरफ व्यक्तिगत स्वायत्तता और "सम्मानजनक मृत्यु" के पक्ष में तर्क हैं, जबकि दूसरी ओर जीवन की पवित्रता और हिप्पोक्रेटिक शपथ के "किसी को नुकसान न पहुँचाने" के सिद्धांत पर आधारित विरोधी तर्क मौजूद हैं।
- यह उस परिप्रेक्ष्य को और जटिल बनाता है कि किसी रोगी की मानसिक क्षमता का सही मूल्यांकन कैसे किया जाए, साथ ही इसमें चिकित्सा निर्णय में संभावित दुरुपयोग या “स्लिपरी स्लोप” जैसे नैतिक जोखिम भी शामिल हैं।
इच्छामृत्यु की वैधता के पक्ष में प्रमुख तर्क क्या हैं?
- व्यक्तिगत स्वायत्तता को बनाए रखना: तर्क का केंद्रीय सिद्धांत रोगी की स्वायत्तता और स्व-निर्णय है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत "गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार" को मान्यता देते हुए अग्रिम चिकित्सा निर्देशों को वैध बनाकर कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018) में बरकरार रखा।
- लाइलाज पीड़ा को कम करना: इच्छामृत्यु को उस असहनीय पीड़ा को कम करने के लिये समर्थित किया जाता है जो अंत समय की गंभीर बीमारियों में होती है। इस दृष्टिकोण का समर्थन उन देशों के डेटा से मिलता है, जहाँ इसे मुख्यतः गंभीर स्थितियों, जैसे– उन्नत कैंसर में अपनाया जाता है।
- निरर्थक चिकित्सा हस्तक्षेप को रोकना: यह निरर्थक, पीड़ा बढ़ाने वाले उपचार को रोकता है, परिवारों और स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों पर भावनात्मक और वित्तीय बोझ को कम करता है, जैसा कि भारत में अरुणा शानबाग मामला, 2011 के बाद से अनुमति प्राप्त निष्क्रिय इच्छामृत्यु द्वारा दर्शाया गया है, जो गैर-लाभकारी हस्तक्षेपों को वापस लेने के लिये है।
- दार्शनिक और व्यावहारिक आधार: उदारवादी सिद्धांत (जॉन स्टुअर्ट मिल) शारीरिक स्वायत्तता के आधार पर इच्छामृत्यु चुनने के अधिकार का विरोध करते हैं, जबकि उपयोगितावादी नैतिकता (जेरेमी बेंथम) पीड़ा को कम करने के लिये इसका समर्थन करती है। यह दर्द से राहत देने के चिकित्सा कर्त्तव्य के साथ संरेखित है और स्वास्थ्य सेवा संसाधनों के न्यायसंगत आवंटन की अनुमति देता है।
इच्छामृत्यु के वैधीकरण के विरुद्ध प्रमुख तर्क क्या हैं?
- नैतिक और नैतिकता संबंधी संघर्ष: कई लोग इच्छामृत्यु को जीवन की पवित्रता के उल्लंघन के रूप में देखते हैं। यह दृष्टिकोण धार्मिक, सांस्कृतिक तथा कर्त्तव्यवादी नैतिकता (इमैनुएल कांट) पर आधारित है, जो जीवन को अपने आपमें एक अस्पृश्य और अंतिम लक्ष्य मानता है।
- दुरुपयोग और दबाव का उच्च जोखिम: कमज़ोर आबादी, वृद्ध, विकलांग और आर्थिक रूप से निर्भर लोग इच्छामृत्यु के लिये दबाव में आने के उच्च जोखिम में होते हैं, विशेषकर ऐसे देश में जहाँ सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ और असमान स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच उपलब्ध हो।
- वास्तविक सहमति का आकलन करने में चुनौतियाँ: कई भारतीय मनोचिकित्सक असाध्य रोग के रोगियों में अवसाद या सूक्ष्म दबाव का सही पता लगाने में आश्वस्त नहीं हो पाते हैं, जिससे अनुचित अनुमति देने का जोखिम बढ़ जाता है।
- कठोर कानूनी प्रतिबंध और अस्पष्टता: BNS, 2023 के तहत ऐसे कार्यों को धारा 100 (दोषपूर्ण हत्या), 101 (हत्या) और 108 (आत्महत्या के लिये प्रोत्साहित करना) के अंतर्गत दंडनीय माना गया है, जिससे स्पष्ट नियामक कानून न होने पर चिकित्सकों और पेशेवरों हेतु गंभीर कानूनी जोखिम उत्पन्न होता है।
- जटिल और पहुँच से बाहर प्रक्रियाएँ: सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु में एक धीमी, अदालती प्रक्रिया शामिल है जिसमें कई मेडिकल बोर्डों की भागीदारी होती है। इससे यह प्रक्रिया कई लोगों के लिये पहुँच से बाहर हो जाती है और न्यायिक बोझ बढ़ जाता है।
भारत अपने एंड-ऑफ-लाइफ केयर फ्रेमवर्क को किस प्रकार सुदृढ़ कर सकता है?
- विधायी स्पष्टता: सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2018 के दिशा-निर्देशों को निष्क्रिय इच्छामृत्यु और एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव्स (लिविंग विल) पर संसद में स्पष्ट कानून बनाकर विधिक सुरक्षा प्रदान करनी चाहिये, ताकि चिकित्सक एवं स्वास्थ्य पेशेवर सुरक्षित रूप से निर्णय ले सकें।
- प्रक्रियाओं का सरलीकरण: प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिये निगरानी को ज़िला स्तरीय समितियों या बहुविषयक अस्पताल नैतिकता समितियों तक स्थानांतरित किया जाना चाहिये। इसके साथ ही लिविंग विल्स को राष्ट्रीय स्वास्थ्य डिजिटल रिकॉर्ड में शामिल किया जाना चाहिये, जिससे उनकी आसान अभिगम्यता सुनिश्चित हो, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2023 में सरलीकरण के दिशा-निर्देशों में शुरू किया गया है।
- सार्वभौमिक उपशामक देखभाल अभिगम्यता: होम-बेस्ड, सामुदायिक और अस्पताल आधारित सेवाओं का नेटवर्क स्थापित करके उपशामक देखभाल को प्राथमिकता एवं संस्थागत स्वरूप दिया जाना चाहिये। आयुष्मान भारत का उपयोग कवरेज के लिये किया जाना चाहिये तथा ASHA कार्यकर्त्ताओं को सामान्य चिकत्सकीय प्रबंधन में प्रशिक्षित किया जाना चाहिये।
- कठोर सुरक्षा उपाय: कमज़ोर समूहों (वृद्ध, दिव्यांग जनों) पर दबाव का अभिनिर्धारण करने तथा रोगी की वास्तविक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिये अनिवार्य स्वतंत्र मनोचिकित्सकीय मूल्यांकन, सामाजिक कार्यकर्त्ता आकलन और कूलिंग-ऑफ अवधि लागू की जानी चाहिये।
- सार्वजनिक जागरूकता और सहमति: पूरे देश में जनता व पेशेवरों को लिविंग विल्स और एंड-ऑफ-लाइफ विकल्पों के बारे में शिक्षित करने के लिये अभियान चलाए जाने चाहिये, साथ ही चिकित्सकीय निकायों, कानूनी विशेषज्ञों, नैतिकता विशेषज्ञों तथा धार्मिक नेताओं को शामिल कर नैतिक सहमति बनाने हेतु सार्वजनिक संवाद को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
निष्कर्ष
हरीश राणा मामला निष्क्रिय इच्छामृत्यु और एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव्स पर स्पष्ट विधायी ढाँचे की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है। जहाँ मरीज़ की स्वायत्तता तथा पीड़ा से राहत महत्त्वपूर्ण हैं, वहीं दुरुपयोग, दबाव एवं विधिक अस्पष्टता का जोखिम सुदृढ़ सुरक्षा उपायों, उपशामक देखभाल के विस्तार व प्रक्रियाओं के सरलीकरण की मांग करता है, ताकि कमज़ोर नागरिकों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।
|
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “गरिमा के साथ मरने का अधिकार, गरिमा के साथ जीने के अधिकार का विस्तार है” — भारत में इच्छामृत्यु के न्यायिक उत्कर्ष के संदर्भ में समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। |
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु क्या है?
निष्क्रिय इच्छामृत्यु में जीवन-रक्षक उपचार को बंद करना या रोकना शामिल है। इसे सर्वोच्च न्यायालय ने अरुणा शानबॉग (2011) और कॉमन कॉज़ (2018) मामले के फैसलों के बाद कठोर सुरक्षा उपायों के तहत अनुमति दी है।
2. क्या भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु वैध है?
सक्रिय इच्छामृत्यु अवैध है तथा BNS- 2023 की धारा 100 और 101 के तहत इसे ‘दोषपूर्ण हत्या’ या हत्या माना जाता है, जबकि धारा 108 के तहत इसे ‘आत्महत्या के उकसावे के रूप में दंडनीय’ ठहराया गया है।
3. एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव (लिविंग विल) क्या है?
यह एक कानूनी दस्तावेज़ है, जो सक्षम वयस्क को जीवन-रक्षक उपचार से पहले ही इनकार करने की अनुमति देता है। इसे सर्वोच्च न्यायालय ने कॉमन कॉज़ (2018) में मान्यता दी है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निजता के अधिकार को जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत भाग के रूप में संरक्षित किया जाता है। भारत के संविधान में निम्नलिखित में से किससे उपर्युक्त कथन सही एवं समुचित ढंग से अर्थित होता है? (2018)
(a) अनुच्छेद 14 एवं संविधान के 42वें संशोधन के अधीन उपबंध
(b) अनुच्छेद 17 एवं भाग IV में दिये गए राज्य के नीति निदेशक तत्त्व
(c) अनुच्छेद 21 एवं भाग III में गारंटी की स्वतंत्रताएँ
(d) अनुच्छेद 24 एवं संविधान के 44वें संशोधन के अधीन उपबंध
उत्तर: C
मेन्स
प्रश्न. सामाजिक विकास की संभावनाओं को बढ़ाने के क्रम में, विशेषकर जराचिकित्सा एवं मातृ स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में सुदृढ़ और पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल संबंधी नीतियों की आवश्यकता है। विवेचन कीजिये। (2020)
