अनुसूचित जाति से संबंधित लोगों को सार्वजनिक स्थानों से वंचित करना | 14 Mar 2026

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों? 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 'भारत में अपराध 2023' रिपोर्ट उन मामलों में वृद्धि पर प्रकाश डालती है, जिनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अनुसूचित जातियों (SC) को सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित किया गया था।

सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित किये जाने से संबंधित NCRB के आँकड़े

  • देश भर में सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करने के 180 मामलों में से 173 उत्तर प्रदेश से संबंधित थे, जिससे यह राज्य इस श्रेणी में स्पष्ट रूप से अलग-थलग दिखाई देता है।
  • यह रुझान वर्ष 2017 से बढ़ रहे हैं, जो मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश में मामलों की बढ़ती रिपोर्टिंग और पंजीकरण से प्रेरित है।
    • रिपोर्ट किये गए कुल मामलों में राज्य का हिस्सा वर्ष 2018 में लगभग 68% से बढ़कर वर्ष 2019 में लगभग 80% हो गया।
    • वर्ष 2022 में यह एकाग्रता और भी अधिक स्पष्ट हो गई, जब देश भर में रिपोर्ट किये गए ऐसे सभी मामलों में से 98% से अधिक उत्तर प्रदेश से आए।
  • अनुसूचित जातियों की तुलना में, देश भर में अनुसूचित जनजातियों (ST) को सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित किये जाने के मामले अपेक्षाकृत कम बने हुए हैं।

सार्वजनिक स्थानों से वंचित किये जाने के मूल कारण क्या हैं?

  • जाति-आधारित स्थानिक भिन्नता: कई ग्रामीण क्षेत्रों में अनौपचारिक जातीय भूगोल अभी भी मौज़ूद है जहाँ प्रभुत्वशाली जातियाँ मंदिरों, जल निकायों, श्मशान घाटों और गाँव के रास्तों को नियंत्रित करती हैं।
    • आधुनिकीकरण के बावज़ूद, आनुष्ठानिक शुद्धता की रूढ़िवादी धारणा विशिष्ट सार्वजनिक वस्तुओं, विशेष रूप से जलस्रोतों और धार्मिक स्थलों तक पहुँच निर्धारित करती हैं।
      • रूढ़िवादी तत्त्वों द्वारा किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के प्रवेश को अभी भी साझा सार्वजनिक संसाधनों को "अपवित्र" करने के रूप में देखा जाता है।
    • ऐसी प्रथाएँ, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत इसके उन्मूलन के बावज़ूद, अस्पृश्यता के निरंतर रूपों को दर्शाती हैं, अनुच्छेद 15 की गारंटी को कमज़ोर करती हैं जो सार्वजनिक स्थानों तक समान पहुँच सुनिश्चित करता है।
  • स्थानीय शक्ति संरचनाओं का प्रभुत्व: ग्रामीण शासन संरचनाएँ और अनौपचारिक जाति पंचायतें अक्सर सामाजिक पदानुक्रम को सुदृढ़ करती हैं।
    • ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों की बड़ी आबादी आज भी भूमिहीन कृषि मज़दूरों के रूप में जीवनयापन करती है। भूमि स्वामित्व और आर्थिक निर्भरता प्रभुत्वशाली समूहों को डराने-धमकाने या सामाजिक बहिष्कार   के माध्यम से बहिष्कार करने में सक्षम बनाती है ताकि उपेक्षित समुदायों को सार्वजनिक स्थानों पर अपने कानूनी अधिकारों का दावा करने से रोका जा सके।
  • अत्याचार निरोधक कानूनों का कमज़ोर प्रवर्तन: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 अनुसूचित जातियों के लिये सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करने को अपराध घोषित करता है, हालाँकि इसके प्रवर्तन में कमियाँ बनी हुई हैं।
    • कई मामलों में पीड़ितों को प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने में विलंब, अपर्याप्त पुलिस जाँच और अत्याचार के मामलों में कम दोषसिद्धि दर का सामना करना पड़ता है, जो कानून के निवारक प्रभाव को कमज़ोर करता है और भेदभावपूर्ण प्रथाओं को जारी रहने देता है।
  • कानूनी अधिकारों के बारे में सीमित जागरूकता: कई उपेक्षित समुदाय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के तहत सुरक्षा के बारे में अनजान हैं।
    • कानूनी साक्षरता की कमी पीड़ितों को भेदभाव की रिपोर्ट करने या संस्थागत उपचार की तलाश करने से रोकती है।

सार्वजनिक स्थानों को लोकतांत्रिक बनाने के लिये कौन-सी विधिक और संस्थागत सुरक्षा उपलब्ध हैं?

  • अनुच्छेद 15: जाति के आधार पर भेदभाव को प्रतिषेध करता है और दुकानों, कुओं, तालाबों, सड़कों जैसे सार्वजनिक स्थानों तक समान पहुँच को सुनिश्चित करता है।
  • अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है और इसे किसी भी रूप में व्यवहार में लाने को  दंडनीय अपराध घोषित करता है।
  • अनुच्छेद 21: प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है।
  • 73वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992: पंचायती राज संस्थाओं में अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) और महिलाओं के लिये आरक्षण अनिवार्य करता है, जिससे स्थानीय शासन में उनकी भागीदारी एवं ग्रामीण संसाधनों और सार्वजनिक स्थानों पर अधिक समावेशी नियंत्रण सुनिश्चित होता है।
  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989: अनुसूचित जाति/जनजाति के व्यक्तियों को सार्वजनिक स्थानों, मंदिरों, जलस्रोतों और सामुदायिक संसाधनों में प्रवेश से वंचित करने जैसे कृत्यों को अपराध घोषित करता है।
  • नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955: अस्पृश्यता से उत्पन्न होने वाली प्रथाओं के खिलाफ कानूनी सुरक्षा उपाय प्रदान करता है, जिसमें सार्वजनिक सुविधाओं तक पहुँच से वंचित करना शामिल है।
  • राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग: अनुसूचित जाति समुदायों के लिये सुरक्षा उपायों की निगरानी करता है और भेदभाव से संबंधित शिकायतों की जाँच करता है।
  • न्यायिक घोषणाएँ:
    • कर्नाटक राज्य बनाम अप्पा बालू इंगले (1995): भारत के उच्चतम न्यायालय ने यह माना है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 और संबंधित कानूनों का उद्देश्य समाज को भेदभावपूर्ण जातिगत प्रथाओं के अंधानुकरण से मुक्त करना है, जिनका अब कोई कानूनी या नैतिक आधार नहीं रह गया है।
    • अरुमुगम सर्वै बनाम तमिलनाडु राज्य (2011): उच्चतम न्यायालय ने ज़िला प्रशासनों को दैनिक स्थानिक अस्पृश्य प्रथाओं, जैसे– सार्वजनिक चाय की दुकानों में भेदभावपूर्ण "टू-टंबलर सिस्टम" को समाप्त करने का निर्देश दिया।

भारत में सार्वजनिक स्थलों को लोकतांत्रिक बनाने के लिये क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

  • स्थानिक न्याय सुनिश्चित करना: पारंपरिक जाति-आधारित स्थानीय भेदभाव को तोड़ने के लिये सार्वजनिक सुविधाओं (पंचायत भवन, आंगनवाड़ी, PDS दुकानें, कुओं) को तटस्थ या अनुसूचित जाति-बहुल क्षेत्रों में स्थापित करना, जिससे प्रभुत्वशाली जातियाँ स्थानों पर नियंत्रण (गेटकीपिंग) करने के बजाय उन्हें साझा करने के लिये मजबूर हों।
  • निधियों को सामाजिक लेखांकन/ऑडिट से जोड़ना: ग्रामसभा के सामाजिक लेखांकन को अनिवार्य बनाना और विकास अनुदानों को इस प्रमाणीकरण से जोड़ना कि कोई अस्पृश्यता या स्थानिक बहिष्कार मौज़ूद नहीं है।
  • आधिकारिक जवाबदेही: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 4 को सख्ती से लागू करना, जो उन सार्वजनिक अधिकारियों को दंडित करती है जो प्राथमिकी दर्ज करने या पीड़ितों की रक्षा करने जैसे कर्त्तव्यों की उपेक्षा करते हैं।
  • विशिष्ट विशेष न्यायालय स्थापित करना: अत्याचार संबंधी मामलों में त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने, लंबित मामलों को कम करने और निवारक प्रभाव में सुधार करने के लिये ज़िला स्तर पर विशिष्ट न्यायालय स्थापित करना।
  • व्यवहार परिवर्तन अभियान: बी.आर. अंबेडकर, ज्योतिराव फुले और पेरियार ई.वी. रामासामी के संवैधानिक मूल्यों और जाति-विरोधी सुधार विचारों को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष

सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करना यह दर्शाता है कि दैनिक जीवन में जाति आधारित ऊँच-नीच की व्यवस्था अभी भी बनी हुई है। इस समस्या के समाधान हेतु मज़बूत कानून प्रवर्तन, सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण तथा संवैधानिक नैतिकता और समानता के प्रति समाज की गहरी प्रतिबद्धता आवश्यक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 17 क्या प्रावधान करता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 'अस्पृश्यता' (छुआछूत) का उन्मूलन करता है और किसी भी रूप में इसके आचरण को निषिद्ध करता है। अस्पृश्यता से उपजी किसी भी अक्षमता को लागू करना कानून के अनुसार एक दंडनीय अपराध होगा।

2. अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति  (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का उद्देश्य क्या है?
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 जाति आधारित अत्याचारों को अपराध घोषित करता है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करना भी शामिल है और इसके अंतर्गत विशेष न्यायालय, पीड़ितों की सुरक्षा तथा राहत के प्रावधान किये गए हैं।

3. संविधान के अनुच्छेद 15(2) का क्या महत्त्व है?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 15(2) सार्वजनिक धन से संचालित या जनता के उपयोग के लिये उपलब्ध स्थानों, जैसे– दुकानों, कुओं, तालाबों और सड़कों पर पहुँच के मामले में किसी भी प्रकार के भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।

4. कौन-सा कानून अस्पृश्यता से उत्पन्न होने वाली प्रथाओं को दंडित करता है?
नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 अस्पृश्यता से उत्पन्न सामाजिक या धार्मिक निर्योग्यताओं को लागू करने पर दंड का प्रावधान करता है।

5. स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम अप्पा बालू इंगले (1995) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का क्या महत्त्व था?

स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम अप्पा बालू इंगले (1995) मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अनुच्छेद 17 का उद्देश्य उन भेदभावपूर्ण जातिगत प्रथाओं को समाप्त करना है जिनका कोई भी कानूनी या नैतिक आधार नहीं है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

मेन्स

प्रश्न 1. बहु-सांस्कृतिक भारतीय समाज को समझने में क्या जाति की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है ? उदाहरणों सहित विस्तृत उत्तर दीजिये। (2020)

प्रश्न 2. "जाति व्यवस्था नई-नई पहचानों और सहचारी रूपों को धारण कर रही है। अतः, भारत में जाति व्यवस्था का उन्मूलन नहीं किया जा सकता है।" टिप्पणी कीजिये । (2018)

प्रश्न 3. स्वतंत्रता के बाद अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के प्रति भेदभाव को दूर करने के लिये राज्य द्वारा की गई दो प्रमुख विधिक पहलें क्या हैं? (मुख्य परीक्षा- 2017)

प्रश्न 4: अपसारी उपागमों और रणनीतियों के होने के बावजूद, महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर का दलितों की बेहतरी का एक समान लक्ष्य था। स्पष्ट कीजिये। (2015)