प्रिलिम्स फैक्ट्स (12 Mar, 2026)



हाई-एनर्जी प्रोटॉन एक्सेलेरेटर के लिये विशाखापत्तनम का चयन

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों? 

भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का समर्थन करने और एक्सेलेरेटर-ड्रिवेन सिस्टम (ADS) के माध्यम से अपने थोरियम भंडार का उपयोग करने हेतु हाई-एनर्जी प्रोटॉन एक्सेलेरेटर सिस्टम की मेज़बानी के लिये विशाखापत्तनम को चुना गया है।

  • इस स्थान को इसके मज़बूत तकनीकी पारिस्थितिक तंत्र और समुद्र से निकटता के कारण चुना गया है, जो हाई-एनर्जी सिस्टम के लिये पर्याप्त शीतल जल को सुनिश्चित करता है।
  • यह परियोजना मध्य प्रदेश के इंदौर में राजा रमन्ना उन्नत प्रौद्योगिकी केंद्र (RRCAT) द्वारा विकसित की जा रही है।

हाई-एनर्जी प्रोटॉन एक्सेलेरेटर सिस्टम क्या है?

  • हाई-एनर्जी प्रोटॉन एक्सेलेरेटर सिस्टम: एक हाई-एनर्जी प्रोटॉन एक्सेलेरेटर प्रोटॉन (आयनित हाइड्रोजन से) को अत्यधिक उच्च गति तक त्वरित करने के लिये विद्युत चुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग करता है, जिससे एक शक्तिशाली प्रोटॉन बीम का निर्माण होता है।
    • इस बीम को सीसा या बिस्मथ जैसे भारी धातु लक्ष्य की ओर निर्देशित किया जाता है, जिससे एक स्पैलेशन अभिक्रिया शुरू होती है।
    • इस अभिक्रिया में टकराव भारी नाभिक को विघटित कर देता है और बड़ी संख्या में न्यूट्रॉनों को मुक्त करता है।
    • ये न्यूट्रॉन परमाणु विखंडन शुरू करते हैं, जिससे प्रणाली ऊर्जा उत्सर्जित करने में सक्षम होती है।
  • एक्सेलेरेटर-ड्रिवेन सिस्टम (ADS): ADS में स्पैलेशन प्रक्रिया से उत्सर्जित न्यूट्रॉन को विशेष रूप से डिज़ाइन किये गए उप-क्रांतिक परमाणु रिएक्टर कोर की आपूर्ति की जाती है, जो अपने आप एक शृंखला अभिक्रिया को बनाए नहीं रख सकता है।
    • रिएक्टर विखंडन प्रक्रिया को बनाए रखने के लिये प्रोटॉन एक्सेलेरेटर से बाह्य न्यूट्रॉन आपूर्ति पर निर्भर करता है।
    • यह डिज़ाइन हाई इन्हेरेंट सेफ्टी प्रदान करती है क्योंकि यदि विद्युत की आपूर्ति रुकने या खराबी के कारण एक्सेलेरेटर बंद हो जाता है, तो न्यूट्रॉन की आपूर्ति शीघ्र समाप्त हो जाती है और परमाणु अभिक्रिया स्वतः रुक जाती है, जिससे रिएक्टर को संरक्षित रखा जा सकता है।
  • भारत के लिये ADS की आवश्यकता:
    • थोरियम का उपयोग: भारत के पास विश्व के थोरियम भंडार का लगभग 25% हिस्सा है। हालाँकि प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला थोरियम (Th-232) 'उर्वर' होता है, 'विखंडनशील' नहीं।
      • इसका अर्थ है कि यह स्वयं विखंडित होकर परमाणु शृंखला अभिक्रिया को बनाए नहीं रख सकता। इसे पहले एक न्यूट्रॉन को अवशोषित करना होगा ताकि यह यूरेनियम-233 (U-233) में परिवर्तित हो सके, जो कि अत्यधिक विखंडनशील है।
      • ADS द्वारा प्रदान किये जाने वाले प्रचुर और उच्च-ऊर्जा वाले न्यूट्रॉनों का उपयोग थोरियम पर बमबारी करने के लिये किया जाता है, जिससे यह यूरेनियम-233 में परिवर्तित हो जाता है। यूरेनियम-233 एक उत्कृष्ट विखंडनशील ईंधन है, जो भारी मात्रा में बिजली उत्पन्न कर सकता है।
    • परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन (रूपांतरण): पारंपरिक परमाणु रिएक्टर अत्यधिक रेडियोधर्मी और लंबे समय तक जीवित रहने वाले परमाणु कचरे (जैसे– माइनर एक्टिनाइड्स) का उत्पादन करते हैं, जो हज़ारों वर्षों तक विषैले बने रहते हैं।
      • ADS में मौजूद उच्च-ऊर्जा वाले न्यूट्रॉन इस विषैले परमाणु अपशिष्ट को “जलाकर” या ट्रांसम्यूट करके इसे कम समय तक रहने वाले या स्थिर आइसोटोप्स में बदल सकते हैं। इससे परमाणु अपशिष्ट के निपटान का बोझ काफी हद तक कम हो जाता है।

Thorium

भारत का 3-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम क्या है?

पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: भारत का त्रि-स्तरीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम

राजा रमन्ना उन्नत प्रौद्योगिकी केंद्र (RRCAT)

  • इंदौर स्थित RRCAT परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) की एक इकाई है और यह लेज़र, कण त्वरक तथा संबंधित तकनीकों में अनुसंधान एवं विकास के लिये भारत का प्रमुख संस्थान है।
  • वर्ष 1984 में स्थापित इस संस्थान ने भारत के 'सिंक्रोट्रॉन विकिरण स्रोतों'—इंडस-1 और इंडस-2 का विकास किया है, जो राष्ट्रीय अनुसंधान सुविधाओं के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान करते हैं।
  • RRCAT त्वरक, लेज़र प्रणालियों और सिंक्रोट्रॉन विकिरण प्रौद्योगिकियों में उन्नत अनुसंधान करता है।
    • RRCAT का अनुसंधान प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक लाभों में परिलक्षित होता है, जैसे कि वैश्विक स्तर पर निर्यात किये जाने वाले चिकित्सा उपकरणों के 'इलेक्ट्रॉन-बीम स्टरलाइज़ेशन' (रोगाणुनाशन) के लिये रैखिक त्वरकों का उपयोग।
  • AIC-RRCAT Pi-Hub (एक इन्क्यूबेशन सेंटर) वर्तमान में स्वदेशी तकनीक के विकास को गति दे रहा है। यह स्टार्टअप्स के साथ मिलकर अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र हेतु किफायती 'मेटल 3D प्रिंटिंग', 'फाइबर-आधारित ऑप्टिकल सेंसर' तथा 'मैग्नेटिक रेसोनेंस इमेजिंग (MRI) मशीनों' के लिये 'क्रायोजेनिक कूलिंग सिस्टम' तैयार करने पर काम कर रहा है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. हाई-एनर्जी प्रोटॉन एक्सेलेरेटर क्या है?
एक हाई-एनर्जी प्रोटॉन एक्सेलेरेटर विद्युत चुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग करके प्रोटॉनों को अत्यंत उच्च गति तक त्वरित करता है, जिससे एक प्रोटॉन बीम उत्पन्न होता है जिसका उपयोग स्पैलेशन प्रतिक्रियाओं के माध्यम से न्यूट्रॉन उत्पन्न करने के लिये किया जाता है।

2. एक्सेलेरेटर ड्रिवन सिस्टम (ADS) क्या है? 
यह प्रणाली रिएक्टर की सुरक्षा और दक्षता में सुधार करती है, क्योंकि ADS एक परमाणु रिएक्टर प्रणाली है जो उप-क्रांतिक रिएक्टर कोर को न्यूट्रॉन प्रदान करने के लिये एक बाहरी प्रोटॉन एक्सेलेरेटर का उपयोग करती है।

3. भारत के परमाणु कार्यक्रम के लिये थोरियम क्यों महत्त्वपूर्ण है? 
भारत के पास विश्व के थोरियम भंडार का लगभग 25% हिस्सा है, जिसे यूरेनियम-233 में परिवर्तित किया जा सकता है, जो परमाणु ऊर्जा उत्पन्न करने के लिये एक विखंडनीय ईंधन है।

4. ADS परमाणु सुरक्षा को किस प्रकार बेहतर बनाता है? 
चूँकि रिएक्टर उप-क्रांतिक अवस्था में संचालित होता है, एक्सेलेरेटर के बंद होते ही विखंडन अभिक्रिया स्वतः ही रुक जाती है। यह अभिक्रिया रिएक्टर को संरक्षित रखती है।

5. भारत के परमाणु अनुसंधान में RRCAT की क्या भूमिका है? 
राजा रामन्ना उन्नत प्रौद्योगिकी केंद्र उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान के लिये कण त्वरक, लेज़र प्रणाली और इंडस-1 और इंडस-2 जैसी सिंक्रोट्रॉन विकिरण सुविधाएँ विकसित करता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. भारत के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

1. मोनाज़ाइट दुर्लभ मृदाओं का स्रोत है।

2. मोनाज़ाइट में थोरियम होता है।

3. भारत की समस्त तटवर्ती बालुकाओं में मोनाज़ाइट प्राकृतिक रूप में होता है।

4. भारत में, केवल सरकारी निकाय ही मोनाज़ाइट संसाधित या निर्यात कर सकते हैं।

उपर्युक्त कथनों में कौन-से सही हैं ?

(a) केवल 1,2 और 3

(b) केवल 1,2 और 4

(c) केवल 3 और 4

(d) 1,2,3 और 4

उत्तर: b


प्रश्न. भारत में क्यों कुछ परमाणु रिएक्टर "आईएईए सुरक्षा उपायों" के अधीन रखे जाते हैं जबकि अन्य इस सुरक्षा के अधीन नहीं रखे जाते? (2020) 

(a) कुछ यूरेनियम का प्रयोग करते हैं और अन्य थोरियम का

(b) कुछ आयातित यूरेनियम का प्रयोग करते हैं और अन्य घरेलू आपूर्ति का 

(c) कुछ विदेशी उद्यमों द्वारा संचालित होते हैं और अन्य घरेलू उद्यमों द्वारा

(d) कुछ सरकारी स्वामित्व वाले होते हैं और अन्य निजी स्वामित्व वाले

उत्तर: (b)


दांडी मार्च

स्रोत: एआईआर

उपराष्ट्रपति ने महात्मा गांधी और दांडी मार्च (1930) में भाग लेने वाले सभी स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि दांडी मार्च की आत्मनिर्भरता की भावना भारत को आत्मनिर्भर और विकसित भारत की ओर ले जाने में मार्गदर्शक है। 

दांडी मार्च

  • परिचय: दांडी मार्च (1930) भारत के स्वतंत्रता संग्राम की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। इस शांतिपूर्ण सविनय अवज्ञा आंदोलन का नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया था। यह मार्च ब्रिटिश नमक कर का विरोध करने तथा भारत पर ब्रिटिश आर्थिक नियंत्रण को चुनौती देने के उद्देश्य से किया गया था।
    • गांधी जी ने नमक को इसलिये चुना क्योंकि यह एक रोज़मर्रा की ज़रूरत थी और इस तरह उन्होंने नमक कानून के अन्याय को हर किसी के लिये समझने में आसान बना दिया।
  • समय-रेखा और प्रमुख घटनाएँ: दांडी यात्रा 12 मार्च, 1930 को साबरमती आश्रम से शुरू हुई और 6 अप्रैल, 1930 को दांडी गाँव (वर्तमान गुजरात) में समाप्त हुई। इस 240 मील की यात्रा का उद्देश्य नमक कानून तोड़ना था। महात्मा गांधी ने 78 अनुयायियों के साथ यह यात्रा शुरू की, जो समय के साथ एक विशाल जन आंदोलन में परिवर्तित हो गई।
  • इस विरोध प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के नमक एकाधिकार और नमक कर को समाप्त करना था, जो वर्ष 1882 के नमक अधिनियम जैसे कानूनों के माध्यम से लागू किया गया था। इस कर ने सभी भारतीयों को, विशेष रूप से गरीबों को, मजबूर किया कि वे आसानी से उपलब्ध तटीय नमक का उपयोग करने के बजाय महंगा, कर-युक्त (और अक्सर आयातित) नमक खरीदें।
  • 6 अप्रैल, 1930 को महात्मा गांधी ने दांडी के समुद्र तट पर मुट्ठी भर प्राकृतिक नमक उठाकर नमक कानूनों का उल्लंघन किया। इस कृत्य ने देश भर के लाखों भारतीयों को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के लिये प्रेरित किया।
    • उदाहरण के लिये, सी. राजगोपालाचारी ने तंजौर तट (मद्रास प्रेसीडेंसी) के तटीय शहर वेदारण्यम में नमक कानून तोड़ा। मालाबार क्षेत्र (वर्तमान केरल) में के. केलप्पन (केरल गांधी) ने कालीकट से पय्यानूर तक एक नमक पदयात्रा का आयोजित की।
  • दमन: अंग्रेज़ों ने इस आंदोलन को दबाने के लिये व्यापक स्तर पर गिरफ्तारियाँ कीं। 5 मई, 1930 को गांधी जी को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके साथ ही, विशेष रूप से धरसाना नमक कारखाने में, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हिंसक कार्रवाई की गई।
    • महात्मा गांधी की गुजरात में गिरफ्तारी के बाद सरोजिनी नायडू ने 21 मई, 1930 को धरसाना नमक कारखाने पर एक शांतिपूर्ण धरने का नेतृत्व किया। इस दौरान, अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हुए पुलिस के क्रूर लाठीचार्ज की रिपोर्टिंग की।
  • दीर्घकालिक महत्त्व: इसका दीर्घकालिक महत्त्व यह है कि इसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक ध्यान आकर्षित किया, इसने न केवल ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की दमनकारी प्रकृति को उजागर किया, बल्कि मार्टिन लूथर किंग जूनियर जैसे भविष्य के वैश्विक अहिंसक आंदोलनों के नेताओं को प्रेरित किया।

और पढ़ें: दांडी मार्च 1930


तेहरान में ब्लैक रैन

स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया 

ईरानी तेल प्रतिष्ठानों पर इज़रायली हमलों के कारण लगी भीषण आग के बाद तेहरान के निवासियों ने "ब्लैक रैन" (कृष्ण वर्षा) के रूप में पहचानी जाने वाली घटना का अनुभव किया, जिससे गंभीर पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हो गईं।

ब्लैक रैन (कृष्ण वर्षा)

  • परिचय: ब्लैक रैन (कृष्ण वर्षा) वह वर्षा है, जो बड़े स्तर पर आग या औद्योगिक दुर्घटनाओं से वायुमंडल में उत्सर्जित कालिख, राख, तेल कणों और औद्योगिक रसायनों से दूषित होती है। जैसे ही वर्षा की बूँदें गिरती हैं, वे इन प्रदूषकों को एकत्रित कर लेती हैं, जिससे वर्षा जल गहरा काला और तैलीय दिखाई देता है।
    • यह तेल प्रतिष्ठानों में आग, रिफाइनरी विस्फोट, वनाग्नि, ज्वालामुखी विस्फोट या न्यूक्लियर फॉलआउट के बाद की घटना है।
  • ब्लैक रैन का आधार: तेल भंडारण और शोधन सुविधाओं में विस्फोटों के कारण भीषण आग लग गई, जिससे धुएँ और पार्टिकुलेट मैटर के साथ-साथ टॉक्सिक हाइड्रोकार्बन, सल्फर ऑक्साइड और नाइट्रोजन यौगिक वायुमंडल में उत्सर्जित किये गए।
    • इस प्रदूषित हवा से गुज़रने वाली वर्षा ने दूषित पदार्थों को अवशोषित कर लिया, जिसे अब तेहरान पर ब्लैक रैन के रूप में देखा गया।
  • तात्कालिक स्वास्थ्य जोखिम: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने पुष्टि की कि ब्लैक रैन मुख्य रूप से श्वसन संबंधी स्वास्थ्य के लिये एक "वास्तविक खतरा" उत्पन्न करती है। स्वास्थ्य जोखिमों में सिरदर्द, त्वचा और आँखों में जलन, श्वास लेने में कठिनाई और संपर्क में आने पर संभावित रासायनिक जलन शामिल हैं।
    • पेट्रोलियम मिश्रणों में पाए जाने वाले बेंजीन जैसे यौगिकों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: तात्कालिक संकट के अतिरिक्त, अग्निशमन फोम से "फॉरएवर केमिकल" (पेर-और पॉलीफ्लोरोएल्काइल पदार्थ) के भूजल और मृदा को दूषित करने का जोखिम है। इसके अतिरिक्त, अम्ल वर्षा इमारतों के क्षरण (जंग) को तेज़ कर सकती है और विषैले यौगिक दूषित वनस्पति के माध्यम से खाद्य शृंखला में प्रवेश कर सकते हैं।
  • ऐतिहासिक मिसाल: ब्लैक रैन का सबसे प्रमुख उदाहरण हिरोशिमा पर परमाणु हमले के बाद हुआ था, जहाँ रेडियोधर्मी पदार्थ वर्षा के साथ मिश्रित हो गए, जिससे विस्फोट क्षेत्र से कहीं दूर तक संदूषण फैल गया।

और पढ़ें: अमेरिका - इज़रायल - ईरान युद्ध में संघर्ष क्षेत्र, फॉरएवर केमिकल्स, अम्ल वर्षा


गारो हिल्स स्वायत्त ज़िला परिषद

स्रोत: द हिंदू

मेघालय में गारो हिल्स स्वायत्त ज़िला परिषद (GHADC) के चुनावों को स्थगित कर दिया गया है, फरवरी 2026 में जारी GHADC अधिसूचना से उत्पन्न अशांति के कारण, जिसमें सभी उम्मीदवारों के लिये चुनाव में भाग लेने हेतु अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाण-पत्र अनिवार्य किया गया था।

  • गैर-जनजातीय समुदायों का विरोध: मैदानी क्षेत्र के गैर-जनजातीय निवासी, जो मुख्यतः मुस्लिम समुदाय से हैं, ने इस नियम का विरोध किया और इसे असंवैधानिक एवं बहिष्कारी बताया। उनका तर्क है कि यह नियम पाँच मुस्लिम-प्रधान GHADC निर्वाचन क्षेत्रों में लोकतांत्रिक भागीदारी और राजनीतिक अधिकारों को सीमित करता है और उनका यह भी कहना है कि छठी अनुसूची के प्रावधानों में संशोधन केवल संसद ही कर सकती है।
  • मेघालय में ADC: मेघालय में तीन ADC हैं अर्थात गारो हिल्स ADC, खासी हिल्स ADC और जयंतिया हिल्स ADC।
    • प्रत्येक ADC में 30 सदस्य होते हैं, जिनमें से 29 सदस्य जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं और प्रत्येक ADC में एक सदस्य मनोनीत होता है, जो राज्यपाल की इच्छा पर पद सँभालता है।
  • समन्वय: राज्य सरकार का ज़िला परिषद मामलों का विभाग ज़िला परिषदों और राज्य सरकार के अन्य विभागों के बीच समन्वय स्थापित करने वाले विभाग के रूप में कार्य करता है।

स्वायत्त ज़िला परिषद

  • प्रशासनिक संरचना: छठी अनुसूची क्षेत्रों (असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के चार पूर्वोत्तर राज्यों के जनजातीय क्षेत्र) को स्वायत्त ज़िलों और स्वायत्त क्षेत्रों में संगठित किया गया है, जिनका संचालन प्रत्येक ज़िला परिषद और क्षेत्रीय परिषद द्वारा किया जाता है। राज्यपाल इन इकाइयों का निर्माण, परिवर्तन या पुनर्गठन कर सकता है।
  • संरचना और कार्यकाल: एक स्वायत्त ज़िला परिषद (ADC) में अधिकतम 30 सदस्य हो सकते हैं (26 निर्वाचित और 4 राज्यपाल द्वारा मनोनीत) और निर्वाचित सदस्यों का कार्यकाल पाँच वर्ष होता है। बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद इसका अपवाद है, जिसमें 46 सदस्य हैं।
  • विधायी शक्तियाँ: परिषदें भूमि, वन (आरक्षित वनों को छोड़कर), उत्तराधिकार, विवाह, सामाजिक रीति-रिवाज़ों और गैर-जनजातीयों द्वारा धन उधार और व्यापार के नियमन पर कानून बना सकती हैं, बशर्ते राज्यपाल की स्वीकृति प्राप्त हो।
  • कानूनों की प्रयोज्यता: केंद्रीय और राज्य के कानून स्वतः छठी अनुसूची क्षेत्रों पर लागू नहीं होते। इनकी प्रयोज्यता राज्य के अनुसार राज्यपाल या राष्ट्रपति के अधिसूचना पर निर्भर करती है।

Meghalaya_ADC

और पढ़ें: चकमा स्वायत्त ज़िला परिषद में राज्यपाल शासन


पीएम सेतु योजना

स्रोत: इंडिया टाइम्स

कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय ने 'PM SETU’ (प्रधान मंत्री स्किलिंग एंड एंप्लॉयबिलिटी ट्रांसफॉर्मेशन थ्रू अपग्रेडेड ITIs) योजना के मार्गदर्शन के लिये एक शीर्ष निकाय के रूप में राष्ट्रीय संचालन समिति (NSC) का गठन किया है। इस योजना का उद्देश्य औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITIs) को उन्नत बनाकर कौशल विकास को मज़बूत करना और रोज़गार के परिणामों में सुधार करना है।

  • परिचय: पीएम सेतु (PM SETU) एक व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण उन्नयन योजना है जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2025 में 60,000 करोड़ रुपये के बजट के साथ आधुनिक उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप कौशल प्रशिक्षण प्रदान करने के लिये मंज़ूरी दी थी।
    • यह योजना सरकार द्वारा संचालित प्रशिक्षण से उद्योग-नेतृत्व वाले कौशल विकास की ओर एक बदलाव का प्रतीक है, जहाँ कंपनियाँ पाठ्यक्रम, प्रशिक्षण विधियों और बुनियादी ढाँचे को डिज़ाइन करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • हब-एंड-स्पोक ITI अपग्रेडेशन: हब-एंड-स्पोक मॉडल के माध्यम से ITI का उन्नयन किया जाएगा। इस योजना के अंतर्गत, 200 ITI को उन्नत बुनियादी ढाँचे के साथ 'हब' के रूप में विकसित किया जाएगा। ये केंद्रीय संस्थान आधुनिक उपकरण, डिजिटल शिक्षण संसाधन और विशेष प्रशिक्षण सुविधाओं को साझा करके, प्रत्येक हब से जुड़े लगभग चार आस-पास के 'स्पोक' ITI को मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करेंगे।
    • इस योजना के अंतर्गत, भुवनेश्वर, चेन्नई, हैदराबाद, कानपुर और लुधियाना में स्थित पाँच राष्ट्रीय कौशल प्रशिक्षण संस्थानों (NSTI) को सुदृढ़ कर उन्हें वैश्विक उत्कृष्टता केंद्रों में बदला जाएगा।
  • विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) शासन: प्रत्येक उन्नत ITI का प्रबंधन SPV के माध्यम से उद्योग-सरकारी साझेदारी द्वारा किया जाएगा, जिसमें उद्योग भागीदारों की 51% और सरकार की 49% हिस्सेदारी होगी।
    • उद्योग जगत के साझेदार बुनियादी ढाँचे और प्रशिक्षण में सुधार के लिये सरकार से 83% तक धनराशि प्राप्त कर सकते हैं।
  • उद्योगों की भागीदारी: कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय ने प्रशिक्षण संस्थानों के उन्नयन में सहयोग करने के लिये 'अभिरुचि की अभिव्यक्ति' (EOI) के माध्यम से एंकर इंडस्ट्री पार्टनर्स (AIPs) को आमंत्रित किया है।
  • आधुनिक प्रशिक्षण पारिस्थितिक तंत्र: 'विशेष प्रयोजन वाहन' (SPVs) पाठ्यक्रम के पुनर्निर्माण, बेहतर प्रशिक्षण वितरण मॉडल, बुनियादी ढाँचे के आधुनिकीकरण और प्रशिक्षुओं के लिये औद्योगिक अनुभव का प्रस्ताव दे सकते हैं। 
    • प्रशिक्षण महानिदेशालय (DGT) ने उभरते क्षेत्रों की मांगों को पूरा करने के लिये 'शिल्पकार प्रशिक्षण योजना' (CTS) के तहत 31 नए ज़माने के पाठ्यक्रम शुरू किये हैं। 
      • प्रशिक्षण में उन्नत विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबिलिटी (गतिशीलता) और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों को लक्षित किया जाएगा।

और पढ़ें: औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITIs) के उन्नयन हेतु राष्ट्रीय योजना