अमेरिका-इज़रायल-ईरान संघर्ष का भारत पर भू-आर्थिक प्रभाव
प्रिलिम्स के लिये: द्रवीकृत प्राकृतिक गैस, होर्मुज़ जलडमरूमध्य, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, चालू खाता घाटा, संपीड़ित प्राकृतिक गैस, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन
मेन्स के लिये: पश्चिम एशियाई भू-राजनीति का भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों पर प्रभाव, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, वैश्विक संघर्षों का भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता पर प्रभाव
चर्चा में क्यों?
ईरान के साथ अमेरिका-इज़रायल संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित कर दिया है और ऊर्जा, व्यापार व मुद्रास्फीति के मोर्चे पर भारत की कमज़ोरियों को उजागर किया है। यह भारत के 'गोल्डीलॉक्स' संतुलन—यानी उच्च विकास दर और निम्न मुद्रास्फीति के सामंजस्य के लिये खतरा उत्पन्न करता है। साथ ही, यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिये एक विदेश नीति संबंधी दुविधा भी उत्पन्न करता है, क्योंकि भारत को अमेरिका, इज़रायल और ईरान तीनों के साथ अपने संबंध बनाए रखने हैं।
सारांश
- अमेरिका-इज़रायल-ईरान संघर्ष भारत की अर्थव्यवस्था को आयातित मुद्रास्फीति, रुपये पर दबाव और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान के खतरे से उजागर करता है। यह खतरा विशेष रूप से भारत की ऊर्जा सुरक्षा, उर्वरक आपूर्ति और व्यापार के लिये है, जिसका मुख्य कारण खाड़ी के तेल, LNG और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से उर्वरक आगत पर भारी निर्भरता है।
- भारत को ऊर्जा विविधीकरण, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण, घरेलू गैस उत्पादन और वैकल्पिक उर्वरक उपयोग को मज़बूत करना चाहिये, साथ ही भू-राजनीतिक जोखिमों को कम करने के लिये व्यापारिक सुगमता और समुद्री मार्गों में सुधार करना चाहिये।
अमेरिका और इज़रायल के बीच ईरान को लेकर चल रहे संघर्ष का भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
- ऊर्जा सुरक्षा गंभीर खतरे में: भारत अपने कच्चे तेल का 85% से अधिक और अपने द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा आयात करता है, जिसका अधिकांश भाग सऊदी अरब, इराक, यूएई और कतर से आता है।
- होर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान के कारण इन खाड़ी देशों से तेल और LNG का बहिर्वाह प्रभावित हो गया है।
- यह संकट भारत की सीमित बफर क्षमता को दर्शाता है। उदाहरण के लिये, चीन के पास 110-140 दिनों के आयात के लिये पर्याप्त पेट्रोलियम भंडार है। इसके विपरीत, भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) में केवल 53 लाख मीट्रिक टन पेट्रोलियम है, जो मात्र कुछ दिनों की खपत के लिये ही पर्याप्त है।
- कच्चे तेल की कीमतों में 15% की वृद्धि के कारण 'आयातित मुद्रास्फीति' और चालू खाता घाटा बढ़ रहा है। यह स्थिति भारत की 7% से अधिक अपेक्षित आर्थिक वृद्धि को प्रभावित कर सकती है।
- भारत की LPG संबंधी संवेदनशीलता: प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत स्वच्छ खाना पकाने की सुविधा के विस्तार के कारण भारत विश्व में LPG का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है।
- भारत की LPG की लगभग 60% मांग आयात के माध्यम से पूरी होती है, क्योंकि घरेलू उत्पादन सीमित है।
- LPG का प्रमुख आयात संयुक्त अरब अमीरात, कतर, सऊदी अरब और कुवैत से होता है। अधिकांश खेप होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रती है, जिसके कारण क्षेत्रीय संघर्ष या नाकाबंदी की स्थिति में आपूर्ति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है।
- भारत में, भूमिगत LPG भंडारण लगभग 1.4 लाख टन है। यह मात्रा, जिसकी दैनिक मांग लगभग 80,000 टन है, दो दिनों से भी कम की खपत के लिये पर्याप्त है। इस दैनिक मांग का 85% से अधिक हिस्सा घरेलू उपयोग के लिये होता है।
- आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 को लागू करने के बाद सरकार ने रिफाइनरियों को प्रोपेन और ब्यूटेन प्रवाह को परिवर्तित कर LPG उत्पादन को अधिकतम करने का निर्देश दिया, जिससे घरेलू उत्पादन में लगभग 25% की वृद्धि हुई, जिसमें घरेलू खपत के लिये आपूर्ति को प्राथमिकता दी गई तथा वाणिज्यिक उपयोगकर्त्ताओं के लिये गैस की आपूर्ति को प्रतिबंधित कर दिया गया।
- इसके परिणामस्वरूप, बड़े शहरों में होटल और रेस्तराँ जैसे व्यावसायिक उपयोगकर्त्ताओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इनमें LPG की कमी, इसकी उच्च कीमतें और नई बुकिंग के लिये 25 दिनों तक की लंबी प्रतीक्षा अवधि शामिल है।
- आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955: भारत की प्राकृतिक गैस की खपत लगभग 195 मिलियन मीट्रिक मानक घन मीटर (MMSCMD) प्रतिदिन है। इस खपत का लगभग आधा हिस्सा आयात किया जाता है, जिसके कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य में किसी भी व्यवधान से आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है, जैसा कि आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के संदर्भ में उल्लेख किया गया है।
- LNG शिपमेंट में व्यवधान के बाद प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को प्राथमिकता देने के लिये भारत ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 लागू किया है।
- नई आवंटन योजना के तहत घरेलू पाइप वाली प्राकृतिक गैस (PNG), संपीड़ित प्राकृतिक गैस (CNG) और LPG उत्पादन को 100% आपूर्ति प्राप्त होगी। वहीं, उर्वरक संयंत्रों को 70% और उद्योगों को 80% आपूर्ति प्राप्त होगी। इसके अतिरिक्त, रिफाइनरियों को उनकी पिछली खपत का लगभग 65% हिस्सा प्राप्त हो सकता है।
- उर्वरक का खतरा: भारत के पास जटिल उर्वरकों के लिये खनन योग्य भंडार की कमी है। यह मर्चेंट अमोनिया के लिये ओमान, सऊदी अरब और कतर, सल्फर (गंधक) के लिये ओमान, यूएई, कतर, कुवैत और सऊदी अरब तथा फॉस्फोरिक एसिड और रॉक फॉस्फेट (जो डायमोनियम फॉस्फेट - DAP के लिये महत्त्वपूर्ण हैं) के लिये जॉर्डन पर निर्भर है।
- इसके अतिरिक्त, घरेलू यूरिया संयंत्र कतर और यूएई से आयात LNG पर निर्भर हैं।
- देश के यूरिया संयंत्र अपनी उत्पादन प्रक्रिया के लिये कतर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से आयात की जाने वाली LNG पर निर्भर हैं।
- वर्तमान में भारत के पास पर्याप्त भंडार है (जैसे– फरवरी 2026 के अंत तक लगभग 5.5 मिलियन टन यूरिया), क्योंकि रबी मौसम समाप्त हो रहा है और खरीफ मौसम अभी कई महीनों दूर (जून से अक्तूबर) है।
- यदि यह नाकाबंदी इस बफर अवधि से अधिक समय तक जारी रहती है, तो सरकार को मजबूरन औद्योगिक और बिजली क्षेत्रों से प्राकृतिक गैस को हटाकर घरेलू उर्वरक उत्पादन और सिटी गैस वितरण को प्राथमिकता देनी पड़ेगी। यह कदम कृषि उत्पादन को बनाए रखने तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगा।
- खाद्य और कृषि निर्यात: वैश्विक व्यापार अनुसंधान पहल (GTRI) के अनुसार, पश्चिम एशिया को होने वाला लगभग 11.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य का भारतीय खाद्य और कृषि निर्यात जोखिम में है।
- सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ईरान भारतीय बासमती चावल के प्राथमिक खरीदार हैं। वर्तमान में, 3,000 से अधिक शिपिंग कंटेनर घरेलू बंदरगाहों (जैसे– कांडला और मुंद्रा) पर फँसे हुए हैं या पारगमन में अटके हुए हैं।
- भारत ने 2025 में पश्चिम एशिया को लगभग 11.8 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के कृषि और खाद्य उत्पादों का निर्यात किया, जो भारत के कुल कृषि निर्यात के पाँचवे भाग से अधिक (लगभग 21–22%) हिस्सा है।
- मुख्य निर्यात वस्तुओं में अनाज, फल, सब्ज़ियाँ, मसाले, डेयरी उत्पाद और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ शामिल हैं।
- निर्यात में बाधा आने से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के किसानों और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग पर प्रभाव पड़ सकता है।
- निर्यातकों को समुद्री ईंधन की बढ़ती कीमतों, उच्च मालभाड़ा लागत और बढ़ते डिमरेज शुल्क के कारण दबाव का सामना करना पड़ रहा है। इसलिये वे सरकार से आग्रह कर रहे हैं कि संकट के कारण होने वाली शिपमेंट में देरी पर दंड से बचने के लिये फोर्स मेज्योर घोषित किया जाए।
- मुख्य औद्योगिक क्षेत्र:
- निर्माण और सीमेंट: भारत अपने आयातित चूना पत्थर का 68.5% और आयातित जिप्सम का 62.1% हिस्सा बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों से प्राप्त करता है।
- यहाँ आपूर्ति में लगने वाले झटके सीधे तौर पर घरेलू सीमेंट की कीमतों में वृद्धि करेंगे और बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को ठप कर देंगे।
- यहाँ आपूर्ति में बाधा आने से घरेलू सीमेंट की कीमतों में वृद्धि हो सकती है और बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ रुक सकती हैं या धीमी पड़ सकती हैं।
- स्टील उत्पादन: भारत के स्टील उद्योग का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI) प्रक्रिया का उपयोग करता है, जो प्राकृतिक गैस पर आधारित होती है।
- कतर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से होने वाली LNG शिपमेंट में व्यवधान आने से घरेलू स्टील उत्पादन में कटौती होगी।
- विनिर्माण और रत्न उद्योग: भारत अपने कॉपर वायर (तांबे के तार) का 50% से अधिक हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है, जो बिजली पारेषण के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- इसके अतिरिक्त सूरत स्थित भारत का हीरा प्रसंस्करण हब कच्चे माल की कमी का सामना कर रहा है, क्योंकि इसके 40% से अधिक कच्चे हीरे संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और इज़रायल से आयात किये जाते हैं।
- निर्माण और सीमेंट: भारत अपने आयातित चूना पत्थर का 68.5% और आयातित जिप्सम का 62.1% हिस्सा बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों से प्राप्त करता है।
- रुपये का अवमूल्यन: भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर तक कमज़ोर हो गया है, जिसके कारण भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को मुद्रा को स्थिर करने के लिये अपने 730 बिलियन अमेरिकी डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार में से 15–20 बिलियन डॉलर का उपयोग करके हस्तक्षेप करना पड़ा है।
- पश्चिम एशिया में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा: खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों में लगभग 1 करोड़ भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो वार्षिक 51 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की प्रेषण राशि भारत भेजते हैं। उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत के लिये एक सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है।
- व्यापारिक जहाज़ों पर हुए हमलों से भारतीय नागरिक प्रभावित हुए। फँसे हुए पर्यटकों और पारगमन यात्रियों को मस्कट, रियाद तथा जेद्दा से उड़ानों के माध्यम से वापस लौटने में सहायता प्रदान की गई।
पश्चिम एशिया संघर्ष के प्रभाव को कम करने हेतु भारत कौन-से कदम उठा सकता है?
- त्वरित विविधीकरण: हालाँकि भारत ने रूस से आयात करके अपनी कच्चे तेल की टोकरी में विविधता लाई है, लेकिन इसे 'होर्मुज़ जलडमरूमध्य' पर अपनी अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिये लैटिन अमेरिका (ब्राज़ील, गुयाना), पश्चिम अफ्रीका और संयुक्त राज्य अमेरिका के आपूर्तिकर्त्ताओं के साथ दीर्घकालिक अनुबंधों का और विस्तार करना चाहिये।
- सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) का विस्तार: भारत अपने सामरिक पेट्रोलियम भंडार को तेल आयात के 90 दिनों के वैश्विक बेंचमार्क (मानक) तक बढ़ाने के लिये कदम उठा सकता है, क्योंकि वर्तमान में संयुक्त भंडार लगभग 70–75 दिनों की आवश्यकताओं को ही पूरा कर पाता है।
- बड़े भूमिगत भंडारण केंद्र भू-राजनीतिक व्यवधानों या आपूर्ति में होने वाली नाकेबंदी के दौरान एक सुरक्षा कवच प्रदान करेंगे।
- हरित परिवर्तन में तेज़ी लाना: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाना और घरेलू नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का विस्तार करना आयातित जीवाश्म ईंधन की बुनियादी मांग को संरचनात्मक रूप से कम करेगा।
- चूँकि भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के प्रमुख लक्ष्यों को पहले ही प्राप्त कर लिया है, इसलिये अब ध्यान नियामक, ग्रिड और भंडारण संबंधी बाधाओं को दूर करने तथा मौजूदा नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों के पूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करने पर केंद्रित होना चाहिये।
- घरेलू गैस उत्पादन का विस्तार: घरेलू प्राकृतिक गैस उत्पादन बढ़ाने के लिये ‘हाइड्रोकार्बन अन्वेषण और लाइसेंसिंग नीति’ (HELP) के तहत अन्वेषण गतिविधियों को तेज़ किया जाए, ताकि देश में गैस के नए भंडार खोजे जा सकें और आयात पर निर्भरता कम हो सके।
- वैकल्पिक उर्वरकों का विस्तार: खाड़ी से आयातित अमोनिया और LNG पर निर्भरता को कम करने के लिये सरकार को नैनो यूरिया और नैनो DAP के घरेलू उत्पादन और देशव्यापी स्तर पर अपनाने को सख्ती से बढ़ावा देना चाहिये।
- PM प्रणाम (धरती माँ की बहाली, जागरूकता पैदा करना, पोषण और सुधार के लिये पीएम कार्यक्रम) का उपयोग राज्यों को आयातित रासायनिक उर्वरकों की उनकी समग्र खपत को कम करने और जैव-उर्वरकों एवं जैविक खेती की ओर स्थानांतरित करने के लिये वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करने के लिये किया जाना चाहिये।
- फोर्स मेजेर के रूप में मान्यता: वाणिज्य मंत्रालय को संघर्ष और उसके बाद होने वाले पोर्ट कंजेशन को आधिकारिक तौर पर एक फोर्स मेजेर घटना के रूप में मान्यता देनी चाहिये।
- यह विधिक संरक्षण भारतीय निर्यातकों को विदेशी खरीदारों द्वारा लगाए गए गंभीर वित्तीय दंड और अनुबंध के रद्द होने से बचाएगा।
- एक ECGC 'वॉर-रिस्क' इंश्योरेंस पूल का निर्माण: लाल सागर और होर्मुज़़ जलडमरूमध्य के लिये समुद्री बीमा प्रीमियम में अत्यधिक वृद्धि MSME निर्यातकों को दिवालिया करने की स्थिति में पहुँचा रही है। निर्यात ऋण गारंटी निगम (ECGC) को तुरंत एक संप्रभु-समर्थित “वार-रिस्क इंश्योरेंस पूल” स्थापित करना चाहिये, ताकि इन प्रीमियमों को सब्सिडी दी जा सके और भारतीय निर्यात को प्रतिस्पर्द्धी बनाए रखा जा सके।
- ईस्टर्न मेरीटाइम कॉरिडोर (EMC) की ओर रुख करना: अस्थिर मध्य पूर्वी संकीर्ण मार्गों (चोकप्वाइंट्स) को पूरी तरह से दरकिनार करने के लिये भारत को चेन्नई-व्लादिवोस्तोक ईस्टर्न मेरीटाइम कॉरिडोर (EMC) को सख्ती के साथ चालू करना चाहिये।
- यह मार्ग अपेक्षाकृत स्थिर हिंद-प्रशांत और दक्षिण चीन सागर के जल क्षेत्रों के माध्यम से रूसी कच्चे तेल, कोयला और उर्वरकों को सुरक्षित रूप से प्राप्त कर सकता है।
निष्कर्ष
भारत को एक संवेदनशील आयातक से एक सुदृढ़ आर्थिक शक्ति में रूपांतरित होने के लिये ‘जस्ट-इन-टाइम’ सप्लाई चैन से आगे बढ़कर ‘जस्ट-इन-केस’ स्ट्रेटजिक बफर की ओर संक्रमण करना होगा, जिसमें समुद्री स्वायत्तता, विदेशों में स्वामित्व वाली परिसंपत्तियों तथा रुपये में मूल्यांकित व्यापार व्यवस्थाओं का उपयोग किया जाएगा।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. "पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव ऊर्जा और कृषि आपूर्ति शृंखलाओं में भारत की ढाँचागत कमज़ोरियों को उजागर करता है।" चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिये होर्मुज़ जलडमरूमध्य क्यों महत्त्वपूर्ण है?
खाड़ी देशों से भारत के कच्चे तेल और LNG आयात का लगभग 60-65% होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुज़रता है, जो इसे एक महत्त्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्ति संकीर्ण मार्ग (चोकप्वाइंट) बनाता है।
2. वर्तमान संकट में आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 का क्या महत्त्व है?
यह अधिनियम सरकार को प्राकृतिक गैस जैसी आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को विनियमित करने की अनुमति देता है ताकि कमी के दौरान प्राथमिकता आवंटन सुनिश्चित किया जा सके।
3. पश्चिम एशिया संघर्ष के दौरान भारत उर्वरक आपूर्ति में संवेदनशील क्यों है?
भारत उर्वरक उत्पादन में उपयोग होने वाले अमोनिया, सल्फर, LNG और फॉस्फोरिक एसिड के लिये खाड़ी देशों पर अधिक निर्भर करता है।
4. ईस्टर्न मेरीटाइम कॉरिडोर (EMC) क्या है?
चेन्नई-व्लादिवोस्तोक पूर्वी समुद्री गलियारा एक प्रस्तावित शिपिंग मार्ग है जिसका उद्देश्य रूस के साथ व्यापार को मज़बूत करना और मध्य पूर्व के संकीर्ण मार्गों (चोकप्वाइंट्स) पर निर्भरता कम करना है।
5. नैनो यूरिया और नैनो DAP भारत की उर्वरक आयात निर्भरता कैसे कम कर सकते हैं?
ये उन्नत उर्वरक पोषक तत्त्वों की दक्षता में सुधार करते हैं, रासायनिक उर्वरक की खपत कम करते हैं और आयातित अमोनिया एवं LNG पर निर्भरता को कम करते हैं।
https://www.youtube.com/watch?v=IDPoDXaZByQ
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. दक्षिण-पश्चिम एशिया का निम्नलिखित में से कौन-सा एक देश भूमध्यसागर तक नहीं फैला है? (2015)
(a) सीरिया
(b) जॉर्डन
(c) लेबनान
(d) इज़रायल
उत्तर: (b)
प्रश्न. कभी-कभी समाचारों में उल्लिखित पद ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ किसकी गतिविधियों के संदर्भ में आता है? (2018)
(a) चीन
(b) इज़रायल
(c) इराक
(d) यमन
उत्तर: (b)
प्रश्न. भारत द्वारा चाबहार बंदरगाह विकसित करने का क्या महत्त्व है? (2017)
(a) अफ्रीकी देशों से भारत के व्यापार में अपार वृद्धि होगी।
(b) तेल-उत्पादक अरब देशों से भारत के संबंध सुदृढ़ होंगे।
(c) अफगानिस्तान और मध्य एशिया में पहुँच के लिये भारत को पाकिस्तान पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।
(d) पाकिस्तान, इराक और भारत के बीच गैस पाइपलाइन का संस्थापन सुकर बनाएगा और उसकी सुरक्षा करेगा।
उत्तर: C
मेन्स
प्रश्न. “भारत के इज़रायल के साथ संबंधों ने हाल ही में एक ऐसी गहराई और विविधता हासिल की है, जिसकी पुनर्वापसी नहीं की जा सकती है।” विवेचना कीजिये। (2018)
लेबर मार्केट पर AI इंपैक्ट स्टडी
प्रिलिम्स के लिये: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM), चैटजीपीटी, जनरेटिव एआई चैटबॉट, एमएसएमई, बौद्धिक संपदा, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020।
मेन्स के लिये: AI इंपैक्ट पर एंथ्रोपिक लेबर मार्केट स्टडी के मुख्य परिणाम, AI से रोज़गार को खतरा, AI के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ रोज़गार को सुदृढ़ करने हेतु आवश्यक उपाय।
चर्चा में क्यों?
एंथ्रोपिक द्वारा की गई हालिया लेबर मार्केट स्टडी रोज़गार पैटर्न पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते प्रभाव पर प्रकाश डालती है, जिसमें यह दर्शाया गया है कि जहाँ लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) सैद्धांतिक रूप से कई पेशेवर कार्य कर सकते हैं, वहीं उनका वर्तमान वास्तविक दुनिया में उपयोग अभी भी सीमित है।
- स्टडी ने "ऑब्ज़र्व्ड एक्सपोज़र" नामक एक नए मापदंड की शुरुआत की है। यह सैद्धांतिक AI क्षमता से आगे बढ़कर यह आकलन करता है कि पेशेवर परिवेश में AI पूर्व से ही प्रत्यक्ष रूप से क्या कार्य कर रहा है।
सारांश
- एंथ्रोपिक लेबर मार्केट स्टडी से पता चलता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) रोज़गार को तीव्रता से प्रभावित कर रही है, विशेष रूप से ज्ञान-गहन क्षेत्रों में।
- हालाँकि AI की सैद्धांतिक क्षमता उच्च है, वास्तविक कार्यस्थल उपयोग सीमित बना हुआ है, लेकिन इसमें तेज़ी से वृद्धि हो रही है।
- AI युग में रोज़गार की सुरक्षा के लिये कौशल पुनर्निर्माण (रीस्किलिंग), AI साक्षरता और नीतिगत उपायों की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हैं।
AI इंपैक्ट पर एंथ्रोपिक लेबर मार्केट स्टडी के मुख्य निष्कर्ष क्या हैं?
- सैद्धांतिक क्षमता और वास्तविक उपयोग के बीच अंतर: क्लॉड जैसे लार्ज लैंग्वेज मॉडल सैद्धांतिक रूप से कंप्यूटर और गणित पेशेवरों के 94% कार्य कर सकते हैं। हालाँकि व्यवहार में क्लॉड के वर्तमान संस्करणों का उपयोग केवल उन कार्यों के लगभग 33% के लिये किया जाता है।
- हाई-एक्सपोज़र और संरक्षित क्षेत्रों की पहचान:
- सर्वाधिक जोखिम वाली नौकरियाँ: कंप्यूटर प्रोग्रामर, कस्टमर सर्विस रिप्रेजेंटेटिव और वित्तीय विश्लेषकों को "मोस्ट एक्पोज़्ड" माना जाता है, जहाँ AI सैद्धांतिक रूप से व्यवसाय, वित्त, कंप्यूटर विज्ञान, इंजीनियरिंग, कानून और कार्यालय प्रशासन जैसे क्षेत्रों में अधिकांश कार्यों को कवर कर सकता है।
- संरक्षित क्षेत्र: विनिर्माण, कृषि, सुरक्षा सेवाएँ और व्यक्तिगत देखभाल में सैद्धांतिक AI का उपयोग सीमित है, जिससे इन क्षेत्रों में नौकरियाँ तत्काल AI डिसरप्शन से अधिक सुरक्षित रहती हैं।
- प्रवेश-स्तर की भर्ती में तीव्र गिरावट: वर्ष 2022 के अंत में चैटजीपीटी लॉन्च होने के बाद से 22 से 25 वर्ष के श्रमिकों के बीच उच्च-जोखिम वाले व्यवसायों में प्रवेश 14% कम हो गया है। कंपनियाँ स्नातक कार्यक्रमों, प्रवेश-स्तर विश्लेषक समूहों और जूनियर डेवलपर पाइपलाइनों को कम कर रही हैं, जिससे व्यापक स्तर पर छँटनी के बगैर भी नए कर्मचारियों के लिये "फ्रंट डोर" प्रभावी रूप से बंद हो रहा है।
- AI जोखिम में जनसांख्यिकी असमानताएँ: सर्वाधिक AI-जोखिम वाले व्यवसायों में श्रमिक विशिष्ट जनसांख्यिकी विशेषताओं को प्रदर्शित करते हैं:
- लैंगिक स्तर: सर्वाधिक जोखिम वाले समूह में 54.4% महिलाएँ हैं।
- शिक्षा: स्नातक डिग्री वाले श्रमिकों के अप्रभावित समूह की तुलना में सर्वाधिक जोखिम वाले क्वार्टाइल में होने की संभावना लगभग 4 गुना अधिक है।
- जाति: श्वेत कर्मचारी हाई-एक्सपोज़र ग्रुप का 65.1% हिस्सा बनाते हैं; एशियाई कर्मचारियों के सर्वाधिक जोखिम वाले समूह में होने की संभावना लगभग दोगुनी है।
- आयु: हाई-एक्सपोज़र वाली लेबर की औसत आयु (42.9 वर्ष) अप्रभावित भूमिका वालों की तुलना में थोड़ी अधिक है।
- भारत-विशिष्ट निहितार्थ: भारतीय IT सेवा क्षेत्र गंभीर जोखिमों का सामना कर रहा है, पिछले एक वर्ष में निफ्टी IT इंडेक्स और TCS, विप्रो और इंफोसिस जैसे दिग्गजों के शेयरों में 20% से अधिक की गिरावट आई है।
- एंथ्रोपिक के वर्कप्लेस ऑटोमेशन टूल डेटा प्रोसेसिंग, अनुबंध विश्लेषण, अनुपालन निगरानी और कस्टमर सपोर्ट जैसी सेवाओं को स्वचालित करके सीधे भारतीय IT व्यवसाय मॉडल को चुनौती देते हैं।
- भारत संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करता है, जिसमें गणितीय एवं वैज्ञानिक कौशल की कमी और अमेरिका तथा चीन की तुलना में कम अनुसंधान एवं विकास (R&D) संबंधी व्यय शामिल है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस/कृत्रिम बुद्धिमत्ता रोज़गार के लिये कैसे खतरा उत्पन्न कर रहा है?
- नियमित और दोहराव वाले कार्यों का स्वचालन: AI-संचालित सिस्टम, जिनमें रोबोट, ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन और प्रोसेस ऑटोमेशन सॉफ्टवेयर शामिल हैं, मनुष्यों की तुलना में अधिक स्पीड, सटीकता और स्थिरता के साथ मानकीकृत कार्यों को अंजाम देते हैं। यह असेंबली लाइनों, डेटा एंट्री और बुनियादी प्रसंस्करण भूमिकाओं में श्रमिकों को समाप्त करता है जहाँ कार्यों में जटिल निर्णय क्षमता का अभाव है। उदाहरण के लिये, ओला इलेक्ट्रिक ने AI टूल्स के साथ संचालन को सुव्यवस्थित करने के बाद 1,000 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया।
- कस्टमर सर्विस में मनुष्यों का प्रतिस्थापन: जनरेटिव एआई चैटबॉट और वर्चुअल एजेंट स्वायत्त रूप से बड़ी संख्या में प्रश्नों, शिकायतों और ट्रांजेक्शन को सँभालते हैं, जिससे ह्यूमन कॉल-सेंटर स्टाफ की आवश्यकता कम या समाप्त हो जाती है। उदाहरण के लिये, लाइमचैट जैसे स्टार्टअप ग्राहकों को मासिक रूप से 10,000 प्रश्नों का जवाब देने के लिये आवश्यक श्रमिकों की संख्या में 80% की कटौती करने में सक्षम बनाते हैं।
- वेश-स्तरीय तकनीकी कौशल की मांग में कमी: AI कोडिंग असिस्टेंट (जैसे– GitHub कोपायलट) और ऑटोमेटेड टेस्टिंग टूल जूनियर डेवलपर्स की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से सॉफ्टवेयर कोड प्रोड्यूस, डीबग को तैयार करते हैं, जिससे प्रवेश-स्तर और मध्य-स्तरीय प्रोग्रामिंग की मांग कम हो रही है। यह रोज़गार बाज़ार में एक "ऑवरग्लास इफेक्ट" उत्पन्न करता है, अर्थात वरिष्ठ विशेषज्ञों की उच्च मांग लेकिन मध्य-स्तर और प्रवेश-स्तर के पदों का कम होना। उदाहरण के लिये IT क्षेत्र में वर्ष 2024 में 50,000 से अधिक नौकरियों में कटौती हुई, जिसका मुख्य रूप से प्रवेश-स्तर के प्रोग्रामर प्रभावित हुए।
- रचनात्मक कार्य का अवमूल्यन: क्रिएटिव फ्रीलांसर (ग्राफिक डिज़ाइनर, कंटेंट राइटर) जो लोगो या ब्लॉग पोस्ट बनाकर कमाते हैं, अब ग्राहकों को नगण्य लागत पर विकल्प उत्पन्न करने के लिये AI टूल (DALL-E, मिडजर्नी) का उपयोग करते हुए देखते हैं। मानव की भूमिका मूल कार्य को करने के बजाय AI आउटपुट को संपादित करने तक सीमित हो गई है।
भारत के श्रम बल को AI-अनुकूल बनाने के लिये सरकार द्वारा उठाए गए कदम
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव के विरुद्ध रोज़गार को अनुकूल बनाने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- शिक्षा में क्रांति लाना: गणित और सामाजिक अध्ययन के साथ डेटा, एल्गोरिद्म और नैतिकता की अवधारणाओं को एकीकृत करके स्कूलों में बुनियादी स्तर पर AI साक्षरता को शामिल करना।
- राष्ट्रीय स्तर पर कौशल विकास कार्यक्रम बनाना: ‘भविष्य के कौशल’ नामक एक कर क्रेडिट को वित्त पोषित करना, जो व्यवसायों को AI से संबंधित क्षेत्रों, जैसे– त्वरित इंजीनियरिंग, डेटा एनोटेशन और रोबोटिक्स रखरखाव में कर्मचारियों के कौशल को बढ़ाने के लिये कर लाभ प्रदान करना।
- कार्यस्थल पर ‘सहयोगी रोबोटिक्स’ (कोबोटिक्स) का उपयोग: कार्यस्थल में पूर्ण स्वचालन की बजाय सहयोगी रोबोटिक्स (कोबोटिक्स) को अपनाना चाहिये, जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) मानव कर्मचारियों को सहायता प्रदान करती है। उदाहरण के लिये, कॉल सेंटर एजेंटों को AI उपकरण प्रदान किये जा सकते हैं, जो भावनात्मक स्वर का विश्लेषण कर सकें और वास्तविक समय में समाधान सुझा सकें।
- शिक्षुता अर्थव्यवस्था की रक्षा करना: IT क्षेत्र में ऐसे आनुवांशिक वातावरण स्थापित करना, जहाँ कनिष्ठ कर्मचारी उत्पादकता बढ़ाने के लिये AI का उपयोग करना, लेकिन नवाचार और मूल्यवर्द्धन के आधार पर उनका मूल्यांकन किया जाए, जिससे ‘कौशल में कमी के खतरे’ का मुकाबला किया जा सके।
- MSME के लिये साइबर-अनुकूलता सुनिश्चित करना: रोज़गार के नुकसान का कारण बनने वाली बौद्धिक संपदा की चोरी को रोकने के लिये, हैदराबाद में फार्मा या सूरत में कपड़ा जैसे MSME समूहों को रियायती ‘AI फायरवॉल एज़ ए सर्विस’ प्रदान की जानी चाहिये।
- पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना: सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 को प्रभावी ढंग से लागू करके, यह गारंटी दी जानी चाहिये कि गिग वर्कर्स का सामाजिक सुरक्षा योगदान उनके सभी प्लेटफॉर्मों पर उनके साथ बना रहे। इससे यह सुनिश्चित होगा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के कारण प्रति-कार्य मज़दूरी का अवमूल्यन होने पर भी, वे पेंशन और स्वास्थ्य बीमा जैसे लाभ प्राप्त कर सकें।
निष्कर्ष:
एंथ्रोपिक (Anthropic) श्रम बाज़ार अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि किस प्रकार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) रोज़गार के प्रारूप को पुनर्गठित कर रहे हैं, जो विशेष रूप से ज्ञान-आधारित और प्रवेश-स्तर की भूमिकाओं को प्रभावित कर रहे हैं। हालाँकि AI को अपनाना अभी भी आंशिक है, लेकिन इसके तीव्र विस्तार के कारण कौशल विकास, शिक्षा सुधार और AI-मानव सहयोग मॉडल में तत्काल निवेश की आवश्यकता है, ताकि रोज़गार सुगमता और समावेशी आर्थिक विकास सुनिश्चित किया जा सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. उन विभिन्न तंत्रों की चर्चा कीजिये जिनके माध्यम से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) रोज़गार के लिये खतरा उत्पन्न करता है। प्रासंगिक भारत-विशिष्ट उदाहरणों के साथ अपने उत्तर की पुष्टि कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. कौन-से क्षेत्र AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) से सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं?
कंप्यूटर प्रोग्रामिंग, वित्त, व्यवसाय प्रबंधन, कानूनी सेवाएँ, इंजीनियरिंग और कार्यालय प्रशासन जैसे क्षेत्र AI के प्रभाव के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं, क्योंकि इनकी प्रकृति कार्य-आधारित और ज्ञान-गहन होती है।
2. एंट्री-लेवल नौकरियाँ AI के प्रति विशेष रूप से अधिक संवेदनशील क्यों हैं?
AI कोडिंग टूल्स, चैटबॉट्स और ऑटोमेशन सिस्टम नियमित तकनीकी कार्यों को कर सकते हैं, जिससे जूनियर डेवलपर्स, विश्लेषकों और ग्रेजुएट ट्रेनीज़ की आवश्यकता कम हो सकती है।
3. कुछ क्षेत्र AI के प्रभाव से अपेक्षाकृत कम प्रभावित क्यों होते हैं?
निर्माण, कृषि, सुरक्षा सेवाओं और व्यक्तिगत देखभाल से जुड़ी नौकरियों में शारीरिक कार्य, परिस्थिति के अनुसार निर्णय और मानवीय संपर्क की आवश्यकता होती है, जिससे इन क्षेत्रों में AI द्वारा प्रतिस्थापन की संभावना सीमित रहती है।
4. AI नौकरी बाज़ार में “आवरग्लास इफेक्ट” कैसे उत्पन्न करता है?
AI ‘आवरग्लास प्रभाव’ पैदा करता है, क्योंकि यह वरिष्ठ विशेषज्ञों (ऊपरी स्तर) की मांग बढ़ाता है, जबकि मिड-लेवल और एंट्री-लेवल पदों को कम करता है (सँकरा मध्य भाग), जिससे पारंपरिक कॅरियर प्रगति को खतरा उत्पन्न होता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न: विकास की वर्तमान स्थिति के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य प्रभावी ढंग से कर सकती है? (2020)
1. औद्योगिक इकाइयों में बिजली की खपत को कम करना
2. सार्थक लघु कथाओं और गीत की रचना
3. रोग निदान
4. टेक्स्ट-टू-स्पीच रूपांतरण
5. विद्युत ऊर्जा का वायरलेस संचरण
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1, 2, 3 और 5
(b) केवल 1, 3 और 4
(c) केवल 2, 4 और 5
(d) 1, 2, 3, 4 और 5
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की अवधारणा का परिचय दीजिये। AI क्लिनिकल निदान में कैसे मदद करता है? क्या आप स्वास्थ्य सेवा में AI के उपयोग में व्यक्ति की निजता को कोई खतरा महसूस करते हैं? (2023)
प्रश्न. भारतीय अर्थव्यवस्था में वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप औपचारिक क्षेत्र में रोज़गार कैसे कम हुए? क्या बढ़ती हुई अनौपचारिकता देश के विकास के लिये हानिकारक है? (2016)

