डेली न्यूज़ (10 Apr, 2026)



प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के 11 वर्ष

प्रिलिम्स के लिये: प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY), भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI), सूक्ष्म इकाइयों के लिये क्रेडिट गारंटी फंड (CGFMU), अकाउंट एग्रीगेटर।

मेन्स के लिये: वित्तीय समावेशन और उद्यमिता को बढ़ावा देने में PMMY का महत्त्व, इसकी उपलब्धियाँ और इससे जुड़ी चुनौतियाँ।

स्रोत: पीआईबी

चर्चा की क्यों? 

भारत के प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) की 11वीं वर्षगाँठ पर इसकी सफलता की सराहना की। 

सारांश

  • PMMY द्वारा सूक्ष्म एवं लघु व्यवसायों को बिना किसी गारंटी के ऋण उपलब्ध कराकर वित्तीय समावेशन के दायरे को बढ़ाया गया है। इसने उद्यमिता के साथ-साथ महिला सशक्तीकरण और अर्थव्यवस्था के औपचारिक स्वरूप को सुदृढ़ करने में मदद की है।
  • हालाँकि, ऋण के छोटे आकार, बढ़ते NPA और सीमित मूल्यवर्द्धन जैसी बाधाएँ इसके विस्तार में चुनौतियाँ खड़ी कर रही हैं। 'क्रेडिट-प्लस' मॉडल और तरुण प्लस जैसी पहलों के माध्यम से इन कमियों को दूर कर सतत आर्थिक विकास की राह प्रशस्त की जा सकती है।

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) क्या है?

  • परिचय: 8 अप्रैल, 2015 को शुरू की गई PMMY भारत सरकार की एक प्रमुख योजना है जिसका उद्देश्य नॉन-कॉर्पोरेट, गैर-कृषि सूक्ष्म और लघु उद्यमों (MSE) को बिना किसी गारंटी के संस्थागत ऋण प्रदान करना है।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य स्वरोज़गार को बढ़ावा देना और ज़मीनी स्तर के उद्यमियों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली में लाना है।
    • यह योजना भारत के वित्तीय समावेशन कार्यक्रम की आधारशिला है, जो तीन स्तंभों पर आधारित है: बैंकिंग सुविधाओं से वंचित लोगों को बैंकिंग सुविधा प्रदान करना, असुरक्षित लोगों को सुरक्षा प्रदान करना और वित्तपोषित न होने वाले लोगों को वित्तपोषित करना।
  • कार्यान्वयन एजेंसी: यह वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग के अधीन कार्य करती है।
  • वित्तपोषण प्रावधान: अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (SCB), क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRB), गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) और सूक्ष्म वित्त संस्थानों (MFI) जैसे सदस्य ऋण देने वाली संस्थाओं (MLI) द्वारा ऋण प्रदान किये जाते हैं।
    • SIDBI की सहायक कंपनी मुद्रा (माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट एंड रिफाइनेंस एजेंसी लिमिटेड) ऋण देने वाली इकाइयों को पुनर्वित्त सहायता प्रदान करती है, किंतु प्रत्यक्ष ऋण प्रदान नहीं करती है।
  • ऋण गारंटी: सूक्ष्म इकाइयों के लिये ऋण गारंटी कोष (CGFMU) PMMY ऋणों के लिये गारंटी कवरेज प्रदान करता है, जिससे ऋण देने वाली संस्थाओं के लिये जोखिम कम हो जाता है।
    • पात्र लाभार्थियों में व्यक्ति, स्वामित्व वाली संस्थाएँ, साझेदार फर्म, निजी और सार्वजनिक लिमिटेड कंपनियाँ और अन्य कानूनी संस्थाएँ शामिल हैं। 
  • मुद्रा कार्ड: यह छोटे उद्यमियों की कार्यशील पूंजी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये एक लचीली, परेशानी मुक्त ऋण सुविधा प्रदान करता है।
    • यह ओवरड्राफ्ट सुविधा वाला RuPay डेबिट कार्ड के रूप में कार्य करता है, जिससे आसान निकासी, भुगतान और किफायती क्रेडिट उपयोग संभव होता है।
  • PMMY के अंतर्गत ऋण श्रेणियाँ:

श्रेणी

ऋण राशि की सीमा

कुल ऋण में हिस्सा

उद्देश्य

शिशु

₹50,000 तक

74%

व्यवसाय शुरू करना (बहुत छोटे पैमाने पर, बुनियादी सेटअप)

किशोर

₹50,000 – ₹5 लाख

24%

प्रारंभिक चरण के व्यवसाय का विस्तार करना (उपकरण खरीदना)

तरुण 

₹5 लाख – ₹10 लाख

2%

स्थापित व्यवसाय को बड़े पैमाने पर ले जाना (उत्पादन बढ़ाना, श्रमिकों को काम पर रखना)

तरुण प्लस

₹10 लाख – ₹20 लाख

0.004%

केंद्रीय बजट 2024–25 में घोषित, यह "बिना वित्तपोषण वालों को वित्तपोषण" के उद्देश्य को सुदृढ़ करता है, जिससे उन सफल व्यवसायों को और विस्तार दिया जा सके जिन्होंने पहले ही अपने तरुण ऋण चुका दिये हैं।

PMMY की प्रमुख उपलब्धियाँ क्या हैं?

  • बड़े पैमाने पर ऋण तक पहुँच: पिछले दशक में इस योजना ने 57 करोड़ से अधिक ऋणों को स्वीकृति प्रदान की है, जो 40.07 लाख करोड़ रुपये से अधिक है।
  • महिला उद्यमिता को बढ़ावा देना: यह योजना नारी शक्ति की एक प्रमुख चालक रही है; महिलाएँ सभी ऋण लाभार्थियों का 67% (दो-तिहाई) हिस्सा हैं।
  • उपेक्षित समुदायों को सशक्त बनाना: PMMY सामाजिक समानता को बढ़ावा देता है, जिसमें 51% से अधिक लाभार्थी अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से संबंधित हैं।
  • औपचारिक अर्थव्यवस्था में संक्रमण: 12 करोड़ से अधिक खाते पहली बार उद्यमी बनने वालों के हैं, जो उन्हें स्थानीय साहूकारों के अनौपचारिक ऋण नेटवर्क से सफलतापूर्वक बाहर निकालकर औपचारिक बैंकिंग प्रणाली में एकीकृत कर रहे हैं।
  • अभूतपूर्व पैमाना: वित्तीय वर्ष 2015-16 में प्रारंभ के पश्चात् यह योजना निरंतर विस्तारित हुई है; वर्ष 2023-24 में यह 6.67 करोड़ ऋणों (5.41 लाख करोड़ रुपये) के साथ अपने उच्चतम स्तर पर पहुँची, तथा मार्च 2026 तक 5.65 लाख करोड़ रुपये की स्वीकृति के साथ इसने सुदृढ़ प्रगति को बनाए रखा है।
  • वर्ष 2047 के लिये विज़न: इन 57.79 करोड़ ऋणों द्वारा प्रदान की गई निरंतर वित्तीय सुरक्षा और विश्वास सीधे सरकार के 2047 तक समावेशी विकास प्राप्त करने और भारत को एक विकसित राष्ट्र (विकसित भारत) में बदलने के लक्ष्य के अनुरूप है।

PMMY से संबंधित चुनौतियाँ क्या हैं?

  • संरचनात्मक विषमता: ऐतिहासिक रूप से 70% से अधिक ऋण 'शिशु' श्रेणी में केंद्रित रहे हैं।
    • यह सूक्ष्म इकाइयों के स्थायी लघु और मध्यम उद्यमों में विकसित होने में विफलता को इंगित करता है, जो भारत के औद्योगिक परिदृश्य में "मिसिंग मिडिल" की समस्या को बनाए रखता है और उच्च आर्थिक गतिशीलता को स्थिर करता है।
  • ऋण-अवशोषण क्षमता घाटा: यह योजना पूंजी निवेश को प्राथमिकता देती है लेकिन ऋणकर्त्ता की ऋण-अवशोषण क्षमता को अनदेखा करती है।
    • समवर्ती क्षमता निर्माण (वित्तीय साक्षरता, व्यावसायिक कौशल, बाज़ार पहुँच) के बगैर ऋणकर्त्ता प्रायः धन का उत्पादक रूप से उपयोग करने में विफल होते हैं, जिससे सूक्ष्म-उद्यम विफलता दर उच्च होती है।
  • क्षेत्रीय असंतुलन और निम्न मूल्यवर्द्धन: MUDRA ऋण मुख्य रूप से व्यापार और सेवा क्षेत्रों में केंद्रित हैं।
    • यह संरचनात्मक पूर्वाग्रह रोज़गार गुणक प्रभाव को सीमित करता है और सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF) में न्यूनतम योगदान देता है।
  • बढ़ती गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPA): ऋण की संपार्श्विक प्रकृति NPA और ऋण चूक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिये एक चिंता का विषय बनी हुई है।
  • ऋण-प्रतिस्थापन बनाम संपत्ति सृजन: वितरित किये गए ऋण की एक महत्त्वपूर्ण राशि का उपयोग लाभार्थियों द्वारा पूंजीगत व्यय या नवीन उत्पादक संपत्तियों के निर्माण के बजाय अनौपचारिक साहूकारों से मौज़ूदा, उच्च-लागत ऋण को पुनर्वित्त करने के लिये किया जाता है, जिससे योजना का इच्छित आर्थिक प्रभाव कम हो जाता है।

PMMY को कौन-से उपाय मज़बूत कर सकते हैं?

  • नकदी प्रवाह-आधारित ऋण प्रणाली की ओर परिवर्तन: बैंकों को भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI), विशेष रूप से अकाउंट एग्रीगेटर (AA) ढाँचा और GST नेटवर्क (GSTN) का उपयोग करते हुए पारंपरिक, संपार्श्विक ऋण से हटकर गतिशील, नकदी प्रवाह-आधारित क्रेडिट मूल्यांकन की ओर बढ़ना चाहिये।
    • यह व्यवसाय की सेहत की वास्तविक समय निगरानी को संभव बनाता है और NPA के जोखिम को कम करता है।
  • ‘क्रेडिट-प्लस’ दृष्टिकोण अपनाना: नीति को केवल ‘ऋण वितरण’ से आगे बढ़कर समग्र ‘उद्यम विकास’ की दिशा में स्थानांतरित करना चाहिये।
  • सूक्ष्म स्तर पर अंतिम उपयोग की निगरानी: ऋण देने वाली संस्थाओं को डेटा विश्लेषण और AI-आधारित प्रारंभिक चेतावनी संकेत (EWS) का उपयोग करके वितरित धन के अंतिम उपयोग पर निगरानी रखनी चाहिये।
    • यह व्यावसायिक ऋणों के व्यक्तिगत उपभोग की ओर विचलन को रोकने में मदद करेगा तथा खातों के NPA बनने से पहले ही वित्तीय तनाव की पहचान संभव बनाएगा।
  • सूक्ष्म विनिर्माण को प्रोत्साहन देना:मेक इन इंडिया’ और जनसांख्यिकीय लाभांश के उपयोग जैसे व्यापक लक्ष्यों के अनुरूप मुद्रा योजना को संरेखित करने के लिये सूक्ष्म विनिर्माण इकाइयों हेतु विशेष प्रोत्साहन (जैसे– अधिक ब्याज अनुदान या प्राथमिकता गारंटी कवरेज) स्पष्ट रूप से शुरू किये जाने चाहिये।
  • NBFC और MFI एकीकरण को सुदृढ़ करना: पारंपरिक वाणिज्यिक बैंकों के पास अक्सर अनौपचारिक क्षेत्र के लिये उपयुक्त अंडरराइटिंग मॉडल (ऋण जोखिम मूल्यांकन मॉडल) का अभाव होता है।

निष्कर्ष

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना ने बिना वित्तपोषण वाले क्षेत्र तक पहुँच का विस्तार किया है, जिससे उद्यमिता, आय और सशक्तीकरण (3E) को बढ़ावा मिला है। ‘क्रेडिट-प्लस’ दृष्टिकोण तथा ‘तरुण प्लस’ जैसी पहलों के माध्यम से यह छोटे उद्यमों को विस्तार करने एवं रोज़गार सृजित करने में सक्षम बनाती है। समग्र रूप से यह वित्तीय समावेशन, समावेशी विकास व आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मज़बूत करती है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भारत में वित्तीय समावेशन और महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) के महत्त्व पर चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) क्या है?
    यह एक प्रमुख योजना (2015) है, जो गैर-कॉर्पोरेट, गैर-कृषि सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को बिना ज़मानत ऋण प्रदान करती है।
  2. PMMY के अंतर्गत ऋण की श्रेणियाँ कौन-सी हैं?
    शिशु (₹50,000 तक), किशोर (₹50,000-₹5 लाख), तरुण (₹5-10 लाख) और तरुण प्लस (₹10-20 लाख)।
  3. मुद्रा लिमिटेड की क्या भूमिका है?
    यह ऋण देने वाली संस्थाओं को पुनर्वित्त सहायता प्रदान करती है, लेकिन सीधे उधारकर्त्ताओं को ऋण नहीं देती।
  4. PMMY का क्या महत्त्व है?
    यह वित्तीय समावेशन, महिला उद्यमिता (67% लाभार्थी) और अनौपचारिक क्षेत्र के औपचारिकीकरण को बढ़ावा देती है।
  5. PMMY की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
    छोटे ऋणों का प्रभुत्व, बढ़ते NPA, विनिर्माण क्षेत्र का कम हिस्सा और कमज़ोर क्रेडिट अवशोषण क्षमता।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स

प्रश्न. प्रधानमंत्री MUDRA योजना का लक्ष्य क्या है?  (2016) 

(a) लघु उद्यमियों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली में लाना

(b) निर्धन कृषकों को विशेष फसलों की कृषि के लिये ऋण उपलब्ध कराना

(c) वृद्ध एवं निस्सहाय लोगों को पेंशन देना

(d) कौशल विकास एवं रोज़गार सृजन में लगे स्वयंसेवी संगठनों का निधीयन (फंडिंग) करना

उत्तर: (a)


अमेरिका-ईरान सीज़फायर में मध्यस्थता

प्रिलिम्स के लिये: 2026 पश्चिम एशिया संकट, मध्यस्थता, होर्मुज़ जलडमरूमध्य, स्थायी मध्यस्थता न्यायालय, संयुक्त राष्ट्र

मेन्स के लिये: भारत के लिये अमेरिका-ईरान सीज़फायर का महत्त्व, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में मध्यस्थता की प्रासंगिकता, अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता के प्रति भारत का दृष्टिकोण

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों? 

अमेरिका-ईरान ने वर्ष 2026 के पश्चिम एशियाई संकट को लेकर दो सप्ताह के सीज़फायर पर सहमति जताई है, जिसे पाकिस्तान की मध्यस्थता के माध्यम से संभव बनाया गया। इस समझौते ने संघर्ष को कम किया है एवं इससे  होर्मुज़ जलडमरूमध्य को पुनः खोलने का मार्ग प्रशस्त हुआ है, साथ ही इसने जटिल वैश्विक संघर्षों के समाधान में मध्यस्थता के महत्त्व को भी रेखांकित किया है।

सारांश

  • अमेरिका-ईरान सीज़फायर (इस्लामाबाद समझौता) ने न केवल वैश्विक संघर्ष को कम किया बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य को पुनः खोलने में मदद की है। यह प्रयास भारत के लिये संभावित ऊर्जा एवं आर्थिक संकट को टालते हुए उसके प्रवासी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
  • मध्यस्थता ने तनाव बढ़ने की प्रक्रिया को रोककर, वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाकर और संवाद को संभव बनाकर एक प्रमुख संघर्ष-समाधान उपकरण के रूप में कार्य किया, हालाँकि संप्रभुता से जुड़ी चिंताएँ तथा क्रियान्वयन की कमी जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं।

भारत के लिये अमेरिका-ईरान सीज़फायर का क्या महत्त्व है?

  • अमेरिका-ईरान सीज़फायर: यह समझौता, जिसे अस्थायी रूप से ‘इस्लामाबाद समझौता’ कहा जा रहा है, एक महत्त्वपूर्ण प्रगति का संकेत देता है, जिसमें कई सप्ताह के तीव्र सैन्य तनाव के बाद अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच दो सप्ताह का सीज़फायर हुआ है।
    • पाकिस्तान की मध्यस्थता में यह समझौता विभिन्न प्रस्तावों के बीच विकसित हुआ, जिसमें अमेरिका ने 15 बिंदुओं की योजना प्रस्तुत की, जबकि ईरान ने प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय तनाव में कमी पर केंद्रित 10 बिंदुओं का ढाँचा प्रस्तावित किया। 
    • इसके मूल में एक रणनीतिक आर्थिक समझौता निहित है: अमेरिका ने सैन्य हमलों को रोक दिया, जिसके बदले में ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोल दिया, जिससे बाधित वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार प्रवाह को बहाल करने में मदद मिली।
  • भारत के लिये महत्त्व:
    • गंभीर ऊर्जा संकट से बचाव: भारत खाड़ी क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भर है और अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 60% वहीं से आयात करता है। ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करने से यह आपूर्ति मार्ग लगभग अवरुद्ध हो गया था।
      • होर्मुज़ जलडमरूमध्य के पुनः खुलने से गंभीर ऊर्जा कमी, ईंधन की बढ़ती कीमतों और व्यापक आर्थिक मंदी को रोकने में मदद मिलती है।
    • प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और प्रेषण: खाड़ी क्षेत्र में लगभग 1 करोड़ (10 मिलियन) भारतीय रहते हैं, जो विश्व में भारतीय प्रवासियों का सबसे बड़ा समूह बनाता है।
      • ये भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं और देश में आने वाले कुल प्रेषण का लगभग 40% योगदान देते हैं।
      • लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष इनके जीवन के लिये गंभीर खतरा बन सकता था (इस संघर्ष में पहले ही आठ भारतीयों की मृत्यु हो चुकी है) एवं भारत को एक विशाल निकासी अभियान चलाने हेतु मजबूर कर सकता था।

2026 के पश्चिम एशिया संघर्ष में मध्यस्थता की क्या भूमिका है?

  • अंतिम “सर्किट ब्रेकर” के रूप में कार्य: जब सशस्त्र राष्ट्र तनाव के बढ़ते चक्र में उलझ जाते हैं, तो कोई भी पहले पीछे हटने को तैयार नहीं होता। ऐसे में मध्यस्थता आवश्यक विराम (दो सप्ताह का सीज़फायर) प्रदान करती है।
  • वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने में सहायक: होर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व की कुल ऊर्जा आपूर्ति 20 % के लिये एक प्रमुख संकीर्ण मार्ग है।
    • होर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व की कुल ऊर्जा आपूर्ति के पाँचवें हिस्से (लगभग 20%) के लिये एक प्रमुख 'चोक पॉइंट' (Choke Point) यानी सबसे महत्त्वपूर्ण संकीर्ण मार्ग है।
  • मध्यस्थता वैश्विक स्तर पर बड़े तेल संकट को रोकने में सहायक होती है, जो भारत जैसी ऊर्जा-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता था।
  • एक गतिरोधग्रस्त संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को दरकिनार करना: वर्तमान दौर में वैश्विक शांति के पारंपरिक तंत्र (जैसे– संयुक्त राष्ट्र) अक्सर महाशक्तियों के वीटो के कारण ठप हो जाते हैं।
    • अनौपचारिक और त्वरित मध्यस्थता वास्तविक समय में संघर्ष-समाधान के लिये एकमात्र प्रभावी और कार्यशील माध्यम के रूप में उभर रही है।
  • ‘मध्य शक्तियों’ को शांति-निर्माता के रूप में उभारना: यह संकट वैश्विक व्यवस्था में एक बड़े बदलाव को दर्शाता है।
    • शक्तियाँ अब एकमात्र शांति मध्यस्थ नहीं रह गई हैं। पाकिस्तान और संभावित रूप से चीन या खाड़ी देशों जैसी मध्यम शक्तियाँ अत्यधिक प्रासंगिक हैं क्योंकि वे दोनों पक्षों के साथ अपने अद्वितीय संव्यवहारात्मक, आर्थिक और सैन्य संबंधों का लाभ उठाकर संवाद शुरू कर सकती हैं।
  • "फेस-सेविंग" एग्ज़िट प्रदान करता है: अति-राष्ट्रवादी राजनीतिक माहौल में प्रत्यक्ष आत्मसमर्पण राजनीतिक आत्महत्या के समान है। मध्यस्थता ने अमेरिकी राष्ट्रपति और ईरानी सर्वोच्च नेता दोनों को सीज़फायर को "राजनयिक जीत" के रूप में प्रस्तुत करने की अनुमति दी।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में मध्यस्थता क्या है?

  • मध्यस्थता: यह विवाद समाधान की एक शांतिपूर्ण विधि है, जिसमें एक तीसरा पक्ष विरोधी पक्षों के बीच संवाद की सुविधा प्रदान करता है। इसका उद्देश्य तनाव को कम करना और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समझौतों तक पहुँचने में मदद करना है।
    • लगभग 4000 वर्ष पुराने संबंधों के साथ मध्यस्थता कूटनीति और वैश्विक शासन में एक केंद्रीय उपकरण बनी हुई है।
  • मध्यस्थता के सैद्धांतिक आधार:
    • आकस्मिकता मॉडल: जैकब बर्कोविच द्वारा विकसित यह मॉडल तर्क देता है कि सफल मध्यस्थता विरोधी पक्षकारों की प्रकृति, विवाद की विशेषताओं और मध्यस्थ की विश्वसनीयता, बुद्धिमत्ता और धैर्य पर निर्भर करती है।
    • थ्योरी ऑफ रिपनेस: आई. विलियम ज़ार्टमैन द्वारा प्रस्तुत यह सिद्धांत मानता है कि मध्यस्थता तभी कार्य करती है, जब कोई संघर्ष-समाधान के लिये "रिपनेस" हो, विशेष रूप से जब दोनों पक्ष "पारस्परिक रूप से हानिकारक गतिरोध" तक पहुँच जाते हैं, जहाँ संघर्ष जारी रखने की कीमत इसे समाप्त करने से अधिक होती है (उदाहरण के लिये ज़िंबाब्वे की स्वतंत्रता के लिये वर्ष 1979 का लैंकेस्टर हाउस समझौता)।
    • पक्षपातपूर्ण मध्यस्थता: यह अवधारणा इस विचार को चुनौती देती है कि मध्यस्थों को पूरी तरह से तटस्थ होना चाहिये। प्रायः मध्यस्थ की शक्ति, आर्थिक प्रभाव और प्रोत्साहन देने या दबाव डालने की क्षमता सख्त तटस्थता से अधिक महत्त्वपूर्ण हो।
  • मध्यस्थता के लिये अंतर्राष्ट्रीय कानूनी ढाँचा:
    • हेग कन्वेंशन (1899 और 1907): इन मूलभूत संधियों ने विवादों में तीसरे पक्ष की भागीदारी को वैधता प्रदान की और स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA) की स्थापना की, जिसने आधुनिक शांतिपूर्ण संघर्ष-समाधान की नींव रखी।
    • संयुक्त राष्ट्र चार्टर (अध्याय VI, अनुच्छेद 33): संयुक्त राष्ट्र स्पष्ट रूप से अनिवार्य करता है कि विरोधी पक्षों को पहले बातचीत, सुलह और मध्यस्थता सहित शांतिपूर्ण साधनों के माध्यम से समाधान तलाशना चाहिये।
      • संयुक्त राष्ट्र महासभा प्रस्ताव 65/283 (2011) और 2012 के लिये UN गाइडेंस फॉर इफेक्टिव मेडिएशन समावेशिता, सहमति, निष्पक्षता और राष्ट्रीय स्वामित्व जैसे प्रमुख सिद्धांतों की रूपरेखा तैयार करते हैं।
      • संयुक्त राष्ट्र प्रायः अपने शांति स्थापना अभियानों (1948 के बाद से 70 से अधिक मिशन शुरू किये गए हैं) के साथ मध्यस्थता पहलों को जोड़ता है ताकि वार्त्ता आगे बढ़ने के दौरान स्थिरता बनी रहे।
  • सफल मध्यस्थता के उदाहरण:
    • गुप्त वार्त्ता मार्ग खोलना: नॉर्वे ने इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच सीक्रेट ओस्लो नामक गुप्त वार्त्ता को सफलतापूर्वक सुविधाजनक बनाया, जिससे संचार के उन मार्गों को खोला गया जो खुले संघर्ष के दौरान नही हो रहे थे।
    • राजनीतिक स्थान का निर्माण: अमेरिका मिस्र और इज़रायल को वर्ष 1978 में कैंप डेविड समझौतों पर हस्ताक्षर करने के लिये एक साथ लाया।
    • समय और सूचना का प्रबंधन: बोस्निया में अमेरिकी नेतृत्व वाले डेटन समझौते (1995) ने युद्ध समाप्त करने के लिये नियंत्रित वार्त्ता का उपयोग किया।
    • विश्वास निर्माण और सत्ता-साझाकरण: पूर्व अमेरिकी सीनेटर जॉर्ज मिशेल ने उत्तरी आयरलैंड में गुड फ्राइडे अकॉर्ड (वर्ष 1998) को सुरक्षित करने के लिये महत्त्वपूर्ण विश्वास का निर्माण किया, जबकि केन्या में कोफी अन्नान के हस्तक्षेप (2008) ने सत्ता-साझाकरण समझौते के माध्यम से भविष्य में होने वाली अस्थिरता को रोका।
    • धारणाओं को पुनः आकार देना: कोलंबियाई शांति प्रक्रिया (वर्ष 2016) ने सफलतापूर्वक फोकस को सैन्य दृष्टिकोण से राजनीतिक समाधानों की ओर स्थानांतरित कर दिया।

अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता के प्रति भारत का दृष्टिकोण क्या है?

  • प्राथमिकता के रूप में द्विपक्षीयता: भारत कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों के अंतर्राष्ट्रीयकरण को रोकने के लिये पड़ोसी विवादों में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को दृढ़ता से अस्वीकार करता है, जो शिमला समझौते (1972) और लाहौर घोषणा (1999) द्वारा स्थापित द्विपक्षीय ढाँचे का सख्ती से पालन करता है।
  • भारत द्वारा चयनात्मक मध्यस्थता: भारत मध्यस्थता के लिये एक व्यावहारिक दृष्टिकोण का पालन करता है। यह संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व वाली या बहुपक्षीय मध्यस्थता का समर्थन करता है और पश्चिम एशिया जैसे व्यापक वैश्विक संकटों में संवाद एवं कूटनीति को बढ़ावा देता है।
    • साथ ही, भारत सामान्य अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों (जहाँ मध्यस्थता स्वीकार्य हो सकती है) और राष्ट्रीय संप्रभुता के मूल मुद्दों (जहाँ किसी भी बाहरी मध्यस्थता को दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया जाता है) के बीच स्पष्ट रूप से अंतर करता है।
  • रणनीतिक स्वायत्तता: भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति शक्ति गुटों के साथ इसके संरेखण को निरुद्ध करती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि वह स्वतंत्र राजनयिक संप्रभुता एवं नीतिगत अनुकूलन बनाए रख सकता है।
  • भारत की भूमिका एक सुगमकर्त्ता के रूप में: अपनी बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा तथा विभाजित पक्षों (जैसे– ईरान और इज़रायल) के साथ संतुलित संबंधों का लाभ प्राप्त करते हुए भारत एक आक्रामक मध्यस्थ की बजाय एक निष्पक्ष संवाद-सुगमकर्त्ता के रूप में कार्य करना अधिक पसंद करता है।
  • ऐतिहासिक उदाहरण: भारत ने कोरियाई युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र में सीज़फायर का समर्थन करके, न्यूट्रल नेशंस रिपैट्रिएशन कमीशन (NNRC) की अध्यक्षता करके तथा कस्टोडियन फोर्स ऑफ इंडिया (CFI) की तैनाती करके अपनी वैश्विक मध्यस्थता की विश्वसनीयता सफलतापूर्वक स्थापित की।
    • भारत की विदेश नीति निरंतर सैन्य उग्रता के बजाय कूटनीतिक संवाद तथा संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के पूर्ण सम्मान को प्राथमिकता देती है।

अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता संबंधी क्या चिंताएँ हैं?

  • संप्रभुता संबंधी चिंताएँ: राज्य प्रायः तृतीय पक्ष के हस्तक्षेप का विरोध करते हैं, क्योंकि वे मध्यस्थता को अपने आंतरिक या द्विपक्षीय मामलों में दखल तथा राष्ट्रीय स्वायत्तता के लिये जोखिम के रूप में देखते हैं।
  • विश्वास की कमी एवं मध्यस्थ का पक्षपात: मध्यस्थता की सफलता निष्पक्षता पर निर्भर करती है किंतु मध्यस्थ के अपने भू-राजनीतिक या रणनीतिक हित हो सकते हैं, जिससे पक्षों के बीच अविश्वास उत्पन्न हो जाता है।
  • प्रवर्तन की कमी: मध्यस्थता से हुए समझौते स्वैच्छिक अनुपालन पर आधारित होते हैं और इनके लिये कोई बाध्यकारी प्रवर्तन तंत्र नहीं होता, जिससे वे अप्रभावी और पलटने योग्य बने रहते हैं।
  • शक्ति असमानता: पक्षों के बीच शक्ति का असंतुलन परिणामों को प्रभावित कर सकता है, जिससे शक्तिशाली राज्य कमज़ोर पक्षों पर अनुचित शर्तें आरोपित कर सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप स्थायी शांति के बजाय केवल अस्थायी समाधान ही प्राप्त होता है।
  • भू-राजनीतिक जटिलता: अनेक पक्षों, महाशक्तियों, प्रतिनिधि समूहों (प्रॉक्सी) और गैर-राजकीय अभिकर्त्ताओं की भागीदारी के कारण सहमति स्थापित करना कठिन हो जाता है और संघर्ष का समय बढ़ सकता है।
  • विलंब रणनीति के रूप में मध्यस्थता: पक्ष कभी-कभी मध्यस्थता का उपयोग वास्तविक शांति की स्थापना के बजाय समय-प्राप्ति के साधन के रूप में करते हैं, ताकि वे पुनर्गठन, पुनः शस्त्रीकरण या बाहरी दबाव को कम कर सकें।

अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता को सुदृढ़ करने हेतु क्या उपाय किये जा सकते हैं?

  • बहुपक्षीय ढाँचों को सुदृढ़ करना: संयुक्त राष्ट्र तथा क्षेत्रीय संगठनों जैसे आसियान और अफ्रीकी संघ के माध्यम से मध्यस्थता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, ताकि अधिक वैधता तथा स्थानीय संदर्भ की बेहतर समझ सुनिश्चित की जा सके।
  • बहु-स्तरीय कूटनीति को बढ़ावा देना: आधिकारिक (Track I) वार्त्ताओं को अनौपचारिक संवाद (Track II) तथा ज़मीनी स्तर के प्रयासों (Track III) के साथ संयोजित किया जाना चाहिये, ताकि विभिन्न स्तरों पर विश्वास का निर्माण हो सके।
  • समावेशिता का सुनिश्चितीकरण: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1325 के अनुरूप महिलाओं, युवाओं तथा हाशिये पर स्थित समूहों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिये, ताकि अधिक स्थायी एवं प्रभावी शांति-परिणाम प्राप्त किये जा सकें।
  • अनुपालन हेतु प्रोत्साहन सृजित करना: समझौतों को पुनर्निर्माण सहायता, ऋण राहत तथा चरणबद्ध प्रतिबंधों में ढील जैसे प्रोत्साहनों से जोड़ना चाहिये, ताकि उनके प्रभावी अनुपालन को सुनिश्चित किया जा सके।
  • मध्यस्थता का व्यवसायीकरण: वार्त्ता कौशल, अंतर्राष्ट्रीय कानून और सांस्कृतिक संवेदनशीलता में विशेषज्ञता रखने वाले प्रशिक्षित मध्यस्थों का विकास किया जाना चाहिये, ताकि मध्यस्थता की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को बढ़ाया जा सके।
  • मूल कारणों का समाधान करना: केवल सीज़फायर तक सीमित रहने के बजाय असमानता, संसाधनों को लेकर विवाद तथा ऐतिहासिक शिकायतों जैसे मूलभूत कारणों का समाधान किया जाना चाहिये जिससे दीर्घकालिक और स्थायी शांति सुनिश्चित की जा सके।

निष्कर्ष


वर्ष 2026 के पश्चिम एशिया संकट में मध्यस्थता एक महत्त्वपूर्ण ‘सर्किट ब्रेकर’ के रूप में कार्य कर रही है। यह एक जोखिमपूर्ण सैन्य संघर्ष को कूटनीतिक प्रक्रिया में परिवर्तित कर रही है, जहाँ मिसाइलों के आदान-प्रदान के स्थान पर प्रस्तावों का विनिमय हो रहा है। यद्यपि यह स्थायी शांति की गारंटी नहीं देती, फिर भी यह एक तीव्र एवं तात्कालिक संकट को एक प्रबंधनीय राजनीतिक वार्त्ता में सफलतापूर्वक परिवर्तित कर देती है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:
प्रश्न: “बहुध्रुवीय विश्व में संघर्ष समाधान के लिये मध्यस्थता सबसे प्रभावी साधन के रूप में उभर रही है।” चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में मध्यस्थता क्या है?

मध्यस्थता एक शांतिपूर्ण विवाद समाधान की प्रक्रिया है, जिसमें एक तृतीय पक्ष संवाद को सुगम बनाकर विवादित पक्षों को समझौते तक पहुँचने में सहायता करता है।

2. संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 33 क्या है?

यह अनुच्छेद विवादों के शांतिपूर्ण समाधान को अनिवार्य करता है, जिसमें वार्त्ता, मध्यस्थता, पंचाट (Arbitration) तथा न्यायिक निपटान जैसे उपाय शामिल हैं।

3. थ्योरी ऑफ रिपनेस (Theory of Ripeness) क्या है?

इसे आई. विलियम ज़ार्टमैन  द्वारा प्रतिपादित किया गया था। इसके अनुसार, मध्यस्थता तब प्रभावी होती है जब पक्ष ‘परस्पर पीड़ादायक गतिरोध’ (Mutually Hurting Stalemate) की स्थिति में पहुँच जाते हैं।

4. होर्मुज़ जलडमरूमध्य क्यों महत्त्वपूर्ण है?

यह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामरिक मार्ग (Chokepoint) है, जिसके माध्यम से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का लगभग पाँचवा भाग गुज़रता है, जिससे यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन जाता है।

5. पश्चिम एशिया संकट में मध्यस्थता भारत के लिये कैसे लाभकारी है?

यह ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता सुनिश्चित करती है, भारतीय प्रवासी समुदाय की सुरक्षा करती है तथा आर्थिक व्यवधान को रोकने में सहायक होती है।