परिसीमन और विधानमंडलों में महिला आरक्षण | 16 Apr 2026
प्रिलिम्स के लिये: परिसीमन, जनगणना , अनुच्छेद 81 , अनुच्छेद 82 , नारी शक्ति वंदन अधिनियम
मेन्स के लिये: भारतीय लोकतंत्र में परिसीमन और प्रतिनिधित्व, संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध, भारत में महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक संशोधन और चुनावी सुधार
चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार ने तीन प्रमुख विधेयक पेश किये हैं: संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026, परिसीमन विधेयक, 2026 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 ताकि नवीनतम उपलब्ध जनगणना के आधार पर नए परिसीमन को सक्षम किया जा सके, लोकसभा का विस्तार किया जा सके और विधानमंडलों में 33% महिला आरक्षण को संचालित किया जा सके।
सारांश
- सरकार ने तीन विधेयक पेश किये हैं ताकि हालिया जनगणना डेटा का उपयोग करके नए परिसीमन को सक्षम किया जा सके, लोकसभा का विस्तार 850 सीटों तक किया जा सके और महिलाओं के लिये 33% आरक्षण लागू किया जा सके।
- एक नया परिसीमन आयोग निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण करेगा और सीटें आवंटित करेगा, जिसके निर्णय अंतिम और कानूनी रूप से बाध्यकारी होंगे, हालाँकि यह निष्पक्षता और संघीय संतुलन पर बहस का विषय होगा।
- यह कदम "एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य" को बनाए रखने का लक्ष्य रखता है, लेकिन दक्षिणी राज्यों के कम प्रतिनिधित्व और संघवाद पर संभावित प्रभाव के बारे में चिंताएँ उत्पन्न करता है।
'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को तेज़ी से लागू करने के लिये लाए गए तीन विधेयकों के प्रमुख प्रावधान क्या हैं?
संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026
- लोकसभा का विस्तार: यह अनुच्छेद 81 में संशोधन करता है ताकि लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 से बढ़ाकर 850 कर दी जाए (815 राज्यों से और 35 केंद्रशासित प्रदेशों से)।
- अनुच्छेद 81 समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को निर्धारित करता है; किसी राज्य को आवंटित सीटों और उसकी जनसंख्या के बीच का अनुपात सभी राज्यों में लगभग समान होना चाहिये (केवल 6 मिलियन से कम जनसंख्या वाले बहुत छोटे राज्यों के लिये अपवाद के साथ)।
- परिसीमन स्थगन को हटाना: यह विधेयक अनुच्छेद 82 के शीर्षक को "प्रत्येक जनगणना के बाद पुन: समायोजन" से बदलकर "निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण" करता है और प्रत्येक जनगणना के बाद राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या को पुन: समायोजित करने की आवश्यकता को हटा देता है।
- इसी प्रकार यह राज्य विधानसभाओं (अनुच्छेद 170) और अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिये आरक्षण पर अनुच्छेदों में संशोधन करता है, जिससे आधार वर्ष 2001 की जनगणना से बदलकर "ऐसी जनगणना" (Such Census) हो जाता है जिसे संसद कानून द्वारा उपयोग करने का निर्णय लेती है।
- वर्तमान में, अनुच्छेद 81 (2) और (3) लोकसभा सीटों को वर्ष 1971 की जनगणना तथा विधानसभा सीटों को 2001 की जनगणना के अनुसार स्थिर रखते हैं, "जब तक वर्ष 2026 के पश्चात् की गई प्रथम जनगणना के प्रासंगिक आँकड़े प्रकाशित न हो जाएँ"।
- परिसीमन को वर्ष 2026 के बाद की जनगणना से अलग करके सरकार वर्ष 2011 की जनगणना के डेटा का उपयोग करके परिसीमन कर सकती है।
- महिला कोटा में तेज़ी लाना: यह अनुच्छेद 334A में संशोधन करता है ताकि इस नई परिसीमन प्रक्रिया के पूरा होने के तुरंत बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम (संविधान 106वाँ संशोधन अधिनियम, 2023)) के तत्काल कार्यान्वयन की अनुमति दी जा सके।
- संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 को संसद में विशेष बहुमत और कम-से-कम आधे राज्यों द्वारा अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह संविधान में संशोधन करता है।
परिसीमन विधेयक, 2026
- जहाँ संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 इस व्यापक परिवर्तन की अनुमति देता है, वहीं यह विधेयक उसे लागू करने की वास्तविक व्यवस्था प्रदान करता है।
- नया परिसीमन आयोग: यह वर्ष 2002 के परिसीमन अधिनियम का स्थान लेता है तथा केंद्र सरकार को एक नया परिसीमन आयोग गठित करने के लिये सशक्त बनाता है।
- इस निकाय की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश द्वारा की जाएगी और इसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा राज्य निर्वाचन आयुक्त शामिल होंगे। इसे एक सिविल न्यायालय के समकक्ष शक्तियाँ प्रदान की जाएँगी।
- निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण: आयोग को सीटों के आवंटन का पुनः समायोजन करने तथा ‘नवीनतम प्रकाशित जनगणना आँकड़ों’ (जो वर्तमान में 2011 की जनगणना की ओर संकेत करते हैं) के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करने का दायित्व सौंपा गया है।
- परिसीमन आयोग को, पूर्व की भाँति, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि सभी निर्वाचन क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से यथासंभव सघन हों। इसके साथ ही, उसे भौतिक विशेषताओं, वर्तमान प्रशासनिक सीमाओं, संचार सुविधाओं और जन-सुविधाओं को भी ध्यान में रखना चाहिये।
- इन विधेयकों में मसौदा प्रकाशन, आपत्तियाँ और सार्वजनिक सुनवाई जैसे संरक्षण उपाय प्रदान किये गए हैं। हालाँकि, एक बार अधिसूचित होने के बाद आयोग के आदेश अंतिम होते हैं, उन्हें विधि का बल प्राप्त होता है और उन्हें न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती, जिससे परीक्षण और आलोचना की संभावना उत्पन्न हो सकती है।
- आरक्षण का कार्यान्वयन: आयोग को राज्यों के बीच सीटों का आवंटन करने, निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करने तथा अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) और महिलाओं के लिये आरक्षण निर्धारित करने का दायित्व सौंपा जाएगा।
संघ राज्य क्षेत्र (कानून संशोधन) विधेयक, 2026
- यह वह सक्षम विधेयक है, जो इन संरचनात्मक परिवर्तनों को उन संघ राज्य क्षेत्रों तक विस्तारित करने के लिये आवश्यक है, जिनकी अपनी विधायिकाएँ हैं।
- यह दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी में महिलाओं के लिये 33% आरक्षण तथा संबंधित परिसीमन सुधार को लागू करता है।
- परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य क्षेत्र (कानून संशोधन) विधेयक, 2026 सामान्य विधेयक हैं, जिन्हें संसद में साधारण बहुमत से पारित किया जा सकता है।
महिला आरक्षण का क्रियान्वयन
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करना: आगामी परिसीमन प्रक्रिया आधिकारिक रूप से नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023) के कार्यान्वयन को प्रारंभ करेगी।
- यह लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सभी सीटों में से एक-तिहाई (33%) सीटें महिलाओं के लिये आरक्षित करने का प्रावधान करता है।
- महत्त्वपूर्ण रूप से, इसमें अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिये आरक्षित सीटों के भीतर भी महिलाओं के लिये एक अनिवार्य उप-आरक्षण (sub-quota) शामिल है।
- आवर्तन और समाप्ति प्रावधान: महिलाओं के लिये आरक्षित विशिष्ट निर्वाचन क्षेत्रों का प्रत्येक आगामी परिसीमन चक्र के बाद क्रमिक रूप से आवर्तन किया जाएगा।
- इसके अतिरिक्त, इस आरक्षण में एक ‘सनसेट क्लॉज़’ (समाप्ति प्रावधान) शामिल है, यह प्रारंभिक रूप से 15 वर्षों के लिये मान्य होगा, हालाँकि संसद विधि के माध्यम से इसे बढ़ाने का अधिकार रखती है।
- यह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं के लिये किसी अलग आरक्षण का प्रावधान नहीं करता है।
परिसीमन क्या है?
- परिभाषा: परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिये निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ निर्धारित या पुनर्निर्धारित की जाती हैं, ताकि प्रत्येक सीट पर लगभग समान संख्या में मतदाता हों।
- उद्देश्य: इसका उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के लोकतांत्रिक सिद्धांत को लागू करना है, जिससे जनसंख्या घनत्व में समय के साथ होने वाले परिवर्तन के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों का संतुलन सुनिश्चित किया जा सके।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 82 के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद संसद द्वारा परिसीमन अधिनियम बनाया जाता है, जिसके माध्यम से राज्यों को लोकसभा सीटों का पुनः आवंटन किया जाता है तथा राज्यों को क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।
- अनुच्छेद 170 राज्य विधानसभाओं में सीटों के पुनः समायोजन तथा निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण का समान प्रावधान करता है।
- परिसीमन आयोग: यह केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक उच्च-शक्तिशाली एवं स्वतंत्र निकाय होता है, जिसमें 3 सदस्य शामिल होते हैं, एक अध्यक्ष (जो सर्वोच्च न्यायालय का सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है), मुख्य निर्वाचन आयुक्त (या उनके द्वारा नामित कोई निर्वाचन आयुक्त) तथा संबंधित राज्यों के राज्य निर्वाचन आयुक्त।
- आयोग के आदेशों को विधि का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके आदेश लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं, किंतु उनमें कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।
- मार्च 2026 तक इसे चार बार गठित किया गया है, अर्थात 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
- परिसीमन पर स्थगन: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने लोकसभा में सीटों की कुल संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर कर दिया, ताकि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण उपाय लागू किये (मुख्यतः दक्षिणी राज्य), उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी के रूप में दंडित न किया जाए।
- 84वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने कुल सीटों पर लगे स्थगन (freeze) को वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया।
- वर्ष 2002 में गठित परिसीमन आयोग ने वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर राज्यों के भीतर आंतरिक निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ पुनर्निर्धारित कीं, वहीं राज्यों के बीच सीटों का आवंटन अभी भी 1971 के आँकड़ों पर आधारित है।
- न्यायिक समीक्षा:किशोरचंद्र छंगनलाल राठौड़ बनाम भारत संघ और अन्य, 2024 मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यदि परिसीमन आयोग का कोई आदेश स्पष्ट रूप से विवेकाधीन है और संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन करता है, तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
प्रस्तावित परिसीमन के संबंध में क्या तर्क हैं?
इसके विरुद्ध तर्क
- जनसांख्यिकीय सफलता के लिये दंड: दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि पिछले 50 वर्षों में केंद्र सरकार की परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण नीतियों को सफलतापूर्वक लागू करने के कारण उन्हें प्रभावी रूप से दंडित किया जा रहा है।
- उनकी जनसंख्या वृद्धि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उत्तरी राज्यों की तुलना में काफी हद तक धीमी हो गई है।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व का नुकसान: यदि सीटों का पुनर्वितरण केवल 2011 की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो लोकसभा में दक्षिणी राज्यों की सीटों का अनुपात कम हो जाएगा।
- उत्तर प्रदेश का हिस्सा 14.73% से बढ़कर 16% से अधिक हो सकता है। केरल का हिस्सा 3.68% से घटकर 2.7% और तमिलनाडु का 7.18% से घटकर 5.88% हो सकता है।
- यह बड़े उत्तरी राज्यों तथा दक्षिणी राज्यों के बीच अंतर को और बढ़ाता है, जिससे दक्षिण की सापेक्ष राजनीतिक आवाज़ कमज़ोर हो जाती है।
- राष्ट्रपति निर्वाचन मंडल पर प्रभाव: राष्ट्रपति चुनाव में सांसद या विधायक के वोट का मूल्य वर्तमान में राज्यों के बीच समानता बनाए रखने के लिये 1971 की जनगणना के आधार पर तय किया गया है।
- यदि परिसीमन के परिणामस्वरूप सांसदों और विधायकों की संख्या बदलती है, तो राष्ट्रपति निर्वाचन मंडल की मूल गणना भी बदल जाएगी। इससे यह संवैधानिक प्रश्न उठता है कि क्या उत्तरी राज्यों को भारत के राष्ट्रपति के चुनाव में असंतुलित और एकतरफा प्रभाव प्राप्त हो जाएगा।
- संघवाद पर आघात: आलोचकों का तर्क है कि यह राजनीतिक शक्ति के केंद्रीकरण का एक ‘परोक्ष’ तरीका है।
- यह किसी राजनीतिक दल को केवल कुछ अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों में भारी जीत हासिल करके राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभुत्व स्थापित करने की अनुमति देता है, जिससे दक्षिणी राज्यों की चुनावी इच्छा काफी हद तक अप्रासंगिक हो जाती है।
- परिसीमन प्रक्रिया को लेकर यह आशंका व्यक्त की जाती है कि भविष्य में इससे ‘जेरिमैंडरिंग’ को बढ़ावा मिल सकता है—अर्थात किसी राजनीतिक दल को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिये निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में जानबूझकर बदलाव करना, जैसा कि असम जैसे उदाहरणों में चिंता के रूप में देखा गया है।
- आर्थिक असमानता: दक्षिणी राज्य राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और कर राजस्व में अनुपात से अधिक योगदान देते हैं।
- उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम होना ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व के बिना कराधान’ जैसी स्थिति उत्पन्न करता है।
पक्ष में तर्क
- लोकतांत्रिक सिद्धांत: प्रत्यक्ष लोकतंत्र का मूल सिद्धांत ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ है।
- सीमित परिसीमन के कारण उत्तर प्रदेश के एक सांसद द्वारा प्रतिनिधित्व किये जाने वाले नागरिकों की संख्या केरल के सांसद की तुलना में वर्तमान में लाखों अधिक है, जिससे समान लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत का उल्लंघन होता है।
- सीटों की संख्या में समग्र वृद्धि: केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि 850 सीटों वाली विस्तारित संसद में किसी भी राज्य की वर्तमान सीटों की संख्या में कोई कटौती नहीं की जाएगी।
- वास्तव में सभी राज्यों की कुल सीटों में लगभग 50% की वृद्धि (उदाहरण के लिये तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर लगभग 58 हो सकती हैं) होने का अनुमान है।
- महिला प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देना: सदन का विस्तार करने से सरकार को 33% महिला आरक्षण लागू करने में सहायता मिलती है, जिससे मौजूदा राजनीतिक प्रतिनिधियों के लिये उपलब्ध सामान्य सीटों की संख्या में भारी कमी नहीं होती।
आगे की राह
- सहमति निर्माण: परिसीमन केवल एक गणितीय प्रक्रिया नहीं है, यह राजनीतिक शक्ति का एक संवेदनशील पुनर्वितरण है। अंतर-राज्य परिषद और राज्य सरकारों के साथ व्यापक परामर्श के माध्यम से राष्ट्रीय सहमति बनाना आवश्यक है।
- सीट आवंटन के लिये “हाइब्रिड मॉडल”: केवल जनसंख्या पर निर्भर रहने के बजाय एक नया सूत्र तैयार किया जा सकता है, जिसमें जनसांख्यिकीय प्रदर्शन, आर्थिक योगदान (GSDP) और भौगोलिक आकार को भी महत्त्व दिया जाए, ताकि बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को दंडित न किया जाए।
- राज्यसभा को सशक्त बनाना: जनसंख्या-आधारित लोकसभा के संतुलन के लिये राज्यसभा में सुधार किया जा सकता है, जिससे सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व मिले (जैसे– अमेरिकी सीनेट में होता है) और छोटे राज्यों की संघीय आवाज़ सुरक्षित रहे सके।
- कोटा और परिसीमन को अलग करना: विपक्षी नेताओं का सुझाव है कि 33% महिला आरक्षण को परिसीमन जैसी अत्यधिक परिवर्तनशील प्रक्रिया पर निर्भर किये बिना वर्तमान सदनों की मौजूदा सीट संख्या के भीतर ही लागू किया जा सकता है।
निष्कर्ष
प्रस्तावित परिसीमन ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखने का उद्देश्य रखता है, लेकिन इसके साथ ही क्षेत्रीय असंतुलन, संघवाद और बेहतर जनसांख्यिकीय प्रदर्शन वाले राज्यों के साथ न्याय से जुड़ी चिंताओं को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। एक सहमति-आधारित और संतुलित दृष्टिकोण, संभवतः हाइब्रिड सूत्र और संस्थागत सुरक्षा उपायों के माध्यम से, आवश्यक है ताकि प्रतिनिधित्व और संघीय भावना दोनों को सुरक्षित रखा जा सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “परिसीमन लोकतंत्र के लिये अनिवार्य है, किंतु संघवाद के लिये चुनौतीपूर्ण।” भारतीय संदर्भ में इसका आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. परिसीमन क्या है?
यह निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः निर्धारित करने की प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
2. परिसीमन का विनियमन किन संवैधानिक प्रावधानों द्वारा किया जाता है?
अनुच्छेद 82 और 170 प्रत्येक जनगणना के बाद सीटों के पुनर्समायोजन को अनिवार्य बनाते हैं।
3. परिसीमन आयोग की क्या भूमिका है?
यह एक स्वतंत्र निकाय है, जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
4. भारत में परिसीमन विवादास्पद क्यों है?
यह बेहतर जनसंख्या नियंत्रण के बावजूद दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व को कम कर सकता है, जिससे संघवाद से संबंधित चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
5. 2026 का प्रस्ताव महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर किस प्रकार प्रभाव डालता है?
यह परिसीमन के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33% आरक्षण का प्रावधान करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. दिसंबर 2023 तक भारत सरकार द्वारा कितने परिसीमन आयोग गठित किये गए हैं? (2024)
(a) एक
(b) दो
(c) तीन
(d) चार
उत्तर: (d)
प्रश्न. परिसीमन आयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2012)
- परिसीमन आयोग के आदेश को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
- जब परिसीमन आयोग के आदेश लोकसभा या राज्य विधानसभा के समक्ष रखे जाते हैं, तो वे आदेशों में कोई संशोधन नहीं कर सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. "भारत में जनांकिकीय लाभांश तब तक सैद्धांतिक ही बना रहेगा जब तक कि हमारी जनशक्ति अधिक शिक्षित, जागरूक, कुशल और सृजनशील नहीं हो जाती।" सरकार ने हमारी जनसंख्या को अधिक उत्पादनशील और रोज़गार-योग्य बनने की क्षमता में वृद्धि के लिये कौन-से उपाय किये हैं? (2016)
प्रश्न. "जिस समय हम भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) को शान से प्रदर्शित करते हैं, उस समय हम रोज़गार-योग्यता की पतनशील दरों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।" क्या हम ऐसा करने में कोई चूक कर रहे हैं? भारत को जिन जॉबों की बेसबरी से दरकार है, वे जॉब कहाँ से आएंगे? स्पष्ट कीजिये। (2014)
