जैव चिकित्सा अपशिष्ट | 22 Jan 2021

चर्चा में क्यों?

हाल ही में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal- NGT) द्वारा देश में विभिन्न अधिकरणों/प्राधिकरणों को  जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन सुविधाओं का अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु निर्देश दिया गया है।

प्रमुख बिंदु:

  • केंद्रीय स्तर पर: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board- CPCB) को जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियमों का सख्ती से अनुपालन और अपशिष्टों का वैज्ञानिक तरीके से निपटान सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।
  • राज्य स्तर पर: सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को अनुपालन की निगरानी करनी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि प्राधिकरण द्वारा अपने क्षेत्राधिकार में प्रत्येक स्वास्थ्य देखभाल सुविधा को संरक्षित किया गया है और मानदंडों का पालन भी किया जा रहा है।
  • ज़िला स्तर पर: ज़िला मजिस्ट्रेट को ज़िला पर्यावरण योजनाओं में सामजस्य/तालमेल स्थापित करने के लिये निर्देशित किया गया है।
  • भूजल संदूषण: जैव चिकित्सा अपशिष्ट को ज़मीन  की गहराई में गाड़ने की अनुमति देते समय यह सुनिश्चित किया जाए कि इससे भूजल संदूषित नहीं होना चाहिये।
  • पृथक्करण: यह सुनिश्चित किया जाए कि खतरनाक जैव चिकित्सा अपशिष्ट सामान्य कचरे के साथ मिश्रित न हों।
  • नियमों का बार-बार उल्लंघन: ये निर्देश विभिन्न स्वास्थ्य तथा जैव चिकित्सा अपशिष्ट उपचार पर नियमित जुर्माना लगाए जाने के परिणामस्वरूप आए हैं। 
  • पूर्व अवलोकन: भविष्य में सामान्य कचरे स कोविड-19 जैव चिकित्सा अपशिष्ट का पृथक्करण सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित होने से बचाने के लिये आवश्यक है।

जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016

  • परिभाषा: जैव चिकित्सा अपशिष्ट को मानव और पशुओं के उपचार के दौरान उत्पन्न शारीरिक अपशिष्ट जैसे- सुई, सिरिंज तथा स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में उपयोग की जाने वाली अन्य सामग्रियों के रूप में परिभाषित किया जाता है।
    • उद्देश्य: इन नियमों का मुख्य उद्देश्य संपूर्ण देश में प्रतिदिन स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं (Healthcare Facilities- HCFs) से  उत्पन्न जैव चिकित्सा अपशिष्ट का उचित प्रबंधन करना है।
  • विस्तार: टीकाकरण शिविर, रक्तदान शिविर, शल्य चिकित्सा शिविर या किसी अन्य स्वास्थ्य सेवा गतिविधि को शामिल करने के उद्देश्य से नियमों को विस्तारित किया गया है।
  • चरणबद्ध तरीके से हटाना: मार्च 2016 से दो वर्षों के भीतर क्लोरीनयुक्त प्लास्टिक की थैलियों, दस्ताने और रक्त की थैलियों को चरणबद्ध तरीके से हटा लिया गया है।
  • पूर्व-उपचार: इसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization- WHO) या राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (National AIDS Control Organisation- NACO) द्वारा निर्धारित कीटाणुशोधन प्रक्रिया के माध्यम से प्रयोगशाला अपशिष्ट, सूक्ष्म जीवाणु अपशिष्ट, रक्त के नमूने और रक्त की थैलियों  को पूर्व-उपचारित किया जाना शामिल है।
  • वर्गीकरण: कचरे के पृथक्करण में सुधार के लिये जैव चिकित्सा अपशिष्ट को पूर्व वर्गीकृत 10 श्रेणियों के अलावा 4 अन्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।
  • प्रदूषकों के लिये कठोर मानक: पर्यावरण में प्रदूषकों के उत्सर्जन को कम करने के उद्देश्य से नियमों  को लागू करने हेतु अधिक कड़े मानकों को निर्धारित किया गया है।
  • राज्य सरकार की भूमिका: राज्य सरकार सामान्य जैव चिकित्सा अपशिष्ट उपचार और निपटान सुविधा स्थापित करने के लिये भूमि प्रदान करती है।

चिंताएँ:

  • महामारी: महामारी के दौरान उत्पन्न जैव चिकित्सा अपशिष्ट के वैज्ञानिक तरीके से निपटान और संग्रहण ने अधिकारियों के समक्ष चुनौती पेश की है।
  • अनुपालन की कमी: राज्य द्वारा कोविड-19 से संबंधित कचरे का निपटारा करते हुए CPCB द्वार जारी दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है।
    • कुछ राज्यों में कोविड-19 उपचार और क्वारंटाइन के दौरान  घरों में उत्पन्न कचरे को अनुचित रूप से अलग करने की सूचना दी गई है।
  • गैर-पृथक्करण: अपशिष्टों का सही से पृथक्करण  न होने के कारण प्लास्टिक अपशिष्ट के दहन से उत्पन्न ज़हरीली गैस हवा के साथ मिलकर वायु प्रदूषण उत्पन्न करती है।
  • अपशिष्ट में वृद्धि: घरों से निकलने वाले जैव चिकित्सा अपशिष्ट में वृद्धि और सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन किये बिना इसका संग्रह कैसलोएड ((मरीज़ों की संख्या में वृद्धि के कारण डॉक्टर्स, नर्सों आदि के कार्यों में हुई वृद्धि) को बढ़ा सकता है।
  • संबद्ध श्रमिकों का स्वास्थ्य: इस प्रकार उत्पन्न कचरे का उचित वैज्ञानिक प्रबंधन न करना संभावित रोगियों को प्रभावित कर सकता है और साथ ही यह संबंधित श्रमिकों और पेशेवरों को प्रभावित कर सकता है।
    • ऐसे मास्क और दस्ताने जिनका उपयोग खतरनाक सामग्री की देख-रेख में बिना किसी सुरक्षित उपायों के किया जाता है, हज़ारों स्वच्छता कर्मियों के जीवन को जोखिम में डालता है ।

सुझाव:

  • समुचित पृथक्करण: कोविड -19 रोगियों द्वारा उपयोग किये जाने से बचे भोजन, डिस्पोज़ेबल प्लेट, चश्मे, प्रयुक्त मास्क, ऊतक आदि को पीले रंग के बैग में, जबकि उपयोग किये गए दस्तानों को लाल रंग के बैग में रखकर  CBWTFs में कीटाणुशोधन एवं पुनर्चक्रण हेतु भेज देना चाहिये। 
    • जहांँ कचरे का दहन नहीं किया जा सकता है, वहांँ पर्यावरणीय क्षति को रोकने के लिये उचित सावधानी बरतने वाले प्रोटोकॉल के अनुसार गहरी दफन प्रणालियों (Deep Burial Systems ) को ठीक से अपनाए जाने की आवश्यकता है। इस प्रणाली में जैव चिकित्सा अपशिष्ट को 2 मीटर गहरी खाई में दफनाने और उसे चूने और मिट्टी की एक परत से कवर करना शामिल है।
  • जागरूकता अभियान:  जैव चिकित्सा अपशिष्ट के सही निपटान के बारे में लोगों के बीच  जागरूकता उत्पन्न  करने के लिये दूरदर्शन, ऑल इंडिया रेडियो और अन्य मीडिया प्लेटफाॅर्मों पर एक उपयुक्त कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिये।
  • आधारभूत संरचना विकसित करना: सरकार को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership-PPP) मॉडल के तहत देश भर में रीसाइक्लिंग प्लांट स्थापित करने चाहिये (जैसा कि स्मार्ट सिटी मिशन के तहत परिकल्पित है)।
  • नियमों में सामंजस्य: केंद्र को प्लास्टिक उत्पादकों के लिये विस्तारित निर्माता ज़िम्मेदारी (Extended Producer Responsibility-EPR) को लेकर  दिशा-निर्देशों के साथ जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के संयोजन हेतु एक राष्ट्रीय प्रोटोकॉल बनाना चाहिये।
  • नवाचार: स्टार्ट-अप और लघु एवं मध्यम उद्यमों द्वारा अपशिष्ट पृथक्करण और उपचार हेतु समाधान की पेशकश के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
  • निरीक्षण: केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों, राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के स्वास्थ्य विभागों और केंद्रीय स्तर पर गठित उच्च स्तरीय टास्क टीम द्वारा निरंतर और नियमित निगरानी की जानी चाहिये।

स्रोत: द हिंदू