एडिटोरियल (09 Jan, 2026)



वेनेज़ुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप और बहुपक्षवाद का संकट

यह लेख 07/01/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित "The Venezuela test for UN & international law” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख संयुक्त राष्ट्र की अनुमति के बिना वेनेज़ुएला में किये गए अमेरिकी अभियान का विश्लेषण करता है, जो अंतर्राष्ट्रीय कानून और ग्लोबल साउथ के संरक्षण को चुनौती देता है। भारत के संदर्भ में, यह संप्रभुता और बहुपक्षीयता को बनाए रखने वाली व्यवस्थाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर चिंताओं को रेखांकित करता है।

प्रिलिम्स के लिये: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4), मुनरो सिद्धांत, केर-फ्रिसबी सिद्धांत, अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय, ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व।

मेन्स के लिये: वेनेज़ुएला के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई के संभावित कारण, भारत पर अमेरिका-वेनेज़ुएला तनाव के प्रभाव, संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संगठनों की एकतरफा सैन्य हस्तक्षेप को रोकने में विफलता

हाल ही में अमेरिका द्वारा चलाए गए ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व के परिणामस्वरूप वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति की गिरफ्तारी हुई, जिससे अंतर्राष्ट्रीय कानून में बल प्रयोग पर प्रतिबंध को लेकर गंभीर बहसें फिर से शुरू हो गई हैं। हालाँकि वाशिंगटन इस कार्रवाई को कानून प्रवर्तन के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना संप्रभु क्षेत्र पर सैन्य बल का प्रयोग शामिल था । इस तरह की एकतरफा कार्रवाइयाँ ग्लोबल साउथ के उन देशों के लिये अत्यधिक खतरा पैदा करती हैं जो शक्ति असंतुलन के खिलाफ चार्टर-आधारित सुरक्षा उपायों पर निर्भर हैं। भारत, जो बहुपक्षवाद और क्षेत्रीय संप्रभुता का लगातार समर्थक रहा है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करने वाली एक प्रमुख आवाज़ है, के लिये यह घटनाक्रम अंतर्राष्ट्रीय कानूनी ढाँचों की कमज़ोर होती विश्वसनीयता और प्रभावशीलता के बारे में गंभीर चिंताएँ उत्पन्न करता है।

वेनेज़ुएला के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई के पीछे संभावित कारक क्या हैं?

  • भूराजनीतिक रणनीति - "डॉन-रो" सिद्धांत: इसका एक प्रमुख प्रेरक पश्चिमी गोलार्द्ध में अमेरिकी प्रभुत्व की पुनः पुष्टि है।
    • हाल ही में अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्ट रूप से मुनरो सिद्धांत (वर्षं 1823 की वह नीति जो अमेरिका में यूरोपीय/बाह्य हस्तक्षेप का विरोध करती थी) का उल्लेख किया है, जिसे अब "डॉन-रो सिद्धांत" कहा जा रहा है।
    • अमेरिका वेनेज़ुएला के रूस, चीन और ईरान के साथ घनिष्ठ संबंधों को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिये एक प्रत्यक्ष खतरा मानता है।
      • उदाहरण के लिये, चीन ने वर्ष 2007 से वेनेज़ुएला को 60 अरब डॉलर से अधिक का ऋण दिया है। अमेरिका इन ऋणों को "शोषणकारी ऋण" मानता है, जिसका उद्देश्य स्थायी निर्भरता उत्पन्न करना है।
  • संसाधन सुरक्षा और तेल रणनीति: वेनेज़ुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है (अनुमानित 303 अरब बैरल)। इन ऊर्जा स्रोतों को सुरक्षित और स्थिर करने की इच्छा अमेरिकी कार्रवाइयों को काफी हद तक प्रभावित करती है।
    • दिसंबर 2025 में, अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि वेनेज़ुएला को तेल, भूमि और अन्य संपत्तियाँ वापस करनी चाहिये, जो उनके अनुसार संयुक्त राज्य अमेरिका से ले ली गई थीं।
    • वेनेज़ुएला में सत्ता परिवर्तन की "प्रबंधन" या देखरेख करके, अमेरिका वैश्विक तेल कीमतों पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव रखता है।
      • प्रशासन का लक्ष्य अत्यधिक सोर क्रूड का उत्पादन बढ़ाना है, जिसे संसाधित करने के लिये अमेरिकी खाड़ी तट पर स्थित रिफाइनरियाँ विशेष रूप से डिज़ाइन की गई हैं, ताकि अमेरिका के लिये ऊर्जा लागत कम हो सके।
  • कानून प्रवर्तन एवं "नारको-आतंकवाद": अमेरिका ने अपने कार्यों को न केवल कूटनीति के रूप में, बल्कि आपराधिक न्याय के मामले के रूप में भी प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है।
    • निकोलस मादुरो और कई उच्च पदस्थ अधिकारियों पर अमेरिकी संघीय न्यायालयों में नारको-आतंकवाद (नशीले पदार्थों से संबंधित आतंकवाद) की साजिश के आरोप में मुकदमा चलाया गया । 
    • अमेरिका का दावा है कि "कार्टेल ऑफ द सन्स" (जिसका कथित तौर पर वेनेज़ुएला के अधिकारियों द्वारा संचालन किया जाता है) ने FARC जैसे समूहों के साथ मिलकर अमेरिका में कोकीन की आपूर्ति की।

क्या किसी संप्रभु क्षेत्र पर सैन्य बल के प्रयोग को "कानून प्रवर्तन" उद्देश्य के तहत उचित ठहराया जा सकता है?

पक्ष में तर्क: 

  • अमेरिकी कार्रवाई के समर्थकों का तर्क है कि युद्ध के पारंपरिक कानूनों को आधुनिक, "हाइब्रिड" खतरों का सामना करने के लिये विकसित होना चाहिये जिनमें पारंपरिक सेनाएँ शामिल नहीं होती हैं।
    • "सशस्त्र हमले" की कार्यात्मक समतुल्यता: अमेरिका का तर्क है कि फेंटानिल का "आक्रमण" और राज्य-प्रायोजित गिरोहों की गतिविधियाँ एक पारंपरिक सैन्य हमले की तुलना में प्रतिवर्ष अधिक अमेरिकी मौतों का कारण बनती हैं।
      • इसे "नारको-आतंकवाद" का नाम देकर , प्रशासन संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत मादक पदार्थों की तस्करी को एक हमले के रूप में प्रस्तुत करता है , जिससे आत्मरक्षा में सैन्य कार्रवाई को उचित ठहराया जा सके।
    • "अनिच्छुक या असमर्थ" सिद्धांत: यह कानूनी सिद्धांत स्पष्ट करता है कि यदि कोई संप्रभु राज्य (वेनेज़ुएला) अपनी धरती पर आपराधिक समूहों को रोकने के लिये या तो अनिच्छुक है या सक्रिय रूप से उनके साथ सहयोग कर रहा है, तो वह अपनी पूर्ण संप्रभुता के अधिकार को खो देता है।
      • इस दृष्टिकोण से, अमेरिका किसी देश पर "आक्रमण" नहीं कर रहा है; बल्कि वह एक ऐसे खतरे को "निष्क्रिय" कर रहा है जिसे स्थानीय सरकार संभालने से इनकार कर रही है, और प्रभावी रूप से एक वैश्विक पुलिसकर्मी के रूप में कार्य कर रहा है जहाँ स्थानीय व्यवस्था विफल हो गई है।
    • " केर-फ्रिसबी सिद्धांत: विशुद्ध रूप से अमेरिकी कानूनी दृष्टिकोण से, किसी व्यक्ति को पकड़ने का "तरीका" उतना मायने नहीं रखता जितना कि उसे पकड़ने वाला "व्यक्ति" मायने रखता है।
      • केर-फ्रिसबी मिसाल के तहत, अमेरिकी न्यायालयों का निर्णय है कि भले ही किसी प्रतिवादी (जैसे मादुरो) को सैन्य बल के माध्यम से अमेरिका लाया जाए, फिर भी अदालत के पास उन पर मुकदमा चलाने का अधिकार है। 
      • इससे शिथिल या अवरुद्ध प्रत्यर्पण प्रक्रियाओं को दरकिनार करने के लिये बल प्रयोग करने का एक मज़बूत घरेलू प्रोत्साहन मिलता है।

विपक्ष में तर्क:  

  • संयुक्त राष्ट्र महासचिव और विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय कानूनी निकायों सहित आलोचकों का तर्क है कि कानून प्रवर्तन के लिये सेना का उपयोग करना एक "खतरनाक मिसाल" है जो वैश्विक व्यवस्था को नष्ट कर देता है।
    • संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) का उल्लंघन: अंतर्राष्ट्रीय कानून का आधार किसी भी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता के विरुद्ध बल प्रयोग का निषेध है । 
      • कानून प्रवर्तन एक घरेलू शक्ति है। आलोचकों का तर्क है कि यदि कोई भी राष्ट्र किसी पड़ोसी पर आक्रमण करने के लिये "अपराध" को आधार बना सकता है, तब संप्रभु सीमा की अवधारणा अर्थहीन हो जाती है, जिससे "जंगल का कानून" जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जहाँ सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बिना किसी रोक-टोक के कार्य करते हैं।
    • गतिज सीमा का अभाव: अंतर्राष्ट्रीय कानून "सशस्त्र हमले" को भौतिक सैन्य हमले (बम, सैनिक, मिसाइल) के रूप में परिभाषित करता है।
      • अधिकांश कानूनी विद्वान इस विचार को खारिज करते हैं कि मादक पदार्थों या प्रवासन को सशस्त्र हमले के रूप में "पुनर्निर्मित" किया जा सकता है। 
      • ऐसा करने पर, अमेरिका पर "कानूनी हेराफेरी" का आरोप लगाया जाता है, जिसमें शब्दों की परिभाषाओं को बदलकर एक ऐसे अभियान को उचित ठहराया जाता है जो वास्तव में एक सत्ता परिवर्तन अभियान है।
    • अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) से बचने का प्रयास : विरोधियों का तर्क है कि यदि अमेरिका वास्तव में "न्याय" और "मानवाधिकारों" में रुचि रखता, तो वह वेनेज़ुएला पर एकतरफा छापा मारने के बजाय आईसीसी की मौजूदा जांच का समर्थन करता।
      • न्यूयॉर्क के न्यायालयों में मुकदमे के लिये एक राष्ट्राध्यक्ष को गिरफ्तार करके, अमेरिका को सामूहिक अत्याचारों के अभियोजन के लिये स्थापित अंतर्राष्ट्रीय ढाँचे के बजाय अपने स्वयं के राजनीतिक हितों और मादक पदार्थों से संबंधित कानूनों को प्राथमिकता देते हुए देखा जा रहा है ।

अमेरिका और वेनेज़ुएला के बीच तनाव का भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

  • ऊर्जा विविधीकरण और शोधन रणनीति: भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर तत्काल प्रभाव कम ही रहेगा क्योंकि भारत ने अमेरिका के द्वितीयक प्रतिबंधों से बचने के लिये वेनेज़ुएला से हटकर अपने तेल भंडार में सक्रिय रूप से विविधता स्थापित की है।
    • हालिया आँकड़ों से पता चलता है कि प्रतिबंधों और व्यापार बाधाओं के कारण भारत के अपरिष्कृत तेल बाज़ार में वेनेज़ुएला की हिस्सेदारी में अत्यधिक गिरावट आई है, जो वित्त वर्ष 2026 (अप्रैल-अक्तूबर 2025) में लगभग 0.3% तक हुई है, जबकि इससे पहले के वर्षों में यह हिस्सेदारी काफी अधिक थी।
    • अब भारत अमेरिकी निगरानी में संभावित नई आपूर्ति व्यवस्था पर स्पष्टता की प्रतीक्षा कर रहा है क्योंकि भारत का शोधन क्षेत्र, विशेष रूप से रिलायंस इंडस्ट्रीज के जामनगर परिसर जैसी अत्यधिक जटिल सुविधाएँ, तकनीकी रूप से वेनेज़ुएला के अपरिष्कृत सोर क्रूड "Merey" ऑयल को संसाधित करने के लिये उपयुक्त हैं।
  • अवरुद्ध अपस्ट्रीम संप्रभु परिसंपत्तियों को सक्रिय करना: भारत की सरकारी स्वामित्व वाली ONGC विदेश (OVL) के वेनेज़ुएला के तेल क्षेत्रों में लंबे समय से निवेश हैं जो भुगतान अवरोधों के कारण "ज़ोंबी परिसंपत्तियाँ" बन गए हैं।
    • उदाहरण के लिये, OVL के पास वेनेज़ुएला के दो तेल क्षेत्रों में इक्विटी हिस्सेदारी है: सैन क्रिस्टोबल (40% हिस्सेदारी) और काराबोबो-1 (11% हिस्सेदारी)। ये परियोजनाएँ कम उत्पादन और प्रतिबंधों से प्रभावित रही हैं।
    • अमेरिका के नेतृत्व में वेनेज़ुएला के तेल क्षेत्र के पुनर्गठन से भारी मात्रा में शेष लाभांश की वापसी संभव हो सकती है।
  • भू-राजनीतिक संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता: वेनेज़ुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप के बढ़ने से भारत एक कूटनीतिक संतुलन की स्थिति में आ गया है । 
    • नई दिल्ली को वाशिंगटन के साथ अपने संबंधों को सावधानीपूर्वक प्रबंधित करना चाहिये, साथ ही संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप के अपने दीर्घकालिक सिद्धांतों का सम्मान भी करना चाहिये।
    • भारत के आधिकारिक बयानों में किसी भी पक्ष की प्रत्यक्ष निंदा किये बिना घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त की गई है, जो व्यापक रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देने वाले सतर्क दृष्टिकोण को दर्शाता है।
  • मैक्रो-इकोनॉमिक और तेल बाज़ार पर प्रभाव: हालाँकि वेनेज़ुएला के साथ भारत का वर्तमान प्रत्यक्ष व्यापार सीमित है, लेकिन वेनेज़ुएला के तेल उत्पादन और निर्यात की गतिशीलता में कोई भी बदलाव वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित कर सकता है ।
    • वेनेज़ुएला के पास विश्व स्तर पर सबसे बड़े सिद्ध तेल भंडार हैं, और अधिक स्थिर ढाँचे के तहत उत्पादन में वृद्धि से मध्यम से लंबी अवधि में अंतर्राष्ट्रीय तेल की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
      • यह स्थिति संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संस्थानों की एकतरफा हस्तक्षेपों पर अंकुश लगाने में विफलता को भी उजागर करती है, जिससे भारत और अन्य ग्लोबल साउथ राष्ट्र ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक रणनीतिक गतिशीलता में व्यवधान के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संगठन एकपक्षीय सैन्य हस्तक्षेपों को रोकने में विफल क्यों हो रहे हैं?

  • संरचनात्मक जड़ता — “वीटो ट्रैप”: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) तब संरचनात्मक रूप से निष्क्रिय हो जाती है, जब कोई स्थायी सदस्य (P5) स्वयं आक्रामक होता है अथवा आक्रामक राज्य को संरक्षण प्रदान करता है।
    • अमेरिका, रूस और चीन अपने-अपने रणनीतिक हितों की रक्षा हेतु वीटो शक्ति का प्रयोग करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सुरक्षा परिषद एक प्रभावी सुरक्षा-प्रदाता के स्थान पर गतिरोध का मंच बन गई है।
    • उदाहरणस्वरूप, 2015 से 2024 के बीच 37 मसौदा प्रस्तावों एवं संशोधनों के संदर्भ में कुल 47 बार वीटो का प्रयोग किया गया।
  • कानूनी पुनर्व्याख्या — “कानून प्रवर्तन” के नाम पर अनुचित लाभसिद्धि: शक्तिशाली राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के अंतर्गत बल प्रयोग पर लगे निषेध को दरकिनार करने हेतु सैन्य आक्रमणों को “सीमापार कानून प्रवर्तन” के रूप में पुनःपरिभाषित कर रहे हैं।
    • हस्तक्षेपों को युद्ध की कार्रवाई के बजाय “आपराधिक कृत्यों के निदान” के रूप में प्रस्तुत कर, वे संयुक्त राष्ट्र की स्वीकृति की आवश्यकता से बचते हुए कार्रवाई को नैतिक अधिकार के रूप में स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
    • उदाहरण के लिये, अमेरिका ने वेनेज़ुएला में "ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व" को "नारको-आतंकवाद" के खिलाफ अनुच्छेद 51 (आत्मरक्षा) का हवाला देकर उचित ठहराया।
  • वित्तीय दबाव एवं तरलता संकट: बहुपक्षवाद की विफलता का एक प्रमुख कारण यह भी है कि संयुक्त राष्ट्र अपने इतिहास के सबसे गंभीर तरलता संकट से जूझ रहा है, जिससे त्वरित संघर्षों की निगरानी या हस्तक्षेप करने की उसकी क्षमता क्षीण हो गई है।
  • जब प्रमुख दाता देश संयुक्त राष्ट्र की नीतियों से असहमति जताने हेतु निर्धारित अंशदान रोक लेते हैं, तब संगठन शांति-रक्षकों या तटस्थ पर्यवेक्षकों की तैनाती की परिचालन क्षमता खो देता है।
    • वर्तमान में नियमित बजट में 2.4 अरब डॉलर तथा शांति-स्थापन निधि में 2.7 अरब डॉलर के बकाये के कारण संयुक्त राष्ट्र को व्यय में कटौती, भर्ती स्थगन और कुछ सेवाओं के संकुचन के लिये बाध्य होना पड़ा है
  • क्षेत्रवाद का उदय: बहुपक्षवाद इसलिये भी कमज़ोर पड़ रहा है क्योंकि विश्व “सार्वभौमिक” सुरक्षा मॉडल से हटकर एक खंडित व्यवस्था की ओर अग्रसर हो गया है, जहाँ क्षेत्रीय गुट संयुक्त राष्ट्र के अधिदेशों के बजाय अपने स्वयं के नियमों को प्राथमिकता देते हैं।
    • संयुक्त राष्ट्र को धीमा एवं भौगोलिक रूप से दूरस्थ मानते हुए, छोटे किंतु विशिष्ट गठबंधन अपने प्रभाव-क्षेत्रों की सुरक्षा हेतु प्रत्यक्ष कार्रवाई करते हैं, प्रायः संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह दरकिनार करते हुए।
    • यूएनएससी की स्वीकृति के बिना अफ्रीकी संघ (AU), नाटो (NATO) तथा पश्चिम अफ्रीकी राज्यों के आर्थिक समुदाय (ECOWAS) जैसे क्षेत्रीय संगठनों द्वारा हस्तक्षेप इसके उदाहरण हैं।
  • विश्वसनीयता में कमी- "जवाबदेही का अभाव": बहुपक्षवाद का क्षरण इसलिये भी हो रहा है क्योंकि संघर्षों का स्वरूप “ग्रे-ज़ोन” आक्रामकता की ओर स्थानांतरित हो गया है, जिसमें निजी सैन्य कंपनियों (PMCs) तथा साइबर युद्ध का उपयोग शामिल है, जो जानबूझकर संयुक्त राष्ट्र की पारंपरिक “युद्ध” परिभाषाओं के बाहर संचालित होते हैं।
  • चूँकि संयुक्त राष्ट्र चार्टर मुख्यतः प्रत्यक्ष राज्य-से-राज्य सैन्य संघर्ष को विनियमित करने के लिये निर्मित था, अतः वह ऐसे “अस्वीकार्य या अस्पष्ट” बल प्रयोग अथवा गैर-गतिज हमलों के लिये बाध्यकारी जवाबदेही ढाँचा प्रदान नहीं करता, जो बिना गोली चलाए किसी राष्ट्र की स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
  • उदाहरणस्वरूप, 2017 का नॉटपेट्या (NotPetya) साइबर हमला—जिसकी उत्पत्ति यूक्रेन में हुई मानी जाती है—तेजी से वैश्विक स्तर पर फैल गया और व्यवसायों, अस्पतालों तथा सरकारी प्रणालियों को बाधित करते हुए अरबों डॉलर की क्षति का कारण बना।
    • यह घटना दर्शाती है कि साइबर अभियानों के माध्यम से व्यापक क्षति पहुँचाई जा सकती है, जवाबदेही को धुंधला किया जा सकता है तथा अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप के पारंपरिक ढाँचों को गंभीर चुनौती दी जा सकती है।

निष्पक्ष और न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था को प्रोत्साहित करने हेतु बहुपक्षवाद में किस प्रकार सुधार किया जा सकता है?

  • विधिक स्पष्टता को सुदृढ़ करना और कमियों को दूर करना: अंतर्राष्ट्रीय कानून को आपराधिक कानून प्रवर्तन और बल के प्रयोग के बीच स्पष्ट रूप से अंतर करने के लिये विकसित होना चाहिये, जिससे "गैर-राज्य अभिकर्त्ताओं के खिलाफ आत्मरक्षा" की अस्पष्टता दूर हो सके। 
    • स्पष्ट संहिताकरण से शक्तिशाली देशों को सैन्य आक्रामकता को मादक पदार्थों के खिलाफ या आतंकवाद रोधी अभियानों के रूप में पुनर्परिभाषित करने से रोका जा सकता है।
    • संधि-आधारित सुधारों में "हानि सीमा" का सिद्धांत शामिल किया जा सकता है, जो यह परिभाषित करेगा कि किस प्रकार का सीमा पार हस्तक्षेप न्यायोचित है। 
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को पुनर्जीवित करना और वीटो में सुधार करना: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रक्रियाओं में सुधार करना, जैसे कि सामूहिक अत्याचारों या एकतरफा हस्तक्षेपों के लिये "वीटो ओवरराइड" तंत्र की शुरुआत करना, विश्वसनीयता बहाल कर सकता है। 
    • रोटेशनल या भारित वीटो प्रणाली पी5 राष्ट्रों की जवाबदेही से खुद को बचाने की क्षमता को सीमित कर सकती है। 
    • विचार-विमर्श में पारदर्शिता बढ़ाना और वीटो के लिये लोक उत्तरदायित्व को अनिवार्य बनाना स्थायी सदस्यों पर ज़िम्मेदारी के भाव को अधिरोपित करेगा। 
    • संरचनात्मक सुधारों को सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत के अनुरूप होना चाहिये, साथ ही छोटे देशों की अभिव्यक्ति का संरक्षण करना चाहिये। सशक्त निर्णयन प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि महाशक्तियों के बीच गतिरोध के कारण संयुक्त राष्ट्र का औचित्य समाप्त न हो जाए।
  • वित्तीय और व्यापारिक उपायों के माध्यम से अनुपालन को प्रोत्साहित करना: जो राष्ट्र बहुपक्षीय मानदंडों का उल्लंघन करते हैं, उनके विरुद्ध संतुलित आर्थिक निरुत्साहन उपाय अपनाये जा सकते हैं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणालियों तथा व्यापार मंचों तक पहुँच को सीमित करना शामिल है।
    • वैश्विक आर्थिक संरचना में प्रोत्साहनों का समावेशन राष्ट्रीय हितों को सामूहिक नियमों के साथ संरेखित करता है।
    • यह दृष्टिकोण परस्पर जुड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था का लाभ उठाकर सैन्य नियंत्रण पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना मानदंडों को लागू करता है। इस प्रकार वित्तीय प्रभाव एक व्यवहारिक अनुपालन साधन के रूप में उभरता है।
  • ग्रे-ज़ोन और हाइब्रिड खतरों के लिये जवाबदेही का संहिताकरण: बहुपक्षीय ढाँचों को साइबर हमलों, प्रॉक्सी संघर्षों तथा निजी सैन्य हस्तक्षेपों सहित हाइब्रिड आक्रामकता को स्पष्ट रूप से संबोधित करना चाहिये।
    • एक बाध्यकारी "ग्रे-ज़ोन जवाबदेही प्रोटोकॉल" का निर्माण यह सुनिश्चित करेगा कि राज्य तकनीकी अथवा गैर-गतिज युद्ध के माध्यम से कानूनी समीक्षा से बच न सकें।। 
    • स्वतंत्र सत्यापन एजेंसियाँ ​​उल्लंघनों की निगरानी कर सकती हैं और उचित दंड की सिफारिश कर सकती हैं। इस प्रकार का संहिताकरण पारंपरिक युद्ध कानून और आधुनिक वास्तविकताओं के बीच की खाई को पाटने कार्य करेगा तथा कमजोर राष्ट्रों को सूक्ष्म किंतु अस्थिरकारी हस्तक्षेपों से संरक्षण प्रदान करता है।
  • वैश्विक शासन में पारदर्शिता और मानकात्मक निगरानी का संस्थानीकरण: बहुपक्षीय संस्थानों को सुगम्य और सुलभ रिपोर्टिंग प्लेटफार्मों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय सैन्य, आर्थिक और साइबर गतिविधियों की निरंतर निगरानी को अपनाना चाहिये। 
    • सैनिक गतिविधियों, प्रतिबंधों और साइबर घटनाओं पर वास्तविक समय डेटा उपलब्ध होने से जवाबदेही बढ़ती है तथा गुप्त अभियानों पर निरोधक प्रभाव पड़ता है।
    • तटस्थ विशेषज्ञों द्वारा स्वतंत्र लेखा-परीक्षा आकलनों को वैधता प्रदान कर सकती है। पारदर्शिता सहकर्मी दबाव को अनुपालन के एक प्रभावी साधन के रूप में संस्थागत बनाती है तथा राज्यों के बीच विश्वास को प्रोत्साहित करती है।

निष्कर्ष: 

वेनेज़ुएला प्रकरण यह दर्शाता है कि जब शक्तिशाली राज्य एकपक्षीय रूप से कार्य करते हैं, तब बहुपक्षवाद कितना नाज़ुक हो जाता है। संप्रभुता, कानूनी स्पष्टता तथा सामूहिक जवाबदेही को बनाए रखना एक अराजक वैश्विक व्यवस्था को रोकने के लिये अनिवार्य है। सुदृढ़ संस्थाएँ, पारदर्शिता तथा प्रवर्तनीय मानदंड अंतरराष्ट्रीय ढाँचों की विश्वसनीयता को पुनर्स्थापित कर सकते हैं। बहुपक्षीय सिद्धांतों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता अशांत विश्व में सैद्धांतिक कूटनीति की आवश्यकता को रेखांकित करती है। “न्याय और नियम ही शांति के वास्तविक आधार हैं; इनके बिना केवल शक्ति शासन करती है, और तब कोई भी सुरक्षित नहीं रहता।”

दृष्टि मेन्स प्रश्न

प्रश्न. सीमा पार सैन्य हस्क्षेपों को उचित ठहराने के लिये 'कानून प्रवर्तन' के कथानकों का बढ़ता प्रयोग संयुक्त राष्ट्र चार्टर में बल प्रयोग पर लगे प्रतिबंध के गहरे क्षरण को दर्शाता है। वेनेज़ुएला के विरुद्ध हाल ही में किये गए अमेरिकी हस्क्षेपों के संदर्भ में इस प्रवृत्ति का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये और बहुपक्षवाद तथा भारत के सामरिक हितों पर इसके निहितार्थों की चर्चा कीजिये।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स 

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:  (2024)

कथन-I: हाल ही में, वेनेज़ुएला अपने आर्थिक संकट से तेज़ी से उबरने में सफल हुआ है और अपने लोगों को दूसरे देशों में पलायन/प्रवास करने से रोकने में सफल हुआ है।

कथन-II: वेनेज़ुएला के पास विश्व के सबसे बड़े तेल भंडार हैं।

उपर्युक्त कथनों के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन-सा सही है ?

(a) कथन-I और कथन-II दोनों सही हैं तथा कथन-II, कथन-I की व्याख्या करता है।

(b) कथन-I और कथन-II दोनों सही हैं, किंतु कथन-II, कथन-I की व्याख्या नहीं करता है।

(c) कथन-I सही है, किंतु कथन-II सही नहीं है।

(d) कथन-I सही नहीं है, किंतु कथन-II सही है।

उत्तर: D