प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2026
चर्चा में क्यों?
भारत ने अपने प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 (2026 में संशोधित) में संशोधन करते हुए कंपनियों के लिये अनुपालन मानकों को आसान बनाया है, जबकि विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) ढाँचे के तहत रीसाइक्लिंग लक्ष्यों को बरकरार रखा है।
प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 (संशोधित 2026) की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
- अनुपालन प्रावधान: जो कंपनियाँ वित्तीय वर्ष 2025–26 के लिये अपने पुनर्चक्रण लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाती हैं, उन्हें अब तुरंत दंडित नहीं किया जाएगा।
- वित्तीय वर्ष 2025–26 के अधूरे लक्ष्यों को अगले तीन वर्षों (2026–27 से शुरू) तक आगे ले जाया जा सकता है, बशर्ते कि हर वर्ष कम-से-कम एक-तिहाई कमी को पूरा किया जाए।
- पुनर्चक्रण लक्ष्य: वर्ष 2026 के संशोधन में प्लास्टिक पैकेजिंग में पुनर्चक्रित सामग्री और पुनः उपयोग के लक्ष्यों के लिये चरणबद्ध ढाँचा बनाए रखा गया है। यह वर्ष 2022 के विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) ढाँचे के तहत शुरू की गई प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है, जिसमें पहली बार उत्पादकों, आयातकों तथा ब्रांड मालिकों (PIBOs) के लिये संग्रहण लक्ष्य निर्धारित किये गए थे।
- वित्तीय वर्ष 2025–26 के लिये कठोर प्लास्टिक पैकेजिंग (श्रेणी I) में कम-से-कम 30% पुनर्चक्रित सामग्री होना अनिवार्य है, जो वर्ष 2028–29 तक बढ़कर 60% हो जाएगा।
- लचीले प्लास्टिक (श्रेणी II) के लिये 10% की आवश्यकता निर्धारित है, जो बढ़कर 20% हो जाएगी, जबकि बहु-स्तरीय प्लास्टिक (श्रेणी III) हेतु 5% का लक्ष्य है, जो बढ़कर 10% तक पहुँचेगा।
- इसके अतिरिक्त 'रिजिड पैकेजिंग' (कठोर पैकेजिंग) के पुन: उपयोग के लक्ष्य अनिवार्य कर दिये गए हैं, जिसमें छोटे कंटेनरों (0.9–4.9 लीटर) के लिये 10%, बड़े पानी के पैकेटों/बोतलों के लिये 70% और बड़े गैर-जल पैकेटों के लिये 10% का लक्ष्य निर्धारित है, जिसमें समय के साथ धीरे-धीरे वृद्धि की जाएगी।
- व्यापार योग्य प्रमाण-पत्र प्रणाली: नियमों में एक ऐसी व्यवस्था को औपचारिक रूप दिया गया है, जिसके तहत कंपनियाँ अपने पुनर्चक्रण दायित्वों को पूरा करने के लिये उन कंपनियों से ट्रेडेबल क्रेडिट खरीद सकती हैं, जिन्होंने अपने लक्ष्यों से अधिक प्रदर्शन किया है।
- हालाँकि यह प्रणाली लचीलापन प्रदान करती है और लागत कम करती है, लेकिन यह कंपनियों को अपने स्वयं के प्लास्टिक के पुनर्चक्रण से बचने की अनुमति भी देती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वर्ष 2023 में 6 लाख से अधिक फर्जी प्रमाण-पत्र पाए।
- छूट: नियमों में ऐसे मामलों के लिये छूट दी गई है, जहाँ अन्य विनियम पुनर्चक्रित प्लास्टिक के उपयोग को सीमित करते हैं, जैसे कि भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI), जिसके कारण खाद्य और पेय पैकेजिंग क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा इससे बाहर रह सकता है।
- कार्यान्वयन तंत्र: अनुपालन की निगरानी एक केंद्रीकृत EPR पोर्टल के माध्यम से की जाती है, जिस पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की निगरानी रहती है, ताकि दायित्वों की ट्रैकिंग, रिपोर्टिंग और प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।
- नियमों के तहत कंपनियों के लिये वर्ष 2024–25 तक बाज़ार में जारी किये गए सभी प्लास्टिक का 100% संग्रहण और प्रसंस्करण करना अनिवार्य किया गया है, जो EPR कार्यान्वयन का अंतिम चरण है।
- हालाँकि पूर्ण अनुपालन का कोई स्पष्ट सार्वजनिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, क्योंकि अधिकांश डेटा केंद्रीकृत पोर्टल के माध्यम से स्वयं-रिपोर्टिंग पर आधारित है और संपूर्ण प्रणाली स्तर पर कोई व्यापक सत्यापन व्यवस्था मौजूद नहीं है।
- पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, EPR के तहत पुनर्चक्रण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, लेकिन यह अभी भी पूर्ण कवरेज से दूर है। वर्ष 2022 से अब तक 2.07 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक अपशिष्ट का पुनर्चक्रण किया गया है, जबकि वर्ष 2022–23 में वार्षिक प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पादन लगभग 41.3 लाख टन रहा, जो लक्ष्यों और वास्तविक परिणामों के बीच के अंतर को दर्शाता है।
नोट: प्लास्टिक की श्रेणियाँ पुनर्चक्रणीयता के आधार पर परिभाषित की जाती हैं: श्रेणी I (कठोर प्लास्टिक) में उच्च-घनत्व पॉलीथीन (HDPE) और पॉलीइथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET) कंटेनर शामिल हैं, इन्हें एकत्र करना सबसे आसान है; श्रेणी II (लचीला प्लास्टिक) में कैरी बैग और स्नैक रैपर शामिल हैं जिन्हें एकत्र करना मध्यम कठिनाई वाला है; और श्रेणी III (बहु-परत प्लास्टिक) जैसे टेट्रा पैक कार्टन एवं फॉयल रैपर को पुनर्चक्रित करना सबसे कठिन है।
- भारत ने वर्ष 2022 में ही एकल-उपयोग प्लास्टिक वस्तुओं पर प्रतिबंध लगा दिया था।
प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों (संशोधन 2026) में परिभाषित प्रमुख शब्द
- जीवन के अंत का निपटान: यह प्लास्टिक अपशिष्ट से ऊर्जा पुनर्प्राप्ति के उपयोग को संदर्भित करता है, जिसमें सीमेंट और इस्पात उद्योगों में सह-प्रसंस्करण, अपशिष्ट-से-ऊर्जा, अपशिष्ट-से-तेल रूपांतरण एवं सड़क निर्माण जैसी प्रक्रियाएँ शामिल हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्लास्टिक को नए प्लास्टिक या रसायनों में परिवर्तित करना यहाँ शामिल नहीं है और इसे पुनर्चक्रण के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- पुनर्चक्रण: पुनर्चक्रण को प्लास्टिक अपशिष्ट के नए उत्पादों में परिवर्तन या ऊर्जा के उत्पादन के रूप में परिभाषित किया गया है। यह संशोधन पिछली परिभाषा में "ऊर्जा के उत्पादन" का विस्तार करता है, जिससे पुनर्चक्रण गतिविधियों का दायरा बढ़ जाता है।
- प्लास्टिक अपशिष्ट प्रसंस्करणकर्त्ता: इस शब्द में अब पुनर्चक्रणकर्त्ता और जीवन के अंत के निपटान में शामिल संस्थाएँ दोनों शामिल हैं, जैसे अपशिष्ट-से-ऊर्जा संचालक एवं सह-प्रसंस्करणकर्त्ता। पहले, यह केवल पुनर्चक्रणकर्त्ताओं तक सीमित था, लेकिन अब दायरा व्यापक और अधिक समावेशी है।
- पंजीकृत पर्यावरण लेखा परीक्षक: ये पर्यावरण लेखांकन नियम, 2025 के तहत परिभाषित लेखा परीक्षक हैं, जो EPR अनुपालन और पुनर्चक्रित सामग्री के उपयोग को सत्यापित करने के लिये अधिकृत हैं। वे नियमों के तहत अनुपालन सत्यापन के लिये नामित एजेंसियों के विकल्प के रूप में कार्य करते हैं।
- पुन: उपयोग (Reuse): पुन: उपयोग का अर्थ है किसी सामग्री को उसकी संरचना को बदले बगैर उसी या किसी भिन्न उद्देश्य के लिये फिर से उपयोग करना। यह परिभाषा कठोर प्लास्टिक पैकेजिंग (श्रेणी I) में पुन: उपयोग दायित्वों के लिये विशेष रूप से प्रासंगिक है।
- विक्रेता: यह शब्द उन संस्थाओं को संदर्भित करता है जो प्लास्टिक के कच्चे माल जैसे रेजिन, छर्रों, या पैकेजिंग में उपयोग किये जाने वाले मध्यवर्ती आगतों को बेचती हैं। यह पहली बार कच्चे माल के आपूर्तिकर्त्ताओं को नियामक ढाँचे के अंतर्गत लाता है, जिससे मूल्य शृंखला में जवाबदेही का विस्तार होता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. भारत में निम्नलिखित में से किसमें एक महत्त्वपूर्ण विशेषता के रूप में 'विस्तारित उत्पादक दायित्व' आरंभ किया गया था? (2019)
(a) जैव चिकित्सा अपशिष्ट (प्रबंधन और हस्तन) नियम, 1998
(b) पुनर्चक्रित प्लास्टिक (निर्माण और उपयोग) नियम, 1999
(c) ई-अपशिष्ट (प्रबंधन और हस्तन) नियम, 2011
(d) खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम, 2011
उत्तर: (c)
प्रश्न 2. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) किस प्रकार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) से भिन्न है? (2018)
NGT का गठन एक अधिनियम द्वारा किया गया है जबकि CPCB का गठन सरकार के कार्यपालक आदेश से किया गया है।
NGT पर्यावरणीय न्याय उपलब्ध कराता है और उच्चतर न्यायालयों में मुकदमों के भार को कम करने में सहायता करता है जबकि CPCB झरनों एवं कुँओं की सफाई को प्रोत्साहित करता है तथा देश में वायु की गुणवत्ता में सुधार लाने का लक्ष्य रखता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (b)
प्रश्न. पर्यावरण में निर्मुक्त हो जाने वाली 'सूक्ष्ममणिकाओं (माइक्रोबीड्स)' के विषय में अत्यधिक चिंता क्यों है? (2019)
(a) ये समुद्री पारितंत्रों के लिये हानिकारक मानी जाती हैं।
(b) ये बच्चों में त्वचा कैंसर होने का कारण मानी जाती हैं।
(c) ये इतनी छोटी होती हैं कि सिंचित क्षेत्रों में फसल पादपों द्वारा अवशोषित हो जाती हैं।
(d) अक्सर इनका इस्तेमाल खाद्य पदार्थों में मिलावट के लिये किया जाता है।
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न: निरंतर उत्पन्न किये जा रहे फेंके गए ठोस कचरे की विशाल मात्राओं का निस्तारण करने में क्या-क्या बाधाएँ हैं? हम अपने रहने योग्य परिवेश में जमा होते जा रहे ज़हरीले अपशिष्टों को सुरक्षित रूप से किस प्रकार हटा सकते हैं? (2018)
चुनाव याचिका
सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने निर्णय दिया कि यदि चुनाव अधिकरण के समक्ष किसी मुद्दे को पहले नहीं उठाया गया हो, तो अपीलीय न्यायालय चुनाव याचिकाओं को नए साक्ष्य या विशेषज्ञ परीक्षण जैसे फिंगरप्रिंट विश्लेषण के लिये पुनर्विचार (रिमांड) हेतु वापस नहीं भेज सकते।
- परिणामस्वरूप, चुनावी विवादों का निर्णय केवल उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर ही किया जाना चाहिये, ताकि मूल कार्यवाही की अखंडता बनी रहे।
चुनाव याचिका
- परिचय: चुनाव याचिका भारत में किसी चुनाव परिणाम की वैधता को चुनौती देने का एकमात्र न्यायिक उपाय है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता एवं पवित्रता सुनिश्चित करता है।
- संविधान के अनुच्छेद 329(b) के तहत, संसद या राज्य विधानसभाओं के लिये कोई भी चुनाव चुनाव याचिका के अलावा नहीं चुनौती दी जा सकती।
- वैधानिक एवं संवैधानिक आधार: संसद (लोकसभा एवं राज्यसभा) तथा राज्य विधानसभाओं के चुनावों से संबंधित चुनाव याचिकाएँ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 द्वारा विनियमित होती हैं, जबकि अधिकांश स्थानीय निकायों (पंचायतों एवं नगरपालिकाओं) से संबंधित चुनावी विवाद 73वें एवं 74वें संविधान संशोधनों के अंतर्गत राज्यों द्वारा बनाए गए संबंधित कानूनों के अनुसार संचालित होते हैं।
- संसद या राज्य विधानसभा के चुनावों से संबंधित याचिकाएँ संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में दायर की जाती हैं।
- हालाँकि राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के चुनाव को चुनौती सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अनुच्छेद 71 के अंतर्गत दायर की जाती है।
- पात्रता एवं समय-सीमा: चुनाव याचिका किसी भी प्रत्याशी या संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के किसी भी मतदाता द्वारा परिणाम घोषित होने की तिथि से 45 दिनों की सख्त समय-सीमा के भीतर दायर की जा सकती है।
- चुनाव को शून्य घोषित करने के आधार: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 100 के अंतर्गत, किसी चुनाव को शून्य घोषित किया जा सकता है यदि प्रत्याशी अयोग्य पाया जाए, भ्रष्ट आचरण (जैसे- रिश्वत, अनुचित प्रभाव या धर्म/जाति के आधार पर अपील) में लिप्त हो अथवा नामांकन पत्रों को अनुचित रूप से स्वीकार या अस्वीकार किया गया हो।
- अपील संबंधी प्रावधान: उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील सर्वोच्च न्यायालय में की जा सकती है, जिसे 30 दिनों के भीतर दायर करना अनिवार्य है।
- न्यायिक परिणाम: न्यायालय चुनाव याचिका को निरस्त कर सकता है, चुनाव को शून्य घोषित कर सकता है (जिससे उपचुनाव आवश्यक हो जाता है) अथवा यदि याचिकाकर्त्ता को वैध मतों का बहुमत प्राप्त हुआ सिद्ध हो जाए, तो उसे विजेता घोषित कर सकता है।
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राज्य विकास ऋणों (SDL) हेतु RBI की बेंचमार्क निर्गमन रणनीति
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वित्तीय वर्ष 2026-27 से राज्य विकास ऋणों (SDL) के लिये पायलट बेंचमार्क निर्गमन रणनीति (BIS) शुरू की है, जिसका उद्देश्य राज्य उधारों में अधिक अनुशासन, पारदर्शिता और तरलता सुनिश्चित करना है।
- भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934, रिज़र्व बैंक को राज्य सरकारों का बैंकर बनने और उनके सार्वजनिक ऋण का प्रबंधन करने का अधिकार प्रदान करता है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान, राज्य सरकारों द्वारा भारी उधारी और निर्गमों की औसत अवधि में तीव्र वृद्धि के कारण बॉण्ड बाज़ार में मांग एवं आपूर्ति के बीच असंतुलन उत्पन्न हो गया।
- वित्तीय वर्ष 2025-26 में, भारतीय राज्य केंद्र के लगभग बराबर उधार लेने वाले हैं, जहाँ राज्यों का कुल निर्गम लगभग ₹12.5 ट्रिलियन है, जबकि केंद्र का यह आँकड़ा ₹14.6 ट्रिलियन है।
- पायलट रोलआउट: राज्य विकास ऋणों (SDL) के लिये बेंचमार्क निर्गमन रणनीति (BIS) वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में नौ राज्यों (आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश) में पायलट आधार पर लागू की जा रही है।
- तंत्र: BIS के तहत राज्य पहले से घोषित उधारी कैलेंडर के अनुसार निर्धारित बेंचमार्क परिपक्वता श्रेणियों में प्रतिभूतियाँ जारी करेंगे, जिससे अनुकूल और गैर-मानकीकृत निर्गम व्यवस्था के स्थान पर एक मानकीकृत प्रणाली अपनाई जाएगी।
- मुख्य उद्देश्य: इसका प्रमुख उद्देश्य राज्य विकास ऋण (SDL), जो राजकोषीय घाटे के वित्तपोषण हेतु जारी किये जाते हैं, के बाज़ार में विखंडन को कम करना है। इसके लिये बड़े और अधिक तरल बेंचमार्क प्रतिभूतियों का निर्माण किया जाता है, जिससे मूल्य खोज बेहतर हो, पारदर्शिता बढ़े तथा निवेशकों को राज्य बॉण्ड की आपूर्ति के बारे में अधिक स्पष्टता मिल सके।
- ऋण लक्ष्य: राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) की पहली तिमाही (Q1) में कुल ₹2.54 ट्रिलियन (2.54 लाख करोड़ रुपये) जुटाने की योजना बनाई है।
- नौ पायलट राज्य नए संरचित BIS ढाँचे के माध्यम से लगभग ₹1.54 लाख करोड़ जुटाएंगे, जबकि अन्य राज्य पारंपरिक तरीके से उधारी जारी रखेंगे।
- क्रमिक प्रतिफल लाभ: यह रणनीति आवश्यक पूर्वानुमानिता तो प्रदान करती है, लेकिन बाज़ार सहभागियों के अनुसार इसके कारण उधारी लागत (यील्ड) में कमी का प्रभाव धीरे-धीरे ही दिखाई देगा, क्योंकि राज्य बॉण्ड की भारी आपूर्ति अभी भी जारी रहेगी।
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अरब लीग द्वारा नए महासचिव की नियुक्ति
अरब राज्यों के लीग (अरब लीग) की परिषद ने मिस्र के नॉमिनेशन को स्वीकृति प्रदान की है, जिसके तहत नबील फहमी 1 जुलाई 2026 से शुरू होने वाले पाँच वर्ष के कार्यकाल के लिये अहमद अबुल घेइत के उत्तराधिकारी के रूप में अगले महासचिव होंगे।
अरब लीग
- परिचय: अरब राज्यों का लीग, जिसकी स्थापना वर्ष 1945 में काहिरा में हुई थी, एक क्षेत्रीय संगठन है जिसमें पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के 22 अरब देश शामिल हैं।
- उत्पत्ति: इसका गठन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के भू-राजनीतिक परिवर्तनों की पृष्ठभूमि में अलेक्जेंड्रिया प्रोटोकॉल (1944) के बाद किया गया था, जिसका उद्देश्य अरब एकता को बढ़ावा देना, औपनिवेशिक विभाजनों का विरोध करना और फिलिस्तीन में विकास पर चिंताओं को दूर करना था।
- उद्देश्य: लीग का उद्देश्य राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रों में सदस्य देशों के बीच समन्वय एवं सहयोग को बढ़ावा देना है। इसका संस्थापक चार्टर "निकट सहयोग" और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर बल देता है, जो सदस्यों के बीच बल के प्रयोग को हतोत्साहित करता है।
- मध्यस्थता: संगठन को सदस्य देशों के बीच और सदस्यों एवं बाहरी पक्षकारों के बीच विवादों में मध्यस्थता करने का अधिकार है।
- सहयोग: वर्ष 1950 की संयुक्त रक्षा और आर्थिक सहयोग संधि सामूहिक सुरक्षा एवं समन्वित सैन्य उपायों का प्रावधान करती है।
- चिंताएँ: लीग एक सुस्त परिसंघ के रूप में कार्य करता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रवर्तन क्षमता कमज़ोर है, संघर्ष समाधान अप्रभावी है, आंतरिक विभाजन हैं और प्रासंगिकता कम हो रही है।
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इंश्योरेंस मिस-सेलिंग पर रोक लगाने के लिये नियामक दबाव
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) बैंकों द्वारा तीसरे पक्ष के वित्तीय उत्पादों की मिस-सेलिंग को रोकने के लिये 'रिस्पोंसिबल बिज़नेस कंडक्ट' पर अपने अंतिम दिशा-निर्देश जारी करने की तैयारी कर रहा है, जिससे नागरिकों की सुरक्षा के लिये भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) की कमीशन संरचनाओं की महत्त्वपूर्ण समीक्षा की जा रही है।
- मिस-सेलिंग का मूल कारण: इंश्योरेंस मिस-सेलिंग का तात्पर्य किसी ऐसे उत्पाद या सेवा की बिक्री से है जो ग्राहक की आवश्यकताओं के लिये अनुपयुक्त है।
- एग्रेसिव मिस-सेलिंग का प्राथमिक चालक IRDAI द्वारा विनियमित अग्रिम-भारित, उच्च कमीशन संरचना है।
- चूँकि एजेंट अपनी फीस का अधिकांश हिस्सा अग्रिम रूप से कमाते हैं, वे दीर्घकालिक पॉलिसी सेवा प्रदान करने के बजाय उत्पादों को आक्रामक रूप से बेचने के लिये अधिक प्रोत्साहित होते हैं।
- IRDAI की वित्त वर्ष 25 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, कुल जीवन बीमा कमीशन 60,800 करोड़ रुपये (वर्ष-दर-वर्ष 18% की वृद्धि) तक पहुँच गया, जबकि प्रीमियम में केवल एकल अंकों में वृद्धि हुई।
- मौजूदा विनियमन की सीमाएँ: एजेंट एक ही पॉलिसी पर कितना कमीशन कमा सकता है, इसे सीधे सीमित करने के बजाय, IRDAI का मौजूदा विनियमन केवल पूरी बीमा कंपनी के लिये समग्र प्रबंधन व्यय (EOM) को सीमित करता है।
- इससे बीमा कंपनियों की कार्यप्रणाली में अत्यधिक सुगमता आई। कंपनियों ने अन्यत्र लागत में कटौती करके अपनी समग्र EOM सीमाओं के भीतर रहने का प्रबंधन किया, जबकि आक्रामक सेलिंग को बढ़ावा देने के लिये एजेंटों को बड़े, असमानुपातिक कमीशन देना जारी रखा।
- कमीशन सुधारों के लिये अनुशंसित समाधान: IRDAI के प्रस्तावित सुधारों में कमीशन दरों को सीधे तय करना, सीमाएँ लगाना और व्यय-आधारित सीमाएँ शामिल हैं, हालाँकि उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि ये अकेले दुर्व्यवहारों को प्रभावी ढंग से रोकने के लिये पर्याप्त नहीं हो सकते हैं।
- जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये उद्योग विशेषज्ञ बीमा कंपनियों के बोर्ड को एक बोर्ड-अनुमोदित पॉलिसी के माध्यम से कमीशन तय करने के लिये ज़िम्मेदार बनाने का सुझाव देते हैं, जिससे भुगतान नियामक प्रकटीकरणों के साथ-साथ समग्र EOM सीमाओं के भीतर सख्ती से रहे।
- ट्रेल-आधारित कमीशन में बदलाव: अत्यधिक अनुशंसित संरचनात्मक सुधार एक क्रमिक, ट्रेल-आधारित कमीशन मॉडल में संक्रमण को दर्शाता है।
- पॉलिसी के जीवनकाल में चरणबद्ध तरीके से कमीशन का भुगतान करके, विक्रेता के वित्तीय प्रोत्साहन सीधे खरीदार के दीर्घकालिक कल्याण के साथ संरेखित हो जाते हैं, जिससे बेहतर स्थिरता सुनिश्चित होती है और बीमा क्षेत्र में विश्वास बहाल होता है।
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