डिजिटल युग में PC&PNDT अधिनियम
प्रिलिम्स के लिये: गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994, लिंगानुपात, 2011 जनगणना, नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS) 2023, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-2021), संयुक्त राष्ट्र पॉपुलेशन फंड।
मेन्स के लिये: गर्भाधान-पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 (PC&PNDT अधिनियम) से संबंधित प्रमुख तथ्य, पुत्र की अभिमत प्राथमिकता एवं उसके कारण, PC&PNDT अधिनियम, 1994 के शिथिल कार्यान्वयन के कारण एवं समतापूर्ण लिंगानुपात हेतु इस अधिनियम को मज़बूत करने के उपाय।
चर्चा में क्यों?
भारत में लिंग-चयनात्मक गर्भपात के विरुद्ध संघर्ष अब ऑनलाइन मंच पर स्थानांतरित हो गया है, जहाँ प्रभावशाली व्यक्ति और स्वघोषित चिकित्सक गर्भाधान-पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 (PC&PNDT अधिनियम) का उल्लंघन करते हुए असैद्धांतिक लिंग-पूर्वानुमान मिथकों को विशाल श्रोताओं तक प्रचारित कर रहे हैं।
- पुत्र के प्रति आंतरिक पक्षपात ने लैंगिक पूर्वाग्रह, डिजिटल विनियमन और प्रजनन अधिकारों पर पुनः ध्यान केंद्रित कर दिया है।
सारांश
- भारत का विषम लिंगानुपात गहराई तक जड़ें जमाए पुत्र पक्षपात से उत्पन्न होता है, जो विधिक प्रतिबंध के बावजूद सांस्कृतिक एवं आर्थिक मानदंडों द्वारा सुदृढ़ होता रहता है।
- PC&PNDT अधिनियम, 1994 का प्रवर्तन संस्थागत कमियों, कम दोषसिद्धि और अवैध प्रचार के डिजिटल मंचों पर स्थानांतरण के कारण कमज़ोर हो गया है।
- प्रभावी परिवर्तन हेतु एक समग्र रणनीति आवश्यक है, अर्थात प्रौद्योगिकी-सक्षम निगरानी, शीघ्र न्याय, ऑनलाइन विनियमन और बालिका को महत्त्व देने हेतु सामाजिक अभियान।
गर्भाधान-पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 (PC&PNDT अधिनियम) क्या है?
- परिचय: इस अधिनियम को वर्ष 1994 में कन्या भ्रूण हत्या की समस्या तथा लिंग चयन हेतु नैदानिक प्रौद्योगिकियों के दुरुपयोग से उत्पन्न हुए बाल लिंगानुपात में गिरावट के समाधान के लिये अधिनियमित किया गया था। (वर्ष 1991 की जनगणना के अनुसार भारत का लिंगानुपात - प्रति 1,000 पुरुषों पर 929 महिलाएँ)।
- इस अधिनियम में वर्ष 2003 में महत्त्वपूर्ण संशोधन किये गए, ताकि इसके प्रावधानों को मज़बूत किया जा सके, गर्भाधान-पूर्व तकनीकों को स्पष्ट रूप से शामिल किया जा सके और लिंग चयन पर अधिक व्यापक रूप से प्रतिबंध लगाया जा सके।
- प्रमुख प्रावधान:
- लिंग चयन पर प्रतिबंध: भ्रूण के लिंग का निर्धारण या चयन करने के उद्देश्य से अल्ट्रासाउंड जैसी किसी भी प्रक्रिया, तकनीक या परीक्षण पर प्रतिबंध (धारा 3A)।

- अनुमत उपयोग:
- सुविधाओं का विनियमन: आनुवंशिक परामर्श केंद्र, प्रयोगशालाएँ और क्लीनिक इस अधिनियम के तहत पंजीकृत होने अनिवार्य हैं। गैर-पंजीकृत सुविधाओं को ऐसी प्रक्रियाएँ संचालित करने से प्रतिबंधित किया गया है (धारा 18)।
- विज्ञापन पर प्रतिबंध: गर्भाधान-पूर्व या प्रसवपूर्व लिंग निर्धारण से संबंधित विज्ञापनों पर प्रतिबंध (धारा 22)।
- पर्यवेक्षी निकाय: कार्यान्वयन एवं निगरानी हेतु केंद्रीय पर्यवेक्षण बोर्ड, राज्य पर्यवेक्षण बोर्ड तथा उपयुक्त प्राधिकारियों की स्थापना।
- वर्ष 2003 का संशोधन: गर्भाधान-पूर्व लिंग चयन तकनीकों को भी इसके दायरे में लाया गया।
- अल्ट्रासाउंड और इमेजिंग प्रौद्योगिकियों को स्पष्ट रूप से विनियामक परिधि में शामिल किया गया।
- पर्यवेक्षण बोर्डों और प्राधिकारियों को खोज एवं ज़ब्ती सहित अधिक प्रवर्तन शक्तियाँ प्रदान की गईं।
- अपराध एवं दंड: इस अधिनियम के तहत प्रत्येक अपराध संज्ञेय, अज़मानतीय और समझौता-रहित होगा।
- दंड में 3-5 वर्ष तक का कारावास और अपराध एवं पुनरावृत्ति के आधार पर 10,000 रुपए से 1,00,000 रुपए या अधिक तक के जुर्माने शामिल हैं।
सन मेटा-प्रिफरेंस और विकृत लिंगानुपात
- सन मेटा-प्रिफरेंस/पुत्र प्राथमिकता की मानसिकता (Son Meta Preference): यह पुत्र प्राथमिकता का एक सूक्ष्म रूप है, जिसमें माता-पिता तब तक संतान पैदा करते रहते हैं जब तक उन्हें पुत्रों की वांछित संख्या (आमतौर पर कम से कम एक पुत्र) प्राप्त न हो जाए।
- यह व्यवहार प्रजनन-समापन नियमों का पालन करता है, जिसमें पुत्र के जन्म के बाद परिवारों द्वारा आगे संतान पैदा करना रोक देने की प्रवृत्ति अधिक होती है। इसके परिणामस्वरूप अंतिम संतान के लिंगानुपात में असंतुलन उत्पन्न होता है, जहाँ अंतिम जन्म में पुरुषों का अनुपात अधिक होता है।
- इसके चलते 21 मिलियन ‘“अवांछित’ लड़कियाँ पैदा हुईं, जिन्हें संसाधनों और देखभाल की उपेक्षा का सामना करना पड़ सकता है।
- लापता महिलाओं का पैमाना: अमर्त्य सेन की कार्यप्रणाली का उपयोग करते हुए, भारत में लापता महिलाओं की अनुमानित संख्या वर्ष 2014 तक लगभग 63 मिलियन तक पहुँच गई थी, जिसमें प्रतिवर्ष 2 मिलियन से अधिक महिलाएँ लैंगिक-चयनात्मक गर्भपात, बीमारियों और उपेक्षा के कारण ‘लापता’ हो रही थीं।
- लापता महिलाएँ (Missing Females) उस कमी को दर्शाती हैं, जिसमें किसी आबादी में महिलाओं और लड़कियों की संख्या अपेक्षित स्तर से कम होती है। यह कमी लैंगिक-चयनात्मक प्रथाओं, कन्या भ्रूणहत्या, शिशुहत्या या उपेक्षा के कारण उत्पन्न होती है, जिसके परिणामस्वरूप महिलाओं की संख्या अपेक्षा से कम रह जाती है। इस शब्द को अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने वर्ष 1990 में लोकप्रिय बनाया था।
- विकास के बावजूद असंतुलित लिंग अनुपात: भारत में जन्म पर लिंग अनुपात (Sex Ratio at Birth - SRB) वर्ष 1970 से 2014 के बीच 1,060 से बढ़कर 1,108 पुरुष प्रति 1,000 महिलाएँ हो गया, जो वैश्विक प्रवृत्तियों के विपरीत है, जहाँ उच्च आय आमतौर पर अनुपात को बेहतर बनाती है। यह लैंगिक-चयनित गर्भपात के माध्यम से मानव हस्तक्षेप की मज़बूत मौजूदगी को दर्शाता है।
पुत्र प्राथमिकता के मुख्य कारण
- आर्थिक कारण: संतान के रूप में पुत्रों को विशेष रूप से उस जगह आर्थिक प्रदाता और वृद्धावस्था में देखभाल करने वाला माना जाता है, जहाँ सामाजिक सुरक्षा कमज़ोर हो।
- पितृसत्तात्मक व्यवस्था में, पुत्र संपत्ति विरासत में प्राप्त करते हैं और परिवार की संपत्ति बढ़ाते हैं, जबकि कन्याओं को आर्थिक बोझ माना जाता है, विशेषकर दहेज प्रथाओं के कारण, भले ही यह कानूनी रूप से निषिद्ध हो।
- सांस्कृतिक और सामाजिक कारण: पितृस्थानिकता (Patrilocality) के अनुसार, कन्याएँ विवाह के बाद पति के घर चली जाती हैं, जिससे यह धारणा विकसित होती है कि ‘कन्या को पालना ऐसा है जैसे पड़ोसी के बगीचे में पानी देना’।
- पुत्रों से अपेक्षा की जाती है कि वे परिवार की वंशावली, नाम और सामाजिक स्थिति को जारी रखें।
- धार्मिक कारण: कुछ परंपराओं, विशेष रूप से हिंदू समाज में, पुत्र महत्त्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान जैसे अंतिम संस्कार और पूर्वजों की पूजा करते हैं, जिन्हें आध्यात्मिक पुण्य तथा माता-पिता के मोक्ष के लिये आवश्यक माना जाता है।
भारत में लिंग अनुपात
- भारत की वर्ष 2011 जनगणना के अनुसार, कुल लिंग अनुपात 943 महिलाएँ प्रति 1,000 पुरुष था, जो वर्ष 2001 में 933 था।
- सरकारी नमूने पंजीकरण प्रणाली (SRS) 2023 के आँकड़ों के अनुसार, भारत में जन्म पर लिंग अनुपात (महिलाएँ प्रति 1,000 पुरुष) वर्ष 2019 में 904 से बढ़कर वर्ष 2023 में 917 हो गया।
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-2021) के अनुसार, भारत में 1,020 महिलाएँ प्रति 1,000 पुरुष हैं।
- वर्ष 2020 में, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) ने बताया कि विश्व की 142.6 मिलियन ‘लापता महिलाओं’ में से 45.8 मिलियन भारत की थीं।
PC&PNDT अधिनियम, 1994 के कमज़ोर क्रियान्वयन के कारण क्या हैं?
- सहमति और शिकायत न होने की स्थिति: लिंग चयन इसलिये जारी रहता है क्योंकि परिवारों की मांग और सेवा प्रदाताओं की आपूर्ति दोनों ही इसमें समान रूप से शामिल हैं। इसके परिणामस्वरूप ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग दुर्लभ होती है और सक्रिय खुफिया तंत्र एवं मज़बूत प्रवर्तन प्रणाली के अभाव में कानून का प्रभावी क्रियान्वयन कठिन हो जाता है।
- अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा: ज़िला/राज्य उपयुक्त प्राधिकरणों के पास कर्मचारी की कमी, सीमित बजट और अपर्याप्त प्रशिक्षण है, जिससे निरीक्षण, फॉलो-अप तथा मामलों का सृजन कम हो जाता है।
- कम दोषसिद्धि दर: दोषसिद्धि दर बेहद कम बनी हुई है (उदाहरण के लिये, एक संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, 25 वर्षों में केवल 617 दोषसिद्धियाँ) और कई राज्यों में मामले दर्ज ही नहीं किये जाते या बहुत कम दर्ज होते हैं।
- डिजिटल और ऑनलाइन चुनौतियाँ: यह अधिनियम पहले से ही बनाया गया था और आधुनिक चुनौतियों से निपटने के लिये अपर्याप्त है, विशेष रूप से सोशल मीडिया के माध्यम से पुत्र प्राथमिकता को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देना, जहाँ इन्फ्लुएंसर्स, आत्म-घोषित विशेषज्ञ और धार्मिक व्यक्तित्व बड़े ऑनलाइन दर्शकों तक अवैज्ञानिक दावे, अनुष्ठान तथा कथाएँ प्रसारित करते हैं।
- गहरी स्थापित सामाजिक अपेक्षाएँ: पितृसत्तात्मक मान्यताओं, सांस्कृतिक अपेक्षाओं और आर्थिक कारणों से प्रेरित पुत्र प्राथमिकता लिंग चयन की मांग को बनाए रखती है तथा कानून से बचने के अवैध तरीकों को प्रोत्साहित करती है।
- पेशेवर कदाचार: लिंग निर्धारण आज भी एक अत्यधिक लाभदायक अवैध कारोबार बना हुआ है, जिसमें चिकित्सक कोडित भाषा, असामान्य समय पर किये जाने वाले स्कैन और पोर्टेबल मशीनों के माध्यम से निगरानी तथा पहचान से बचने की कोशिश करते हैं।
PC&PNDT अधिनियम, 1994 के कार्यान्वयन को किस प्रकार मज़बूत किया जा सकता है?
- संस्थागत ढाँचे को मज़बूत करना: समय पर पंजीकरण, निरीक्षण और अपील सुनिश्चित करने के लिये राज्य और ज़िला स्तर पर समर्पित उपयुक्त प्राधिकारियों (जैसे, सिविल सर्जन, चिकित्सा अधीक्षक) और अपीलीय प्राधिकारियों की नियुक्ति कीजिये, जिनकी भूमिका स्पष्ट हो।
- प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना: वास्तविक समय में निगरानी के लिये फॉर्म F (पूर्व-परीक्षा घोषणाएँ) को ऑनलाइन जमा करना अनिवार्य करना तथा अवैध गतिविधियों की रिपोर्ट करने के लिये हेल्पलाइन और समर्पित वेबसाइटों के माध्यम से गुमनाम शिकायत निवारण प्रदान करना।
- ऑनलाइन पारिस्थितिकी तंत्र को संबोधित करना: प्रौद्योगिकी प्लेटफार्मों (जैसे गूगल, मेटा, अमेज़ॅन आदि) को लिंग-चयन से संबंधित सामग्री को सक्रिय रूप से हटाने के लिये कानूनी रूप से उत्तरदायी बनाना तथा विश्वसनीय स्वास्थ्य प्रभावकों को प्रोत्साहित करना ताकि वे भ्रांतियों का खंडन कर सकें और ऑनलाइन माध्यमों पर बालिकाओं के महत्त्व को बढ़ावा दे सकें।
- कानूनी और प्रक्रियात्मक सुधार: PC&PNDT मामलों के त्वरित निपटारे और प्रभावी प्रतिरोध के लिये फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना की जाए तथा अधिनियम में ‘विज्ञापन’ की परिभाषा का विस्तार कर सभी प्रकार के अप्रत्यक्ष प्रचार और ऑनलाइन लिंग-पूर्वानुमान सेवाओं को शामिल किया जाए।
- जागरूकता और व्यवहार में बदलाव: आधिकारिक समीक्षाओं में यह रेखांकित किया गया है कि गहराई से विद्यमान पुत्र-प्राथमिकता को संबोधित किये बिना केवल प्रवर्तन के माध्यम से लिंग चयन को रोका नहीं जा सकता।
- इसलिये निरंतर जन-जागरूकता, सामुदायिक सहभागिता और अप्रत्यक्ष प्रचार—विशेषकर विज्ञापनों तथा डिजिटल/सोशल मीडिया के माध्यम से, के प्रभावी विनियमन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया है, जहाँ प्रवर्तन रणनीतियों को तत्काल अद्यतन करना आवश्यक है।
निष्कर्ष:
PC&PNDT अधिनियम के सामने सबसे बड़ी चुनौती समाज में गहराई से विद्यमान पुत्र-प्राथमिकता है, जिसे डिजिटल माध्यमों ने और अधिक तीव्र कर दिया है। इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिये कानून को डिजिटल युग के अनुरूप अद्यतन करना, त्वरित और प्रभावी दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करना तथा कन्या शिशु के महत्त्व को स्थापित करने के लिये सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना आवश्यक है, ताकि क्लिनिक-आधारित निगरानी से आगे बढ़कर समग्र पारिस्थितिकी दृष्टिकोण अपनाया जा सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न प्रश्न: भारत में लिंग-चयनात्मक तकनीकों की मांग को बनाए रखने वाले सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक कारकों पर चर्चा कीजिये। इन निर्धारकों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिये एक बहु-आयामी रणनीति किस प्रकार अपनाई जा सकती है? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. PC&PNDT अधिनियम, 1994 क्या है?
यह एक ऐसा कानून है, जिसे लिंग चयन पर रोक लगाने और गर्भधारण-पूर्व एवं प्रसव-पूर्व निदान तकनीकों को विनियमित करने के लिये बनाया गया है, ताकि भारत में कन्या भ्रूण हत्या को रोका जा सके।
2. जनसांख्यिकीय अध्ययनों में “लापता महिलाएँ” (Missing Females) शब्द का क्या अर्थ है?
यह जनसंख्या में महिलाओं और लड़कियों की संख्या में होने वाली बड़ी कमी को दर्शाता है, जो मुख्यतः लिंग-पक्षपाती प्रथाओं जैसे लिंग-चयनात्मक गर्भपात और जन्मोत्तर भेदभाव के कारण होती है, जैसा कि अमर्त्य सेन ने रेखांकित किया है।
3. हालिया आँकड़ों के अनुसार भारत के लिंगानुपात में क्या प्रमुख प्रवृत्तियाँ देखी गई हैं?
नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS) 2023 के अनुसार, भारत में जन्म के समय लिंगानुपात वर्ष 2019 के 904 से बढ़कर 917 हो गया है। वहीं, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019–21) में कुल लिंगानुपात 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाओं का दर्ज किया गया है, जो अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति को दर्शाता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स:
प्रश्न. जनांकिकीय लाभांश के पूर्ण लाभ को प्राप्त करने के लिये भारत को क्या करना चाहिये? (2023)
(a) कुशलता विकास का प्रोत्साहन
(b) और अधिक सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का प्रारम्भ
(c) शिशु मृत्यु दर में कमी
(d) उच्च शिक्षा का निजीकरण
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न. आप उन आँकड़ों को किस प्रकार स्पष्ट करते हैं, जो दर्शाते हैं कि भारत में जनजातीय लिंगानुपात, अनुसूचित जातियों के बीच लिंगानुपात के मुकाबले, महिलाओं के अधिक अनुकूल हैं। (2015)
मुक्त व्यापार समझौतों की ओर भारत का रणनीतिक रुख
प्रिलिम्स के लिये: मुक्त व्यापार समझौते, विश्व व्यापार संगठन, आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौता, व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता
मेन्स के लिये: बहुध्रुवीय विश्व में भारत की बदलती व्यापार नीति, भारत की विदेश नीति और भू-राजनीति में FTA की भूमिका
चर्चा में क्यों?
भारत वर्तमान में न्यूज़ीलैंड, रूस और ओमान जैसे विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की दिशा में अपनी कोशिशों को तीव्र कर रहा है। हालाँकि विगत FTA से केवल सीमित व्यापारिक लाभ ही प्राप्त हुए थे।
- यह फोकस में बदलाव को दर्शाता है, जिसमें अब FTA का उपयोग केवल व्यापार बढ़ाने हेतु नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारियों और भू-राजनीतिक हितों को सुरक्षित करने के लिये किया जा रहा है।
सारांश
- भारत का FTA के लिये नवीनीकृत प्रयास शुद्ध व्यापार उदारीकरण से हटकर FTA का उपयोग भू-राजनीतिक संरेखण, आपूर्ति शृंखला सुरक्षा और कमज़ोर होती बहुपक्षीय व्यवस्था में रणनीतिक साझेदारियों के साधन के रूप में करने की दिशा में एक कदम को दर्शाता है।
- विगत FTA ने निर्यात में केवल सीमित वृद्धि दी जबकि व्यापार घाटा बढ़ा और घरेलू क्षेत्रों पर दबाव पड़ा, जिससे मज़बूत सुरक्षा उपायों के साथ संतुलित तथा सेवा-केंद्रित समझौतों की आवश्यकता स्पष्ट हुई।
भारत FTA पर पुनः ध्यान क्यों केंद्रित कर रहा है?
- वैश्विक भू-राजनीति में रणनीतिक पुनर्संरेखण: एकध्रुवीय से बहुध्रुवीय व्यवस्था में वैश्विक बदलाव (जैसे अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्द्धा, विश्व व्यापार संगठन (WTO) की कमज़ोरी) ने द्विपक्षीय और क्षेत्रीय FTA को रणनीतिक जुड़ाव के साधन के रूप में बदल दिया है।
- भारत FTA का उपयोग राजनीतिक संरेखण को मज़बूत करने के लिये कर रहा है, विशेष रूप से इंडो-पैसिफिक, पश्चिम एशिया और अफ्रीका में।
- एक अस्थिर वैश्विक व्यवस्था में FTA ‘राजनीतिक सुरक्षा जाल’ के रूप में कार्य करते हैं, जो द्विपक्षीय संबंधों को और मज़बूत करते हैं तथा रणनीतिक बीमा सुनिश्चित करते हैं (जैसे भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौता (ECTA), भारत-UAE व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (CEPA))।
- बहुपक्षवाद का पतन: WTO वार्ताओं (दोहा राउंड) में ठहराव और वैश्विक स्तर पर बढ़ते संरक्षणवादी रुझानों ने बहुपक्षीय व्यापार मंचों की प्रभावशीलता को कम कर दिया है।
- FTA, WTO-प्लस प्रतिबद्धताओं को आगे बढ़ाने के लिये एक मंच प्रदान करते हैं, विशेष रूप से सेवाओं, डिजिटल व्यापार और निवेश जैसे क्षेत्रों में।
- भारत-EFTA TEPA इस बदलाव का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसमें 15 वर्षों में 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर के FDI के लिये बाध्यकारी प्रतिबद्धता शामिल है।
- आर्थिक और व्यापारिक साझेदारों का विविधीकरण: FTA कुछ बाज़ारों (जैसे अमेरिका, EU, चीन) पर अधिक निर्भरता को कम करने में सहायता करते हैं।
- ये भारत को नए बाज़ारों तक पहुँच बनाने, आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने और महत्त्वपूर्ण संसाधनों (जैसे ऊर्जा, खनिज) को सुरक्षित करने में सक्षम बनाते हैं।
- इसके अलावा, FTA अब केवल बाज़ार पहुँच तक सीमित नहीं हैं; ये ‘चीन प्लस वन’ नीति को लागू करने और ऊपरी स्तरीय आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये रणनीतिक उपकरण बन गए हैं।
- सेवाएँ और निवेश में अप्रयुक्त संभावनाओं को खोलना: भारत को सेवाओं (IT, स्वास्थ्य, शिक्षा) में तुलनात्मक लाभ प्राप्त है, लेकिन विगत FTA ने इस संभावनाओं का पूर्ण उपयोग नहीं किया।
- नई FTA (जैसे UAE-इंडिया CEPA) अब सेवाओं, फिनटेक और निवेश प्रवाह पर अधिक ध्यान केंद्रित करती हैं।
- घरेलू क्षमताओं और मूल्य शृंखला को सुदृढ़ करना: FTA 'मेक इन इंडिया' और उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) जैसी पहलों के साथ संरेखित हैं, जिनका उद्देश्य भारतीय विनिर्माण को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में एकीकृत करना है। रणनीतिक FTA विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और तकनीकी हस्तांतरण को आकर्षित करने में सहायता कर सकते हैं।
- पिछले असंतुलनों को सुधारना: विगत असममित लाभ वाली FTA (जैसे ASEAN) से सीखते हुए, भारत अब बेहतर संतुलित और सेवा-केंद्रित समझौतों की तलाश कर रहा है, ताकि घरेलू उद्योगों के हित सुरक्षित रह सकें।
- उदाहरण के लिये, भारत का ASEAN में निर्यात हिस्सा केवल 10.2% से बढ़कर 10.8% हुआ, जबकि जापान के साथ यह 2.1% से घटकर 1.9% एवं दक्षिण कोरिया के साथ 1.9% से घटकर 1.4% हो गया, जो संबंधित FTA से पहले और बाद के पाँच-वर्षीय औसत पर आधारित है।
- यह प्रवृत्ति संकेत देती है कि विगत FTA ने अधिकतर मौजूदा व्यापार प्रवाह को औपचारिक रूप दिया है, बजाय इसके कि उन्होंने महत्त्वपूर्ण नए व्यापार को उत्पन्न किया हो।
मुक्त व्यापार समझौते
- परिचय: मुक्त व्यापार समझौता (FTA) दो या दो से अधिक देशों या क्षेत्रीय समूहों के बीच ऐसा समझौता है, जिसमें व्यापार को बढ़ावा देने के लिये आपसी वार्ता के माध्यम से व्यापारिक बाधाओं को कम या समाप्त किया जाता है।
- FTA के तहत प्रमुख कवरेज: कस्टम ड्यूटी (टैरिफ), मूल के नियम, गैर-शुल्क उपाय (TBT), सैनिटरी एवं फाइटोसैनिटरी (SPS) उपाय और व्यापार उपचार।
- FTA वस्तुओं के व्यापार (जैसे कृषि या औद्योगिक उत्पाद) या सेवाओं के व्यापार (जैसे बैंकिंग, निर्माण, व्यापार आदि) को शामिल कर सकते हैं।
- इसके अलावा, FTA बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR), निवेश, सरकारी खरीद और प्रतिस्पर्द्धा नीति जैसे अन्य क्षेत्रों को भी शामिल कर सकते हैं।
- व्यापार समझौते के प्रकार:
- द्विपक्षीय (Bilateral): दो देशों के बीच व्यापार के अवसरों का विस्तार करने के लिये।
- बहुपक्षीय (Plurilateral): कई देशों के बीच, क्षेत्रीय या अन्य रूप में।
- बहुराष्ट्रीय (Multilateral): आमतौर पर WTO फ्रेमवर्क के तहत, वैश्विक व्यापार नियम निर्धारित करने के लिये।
- भारत और FTA: WTO के अनुसार, भारत ने हाल ही में हुए भारत–ब्रिटेन व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (CETA) और भारत–यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौता (TEPA) के अतिरिक्त 20 क्षेत्रीय या मुक्त व्यापार समझौते किये हैं।
- वर्तमान में भारत अमेरिका, यूरोपीय संघ, कनाडा और दक्षिण अफ्रीकी कस्टम्स यूनियन के साथ FTA पर वार्ता कर रहा है।
भारत के मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के बढ़ते नेटवर्क से जुड़ी चिंताएँ क्या हैं?
- व्यापार घाटा और असममित लाभ: भारत की कई पूर्व FTA से निर्यात में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई है। प्राय: साझेदार देशों से आयात, निर्यात की तुलना में तेज़ी से बढ़ा है, जिससे व्यापार घाटा बढ़ गया।
- उदाहरण: वित्त वर्ष 2008-2009 से वित्त वर्ष 2022-2023 के बीच ASEAN से भारत में आयात 234.4% बढ़ा, जबकि FTA होने के बावजूद भारत से ASEAN को निर्यात केवल 130.4% ही बढ़ पाया।
- इसके अलावा, भारतीय निर्यातकों को अक्सर समान (पारस्परिक) बाज़ार पहुँच प्राप्त नहीं हो पाती है।
- उदाहरण: वित्त वर्ष 2008-2009 से वित्त वर्ष 2022-2023 के बीच ASEAN से भारत में आयात 234.4% बढ़ा, जबकि FTA होने के बावजूद भारत से ASEAN को निर्यात केवल 130.4% ही बढ़ पाया।
- गैर-शुल्क बाधाएँ (NTB): विकसित अर्थव्यवस्थाएँ कड़े मानक (जैसे IPR, स्वच्छता/स्वास्थ्य संबंधी उपाय) लागू करती हैं, जो शुल्क रियायतों के लाभ को कमज़ोर कर देते हैं। डेटा स्थानीयकरण और IPR से जुड़े मुद्दों के कारण भारत–EU FTA पर वार्ता भी लंबित है।
- इसके अतिरिक्त भारत की FTA उपयोग दर केवल लगभग 25% है, जबकि विकसित देशों में यह 70–80% तक रहती है।
- EU और UK के साथ होने वाली FTA में कठोर पर्यावरणीय एवं श्रम अनुपालन आवश्यकताएँ शामिल हैं, जिन्हें अपनाने को लेकर भारत सतर्क है; साथ ही यह स्थिति भारत के उभरते ‘ग्रीन’ व्यापार व्यवस्थाओं से बाहर हो जाने का जोखिम भी उत्पन्न करती है।
- घरेलू क्षेत्रों को नुकसान: MSME, किसान और श्रम-प्रधान क्षेत्र किफायती आयात के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने में संघर्ष करते हैं। शुल्क कटौती उन क्षेत्रों को नुकसान पहुँचा सकती है जो अभी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी नहीं हैं।
- FTA में प्राय: तैयार वस्तुओं के शून्य-शुल्क आयात की प्रतिबद्धता होती है, जबकि कच्चे माल पर घरेलू शुल्क ऊँचे बने रहते हैं (ऊपरी स्तर के उद्योगों की सुरक्षा हेतु), जिससे भारतीय विनिर्माताओं के लिये एक संरचनात्मक नुकसान की स्थिति बनती है।
- यह ‘उलटी शुल्क संरचना’ (Inverted Duty Structure) विनिर्माण के बजाय व्यापार (तैयार वस्तुओं के आयात) को प्रोत्साहित करती है, जो आत्मनिर्भर भारत (मेक इन इंडिया) की अवधारणा के प्रतिकूल है।
- उदाहरण: ASEAN FTA के तहत किफायती आयात से भारतीय रबर किसानों को नुकसान पहुँचा।
- डेयरी, बागान फसलों या अनाज क्षेत्रों में बाज़ार खोलने से किसानों की आजीविका को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- FTA में प्राय: तैयार वस्तुओं के शून्य-शुल्क आयात की प्रतिबद्धता होती है, जबकि कच्चे माल पर घरेलू शुल्क ऊँचे बने रहते हैं (ऊपरी स्तर के उद्योगों की सुरक्षा हेतु), जिससे भारतीय विनिर्माताओं के लिये एक संरचनात्मक नुकसान की स्थिति बनती है।
- तीसरे देशों के माध्यम से अप्रत्यक्ष आयात बढ़ने की आशंका: गैर-FTA देशों की वस्तुएँ, मूल के नियमों का दुरुपयोग कर, साझेदार देशों के रास्ते भारत में प्रवेश कर सकती हैं। इससे घरेलू विनिर्माण कमज़ोर होता है और FTA की मूल भावना भी प्रभावित होती है।
भारत की FTA रणनीति की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिये नीति दृष्टिकोण क्या होना चाहिये?
- घरेलू प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सुदृढ़ करना: वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा के लिये उद्योगों को तैयार करने हेतु अनुसंधान एवं विकास (R&D), अवसंरचना, कौशल विकास और MSME समर्थन में निवेश करना।
- WTO-प्लस क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना: डिजिटल व्यापार, हरित ऊर्जा और सेवाओं जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दें, विशेष रूप से विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ भविष्य की FTA में।
- संतुलित सुरक्षा उपायों को शामिल करना: तीसरे देशों द्वारा दुरुपयोग रोकने के लिये सशक्त मूल-नियम (Rules of Origin), सेफगार्ड शुल्क और एंटी-डंपिंग प्रावधान सुनिश्चित करना।
- संस्थागत सुधार और अंतर-मंत्रालयी समन्वय: विदेश मंत्रालय (MEA), वाणिज्य मंत्रालय और नीति आयोग के बीच सहयोग को मज़बूत करें ताकि रणनीतिक एवं आर्थिक हितों का बेहतर संरेखण हो सके।
- विवाद निपटान ढाँचे में सुधार: व्यापार विवादों के त्वरित समाधान के लिये FTA में बाध्यकारी समय-सीमाएँ और स्वतंत्र पैनल शामिल करना।
- मौजूदा FTA की निगरानी और समीक्षा: आवधिक प्रभाव आकलन, सार्वजनिक परामर्श और आवश्यक सुधार हेतु तंत्र स्थापित करना।
- समावेशी और सतत व्यापार को बढ़ावा देना: घरेलू अनुकूलन प्रभावित किये बिना श्रम और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को एकीकृत करना।
निष्कर्ष
FTA पर भारत का नया ज़ोर व्यापार मात्रा के विस्तार से अधिक अस्थिर वैश्विक व्यवस्था में दिशा तय करने से जुड़ा है। जैसे-जैसे बहुपक्षवाद कमज़ोर पड़ रहा है और भू-राजनीति अर्थशास्त्र पर हावी हो रही है, FTA रणनीतिक संरेखण, कूटनीतिक बीमा तथा आपूर्ति-शृंखला सुरक्षा के उपकरण के रूप में विकसित हो गए हैं। इस उभरते वैश्विक परिदृश्य में, भारत की व्यापार नीति को अब केवल आर्थिक दक्षता नहीं, बल्कि रणनीतिक तर्क अधिकाधिक दिशा देगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. पहले के FTA से सीमित लाभ मिलने के बावजूद भारत अधिक FTA क्यों कर रहा है?
भारत अब FTA को बहुध्रुवीय विश्व में रणनीतिक संरेखण, आपूर्ति-शृंखला अनुकूलन और भू-राजनीतिक साझेदारियों के साधन के रूप में देख रहा है।
2. ASEAN जैसे पूर्व FTA के तहत भारत को कौन-सी प्रमुख समस्या का सामना करना पड़ा है?
आयात, निर्यात की तुलना में तेज़ी से बढ़े, जिससे व्यापार घाटा बढ़ गया। उदाहरण के तौर पर, ASEAN से आयात वित्त वर्ष 2012-2013 में 8 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2022-2023 में 44 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया।
3. FTA भारत के घरेलू क्षेत्रों को कैसे प्रभावित करते हैं?
MSME और किसानों पर किफायती आयात का दबाव बढ़ता है, विशेषकर रबर, डेयरी और बागान फसलों जैसे क्षेत्रों में।
4. नई FTA में WTO-प्लस मुद्दे क्या हैं?
इनमें WTO प्रतिबद्धताओं से आगे के क्षेत्र शामिल होते हैं, जैसे सेवाएँ, डिजिटल व्यापार, निवेश, बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR), श्रम और पर्यावरणीय मानक।
5. कौन-से सुरक्षा उपाय भारत के FTA परिणामों को बेहतर बना सकते हैं?
सशक्त मूल-नियम (Rules of Origin), सेफगार्ड शुल्क, आवधिक समीक्षा और बेहतर विवाद-निपटान तंत्र।
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दृष्टि मेंस प्रश्न: प्रश्न. भारत द्वारा हाल के वर्षों में मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) में आई तेज़ी, बाज़ार पहुँच से हटकर भू-राजनीतिक संरेखण की ओर हुए रणनीतिक बदलाव को दर्शाती है। विवेचना कीजिये। |
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित देशों पर विचार कीजिये: (2018)
- ऑस्ट्रेलिया
- कनाडा
- चीन
- भारत
- जापान
- यूएसए
उपर्युक्त में से कौन-कौन आसियान (ए.एस.इ.ए.एन.) के 'मुक्त-व्यापार भागीदारों' में से हैं?
(a) 1, 2, 4 और 5
(b) 3, 4, 5 और 6
(c) 1, 3, 4 और 5
(d) 2, 3, 4 और 6
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. विश्व व्यापार में संरक्षणवाद और मुद्रा चालबाज़ियों की हालिया परिघटनाएँ भारत की समष्टि-आर्थिक स्थिरता को किस प्रकार प्रभावित करेंगी? (2018)
दया याचिका
चर्चा में क्यों?
भारत के राष्ट्रपति ने वर्ष 2012 में महाराष्ट्र में एक दो वर्षीय बच्ची के अपहरण, बलात्कार और हत्या के अपराध में दोषी ठहराए गए एक अभियुक्त की दया याचिका को अस्वीकार कर दिया है, जिससे मृत्युदंड से संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया की पुनः पुष्टि होती है।
सारांश
- राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका को अस्वीकार किये जाने से अनुच्छेद 72 और 161 के तहत दया याचिकाओं की प्रक्रिया, BNSS 2023 की समयबद्ध रूपरेखा, सीमित न्यायिक समीक्षा तथा अनुच्छेद 21 को बनाए रखते हुए न्याय के संभावित विफल होने से बचाव के लिये दया के मानवीय औचित्य पर ध्यान केंद्रित होता है।
दया याचिका क्या है?
- परिचय: दया याचिका एक संवैधानिक उपाय है जो दोषियों, विशेष रूप से मृत्युदंड के मामलों में क्षमा, दंड परिवर्तन, दंड माफी या सज़ा के निलंबन की मांग करने के लिये उपलब्ध होता है।
- संवैधानिक आधार: दंड को क्षमा करने, परिवर्तित करने, घटाने या निलंबित करने की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति और अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल में निहित है।
- राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति राज्यपाल की तुलना में व्यापक होती है, क्योंकि यह सेना न्यायालय (Court-martial) के मामलों तक विस्तृत होती है, जबकि राज्यपाल की शक्ति केवल राज्य कानूनों के अंतर्गत आने वाले अपराधों तक सीमित रहती है और सेना न्यायालय द्वारा दी गई सज़ाओं पर लागू नहीं होती।
- दायर करने के आधार: दया याचिका अच्छे आचरण, मानसिक स्वास्थ्य, आयु, चिकित्सीय स्थिति, मानवीय कारणों, न्याय के संभावित दुरुपयोग (न्यायिक त्रुटि) या पुनर्वास के प्रयासों जैसे आधारों पर दायर की जा सकती है।
- कानूनी प्रावधान: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के धारा 472(1) में दया याचिकाओं के लिये समयबद्ध प्रक्रिया निर्धारित की गई है।
- सज़ा पाए हुए व्यक्ति को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपील खारिज किये जाने या उच्च न्यायालय द्वारा मृत्युदंड की पुष्टि होने के 30 दिन के भीतर याचिका दायर करनी होती है, जबकि यदि मामले में कई अभियुक्त हों तो याचिकाएँ 60 दिन के भीतर दायर करनी होंगी।
- सरकार की भूमिका: BNSS, 2023 के तहत, दया याचिका प्राप्त होने पर केंद्रीय सरकार राज्य सरकार से टिप्पणियाँ मांगती है, मामले के रिकॉर्ड की जाँच करती है और 60 दिनों के भीतर राष्ट्रपति को अपनी सिफारिश भेजती है।
- केंद्र आवश्यकता पड़ने पर मुकदमे के न्यायाधीश की राय और प्रमाणित रिकॉर्ड भी प्राप्त कर सकता है। यदि मामले में कई अभियुक्त हों, तो याचिकाओं का निर्णय एक साथ किया जाता है।
- हालाँकि राष्ट्रपति के निर्णय के लिये कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है, केंद्र को राष्ट्रपति का आदेश राज्य गृह विभाग और जेल अधिकारियों को 48 घंटे के भीतर संप्रेषित करना अनिवार्य है।
- अंतिमता और गैर-न्यायिकता: BNSS की धारा 472(7) के तहत, दया याचिका पर राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम माना जाता है।
- न्यायालयों को क्षमा या दंड-परिवर्तन के आधारों पर सवाल करने या समीक्षा करने से रोका गया है, जिससे दया शक्तियों की विशेष कार्यकारी प्रकृति को पुष्ट किया जाता है।
- न्यायिक घोषणाएँ:
- मारू राम बनाम भारत संघ (1981): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ये शक्तियाँ मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर प्रयोग की जानी चाहिये, जिससे दया को व्यक्तिगत विवेक के बजाय एक कार्यकारी कार्य माना गया।
- केहर सिंह बनाम भारत संघ (1989): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति न्यायपालिका से स्वतंत्र है, लेकिन सीमित न्यायिक समीक्षा के अधीन है ताकि प्रक्रियात्मक निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके, न कि निर्णय की योग्यता का मूल्यांकन करने के लिये।
भारत में क्षमादान शक्तियों का दार्शनिक आधार
- क्षमादान शक्तियाँ इस तथ्य को मान्यता देती हैं कि न्यायिक प्रणाली सर्वशक्तिमान नहीं है और संभावित न्यायिक त्रुटियों को सुधारने के लिये एक मानवीय तंत्र प्रदान करती हैं।
- वर्ष 2012 में 14 सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने 9 मृत्युदंडों को आजीवन कारावास में परिवर्तित करने के लिये राष्ट्रपति से अनुरोध किया, न्यायिक त्रुटियों के प्रति चिंता जताते हुए।
- इसका उद्देश्य अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार को बनाए रखते हुए न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास बनाए रखना भी है।
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दृष्टि मेंस प्रश्न: प्रश्न. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत दया याचिकाओं के लिये पेश किये गए समयबद्ध प्रक्रियाओं के महत्त्व का मूल्यांकन कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भारत में दया याचिका क्या है?
दया याचिका एक संवैधानिक उपाय है, जो अनुच्छेद 72 और 161 के तहत क्षमा, दंड-परिवर्तन, दंड-न्यूनिकरण या दंड के निलंबन की मांग करती है।
2. BNSS, 2023 दया याचिका प्रक्रिया में क्या बदलाव लाता है?
BNSS दया याचिकाएँ दायर करने के लिये समय सीमाएँ निर्धारित करता है और केंद्रीय एवं राज्य सरकारों की संरचित भूमिका को निर्दिष्ट करता है।
3. किसके पास अधिक व्यापक क्षमादान शक्तियाँ हैं—राष्ट्रपति या राज्यपाल?
राष्ट्रपति के पास अधिक व्यापक शक्तियाँ हैं, जो सेना न्यायालय और मृत्युदंड मामलों में भी लागू होती हैं, जबकि राज्यपाल की शक्तियाँ इन तक सीमित नहीं हैं।
4. क्या न्यायालय राष्ट्रपति के दया याचिका निर्णय की समीक्षा कर सकते हैं?
न्यायालय निर्णय की योग्यता का परीक्षण नहीं कर सकते, लेकिन प्रक्रियात्मक निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिये सीमित न्यायिक समीक्षा कर सकते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न. मृत्यु दंडादेशों के लघुकरण में राष्ट्रपति के विलंब के उदाहरण न्याय प्रत्याख्यान (डिनायल) के रूप में लोक वाद-विवाद के अधीन आए हैं। क्या राष्ट्रपति द्वारा ऐसी याचिकाओं को स्वीकार करने/अस्वीकार करने के लिये एक समय सीमा का विशेष रूप से उल्लेख किया जाना चाहिये? विश्लेषण कीजिये। (2014)
