प्रिलिम्स फैक्ट्स (10 Mar, 2026)



अमेरिका-इज़राइल-ईरान संघर्ष में हथियार

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों? 

अमेरिका-इज़रायल गुट और ईरान के बीच संघर्ष ने युद्ध के एक नए युग की शुरुआत की है, जिसे आधुनिक सैन्य इतिहास के सबसे तकनीकी रूप से जटिल ड्रोन और मिसाइल युद्ध के रूप में चिह्नित किया गया है।

  • अमेरिका-इज़रायल-ईरान संघर्ष में किन प्रमुख हथियारों और रक्षा प्रणालियों का इस्तेमाल किया गया?

ईरान का शस्त्रागार:

  • शाहेद-136 और शाहेद-131 ड्रोन: निम्न लागत वाले लॉइटरिंग म्युनिशन (जिन्हें अक्सर कामिकेज़ ड्रोन कहा जाता है) हैं, जिन्हें बड़े पैमाने पर ‘स्वर्म टैक्टिस’ में तैनात किया जाता है। 
    • इन्हें निम्न ऊँचाई पर और धीमी गति से उड़ान भरने के लिये डिज़ाइन किया गया है, ताकि ये प्रलोभन (डिकॉय) के रूप में कार्य कर सकें और दुश्मन की महंगी हवाई रक्षा प्रणालियों को निष्क्रिय और आर्थिक रूप से नष्ट कर सकें।
  • शाहब-3 मिसाइल: लगभग 2,000 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली एक मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल। यह मध्य पूर्व में ईरान की लंबी दूरी की प्रतिरोधक क्षमता और आक्रमण क्षमता का आधार है।
  • फत्ताह मिसाइल: ईरान का दावा है कि यह अगली पीढ़ी का हाइपरसोनिक हथियार है जो मैक 15 तक की गति प्राप्त करने और 1,400 किलोमीटर तक की दूरी पर स्थित लक्ष्यों को भेदने में सक्षम है।
    • फत्ताह की कथित गतिशीलता को पारंपरिक मिसाइल-रोधी ढालों को भेदने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
  • खोर्रमशहर मिसाइल: यह एक अत्यंत विनाशकारी बैलिस्टिक मिसाइल है जिसका उपयोग हाल ही में सैन्य प्रतिष्ठानों पर किये गए हमलों में किया गया है।
  • बावर-373: यह एक लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणाली है जिसे विमानों और बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिये डिज़ाइन किया गया है, जो उन्नत सतह-से-हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणालियों के समकक्ष है।
  • सेवोम-ए-खोरदाद: यह एक मोबाइल हवाई रक्षा प्रणाली है। इसकी मुख्य विशेषता है कि यह विमानों और क्रूज़ मिसाइलों को निशाना बना सकती है। यह तेज़ी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकती है, जिससे इसकी उत्तरजीविता बढ़ जाती है।
  • टोर-M1: यह एक अल्प दूरी की प्रणाली है जिसका उपयोग सटीक निर्देशित गोला-बारूद, ड्रोन और निम्न ऊँचाई पर उड़ने वाली क्रूज़ मिसाइलों को रोकने के लिये किया जाता है।
  • मजीद और अज़रख्श: ये ऐसी प्रणालियाँ हैं जो महत्त्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा हेतु ड्रोन और निम्न ऊँचाई पर उड़ान भरने वाले हवाई खतरों का सामना करने के लिये विशेष रूप से विकसित की गई हैं।
  • पावेह क्रूज़ मिसाइल: पावेह एक लैंड अटैक क्रूज़ मिसाइल है जिसकी मारक क्षमता 1,650 किलोमीटर है। इसकी यह क्षमता और उड़ान के दौरान मार्ग बदलने की विशेषता इसे अमेरिकी क्षेत्रीय ठिकानों के लिये  एक गंभीर खतरा बनाती है।
  • सेज्जिल और इमाद मिसाइलें: सेज्जिल और इमाद मिसाइलें महत्त्वपूर्ण हैं। सेज्जिल एक ठोस ईंधन वाली मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है। यह विशेषता इसे तरल ईंधन वाली शाहब-3 से अलग करती है, क्योंकि यह बहुत तेज़ी से लॉन्च हो सकती है। इस तीव्र लॉन्च क्षमता के कारण अमेरिका/इज़रायल को इसका पता लगाने में कम समय मिलता है।
    • इमाद ईरान की पहली सटीक रूप से निर्देशित, लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है जिसमें एक मैन्यूवरेबल री-एंट्री व्हीकल (MaRV) लगा हुआ है।

अमेरिकी शस्त्रागार

  • B-2 स्पिरिट स्टेल्थ बॉम्बर: यह एक अत्याधुनिक, कम-रडार-सिग्नेचर वाला विमान है, जिसे भारी सुरक्षा वाले वायुमंडल में प्रवेश करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
    • B-2 स्टेल्थ बॉम्बर की बैट जैसी फ्लाइंग विंग डिज़ाइन इसे रडार द्वारा कम पकड़ में आने योग्य बनाती है और शत्रु की हवाई सुरक्षा से बचाती है
  • GBU-57 विशाल आयुध भेदक (MOP) एक 30,000 पाउंड का “बंकर-बस्टर” बम है, जिसे गहरी और मज़बूत संरचनाओं को ध्वस्त करने के लिये डिज़ाइन किया गया है। 
    • B-2 बॉम्बर ही एकमात्र विमान है जो इस हथियार को ले जाने में सक्षम है, जिसका विशेष उपयोग ईरानी परमाणु सुविधाओं (जैसे– फोर्डो और नतांज़) को गहराई में और कड़े सुरक्षा वाले ढाँचे के साथ नष्ट करने के लिये किया जाता है।
  • टोमहॉक क्रूज़ मिसाइलें: सबसोनिक, निम्न-ऊँचाई वाली सटीक मिसाइलें, जो आंतरिक (इनलैंड) लक्ष्यों पर हमला करने के लिये लॉन्च की जाती हैं और रडार से बचती हैं।
    • टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइल उच्च परिशुद्धता के लिये GPS, जड़त्वीय नेविगेशन प्रणाली (INS), TERCOM (भूभाग मानचित्रण) और DSMAC (डिजिटल दृश्य मिलान) का उपयोग करती है।
  • लो‑कॉस्ट अनक्रूड कॉम्बैट अटैक सिस्टम (LUCAS) ड्रोन: यह संयुक्त राज्य अमेरिका का नया वन‑वे अटैक ड्रोन है जिसे “लो‑कॉस्ट अनक्रूड कॉम्बैट अटैक सिस्टम”  (LUCAS) के नाम से विकसित किया गया है। यह ड्रोन एक तरह का कामिकेज़ (एक‑तरफा हमला करने वाला) ड्रोन है, जिसे विशेष रूप से कम लागत में बड़ी संख्या में इस्तेमाल के लिये बनाया गया है।
    • यह ड्रोन रनवे, ज़मीन पर चलने वाले वाहन या जहाज़ों से लॉन्च किया जा सकता है और कम लागत में सटीक हमले करने में सक्षम है।
  • प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइल (PrSM): एक शॉर्ट‑रेंज बैलिस्टिक मिसाइल जो हाल ही में युद्ध में पहली बार इस्तेमाल हुई है, इसे अमेरिकी M-142 HIMARS सिस्टम से लॉन्च किया जाता है और यह 400 किमी. तक दूर स्थित लक्ष्यों को मारने में सक्षम है।
  • टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस (THAAD): एक उन्नत अमेरिकी एंटी‑बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम है, जिसे शॉर्ट‑रेंज, मीडियम‑रेंज और सीमित इंटरमीडिएट‑रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों को उनकी उड़ान के अंतिम चरण में रोकने के लिये डिज़ाइन किया गया है। यह प्रणाली पृथ्वी के वायुमंडल के अंदर और बाहर दोनों में काम करती है और एक महत्वपूर्ण उच्च‑ऊँचाई वाली रक्षा परत प्रदान करती है।
    • THAAD “हिट‑टू‑किल” काइनेटिक इंटरसेप्शन तकनीक का उपयोग करता है, जिसमें इंटरसेप्टर मिसाइलें अत्यधिक उच्च गति से सीधे टकराकर आने वाले लक्ष्यों को नष्ट कर देती हैं।
    • THAAD (थाड) अत्यधिक मोबाइल और तेज़ी से तैनात होने योग्य भी है, जो अमेरिका को इसे मिसाइल खतरों का सामना करने वाले क्षेत्रों में तैनात करने की अनुमति देता है।
  • पैट्रियट मिसाइल सिस्टम (PAC-3): एक व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाला अमेरिका निर्मित रक्षा सिस्टम है, जो कम‑ऊँचाई के खतरों, जैसे– क्रूज़ मिसाइल और ड्रोन को सफलतापूर्वक रोकता है।
  • एडवांस्ड प्रिसिजन किल वेपन सिस्टम (APKWS): एक किफायती और प्रभावी रक्षा समाधान है।
    • यह मानक अनगाइडेड 'हाइड्रा' रॉकेटों को 25,000 अमेरिकी डॉलर के लेज़र-गाइडेड हथियारों में बदल देता है, जिससे सैन्य बल लाखों डॉलर के महंगे इंटरसेप्टर को बर्बाद किये बिना धीमी गति से चलने वाले ड्रोनों को नष्ट कर सकते हैं।
  • कोयोट एंटी‑ड्रोन सिस्टम: APKWS के साथ अमेरिका कोयोट पर भी काफी निर्भर करता है।
  • यह एक रडार-निर्देशित, जेट-शक्तिधारित इंटरसेप्टर ड्रोन है जो सक्रिय रूप से शाहेद ड्रोन का पीछा करके उन पर टकराता है।
  • SM-3 और SM-6 (US नेवी): समुद्र आधारित इंटरसेप्टर। SM-3 मध्यम उड़ान चरण में बैलिस्टिक मिसाइलों को नष्ट करता है, जबकि SM-6 अंतिम चरण में मिसाइलों, विमान तथा ड्रोन को लक्षित करता है।
  • इनडायरेक्ट फायर प्रोटेक्शन कैपेबिलिटी (IFPC): यह बेसों की रक्षा के लिये AIM-9X का उपयोग करता है—एक प्रमुख, शॉर्ट‑रेंज, इन्फ्रारेड‑ट्रैकिंग, एयर‑टू‑एयर और सतह से लॉन्च होने वाली इंटरसेप्टर मिसाइल—जो ड्रोन और रॉकेटों से सुरक्षा प्रदान करती है और महंगी पैट्रियट मिसाइलों को बचाने में मदद करती है।
  • MQ-9 रीपर ड्रोन: लंबी उड़ान क्षमता वाले अनक्रूड हवाई वाहन, जो लगातार निगरानी, लक्ष्य चिह्नित करने और सटीक हेलफायर मिसाइल ले जाने के लिये उपयोग किये जाते हैं।
  • बोइंग P-8I: एक बहु-मिशन, लंबी दूरी वाला समुद्री गश्ती विमान, जिसे एंटी-सबमरीन वारफेयर (ASW), एंटी-सर्फेस वारफेयर, खुफिया, निगरानी और टोही (ISR), समुद्री क्षेत्र की जानकारी तथा खोज एवं बचाव अभियानों के लिये डिज़ाइन किया गया है।

इज़रायल शस्त्रागार

  • ब्लू स्पैरो मिसाइल: यह एक एयर-लॉन्च्ड क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल है, जो स्पैरो मिसाइल परिवार (जिसमें ब्लैक स्पैरो और सिल्वर स्पैरो भी शामिल हैं) का हिस्सा है।
    • मूल रूप से इसे इज़रायल के एरो मिसाइल रक्षा प्रणाली के अभ्यास लक्ष्य के रूप में डिज़ाइन किया गया था, लेकिन बाद में इसे हवा-से-सतह पर हमले वाले मिशनों के लिये अनुकूलित किया गया।
    • इस मिसाइल की सीमा लगभग 2,000 किमी. है। इसे आमतौर पर F-15 जैसे लड़ाकू विमानों से लॉन्च किया जाता है और यह एक क्वासी-बैलिस्टिक मार्ग का पालन करती है, जिसमें यह थोड़ी देर के लिये वायुमंडल से बाहर जाती है तथा फिर अपने लक्ष्य पर हमला करने के लिये पुनः प्रवेश करती है, जिससे इसे वायु रक्षा प्रणाली द्वारा रोकना कठिन हो जाता है।
  • जेरिको मिसाइल:
    • जेरिको-2: 1,500–3,000 किमी. की मारक क्षमता वाली एक मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल (MRBM)।
    • जेरिको-3: 4,800–6,500 किमी. दूर लक्ष्यों को भेदने में सक्षम एक मध्यवर्ती दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल (IRBM), जो इज़रायल की स्ट्रेटजिक डेटेरेंस की बुनियाद है।
  • एरो-2 और एरो-3: लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली। एरो-3 मिसाइलों को वायुमंडल के बाहर (एक्सो-एटमॉस्फेरिक) रोकता है, जबकि एरो-2 वायुमंडल के भीतर कार्य करता है।
  • डेविड स्लिंग: मध्यम से लंबी दूरी के रॉकेट, क्रूज़ मिसाइलों और सामरिक बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिये डिज़ाइन किया गया, जो एरो और आयरन डोम के बीच के अंतर को समाप्त करता है।
  • आयरन डोम: रॉकेट, तोपखाने के गोले और ड्रोन के खिलाफ प्रभावी कम दूरी की रक्षा प्रणाली, जिसमें कम गति वाले खतरों के खिलाफ उच्च सफलता दर है।
  • आयरन बीम: गाइडेड-एनर्जी लेज़र सिस्टम जो कम लागत पर ड्रोन और छोटे प्रोजेक्टाइल को नष्ट करती है, जिससे महंगे इंटरसेप्टर पर निर्भरता कम होती है।
  • सी-डोम: आयरन डोम का नौसैनिक संस्करण, इज़रायल के सार 6-श्रेणी के कार्वेट पर तैनात किया गया है ताकि हूती और ईरानी ड्रोन समूहों से उसके अपतटीय गैस रिग और समुद्री सीमाओं की रक्षा की जा सके।
  • F-35I "अदिर": इज़रायल मध्य पूर्व का एकमात्र देश है जो इस पाँचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान का संचालन करता है, जो बावर-373 जैसी वायु रक्षा प्रणालियों को चकमा देकर ईरानी हवाई क्षेत्र में हमलों को सक्षम बनाता है।

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और पढ़ें: ईरान पर अमेरिका-इज़रायल का हमला

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. ईरान द्वारा उपयोग किये जाने वाले शाहेद-136 ड्रोन क्या हैं?
शाहेद-136 कम लागत वाले लोइटरिंग म्यूनिशन (कामिकेज़ ड्रोन) हैं, जिनका उपयोग सामूहिक हमलों में दुश्मन की वायु रक्षा प्रणालियों को अभिभूत करने के लिये किया जाता है।

2. आयरन डोम प्रणाली की क्या भूमिका है?
आयरन डोम इज़रायल की कम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली है, जिसे उच्च सफलता दर के साथ रॉकेट, तोपखाने के गोले और ड्रोन को रोकने के लिये डिज़ाइन किया गया है।

3. ब्लू स्पैरो मिसाइल क्या है?
ब्लू स्पैरो इज़रायल द्वारा विकसित एक वायु से प्रक्षेपित सेमी-बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसे मूल रूप से एरो रक्षा प्रणाली के लिये लक्ष्य के रूप में डिज़ाइन किया गया था, जिसे बाद में आक्रामक हमलों के लिये अनुकूलित किया गया।

4. थाड (THAAD) क्या है और यह कैसे कार्य करता है?
थाड (टर्मिनल हाई अल्टीट्यूड एरिया डिफेंस) एक अमेरिकी एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम है जो आने वाली मिसाइलों को उनके उच्च-तुंगता वाले टर्मिनल चरण के दौरान रोकती है।

5. इज़रायल के लिये F-35I "अदिर" महत्त्वपूर्ण क्यों है?
F-35I पाँचवीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान है, जो इज़रायल को उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों को चकमा देते हुए हमले करने में सक्षम बनाता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रिलिम्स 

प्रश्न. मानव-रहित वायु वाहनों (UAV) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2025)

I. सभी प्रकार के UAV ऊर्ध्वाधर अवतरण (लैंडिंग) कर सकते हैं 

II. सभी प्रकार के UAV स्वत: मंँडरा सकते हैं 

III.  सभी प्रकार के UAV शक्ति पूर्ति के स्रोत के रूप में केवल बैटरी का प्रयोग कर सकते हैं

उपर्युक्त कथनों  में से कितने सही हैं?

(a) केवल एक

(b) केवल दो 

(c) सभी तीन

(d) कोई भी नहीं

उत्तर: (d)


प्रश्न. कभी-कभी समाचार में उल्लिखित ‘टर्मिनल हाई अल्टीट्यूड एरिया डिफेंस’  (टीएचएएडी) क्या है? (2018)

(a)    इज़रायल की एक रडार प्रणाली

(b)    भारत का घरेलू मिसाइल-प्रतिरोधी कार्यक्रम

(c)    अमेरिकी मिसाइल-प्रतिरोधी प्रणाली

(d)    जापान और दक्षिण कोरिया के बीच एक रक्षा सहयोग

उत्तर: (c)


हाइब्रिड इलेक्ट्रिक व्हीकल्स

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

दिल्ली की आगामी इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) पॉलिसी सड़क कर और पंजीकरण शुल्क में छूट को बैटरी इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (BEV) से बढ़ाकर हाइब्रिड इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (HEV) तक कर सकती है।

हाइब्रिड इलेक्ट्रिक व्हीकल्स क्या हैं?

  • परिचय: हाइब्रिड इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (HEV) एक ऑटोमोबाइल है, जो बेहतर ईंधन दक्षता और कम उत्सर्जन प्राप्त करने के लिये एक पारंपरिक आंतरिक दहन इंजन (ICE) को एक इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम के साथ जोड़ता है। यह एक्सटर्नल चार्जिंग की आवश्यकता के बगैर संचालित होता है।
    • यह सहज रूप से इन ऊर्जा स्रोतों के मध्य स्विच करता है या उन्हें संयोजित करता है, इंजन से अतिरिक्त दूरी एवं मोटर से तात्कालिक त्वरण तथा नॉइज़-फ्री ड्राइविंग का लाभ उठाते हुए, ताकि दक्षता का अनुकूलन हो सके।
  • सेल्फ-चार्जिंग क्षमता: प्योर इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) के विपरीत, इसमें एक मानक हाइब्रिड की सेल्फ-चार्जिंग बैटरी होती है। इसे प्लग इन करने की आवश्यकता नहीं होती है; इसे पुनर्योजी ब्रेकिंग के माध्यम से और कुछ डिज़ाइनों में, गैसोलीन इंजन द्वारा जनरेटर के रूप में कार्य करके स्वचालित रूप से पुनः चार्ज किया जाता है।
    • ब्रेक लगाने के दौरान, इलेक्ट्रिक मोटर एक जेनरेटर के रूप में कार्य करती है तथा वाहन की गतिज ऊर्जा (जो अन्यथा ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती) को बैटरी को रिचार्ज करने के लिये विद्युत में परिवर्तित करती है।
  • हाइब्रिड कॉन्फिगरेशन के प्रकार:
    • पैरलल हाइब्रिड: इसमें इंजन और इलेक्ट्रिक मोटर दोनों ही पहियों से यांत्रिक रूप से जुड़े होते हैं, जिससे वे वाहन को स्वतंत्र रूप से या एक साथ चलाने में सक्षम होते हैं। हालाँकि कुछ समय के लिये केवल इलेक्ट्रिक मोड में चलना संभव है, मोटर आमतौर पर इंजन की सहायता के रूप में काम करती है।
    • सीरीज़-पैरल (पावर-स्प्लिट) हाइब्रिड: यह स्मार्ट तरीके से मोड बदल सकता है, केवल इलेक्ट्रिक पावर पर चलना, इंजन से मोटर के लिये बिजली बनाना (सीरीज़ मोड) या दोनों पावर स्रोतों से सीधे पहियों को चलाना (पैरलल मोड)।
    • प्लग-इन हाइब्रिड इलेक्ट्रिक व्हीकल (PHEV): इसकी मुख्य विशेषता यह है कि इसे बाहरी स्रोत से प्लग के माध्यम से चार्ज किया जा सकता है। इसके अलावा इसे इंजन और रीजेनरेटिव ब्रेकिंग से भी चार्ज किया जा सकता है। PHEV किसी भी हाइब्रिड आर्किटेक्चर (पैरलल, सीरीज़, या सीरीज़-पैरलल) का उपयोग कर सकते हैं तथा यह शहरी इलेक्ट्रिक यात्रा एवं लंबी दूरी के लिये असीमित हाइब्रिड रेंज दोनों का लाभ प्रदान करते हैं।
  • लाभ: हाइब्रिड व्हीकल शहर में विशेषरूप से ईंधन की बचत प्रदान करते हैं और रीजेनरेटिव ब्रेकिंग जैसी तकनीकों के माध्यम से प्रदूषण को कम करते हैं, साथ ही पूरी तरह इलेक्ट्रिक व्हीकल से जुड़ी रेंज की चिंता को दूर करते हैं। अन्य लाभों में ब्रेक के घिसने की दर में कमी तथा व्हीकल के प्रकार एवं स्थान के अनुसार सरकारी प्रोत्साहन, जैसे- टैक्स क्रेडिट प्राप्त करने की संभावना शामिल है।
  • हानि: हाइब्रिड व्हीकल अपनी जटिल तकनीक के कारण पारंपरिक कारों की तुलना में शुरुआती कीमत में महँगे होते हैं और कुछ ड्राइवरों को इन्हें चलाना कम रोचक लगता है। अन्य कमियाँ हैं- बैटरी बदलने की ऊँची लागत और ईंधन की बचत का मुख्य लाभ शहर की ड्राइविंग में होता है, हाइवे पर कम प्रभावी होता है।

उच्च ऊर्जा वाहनों (व्हीकल्स) के लिये अन्य संभावित वैकल्पिक प्रौद्योगिकियाँ

  • बैटरी से चलने वाले इलेक्ट्रिक व्हीकल (BEV): ये पूरी तरह से लार्ज रिचार्जेबल बैटरी और इलेक्ट्रिक मोटर से चलते हैं, जिससे कोई उत्सर्जन नहीं होता। ये पूरी तरह से बाहरी चार्जिंग व्यवस्था पर निर्भर होते हैं और इनकी रेंज बैटरी की क्षमता पर आधारित होती है।
  • फ्यूल सेल इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (FCEVs): ये इलेक्ट्रिक मोटर को शक्ति प्रदान करने के लिये हाइड्रोजन फ्यूल सेल का इस्तेमाल करते हैं। इस प्रक्रिया में, विद्युत उत्पन्न होती है और जलवाष्प एकमात्र उप-उत्पाद के रूप में उत्सर्जित होती है।
  • हाइड्रोलिक हाइब्रिड: ये सिस्टम ब्रेकिंग के दौरान उत्पन्न ऊर्जा को बैटरी में स्टोर करने की बजाय, उसे द्रव दाब के रूप में हाइड्रोलिक संचायकों में संगृहीत करते हैं। यह संगृहीत दबाव बाद में वाहन को चलाने (प्रणोदन) में सहायता करता है।
  • वैकल्पिक ईंधन वाले पारंपरिक वाहन: इस वर्ग के अंतर्गत ऐसे वाहन आते हैं, जिनमें आंतरिक दहन इंजन का उपयोग होता है, लेकिन वे गैर-पेट्रोलियम आधारित ईंधनों पर संचालित होते हैं। ये वाहन विद्युतीकरण के बिना भी उत्सर्जन को कम करने में सहायक होते हैं। उदाहरण के लिये, फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल (ये E85 जैसे इथेनॉल मिश्रणों के साथ संगत होते हैं), संपीडित प्राकृतिक गैस (CNG) पर चलने वाले वाहन, जैव ईंधन का उपयोग करने वाले वाहन, इनमें शामिल हैं। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. हाइब्रिड इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (HEV) क्या हैं?
एक हाइब्रिड इलेक्ट्रिक वाहन ईंधन दक्षता में सुधार और उत्सर्जन को कम करने के लिये एक आंतरिक दहन इंजन (ICE) को एक इलेक्ट्रिक मोटर और बैटरी के साथ जोड़ता है, आमतौर पर इसके लिये बाहरी चार्जिंग की आवश्यकता नहीं होती है।

2. हाइब्रिड वाहनों में रीजेनरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम किस प्रकार कार्य करता है?
ब्रेकिंग के दौरान, इलेक्ट्रिक मोटर एक जेनरेटर के रूप में कार्य करती है, गतिज ऊर्जा को विद्युत में परिवर्तित करती है और इसे बैटरी में संग्रहित करती है।

3. बैटरी से चलने वाले इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (BEV) हाइब्रिड वाहनों से किस प्रकार भिन्न हैं?
BEV पूरी तरह से इलेक्ट्रिक बैटरी पर चलते हैं और इनसे टेलपाइप से कोई उत्सर्जन नहीं होता है, जबकि हाइब्रिड इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन को इंटरनल कंबशन इंजन के साथ जोड़ते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रश्न. हरित हाइड्रोजन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2023)

  1. इसे आंतरिक दहन के लिये ईंधन के रूप में सीधे इस्तेमाल किया जा सकता है।  
  2. इसे प्राकृतिक गैस के साथ मिलाकर ताप या शक्ति जनन के लिये ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।  
  3. इसे वाहन चालन के लिये हाइड्रोजन ईंधन प्रकोष्ठ में इस्तेमाल किया जा सकता है।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

(a) केवल एक

(b) केवल दो

(c) सभी तीन

(d) कोई भी नहीं

उत्तर: (c)


प्रश्न. हाइड्रोजन ईंधन सेल वाहन ‘निकास’ के रूप में निम्नलिखित में से एक का उत्पादन करते हैं: (2010)

(a) NH₃

(b) CH₄

(c) H₂O

(d) H₂O₂

उत्तर: (c)


प्रश्न 1. हमारे देश के शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (Air Quality Index) का परिकलन करने में साधारणतया निम्नलिखित वायुमंडलीय गैसों में से किनको विचार में लिया जाता है? (2016)

  1. कार्बन डाइऑक्साइड 
  2. कार्बन मोनोक्साइड
  3.  नाइट्रोजन डाइऑक्साइड 
  4. सल्फर डाइऑक्साइड 
  5. मेथेन

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1, 2 और 3

(b) केवल 2, 3 और 4

(c) केवल 1, 4 और 5

(d) 1, 2, 3, 4 और 5

उत्तर: (b)


ग्रीन अमोनिया और ग्रीन मेथनॉल के लिये मानक

स्रोत: द हिंदू 

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने 'राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन' (NGHM) के तहत हरित हाइड्रोजन डेरिवेटिव्स (जैसे– अमोनिया और मेथनॉल) के व्यापार में तेज़ी लाने के लिये 'ग्रीन अमोनिया' और 'ग्रीन मेथनॉल' हेतु विशिष्ट उत्सर्जन मानकों को अधिसूचित किया है।

  • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: वर्ष 2023 में अनुमोदित इस मिशन का उद्देश्य भारत को स्वच्छ हाइड्रोजन के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना है। वर्ष 2030 तक इसका लक्ष्य हाइड्रोजन उत्पादन के लिये 125 गीगावाट (GW) की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विकसित करना है, इसके तहत कुल 8 लाख करोड़ रुपए से अधिक का निवेश कर 6 लाख नौकरियाँ सृजित करना अपेक्षित है। इसके अतिरिक्त इसके परिणामस्वरूप जीवाश्म ईंधन के आयात में 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक की शुद्ध कमी के साथ-साथ वार्षिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 50 मीट्रिक टन की कमी आएगी।
  • ग्रीन हाइड्रोजन: यह वह हाइड्रोजन है जिसे सौर या पवन जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की सहायता से जल इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा उत्पन्न किया जाता है। 
    • भारत सरकार के मानकों के अनुसार, यदि उत्पादित हाइड्रोजन के प्रति किलोग्राम पर उत्सर्जन 2 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) समतुल्य से अधिक नहीं होता, तो उसे “ग्रीन” माना जाता है।
    • यदि उत्सर्जन इस निर्धारित सीमा के भीतर रहता है, तो इसे बायोमास (जैसे– कृषि अपशिष्ट) से भी उत्पादित किया जा सकता है।
  • ग्रीन अमोनिया थ्रेशहोल्ड: किसी अमोनिया को आधिकारिक रूप से “ग्रीन” वर्गीकृत करने के लिये कुल गैर-जैविक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन प्रति किलोग्राम अमोनिया पर अधिकतम 0.38 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य से अधिक नहीं होना चाहिये, जिसकी गणना पिछले 12 महीनों की अवधि के औसत के आधार पर की जाती है।
    • ग्रीन अमोनिया एक कार्बन-न्यूट्रल, नवीकरणीय ईंधन और उर्वरक फीडस्टॉक है, जिसे पवन या सौर ऊर्जा से इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा उत्पन्न ग्रीन हाइड्रोजन को नाइट्रोजन के साथ मिलाकर तैयार किया जाता है।
    • यह जीवाश्म ईंधन आधारित “ग्रे” अमोनिया का एक सतत विकल्प प्रदान करता है, जो शिपिंग, बिजली उत्पादन और कृषि जैसे क्षेत्रों के डीकार्बोनाइज़ेशन के लिये महत्त्वपूर्ण है।
  • ग्रीन मेथनॉल थ्रेशहोल्ड: उत्सर्जन की सीमा प्रति किलोग्राम मेथनॉल पर अधिकतम 0.44 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य निर्धारित की गई है, जिसकी गणना पिछले 12 महीनों की अवधि के औसत के आधार पर की जाती है।
  • ग्रीन मेथनॉल की सीमा: उत्सर्जन की सीमा 0.44 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष ($CO_2$ eq) प्रति किलोग्राम मेथनॉल से अधिक नहीं निर्धारित की गई है, जिसकी गणना पिछले 12 महीनों की अवधि के औसत के आधार पर की जाती है।
    • ग्रीन मेथनॉल एक कम-कार्बन और नवीकरणीय तरल ईंधन तथा रासायनिक फीडस्टॉक है, जिसे बायोमास (बायो-मेथनॉल) या ग्रीन हाइड्रोजन से तैयार किया जाता है।
    • ग्रीन मेथनॉल एक कम कार्बन, नवीकरणीय तरल ईंधन और रासायनिक फीडस्टॉक है, जो बायोमास (बायो-मेथनॉल) या ग्रीन हाइड्रोजन से उत्पादित किया जाता है।
    • यह पारंपरिक जीवाश्म ईंधन आधारित मेथनॉल के स्थान पर एक सतत और नेट-ज़ीरो विकल्प के रूप में कार्य करता है, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को लगभग 60–95% तक कम करने में सक्षम है।
  • पात्र कार्बन स्रोत: ग्रीन मेथनॉल के उत्पादन के लिये कार्बन डाइऑक्साइड को बायोजेनिक स्रोतों, 'डायरेक्ट एयर कैप्चर' या मौजूदा औद्योगिक स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है।
  • रणनीतिक महत्त्व: ये नए निर्धारित मानक निवेशकों को नियामक स्पष्टता प्रदान करेंगे और उर्वरक, शिपिंग, बिजली तथा भारी उद्योग जैसे हार्ड-टू-अबेट क्षेत्रों के डीकार्बोनाइज़ेशन की सुविधा प्रदान करेंगे।

और पढ़ें: भारत की ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता


व्हाइट फॉस्फोरस

स्रोत: द हिंदू 

ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट ने इज़रायल पर लेबनान के आवासीय क्षेत्रों में व्हाइट फॉस्फोरस वाले गोला-बारूद का उपयोग करने का आरोप लगाया है, जिससे इंटरनेशनल ह्यूमनिटेरियन लॉ के संभावित उल्लंघन पर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हो गई हैं।

  • इन कथित केमिकल वेपन का उपयोग बढ़ते इज़रायल-लेबनान संघर्ष के बीच हुआ है, लेबनानी अधिकारियों ने हाल के इज़रायली हमलों में नागरिकों के हताहत होने की सूचना दी है।
  • व्हाइट फॉस्फोरस: यह विषैला, मोम जैसा रासायनिक पदार्थ है, जो 800 डिग्री सेल्सियस से ऊपर के तापमान पर जलता है, जो अकेला धातु को पिघलाने के लिये पर्याप्त है।
    • आमतौर पर लहसुन जैसी गंध के साथ सफेद, पीले या रंगहीन, सफेद फॉस्फोरस गोला-बारूद को बुझाना मुश्किल होता है और यह तब तक जलता रहता है, जब तक कि रसायन पूरी तरह से समाप्त न हो जाए या ऑक्सीजन से वंचित न हो जाए।
  • इंसेंडियरी म्यूनिशन: सेनाएँ प्रायः व्हाइट फॉस्फोरस का उपयोग इंसेंडियरी म्यूनिशन के रूप में युद्ध के मैदानों में धूम्र आवरण बनाने के लिये करती हैं, क्योंकि यह तेज़ी से प्रज्वलित होता है और सघन धूम्र उत्पन्न करता है, जो बड़े क्षेत्रों में फैल सकता है।
    • इंसेंडियरी म्यूनिशन एक ऐसा हथियार है, जिसे वस्तुओं में आग लगाने या लक्ष्य पर प्रहार करने पर उत्पन्न लौ, ऊष्मा या रासायनिक प्रतिक्रियाओं के माध्यम से आग उत्पन्न करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
  • गंभीर स्वास्थ्य खतरे: जब आबादी वाले क्षेत्रों में व्हाइट फॉस्फोरस का उपयोग किया जाता है, तो यह इमारतों में आग लगा सकता है।
    • व्हाइट फॉस्फोरस मनुष्यों के लिये अत्यंत हानिकारक है, क्योंकि यह शरीर में जलन उत्पन्न कर सकता है, जो हड्डी तक पहुँच जाती है और विषैले रसायन उत्सर्जित करता है, जो यकृत, गुर्दे एवं हृदय जैसे महत्त्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुँचाते हैं।
    • यह पदार्थ असामान्य पोटेशियम स्तर सहित चयापचय संबंधी विकार भी उत्पन्न कर सकता है, जिससे हृदय गति रुक सकती है।
  • अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत वैधता: हालाँकि  धूम्र आवरण का उपयोग किये जाने पर व्हाइट फॉस्फोरस को रासायनिक हथियार के रूप में पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं किया गया है।
    • नागरिक-आबादी वाले क्षेत्रों में इंसेंडियरी म्यूनिशन के रूप में इसका उपयोग वर्ष 1980 के कुछ पारंपरिक हथियारों पर अभिसमय (CCW) के तहत सख्ती से अवैध है।
    • CCW उन हथियारों को प्रतिबंधित करता है, जो नागरिकों और लड़ाकों को अत्यधिक चोट या अंधाधुंध नुकसान पहुँचाते हैं। भारत CCW के सभी पाँच प्रोटोकॉल का पक्षकार है।
      • वर्ष 1980 के CCW का प्रोटोकॉल III नागरिकों के खिलाफ इंसेंडियरी म्यूनिशन को प्रतिबंधित करता है, हालाँकि व्हाइट फॉस्फोरस को अक्सर धुआँ या प्रकाश के लिये उपयोग किये जाने वाले बहुउद्देश्यीय म्यूनिशन के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जिससे सेनाओं को यह तर्क देने का मौका मिलता है कि यह प्रोटोकॉल के अंतर्गत नहीं आता है।
      • इसके अतिरिक्त इज़रायल प्रोटोकॉल III का हस्ताक्षरकर्त्ता नहीं है, जिससे जवाबदेही और जटिल हो जाती है।

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संयुक्त सैन्य अभ्यास लामितिये-2026

स्रोत: पीआईबी

भारतीय सशस्त्र बलों का दल सेशेल्स रक्षा बलों के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘लामितिये-2026’ (LAMITIYE-2026) के 11वें संस्करण में भाग ले रहा है, जिसका उद्देश्य भारत और सेशेल्स के बीच रक्षा सहयोग और परिचालन समन्वय को मज़बूत करना है।

  • लामितिये अभ्यास: ‘लामितिये’ शब्द का अर्थ क्रियोल भाषा (सेशेल्स की आधिकारिक भाषा) में ‘मित्रता’ है, जो दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग की भावना को दर्शाता है। 
  • संयुक्त सैन्य अभ्यास लामितिये भारतीय सशस्त्र बलों और सेशेल्स रक्षा बलों के बीच वर्ष 2001 से आयोजित होने वाला एक द्विवार्षिक अभ्यास है।
    • इस अभ्यास का उद्देश्य अर्द्ध-शहरी वातावरण में अपरंपरागत अभियानों के क्षेत्र में संतुलन स्थापित करना और शांति स्थापना अभियानों के दौरान दोनों पक्षों के बीच सहयोग और अंतर-संचालनीयता को बढ़ावा देना है। इससे दोनों सेनाओं के बीच कौशल, अनुभव और अच्छी प्रथाओं के आदान-प्रदान के साथ-साथ द्विपक्षीय सैन्य संबंधों को बढ़ावा मिलेगा।
    • 11वें संस्करण में भारतीय सशस्त्र बलों की पहली त्रि-सेवा भागीदारी देखने को मिल रही है, इस संयुक्त सैन्य अभ्यास में असम रेजिमेंट, भारतीय नौसेना एवं वायु सेना के जवान, INS त्रिकंद और एक C-130J विमान शामिल हैं।
  • सेशेल्स: यह पश्चिमी हिंद महासागर में स्थित 155 द्वीपों का एक द्वीपसमूह देश है, जो मेडागास्कर के उत्तर-पूर्व में और अफ्रीका के पूर्वी तट से दूर स्थित है। 
    • यह अफ्रीका का सबसे छोटा देश है, जो मस्करीन पठार पर स्थित है। इसकी राजधानी राजधानी माहे द्वीप पर स्थित विक्टोरिया है। 
    • सेशेल्स भारत के 'सागर' (क्षेत्र में सभी के लिये सुरक्षा और विकास) दृष्टिकोण में एक महत्त्वपूर्ण भागीदार है। प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों पर स्थित होने के कारण यह समुद्री सुरक्षा के मामले में भारत के लिये रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण है।

Seychelles

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भारत रणनीतिक तेल भंडार जारी करने की IEA की पहल में नहीं होगा शामिल

स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया 

भारत ने मध्य पूर्व के बढ़ते संघर्ष के कारण अस्थिर हुए वैश्विक तेल बाज़ारों को नियंत्रित करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) द्वारा प्रस्तावित रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) जारी करने की पहल में शामिल न होने का निर्णय लिया है।

  • पृष्ठभूमि: प्रमुख उत्पादकों द्वारा आपूर्ति में कटौती और ईरान पर अमेरिका-इज़रायल युद्ध के कारण शिपिंग में व्यवधान की आशंकाओं के चलते कच्चे तेल की कीमतें 119 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँच गईं।
  • तर्क: सरकार 'भारत प्रथम' नीति के तहत तर्क देती है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना बाज़ार हस्तक्षेप से अधिक महत्त्वपूर्ण है। भारत का रणनीतिक भंडार केवल घरेलू आपूर्ति में वास्तविक व्यवधानों से सुरक्षा के लिये है, न कि वैश्विक कीमतों की अस्थिरता को नियंत्रित करने के साधन के रूप में।
  • IEA की सदस्यता स्थिति: भारत अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) का एक सहयोगी सदस्य है, न कि पूर्ण सदस्य। इस सदस्यता स्थिति के कारण एजेंसी द्वारा समन्वित स्टॉक रिलीज़ (भंडार जारी करने) के आह्वान का पालन करने के लिये भारत बाध्यकारी रूप से प्रतिबद्ध नहीं है।
  • पूर्व भागीदारी: यह 2021 की उस पहल से अलग है, जब भारत ने अमेरिका के नेतृत्व में अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) से लगभग 5 मिलियन बैरल तेल जारी करके वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों को स्थिर करने में सहयोग किया था।

रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार

  • परिचय: SPR आपातकालीन कच्चे तेल के भंडार हैं जिन्हें सरकारें पेट्रोलियम आपूर्ति में व्यवधान को कम करने के लिये बनाए रखती हैं।  IEA के सदस्य देशों को तेल का ऐसा भंडार रखना अनिवार्य है, जो नेट आयात के कम-से-कम 90 दिनों के बराबर हो।
    • भारत के विशेष पेट्रोलियम भंडार (SPR) का प्रबंधन पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधीन भारतीय रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार लिमिटेड (ISPRL) द्वारा किया जाता है ।
  • वर्तमान SPR क्षमता: भारत, जो विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता है, के पास वर्तमान में लगभग 5.33 मिलियन टन की रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण (SPR) क्षमता है। ये भंडार केवल 80 प्रतिशत ही भरे हुए हैं।
    • भारत के परिचालन रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) विशाखापत्तनम (1.33 MMT), मंगलुरु (1.5 MMT) और पाडुर (2.5 MMT) में स्थित 3 भूमिगत रॉक कैवर्न (चट्टानी गुफा) स्थलों पर स्थित हैं, जो लगभग 9.5 दिनों की कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं। 
    • सरकार ने SPR विस्तार को मंज़ूरी दे दी है, जिसमें पाडुर (कर्नाटक) में 2.5 MMT और चंडीखोल (ओडिशा) में 4 MMT की सुविधा जोड़ना शामिल है। भविष्य के स्थलों, जैसे– बीकानेर (सॉल्ट कैवर्न/नमक की गुफा), मंगलुरु, राजकोट या बीना (मध्य प्रदेश) पर योजना बनाई जा रही है।
  • कुल ऊर्जा बफर: रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPRs) तेल कंपनियों द्वारा रखे गए वाणिज्यिक इन्वेंट्री (commercial inventories) के पूरक के रूप में कार्य करते हैं। वर्तमान में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का संयुक्त भंडार (जिसमें रिफाइनरियों, बंदरगाहों और फ्लोटिंग स्टोरेज का स्टॉक शामिल है) भारत के लिये लगभग 74 दिनों का कुल बफर प्रदान करता है। 

और पढ़ें: भारत के लिये IEA की पूर्ण सदस्यता


NHAI द्वारा पहला राष्ट्रीय राजमार्ग ग्रीन कवर इंडेक्स 2025-26 जारी

स्रोत: पीआईबी 

ग्रीन कवर इंडेक्स

  • परिचय: GCI प्रत्येक 1 किलोमीटर खंड के भीतर हरित आच्छादन वाली भूमि के प्रतिशत को दर्शाता है। इसमें हाई-रिज़ॉल्यूशन वाले उपग्रह सेंसर क्लोरोफिल सामग्री को मापते हैं ताकि राजमार्गों के बाएँ और दाहिने तटों पर वनस्पति का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जा सके।
  • प्रयुक्त प्रौद्योगिकी और डेटा: यह राष्ट्रीय राजमार्गों के अधिकार-मार्ग में हरित आवरण का वैज्ञानिक, मात्रात्मक मूल्यांकन प्रदान करने के लिये अंतरिक्ष-आधारित प्रौद्योगिकियों का उपयोग करता है। यह इसरो के रिसोर्ससैट-2/2A (LISS-IV) उपग्रह से 5-मीटर रिज़ॉल्यूशन के मल्टी-स्पेक्ट्रल डेटा का उपयोग करता है। सटीकता बढ़ाने के लिये इसे और भी बेहतर रिज़ॉल्यूशन वाली कार्टोसैट-2S इमेजरी के साथ क्रॉस-सत्यापित किया जाता है।
    • परिणाम NRSC के ओपन-सोर्स भुवन वेब GIS पोर्टल पर प्रकाशित किये जाते हैं, जो इंटरैक्टिव मैप और मानकीकृत रिपोर्ट प्रदान करता है।
  • कवरेज और दायरा: वर्तमान में यह परियोजना 24 राज्यों में लगभग 30,000 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों की निगरानी करती है, विशेष रूप से उनका जो संचालन एवं रखरखाव (O&M) की अवस्था में हैं।
  • नीतिगत संपर्क: यह परियोजना भारत की ग्रीन हाईवे पॉलिसी, 2015 का प्रत्यक्ष कार्यान्वयन है, जो NHAI को न केवल वृक्ष लगाने बल्कि उनके जीवित रहने को भी सुनिश्चित करने का निर्देश देती है।
  • भविष्य का दायरा और संवर्द्धन: नियोजित उन्नयन में स्वचालित वर्गीकरण के लिये मशीन लर्निंग का उपयोग, वनस्पति हानि के लिये चेंज-डिटेक्शन अलर्ट और सतत बुनियादी ढाँचा योजना का समर्थन करने के लिये कार्बन पृथक्करण मॉडल के साथ एकीकरण शामिल है।

और पढ़ें: हरित राष्ट्रीय राजमार्ग गलियारा परियोजना