डेली न्यूज़ (07 May, 2020)



भारतीय फोटो जर्नलिस्टों ने पुलित्ज़र पुरस्कार जीता

प्रीलिम्स के लिये:

पुलित्ज़र पुरस्कार

मेन्स के लिये:

पुलित्ज़र पुरस्कार

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘कोलंबिया विश्वविद्यालय’ द्वारा वर्ष 2020 के पुलित्ज़र पुरस्कार (Pulitzer Prize) विजेताओं की घोषणा की गई।

मुख्य बिंदु: 

  • जम्मू और कश्मीर के ‘एसोसिएटेड प्रेस’ (Associated Press- AP) के तीन फ़ोटोग्राफ़रों को फीचर फोटोग्राफी (Feature Photography) श्रेणी में पुरस्कार विजेता घोषित किया। जबकि अनुश्री फड़नवीस (Anushree Fadnavis) और अदनान आबिदी (Adnan Abidi) ने ‘ब्रेकिंग न्यूज़ फोटोग्राफी’ श्रेणी में पुरस्कार जीता है। 
  • एसोसिएटेड प्रेस के फोटोग्राफर चन्नी आनंद (Channi Anand), मुख्तार खान (Mukhtar Khan) और डार यासीन (Dar Yasin) ने जम्मू और कश्मीर के विशेष राज्य का का दर्जा वापिस लिये जाने के बाद कश्मीर में होने वाले विरोध-प्रदर्शनों के बीच मीडिया कवरेज के लिये ‘फीचर फोटोग्राफी’ पुरस्कार जीता है।

पुलित्ज़र पुरस्कार (Pulitzer Prize):

  • पृष्ठभूमि:
    • पुलित्ज़र पुरस्कार को पत्रकारिता के क्षेत्र में अमेरिका का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान माना जाता है।
    • इस पुरस्कार की शुरुआत वर्ष 1917 में की गई थी, जिसे कोलंबिया विश्वविद्यालय और ‘पुलित्ज़र पुरस्कार बोर्ड’ द्वारा प्रशासित किया जाता है।
      • 'पुलित्ज़र पुरस्कार बोर्ड' का निर्माण कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त न्यायाधीशों द्वारा होता है। 
    • यह पुरस्कार प्रसिद्ध समाचार पत्र प्रकाशक जोसेफ पुलित्ज़र के सम्मान में दिया जाता है। जोसेफ पुलित्ज़र ने कोलंबिया विश्वविद्यालय में पत्रकारिता स्कूल को शुरू करने तथा पुरस्कार की शुरुआत करने के लिये अपनी वसीयत से पैसा दिया था।
  • पुरस्कार राशि:
    • प्रत्येक पुरस्कार विजेता को एक प्रमाण पत्र और 15,000 डॉलर की पुरस्कार राशि प्रदान की जाती है। ‘सार्वजनिक सेवा श्रेणी’ में पुरस्कार विजेता को स्वर्ण पदक दिया जाता है। 
  • पुरस्कार की श्रेणियाँ:
    • यह पुरस्कार कुल 22 श्रेणियों में दिया जाता है। जिसमें पत्रकारिता की 15 श्रेणियों और पुस्तक, नाटक, संगीत आदि की 7 श्रेणियाँ शामिल है। 

पुलित्ज़र पुरस्कार (Pulitzer Prizes):

  • पत्रकारिता में दिये गए अन्य पुरस्कार;

ब्रेकिंग न्यूज रिपोर्टिंग

कोरियर-जर्नल का स्टाफ 

खोजी रिपोर्टिंग

न्यूयॉर्क टाइम्स के ब्रायन एम. रोसेन्थल

व्याख्यात्मक रिपोर्टिंग

वाशिंगटन पोस्ट के कर्मचारी

स्थानीय रिपोर्टिंग

बाल्टीमोर सन के कर्मचारी

नेशनल रिपोर्टिंग

सिएटल टाइम्स के कुछ पत्रकारों को 

अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टिंग

न्यूयॉर्क टाइम्स के कर्मचारी

फीचर लेखन

न्यूयॉर्क के बेन ताउब

समीक्षा

न्यूयॉर्क टाइम्स के निकोल हन्नाह-जोन्स

आलोचना

लॉस एंजिल्स टाइम्स के क्रिस्टोफर नाइट

संपादकीय लेखन

फिलिस्तीन के जेफरी गेरिट, हेराल्ड प्रेस

संपादकीय कार्टूनिंग

बैरी ब्लिट, द न्यू यॉर्कर

ऑडियो रिपोर्टिंग

लॉस एंजिल्स टाइम्स, अमेरिकी लाइफ तथा वाइस न्यूज के कुछ कर्मकारियों

सार्वजनिक सेवा

एंकरेज डेली न्यूज

स्रोत: द हिंदू


मच्छर जनित बीमारियों का प्रसार

प्रीलिम्स के लिये:

मलेरिया, डेंगू

मेन्स के लिये:

मच्छर जनित बीमारियों से संबंधित मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

वैश्विक स्तर पर सभी सरकारें COVID-19 से निपटने में जुटी हुई हैं, लेकिन हाल ही में दिल्ली में मच्छर जनित बीमारियाँ प्रमुख चिंता के रूप में उभर कर सामने आई हैं। 

प्रमुख बिंदु: 

  • उल्लेखनीय है कि 2 मई, 2020 तक मलेरिया के 16 मामले सामने आए हैं। दरअसल यह आँकड़ा पिछले पाँच वर्षों की तुलना में अत्यधिक है। 
  • ध्यातव्य है कि जनवरी-मई 2019 तक केवल मलेरिया के 2 ही मामले सामने आए थे जबकि पिछले पाँच वर्षों में मलेरिया के कारण एक भी मृत्यु नहीं हुई है। 
  • 2 मई 2020 तक डेंगू के 13 और चिकनगुनिया के 10 मामले भी सामने आए हैं, जबकि पिछले वर्ष इस अवधि तक डेंगू के 8 और चिकनगुनिया के 4 मामले सामने आए थे। 
  • स्वास्थ्य संबंधी अधिकारियों के अनुसार, दिल्ली में कुल डेंगू के मामलों में से लगभग 70% या तो राज्य के बाहर से हैं या जिन्हें अभी तक चिह्नित नहीं किया गया है। 
  • लगभग चिकनगुनिया के 65% और मलेरिया के 56% मामलों को भी अभी तक चिह्नित नहीं किया गया है।
  • संक्रमित लोगों का पहचान बहुत ज़रूरी है साथ ही संक्रमित लोगों की पहचान करने की शुरुआत संबंधित राज्य से होना चाहिये।
  • ‘स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण मंत्रालय’ (Ministry of Health and Family Welfare) ने पहले ही इस बीमारी को ‘ध्यान देने योग्य रोग’ (Notifiable Disease) की श्रेणी में घोषित किया है।

मलेरिया (Malaria):

  • यह प्लाज़मोडियम (Plasmodium) परजीवियों के कारण होने वाला मच्छर जनित रोग है।
  • यह प्लास्मोडियम परजीवी से संक्रमित मादा एनाफिलीज़ मच्छर (Anopheles Mosquitoes) के काटने से फैलता है।
  • 5 परजीवी प्रजातियों के कारण मनुष्यों में मलेरिया होता हैं। साथ ही इनमें से 2 परजीवी प्रजातियाँ (‘पी.फाल्सीपरम’-P. Falciparum एवं ‘पी.वीवाक्स’-P Vivax) ज़्यादा खतरनाक होती हैं।
  • लक्षण:
    • मलेरिया के लक्षण हैं- बुखार, कंपन, पसीना आना, सिरदर्द, शरीर में दर्द, जी मचलना और उल्टी होना।
    • यदि 24 घंटों के भीतर संक्रमित मरीज़ का इलाज़ नहीं किया जाता है, तो ‘पी.फाल्सीपरम’ (P. Falciparum) मलेरिया का प्रभाव निरंतर बढ़ता जाता है। परिणामस्वरूप इस मलेरिया से अक्सर मृत्यु भी हो जाती है।

डेंगू (Dengue):

  • डेंगू दुनिया के कई हिस्सों में तेज़ी से उभरती हुई वायरल बीमारी है।
  • डेंगू के वायरस का मुख्य वाहक ‘एडीज़ एजिप्टी’ मच्छर (Aedes Aegypti Mosquito) है।
  • मच्छर जनित वायरल संक्रमण जो चिकनगुनिया, यलो फीवर, ज़ीका वायरस जैसी गंभीर बीमारी का कारण बनता है, कभी-कभी महामारी के रूप में घातक जटिलता की स्थिति पैदा करता है।
  • वर्षा, तापमान, सापेक्ष आर्द्रता और अनियोजित तेज़ी से शहरीकरण से डेंगू का प्रसार अत्यधिक होता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


महामारी रोग अधिनियम: समग्र विश्लेषण

प्रीलिम्स के लिये

महामारी रोग अधिनियम, 1897

मेन्स के लिये

महामारी रोग अधिनियम का महत्त्व और उसकी सीमाएँ

चर्चा में क्यों?

बीते महीने केंद्र सरकार ने महामारी रोग अधिनियम, 1897 (Epidemic Disease Act, 1897) में संशोधन करते हुए स्वास्थ्यकर्मियों के साथ हिंसा के कृत्य को संज्ञेय एवं गैर-ज़मानती अपराध घोषित किया था, जिससे लगभग 123 वर्ष पुराना यह अधिनियम एक बार पुनः चर्चा में आ गया है।

प्रमुख बिंदु

  • ध्यातव्य है कि केंद्र सरकार ने इसी वर्ष मार्च माह में COVID-19 के प्रकोप से लड़ने के लिये महामारी रोग अधिनियम, 1897 लागू किया था।
  • औपनिवेशिक-युग का यह अधिनियम राज्य सरकारों को विशेष उपाय करने और महामारी के दौरान विशेष नियम निर्धारित करने का अधिकार देता है।
  • इसके अतिरिक्त यह अधिनियम राज्य सरकार द्वारा निर्धारित नियमों की अवज्ञा करने पर दिये जाने वाले दंड को परिभाषित करता है, साथ ही यह ‘सद्भावना में’ किये गए किसी भी कार्य के लिये सुरक्षा प्रदान करता है।

क्यों आवश्यक था अधिनियम?

  • उल्लेखनीय है कि भारतीय गवर्नर जनरल की परिषद (Council of the Governor General of India) के सदस्य जे. वुडबर्न (J Woodburn) ने सर्वप्रथम 28 जनवरी, 1897 को ‘ब्लैक डेथ’ के नाम से प्रसिद्ध ब्यूबोनिक प्लेग (Bubonic Plague) के प्रकोप के दौरान महामारी रोग विधेयक को प्रस्तुत किया था।
    • विश्लेषकों के अनुसार, जनसंख्या के निरंतर प्रवाह के कारण प्लेग महामारी तेज़ी से फैल रही थी और अनुमान के अनुसार, महामारी फैलने के दौरान प्रति सप्ताह लगभग 1900 लोगों की मौत हो रही थी।
  • उस समय जे. वुडबर्न ने कहा था कि ‘ब्यूबोनिक प्लेग जो कि बॉम्बे में काफी अधिक फैल चुका है और धीरे-धीरे देश के अन्य हिस्सों में फैल रहा है, इसलिये आवश्यक है कि सरकार जल्द-से-जल्द इस बीमारी से लड़ने के लिये कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाए, ताकि यह बीमारी देश के अन्य हिस्सों में न पहुँचे।
  • विधेयक में कहा गया था कि नगरपालिका निकायों, छावनियों और अन्य स्थानीय सरकारों के पास इस प्रकार की स्थितियों से निपटने के लिये शक्तियाँ तो थीं, किंतु वे सभी शक्तियाँ ‘अपर्याप्त’ थीं।
  • उल्लेखनीय है कि भारत की उस समय की स्थिति से विश्व के कई अन्य देश भी चिंतित थे, रूस का अनुमान था कि इस बीमारी के कारण आगामी समय में संपूर्ण उपमहाद्वीप संक्रमित हो सकता है।
  • इस विधेयक में भारतीय प्रांतों और स्थानीय सरकारों को विशेष शक्तियाँ प्रदान की गईं, जिसमें ट्रेनों और समुद्री मार्गों के यात्रियों की जाँच करना भी शामिल था।
  • विधेयक में कहा गया था कि इसमें कहा गया है कि मौजूदा कानून नगर निगम अधिकारियों के लिये ‘भीड़भाड़ वाले घरों, उपेक्षित शौचालयों तथा झोपड़ियों और अस्वच्छ गौशालाओं तथा अस्तबलों’ से संबंधित विभिन्न मामलों से निपटने के लिये पर्याप्त नहीं हैं।

कैसे पारित हुआ यह विधेयक?

  • इस विधेयक को जेम्स वेस्टलैंड (James Westland) की अध्यक्षता वाली एक प्रवर समिति को भेजा गया, जिसने अगले ही सप्ताह 4 फरवरी, 1897 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और इसी दिन संक्षिप्त चर्चा के पश्चात् विधेयक पारित कर दिया गया।
  • यह विधेयक ब्यूबोनिक प्लेग (Bubonic Plague) के बढ़ते संक्रमण की चिंताओं के संदर्भ में पारित किया गया था, चूँकि बॉम्बे से काफी अधिक मात्रा में संक्रमित लोग देश के अन्य क्षेत्रों में जा रहे थे, जिससे प्लेग काफी तेज़ी से फैल रहा था।
    • ध्यातव्य है कि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार मुख्य रूप से भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता के लिये काफी चिंतित थी।
  • विधेयक पर चर्चा करने वाले सदस्यों में रहीमतुला मुहम्मद सयानी (Rahimtula Muhammad Sayani) और दरभंगा के महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह (Lakshmishwar Singh) ने कहा था कि इस विधेयक को काफी ‘हड़बड़ी’ में पारित किया जा रहा है।
    • हालाँकि दरभंगा के महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह ने तत्कालीन स्थिति को ‘मानव जाति के समक्ष मौजूद सर्वाधिक भयानक संकटों में से एक के रूप में वर्णित किया था।’

अधिनियम के प्रमुख प्रावधान

  • महामारी रोग अधिनियम में कुल चार खंड हैं, जिन्हें आवश्यकतानुसार, समय-समय पर संशोधित किया जाता है। अधिनियम के महत्त्वपूर्ण प्रावधान निम्नानुसार हैं:
  • महामारी रोग अधिनियम, 1897 की धारा (2) के अनुसार, जब यह निश्चित हो जाए कि पूरे राज्य या उसके किसी भाग में किसी खतरनाक महामारी का प्रकोप हो गया है, या होने की आशंका है तब राज्य सरकार यदि यह समझती है कि मौजूदा विधि के साधारण उपबंध इसके लिये पर्याप्त नहीं हैं, तो वह ऐसे उपाय कर सकेगी जिन्हें वह उस रोग के प्रकोप या प्रसार की रोकथाम के लिये आवश्यक समझे। 
  • राज्य सरकार बड़े पैमाने पर जनता की सुरक्षा के लिये निम्नलिखित उपाय कर सकती हैं
    • यात्रा करने वाले व्यक्ति का निरीक्षण करना।
    • उन व्यक्तियों का, जिनके बार में जाँच अधिकारी को यह शंका है कि वे किसी रोग से संक्रमित है, किसी अस्पताल अथवा अस्थायी आवास में अलगाव करना।
  • इस अधिनियम की धारा 2A केंद्र सरकार को भारत छोड़ने वाले तथा भारत पहुँचाने वाले जहाज़ों का निरीक्षण करने का अधिकार देता है और आवश्यकता पड़ने पर केंद्र सरकार को ऐसे जहाज़ों को बंद करने का अधिकार होता है।
  • अधिनियम की धारा 3 में अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर दिये जाने वाले दंड के प्रावधान हैं। धारा 3 के अनुसार, अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 188 के समान सज़ा होगी।
    • IPC की धारा 188 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति सरकार के नियमों/अधिसूचना का उल्लंघन करता है तो उसे कम-से-कम 1 महीने और अधिकतम 6 महीने कैद और 1000 रुपए का जुर्माना हो सकता है।
  • अधिनियम की धारा-4 सरकार, उसके कर्मचारियों और उसके अधिकारियों को ‘सद्भाव में’ किये गए किसी भी कार्य के लिये सुरक्षा प्रदान करता है।

अधिनियम की सीमाएँ

  • ध्यातव्य है कि यह अधिनियम तकरीबन 123 वर्ष से अधिक पुराना है और इसे तत्कालीन सरकार द्वारा भारत के एक विशेष हिस्से बॉम्बे प्रेसीडेंसी के लिये अधिनियमित किया गया था, इसलिये कई आलोचकों का मत है कि यह मौजूदा भारतीय परिदृश्य के लिये पर्याप्त नहीं है।
    • विदित हो कि ब्रिटिश काल के दौरान कई अवसरों पर यह भी देखा गया कि ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार करने और सार्वजनिक सभाओं को रोकने के लिये इस अधिनियम का दुरुपयोग किया गया।
  • महामारी रोग अधिनियम का उद्देश्य किसी बीमारी के प्रसार को रोकने के लिये अधिक है जो पहले से ही फैल रही है, जबकि यह बीमारी को रोकने या मिटाने पर ध्यान केंद्रित नहीं करता है।
  • इस अधिनियम में महामारी या बीमारी शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। साथ ही इस अधिनियम में सरकार के लिये महामारी के समय लागू किये जाने वाले विभिन्न उपायों को लेकर कोई विशेष निर्देश नहीं दिये गए हैं।
  • सरकार की ओर से टीके और दवाओं का वितरण किस प्रकार किया जाए, इस विषय पर भी यह अधिनियम कुछ विशेष प्रावधान नहीं करता है।

COVID-19 और महामारी रोग अधिनियम

  • महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात, असम और दिल्ली समेत देश के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने महामारी रोग अधिनियम के प्रावधानों के तहत अधिसूचना जारी की है।
  • इस अधिनियम के तहत कुछ प्रतिबंध लगाने के बावजूद भी कई राज्य मुख्य रूप से महामारी के प्रसार को कम करने जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, क्योंकि इस अधिनियम में कोई विशेष प्रावधान नहीं हैं जो राज्य सरकारों को संकट के दौरान एक निर्दिष्ट तरीके से कार्य करने के लिये मार्गदर्शन कर सकें।
  • यह अधिनियम एक शताब्दी से भी अधिक पुराना है, जब विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization-WHO) और संयुक्त राष्ट्र (United Nations-UN) जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की स्थापना भी नहीं हुई थी। इस प्रकार यह अधिनियम इन संगठनों द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप कार्य करने में असमर्थ है।
  • आवश्यक है कि मौजूदा COVID-19 संक्रमण के दौरान विधायिका को देश के समक्ष मौजूद चुनौतियों और कठिनाइयों पर विचार करना चाहिये और उनके अनुसार एक नया तथा प्रभावी कानून का निर्माण करना चाहिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


अफगानिस्तान में COVID-19 मामलों में वृद्धि

प्रीलिम्स के लिये

अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी संगठन, ‘डिस्प्लेस्मेंट ट्रैकिंग मैट्रिक्स, COVID-19

मेन्स के लिये

स्वास्थ्य क्षेत्र पर COVID-19 का प्रभाव

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी संगठन’ (International Organisation for Migration-IOM) ने अफगानिस्तान में COVID-19 के बढ़ते मामलों पर चिंता ज़ाहिर की है। IOM के अनुमान के अनुसार, अफगानिस्तान में COVID-19 संक्रमण की दर विश्व में सबसे अधिक हो सकती है। 

मुख्य बिंदु: 

  • 5, मई 2020 तक अफगानिस्तान में COVID-19 संक्रमण के कुल 2,900 मामलों की पुष्टि की गई थी, जबकि इस बीमारी से मरने वालों की संख्या 90 बताई गई थी। 
  • IOM के अनुसार, अफगानिस्तान में COVID-19 के नियंत्रण हेतु किसी तात्कालिक प्रभावी प्रतिक्रिया के अभाव में देश की लगभग 80% तक की आबादी इस संक्रामक बीमारी की चपेट में आ सकती है। 
  • IOM के अनुसार, हाल ही में लगभग 50-70 लाख की आबादी वाले काबुल शहर में 500 लोगों से लिये गये अनियमित/यादृच्छिक नमूनों (Randomised Sample) में से लगभग 50% COVID-19 से संक्रमित पाए गए थे।
  • COVID-19 महामारी के कारण हाल ही में पड़ोसी देशों पाकिस्तान और ईरान से लगभग 2,71,000 से अधिक अफगान नागरिकों के लौटने से अफगानिस्तान प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है।

कमज़ोर स्वास्थ्य व्यवस्था और COVID-19:  

  • पिछले तीन महीनों के दौरान देश के विभिन्न क्षेत्रों में सुरक्षा के अभाव और गैर-सरकारी नियंत्रण वाले क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की नियमित पहुँच न होने के कारण देश के लगभग 30% हिस्से में COVID-19 परीक्षण नहीं किये जा सके हैं।
  • अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर COVID-19 परीक्षण करने की क्षमता का न होना भी एक बड़ी चुनौती है, जनवरी, 2020 में देश में स्थापित 8 परीक्षण केंद्रों में प्रत्येक पर एक दिन में मात्र 100-150 परीक्षण किये जा सकते हैं।
  • अफगानिस्तान में COVID-19 टेस्टिंग किट और प्रशिक्षित लैब टेक्नीशियनों की कमी के साथ गंभीर रूप से बीमार लोगों का उपचार करने के लिये आवश्यक संसाधन बहुत ही सीमित हैं।
  • अफगानिस्तान में पुरुषों और महिलाओं के लिये अनुमानित जीवनकाल या जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) मात्र 50 वर्ष है, जिसमें से एक बड़ी आबादी पहले से ही तपेदिक, एचआईवी-एड्स (HIV-AIDS), कुपोषण, कैंसर और हृदय और फेफड़ों के रोग आदि गंभीर बीमारियों से ग्रस्त है।
  • पर्यावरण प्रदूषण भी लोगों के गिरते स्वास्थ्य का एक बड़ा कारण रहा है।

COVID-19 के नियंत्रण में चुनौतियाँ:

  • देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के कारण आवाजाही पर प्रतिबंध और क्वारंटीन जैसे प्रयासों के परिणाम भी सीमित रहे हैं।
  • देश की एक बड़ी आबादी बगैर रोज़गार के कुछ दिनों से अधिक अपने परिवार का भरण-पोषण नहीं कर सकती, ऐसे में दो सप्ताह के बाद ही रोज़गार के लिये लोगों ने पुनः ईरान जाना प्रारंभ कर दिया।
  • IOM के अनुसार, अफगानिस्तान में, जहाँ एक परिवार में औसतन 7 लोग रहते हैं, वहाँ सोशल डिस्टेंसिंग जैसे प्रयासों की सफलता बहुत ही अव्यावहारिक है। साथ ही इनमें से अधिकांश परिवार बहुत ही छोटे, एक कमरों वाले बिना व्यवस्थित वायु-प्रबंधन के घरों में रहते हैं।
  • देश में COVID-19 के संदर्भ में जागरूकता का अभाव इस बीमारी से लड़ने में एक बड़ी समस्या बन गई है, हाल ही में कुछ गैर-सरकारी संगठनों द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 60% लोगों को COVID-19 के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

तालिबान समस्या और राजनीतिक अस्थिरता:

  • वर्ष 1990 में तालिबान के उदय के साथ ही अफगानिस्तान में एक ऐसी अंतहीन अशांति की शुरुआत हुई जी आज तक जारी है।  
  • 29 फरवरी, 2020 को तालिबान और अमेरिका के बीच एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किये गए, हालाँकि अभी तक इसके बहुत सकारात्मक परिणाम देखने को नहीं मिले हैं। 
  • अफगानिस्तान की आतंरिक राजनीति उस समय और अस्थिर हो गई जब मार्च 2020 में चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद राष्ट्रपति अशरफ गनी और उनके प्रतिद्वंदी अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने अलग-अलग समारोहों में राष्ट्रपति की शपथ ली और अपने को देश का वास्तविक राष्ट्रपति बताया था।
  • वर्तमान में वैश्विक मंचों पर अशरफ गनी को ही राष्ट्रपति के रूप में मान्यता प्राप्त है परंतु इससे अफगानिस्तान की स्थानीय शांति एवं शासन व्यवस्था प्रभावित हुई है।      
  • विश्व बैंक (World Bank) के आँकड़ों के अनुसार, अफगानिस्तान में सेना और तालिबान के बीच संघर्ष के कारण वर्ष 2019 में आतंरिक रूप से विस्थापित लोगों की संख्या 3,69,700 (वर्ष 2018) से बढ़कर 400,000 (वर्ष 2019) तक पहुँच गई थी।
  • वर्ष 2019 में अफगानिस्तान की जीडीपी वृद्धि दर मात्र 2.9% रही थी, परंतु COVID-19 के कारण इसमें काफी गिरावट देखी जा सकती है।    

COVID-19 नियंत्रण के प्रयास:  

  • IOM के अनुसार इन कठिन चुनौतियों के बावज़ूद भी अफगानिस्तान के स्वास्थ्य मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation- WHO) के सहयोग से स्वास्थ्य कर्मियों और मोबाइल स्वास्थ्य टीम आदि के द्वारा COVID-19 के नियंत्रण का प्रयास किया जा रहा है।
  • यदि शारीरिक तापमान और अन्य जाँच में किसी व्यक्ति के COVID-19 संक्रमित होने की संभावना होती है तो उसे IOM की एम्बुलेंस से नज़दीकी आइसोलेशन केंद्र (Isolation facility) पर भेज दिया जाता है। साथ ही यही प्रक्रिया ‘प्रवासी पारगमन केंद्रों’ (Migrant Transit Centres) पर भी अपनाई जा रही है।
  • IOM द्वारा स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षण, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण और अन्य चिकित्सीय आपूर्ति मुहैया कराई जा रही है, साथ ही ‘डिस्प्लेस्मेंट ट्रैकिंग मैट्रिक्स’ (Displacement Tracking Matrix) के माध्यम से 25 प्रांतों और लगभग 10,000 समुदायों में आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। 

‘डिस्प्लेस्मेंट ट्रैकिंग मैट्रिक्स’

(Displacement Tracking Matrix- DTM): 

  • ‘डिस्प्लेस्मेंट ट्रैकिंग मैट्रिक्स’ DTM, किसी आबादी की गतिशीलता या विस्थापन की निगरानी के लिये प्रयोग की जाने वाली एक प्रणाली है।
  • इसमें नियमित रूप से और एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत किसी समूह के विस्थापन के मार्ग, समूह के खतरों और आवश्यकताओं की जानकारी एकत्र कर उसकी समीक्षा की जाती है, जिससे नीति निर्माताओं या अन्य सहयोगियों द्वारा ऐसे समूहों को बेहतर और लक्षित सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
  • इस प्रणाली की अवधारणा वर्ष 2004 में इराक में आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों (Internally displaced people- IDPs) की जानकारी जुटाने के लिये की गई थी।     
  • IOM अफगानिस्तान की सीमा पर स्थित प्रवेश केंद्रों पर स्वास्थ्य मंत्रालय, WHO और ‘संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त’ (United Nations High Commissioner for Refugees-UNHCR)  के साथ समन्वय में सहयोग प्रदान कर रहा है।
  • IOM के अफगानिस्तान कार्यालय द्वारा प्रतिवर्ष ईरान से बिना पूरे प्रमाणिक कागज़ों के लौट रहे लाखों अफगानिस्तानियों को मानवीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है, वर्ष 2020 में अब तक IOM ने अपने ट्रांज़िट केंद्रों के माध्यम से 30,000 से अधिक लोगों को सहायता उपलब्ध कराई गई है।
  • IOM ने अफगानिस्तान में COVID-19 के विरुद्ध अपने प्रयासों को तेज़ करने के लिये सहयोगियों से 5 मिलियन अमेरिकी डॉलर की अतिरिक्त आर्थिक सहायता की मांग की है।

भारत द्वारा दी गई सहायता: 

  • COVID-19 से निपटने में ‘दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन’ (South Asian Association for Regional Cooperation- SAARC) के देशों में आपसी सहयोग बढ़ाने के लिये मार्च 2020 में भारतीय प्रधानमंत्री की पहल पर ‘सार्क COVID- 19 आपातकालीन निधि’ की स्थापना की गई थी।
  • साथ ही भारत सरकार ने 12 अप्रैल, 2020 को अफगानिस्तान को 5,022 मीट्रिक टन गेहूँ (कुल प्रस्तावित 75000 टन) और हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा की 5,00,000 टैबलेट आदि सहयोग उपलब्ध कराया था।  

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस


‘अतुल्य’ माइक्रोवेव-स्ट्रेलाइज़र

प्रीलिम्स के लिये

‘अतुल्य’ माइक्रोवेव-स्ट्रेलाइज़र

मेन्स के लिये

महामारी से निपटने में विभिन्न संगठनों की भूमिका

चर्चा में क्यों?

रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (Defence Research and Development Organisation- DRDO) के तहत पुणे स्थित डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस टेक्नोलॉजी (Defence Institute of Advanced Technology) ने कोरोनावायरस (COVID-19) को विघटित अथवा समाप्त करने के लिये ‘अतुल्य’ (ATULYA) नाम से एक ‘माइक्रोवेव-स्ट्रेलाइज़र’ (Microwave Steriliser) तैयार किया है।

प्रमुख बिंदु

  • रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, यह वायरस 56 डिग्री से 60 डिग्री सेल्सियस तापमान में विभेदकारी ऊष्माष्यन (Differential Heating) द्वारा विघटित हो जाता है।
  • यह उत्पाद एक किफायती उपाय है जिसे पोर्टेबल (Portable) या फिक्स्ड इंस्टोलेशन (Fixed Installations) किसी भी रूप में संचालित (Operate) किया जा सकता है।
  • ध्यातव्य है कि मानव सुरक्षा की दृष्टि से इस उपकरण का परीक्षण किया गया है और इसे सुरक्षित पाया गया है। 
  • मंत्रालय के अनुसार, भिन्न-भिन्न वस्तुओं के आकार और ढाँचे के अनुरूप विघटन का समय 30 सेकेंड से एक मिनट तक रहता है। इस उपकरण का वजन लगभग तीन किलोग्राम है और इसका उपयोग केवल गैर-मेटैलिक (Non-Metallic) वस्तुओं के लिये किया जा सकता है।

Atulya

DRDO और कोरोनावायरस

  • ध्यातव्य है कि देश में कोरोनावायरस का प्रसार काफी तेज़ी से हो रहा है और संक्रमण का आँकड़ा दिन-प्रति-दिन बढ़ता जा रहा है। नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, देश भर में कोरोनावायरस संक्रमण के कुल 52000 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं और इस वायरस के प्रभाव से तकरीबन 1700 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। 
  • हालाँकि इस वायरस का मुकाबला करने के लिये देश का प्रत्येक व्यक्ति और संस्थान अपनी-अपनी भूमिका अदा कर रहा है।
  • इसी क्रम में सशस्त्र बल और DRDO समेत रक्षा मंत्रालय के विभिन्न विंग्स भी देश में महामारी के प्रसार को रोकने का काफी प्रयास कर रहे हैं और अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार, विभिन्न प्रकार के उत्पादों को डिज़ाइन और विकसित कर रहे हैं।
    • DRDO की स्थापना वर्ष 1958 में रक्षा विज्ञान संगठन (Defence Science Organisation-DSO) के साथ भारतीय सेना के तकनीकी विकास प्रतिष्ठान (Technical Development Establishment-TDEs) और तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय (Directorate of Technical Development & Production- DTDP) के संयोजन के माध्यम से की गई थी।
    • DRDO रक्षा मंत्रालय के रक्षा अनुसंधान और विकास विभाग के तहत कार्य करता है।
  • DRDO ने महामारी से निपटने के लिये कई उत्पाद विकसित किये हैं, जिनमें वेंटिलेटर, पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (Personal Protective Equipment-PPE) किट, बड़े क्षेत्रों को सैनिटाइज़ करने हेतु उपाय और COVID-19 परीक्षण के नमूने एकत्रित करने हेतु कियोस्क आदि शामिल हैं।
  • हाल ही में DRDO ने अधिक संक्रमण वाले क्षेत्रों के त्वरित एवं रसायन मुक्त कीटाणुशोधन (Disinfection) के लिये एक अल्ट्रा वॉयलेट डिसइंफेक्सन टॉवर (Ultra Violet Disinfection Tower) भी विकसित किया है।
    • ‘यूवी ब्लास्टर’ (UV blaster) नाम का यह उपकरण एक अल्ट्रा वॉयलेट (UV) आधारित क्षेत्र सैनिटाइज़र (Sanitizer) है।

स्रोत: पी.आई.बी


COVID-19 के कारण रक्त के थक्के जमने की समस्याएँ

प्रीलिम्स के लिये

COVID-19, थ्रोम्बी

मेन्स के लिये

स्वास्थ्य क्षेत्र पर COVID-19 का प्रभाव, COVID-19 से उत्पन्न समस्याएँ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में विश्व भर में कई चिकित्सकों ने COVID-19 से संक्रमित मरीज़ों में रक्त के थक्के जमने से जुड़ी समस्याओं के मामलों में वृद्धि देखी है, चिकित्सकों के अनुसार, यदि ऐसे मामलों में मरीज़ को जल्दी उपचार नहीं उपलब्ध कराया जाता तो यह जानलेवा भी हो सकता है।

मुख्य बिंदु:

  • इस बीमारी में अलग-अलग मरीज़ों में पैरों पर मामूली त्वचा घाव, जिसे ‘कोविड टो ‘ (COVID Toe) भी कहा जाता है, से लेकर दिल के दौरे पड़ने और नसों में रक्त के थक्के जमने जैसे घातक मामले भी देखे गए हैं।
  • ऐसे मामलों में सही समय पर इलाज न होने से श्वसन से जुड़ी समस्याओं के ठीक होने के कई दिनों या महीनों बाद मरीज़ में इस बीमारी के लक्षण प्रकट हो सकते हैं। 

संक्रमणों में रक्त जमने के मामले: 

  • विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे संक्रमण के मामलों में थक्के जमाने के खतरों का बढ़ना असामान्य नहीं है। 
  • इससे पहले वर्ष 1918 की स्पैनिश फ्लू (Spanish Flu) की महामारी के दौरान भी मरीज़ो में रक्त के थक्के जमने के मामले देखे गए थे, जिनसे बहुत ही जल्दी व्यक्ति की मृत्यु तक हो सकती थी। 
  • इसके अतिरिक्त अन्य वायरस जैसे-एचआईवी (HIV), डेंगू (Dengue), इबोला (Ebola) आदि भी रक्त जमने जैसे हानिकारक प्रभावों के लिये जाने जाते हैं।
  • हालाँकि COVID-19 में थक्के जमने की तीव्रता अन्य संक्रमणों की तुलना में कई गुना अधिक है।
  • चिकित्सकों के अनुसार, कुछ मामलों में ऐसे रक्त के थक्के, मरीजों में गुर्दे को सहायता देने वाले ‘आर्टीरियल कैथीटर्स’ (Arterial Catheters) और फिल्टर्स (Filters) में बनते हैं, जिन्हें थ्रोम्बी (Thrombi) कहा जाता है। परंतु अधिक खतरनाक वे थक्के हैं जो फेफड़े में रक्त प्रवाह को बाधित करते हैं, जिससे सांस लेने में कठिनाई होती है।

प्रभाव:    

  • चिकित्सकों के अनुमान के अनुसार, रक्त के इन थक्कों का जमना मरीज़ों के स्वास्थ्य में तीव्र गिरावट और ब्लड-ऑक्सीजन की कमी का प्रमुख कारण हो सकता है।   
  • फरवरी 2020 में चीन में मरीज़ों में रक्त के थक्के जमने के मामले देखे गए थे परंतु इनकी गंभीरता के बारे में स्थिति अब और अधिक स्पष्ट हो गई है।  
  • इसके अतिरिक्त फ्राँस और नीदरलैंड में किये गए अध्ययनों में देखा गया कि COVID-19 से संक्रमित लगभग 30% मरीज़, ‘पाॅल्मनरी इंबाॅलिज़्म’ (Pulmonary Embolism) नामक बीमारी से ग्रस्त थे, जिसमें फेफड़े की धमनियों में रक्त का प्रवाह बाधित हो जाता है।
  • यदि समय रहते इसका इलाज नहीं किया जाता तो धमनियों में बड़े थक्कों से हृदय पर दबाव बढ़ सकता है और व्यक्ति को हृदय आघात भी हो सकता है।
  • 3 में से एक मामले में सही समय पर इलाज न मिले पर इसके घातक परिणाम हो सकते हैं और 6 में से 1 व्यक्ति में इसके लक्षण पुनः वापस आ सकते हैं।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, इस महामारी के बाद प्रभावित फेफड़े और रक्त के थक्के जमने से जुड़े मामलों में वृद्धि हो सकती है।
  • शरीर के अन्य हिस्सों में रक्त के थक्के जमने से अन्य महत्त्वपूर्ण अंगों जैसे-दिल, गुर्दे, यकृत, आंत और अन्य ऊतकों आदि को क्षति हो सकती है।
  • मरीज़ो में रक्त के थक्कों के जमने की स्थिति में इसके परीक्षण के लिये डी-डाईमर ब्लड टेस्ट (D-Dimer Blood Test) का प्रयोग किया जाता है।  

आगे की राह:

  • विशेषज्ञों के अनुसार, जहाँ एक तरफ COVID-19 से संक्रमित मरीज़ों में ऐसी समस्याओं का पता चलना इस बीमारी को और अधिक जटिल बनता है, परंतु साथ ही अधिक-से-अधिक जानकारी के पता होने से इस बीमारी का बेहतर तरीके से उपचार करना संभव हो सकेगा। 
    • उदाहरण के लिये: इटली में  ‘पाॅल्मनरी इंबाॅलिज़्म’ से एक मरीज़ की मृत्यु होने के बाद चिकित्सकों का ध्यान इस तरफ गया और इसके बाद कई अन्य मरीज़ो में इसके उपचार के प्रयास किये गए।   
  • COVID-19 के बारे में जैसे-जैसे अधिक जानकारी प्राप्त होगी चिकित्सकों को इस बीमारी से ग्रस्त लोगों को उनके लक्षणों के आधार पर बेहतर और लक्षित उपचार उपलब्ध कराने में आसानी होगी।
  • शीर्ष स्वास्थ्य संस्थाओं को COVID-19 के संबंध में दूरस्थ क्षेत्रों में कार्यरत चिकित्सकों और ज़मीनी स्तर पर कार्यरत सहयोगियों को अधिक से अधिक जानकारी उपलब्ध करनी चाहिये, जिससे शीघ्र ही इस बीमारी के लक्षणों की पहचान कर मरीज़ों को उचित सहायता उपलब्ध कराई जा सके।

स्रोत:  द इंडियन एक्सप्रेस


भारत का स्थायी मिशन

प्रीलिम्स के लिये: 

स्थायी मिशन 

मेन्स के लिये: 

संयुक्त राष्ट्र में भारत का स्थायी मिशन 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत सरकार द्वारा राजनयिक (Diplomat) टी एस तिरुमूर्ति (T S Tirumurti) को संयुक्त राष्ट्र (The United Nations) में अपने स्थायी प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया गया है। 

संयुक्त राष्ट्र का स्थायी मिशन:

स्थायी मिशन वह राजनयिक मिशन है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के प्रत्येक सदस्य राज्य द्वारा अपना एक स्थायी प्रतिनिधि संयुक्त राष्ट्र में नियुक्त किया जाता है। इस स्थायी प्रतिनिधि को ‘संयुक्त राष्ट्र का राजदूत’ (UN Ambassador) भी कहा जाता है।

वियना सम्मेलन के अनुसार स्थायी मिशन:

वियना सम्मेलन का अनुच्छेद 1(7) जो कि सार्वभौमिक चरित्र के अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में राज्यों के प्रतिनिधित्व के बारे में बताता है के अनुसार, एक स्थायी मिशन वह है जिसकी निश्चित विशेषताएँ होती है, अंतर्राष्ट्रीय संगठन में राज्य का प्रतिनिधित्व करता हो तथा जिसे अंतरराष्ट्रीय संगठन में सदस्य राज्यों द्वारा प्रतिनिधित्व के तौर पर भेजा जाता है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा के अनुसार स्थायी मिशन: 

  • संयुक्त राष्ट्र महासभा के संकल्प 257 (III) , के अनुसार, 3 दिसंबर 1948 को ‘स्थायी मिशन’ पद को इस प्रकार संबोधित किया- 
    • ऐसे स्थायी मिशनों की उपस्थिति संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों और सिद्धांतों की प्राप्ति में सहायक है।
    • इस प्रकार के मिशन विशेष रूप से, सदस्य राज्यों और सचिवालय के विभिन्न अंगों के सत्रों के बीच की अवधि में आवश्यक संपर्क बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र में भारतीय स्थायी मिशन:

  • वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र में अवर सचिव जनरल (Under Secretary General) और सहायक महासचिव (Assistant Secretary General) के वरिष्ठ पदों पर आठ भारतीय नियुक्त हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधि के तौर पर राजनेता अर्कोट रामासामी मुदलियार तथा स्वतंत्रता सेनानी हंसा मेहता, विजयलक्ष्मी पंडित और लक्ष्मी मेनन कार्य कर चुके हैं। 
  • हंसा मेहता और विजयलक्ष्मी पंडित भारतीय संविधान सभा की 15 महिला सदस्यों में से एक थी।

टी एस तिरुमूर्ति-

  • ये वर्ष 1985 बैच के भारतीय विदेश सेवा (Indian Foreign Service) के अधिकारी हैं।
  • टी एस तिरुमूर्ति की नियुक्ति सैयद अकबरुद्दीन के स्थान पर की गई है।
  • वर्तमान समय में ये विदेश मंत्रालय में सचिव के तौर पर कार्यरत हैं।

संयुक्त राष्ट्र- 

  • संयुक्त राष्ट्र एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है।
  • इसकी स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र अधिकार-पत्र के माध्यम से की गई थी।
  • इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय कानून को सुविधाजनक बनाने हेतु सहयोग प्रदान करना, अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक एवं सामाजिक विकास तथा मानवधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ विश्व शांति स्थापित करने के लिये कार्य करना है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


एकीकृत मृदा पोषक तत्त्व प्रबंधन

प्रीलिम्स के लिये:

मृदा स्वास्थ कार्ड 

मेन्स के लिये:

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना की उपलब्धियाँ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय (Ministry of Agriculture & Farmers Welfare) द्वारा एकीकृत मृदा पोषक तत्त्व प्रबंधन (Integrated Soil Nutrient Management ) के लिये मिशन मोड जागरूकता अभियान (Mission Mode Awareness Campaigns) के माध्यम से कृषक आंदोलन का आह्वान किया गया है। 

मुख्य बिंदु:

  • कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जैव एवं जैविक उर्वरकों के बढ़ते उपयोग और रासायनिक उर्वरकों के कम से कम इस्‍तेमाल के लिये मिशन मोड में  जागरूकता अभियान शुरू करने का आवाहन किया गया है।
  • मिशन के लिये जारी दिशा-निर्देशों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card-SHC) की सिफारिशों के आधार पर निर्धारित किया जायेगा।
  • वर्ष 2020-21 के दौरान इस कार्यक्रम का मुख्य फोकस देश के सभी ज़िलों को कवर करते हुए 1 लाख से अधिक गाँवों के किसानों को जागरुक करने पर होगा।
  • कृषि में शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं, महिला स्वयं सहायता समूहों, इत्‍यादि के द्वारा ग्राम स्तरीय मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना की जाएगी।
  • इसके बाद मृदा स्वास्थ कार्ड योजना के तहत समुचित कौशल संवर्द्धन के द्वारा रोज़गार सृजन सुनिश्चित करने पर बल दिया जायेगा।
  •  ‘कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग’ (The Department of Agriculture, Cooperation and Farmers’ Welfare) द्वारा सुरक्षित पौष्टिक भोजन के लिये  भारतीय प्राकृत कृषि पद्धति सहित उर्वरकों के जैविक परीक्षण और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिये मिट्टी के परीक्षण के आधार पर एक व्यापक अभियान पंचायत राज, ग्रामीण विकास और पेयजल तथा स्वच्छता विभागों (Departments of Panchayat Raj, Rural Development and Drinking Water and Sanitation) के साथ मिलकर चलाया जाएगा।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना

(Soil Health Card Scheme ):

  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना की शुरूआत 19 फरवरी, 2015 को राजस्थान के सूरतगढ़ से की गई।
  • इस योजना के तहत हर 2 वर्ष के अंतराल पर किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरित किये जाते हैं।    
  • ये कार्ड किसानों को मृदा स्वास्थ्य और इसकी उर्वरता में सुधार के लिये आवश्यक  पोषक तत्त्वों की उचित मात्रा के साथ-साथ किसानों को मिट्टी की पोषक स्थिति की जानकारी प्रदान करते हैं।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड के बारे में:

  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड में  छः फसलों के लिये उर्वरकों की दो श्रेणियाँ निर्धारित की गई है जिसमे जैविक खाद भी शामिल है।
  • किसान इस कार्ड को मृदा स्वास्थ्य कार्ड पोर्टल के माध्यम से स्वयं भी प्रिंट कर सकते हैं/ प्राप्त कर सकते हैं।
  • सुविधा की दृष्टि से मृदा स्वास्थ्य कार्ड पोर्टल में किसान का डाटा दो चक्रीय रूपों तथा 21 भाषाओँ में विद्यामन है।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना की उपलब्धियाँ:  

  • राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (National Productivity Council- NPC) के अनुसार, योजना के माध्यम से सतत् कृषि को बढ़ावा मिला है।
  • कृषि कार्यों में रासायनिक उर्वरक के उपयोग में 8-10% की कमी देखी गई है।
  • कार्ड पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर उर्वरक और सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग करने के कारण फसलों की उपज में 5-6% की वृद्धि हुई है।
  • योजना के पहले चक्र (वर्ष 2015-17) में 10.74 करोड़ तथा दूसरे चक्र (2017-19) में 9.33 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड किसानों को वितरित किये गए हैं। इसके अलावा चालू वित्त वर्ष में अब तक सवा दो करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरित किये जा चुके हैं।

स्रोत: पी.आई.बी


UNICEF की 'लॉस्ट एट होम’ रिपोर्ट

प्रीलिम्स के लिये:

'लॉस्ट एट होम’ रिपोर्ट

मेन्स के लिये:

आंतरिक रूप से विस्थापन 

चर्चा में क्यों?

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष’ (United Nations Children's Fund- UNICEF) द्वारा प्रकाशित ‘लॉस्ट एट होम’ (Lost at Home) रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 में लगभग 33 मिलियन लोगों का आंतरिक रूप से विस्थापन हुआ है।

मुख्य बिंदु:

  • विस्थापित लोगों में 12 मिलियन बच्चे थे। जिनमें से लगभग 3 मिलियन बच्चों का विस्थापन संघर्ष और हिंसा के कारण जबकि 2 मिलियन का विस्थापन प्राकृतिक आपदाओं के कारण देखा गया।
  • रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 में भारत में प्राकृतिक आपदाओं, संघर्ष और हिंसा के कारण 5 मिलियन से अधिक लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए हैं।
  • वर्ष 2019 में भारत में आंतरिक रूप से सर्वाधिक विस्थापन हुआ है। भारत के बाद क्रमश: फिलीपींस, बांग्लादेश और चीन का स्थान है।

Countries

आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्ति

(Internally displaced persons- IDPs):

  • "व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूह हैं जो सशस्त्र संघर्ष, प्राकृतिक आपदा या मानवीय आपदा के कारण उत्पन्न परिस्थितियों के प्रभाव से बचने के लिये अपना आवास छोड़ने या देश की अंतर्राष्ट्रीय सीमा से अंदर पलायन करने को बाध्य होते हैं। ”
  • यहाँ आंतरिक विस्थापन की परिभाषा में ‘अनैच्छिक’ चरित्र तथा ‘अंतर्राष्ट्रीय सीमा’ महत्त्वपूर्ण तत्त्व है ।

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प्राकृतिक आपदा और विस्थापन:

  • रिपोर्ट में कहा गया कि प्राकृतिक आपदाओं के कारण विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या संघर्ष और हिंसा के कारण विस्थापित होने वाले लोगों की तुलना में अधिक है। वर्ष 2019 में लगभग 10 मिलियन लोगों का पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र में दर्ज 9.5 मिलियन लोगों का दक्षिण एशिया में विस्थापन हुआ।
  • भारत, फिलीपींस, बांग्लादेश, और चीन प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित होने वाले शीर्ष देश हैं, इन देशों में वैश्विक आपदा-प्रेरित विस्थापन का लगभग 69% योगदान है।
  • भारत में वर्ष 2019 में कुल 5,037,000 लोगों का आंतरिक विस्थापन हुआ जिनमें से 5,018,000 लोगों का विस्थापन प्राकृतिक आपदाओं के कारण हुआ है।  

संघर्ष और हिंसा के कारण विस्थापन:

  • वर्ष 2019 तक लगभग 46 मिलियन लोगों का आंतरिक विस्थापन संघर्ष और हिंसा के कारण हुआ था।
  • वर्ष 2019 में संघर्ष और हिंसा के कारण सर्वाधिक लगभग 19 मिलियन बच्चों का आंतरिक रूप से विस्थापित देखने को मिला।  
  • संघर्ष के कारण बच्चों का आंतरिक रूप से सर्वाधिक विस्थापन मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका (Middle East and North Africa- MENA) तथा उप-सहारा अफ्रीका में हुआ है।
  • इस प्रकार के विस्थापन के दो स्पष्ट क्षेत्र हैं - मध्य पूर्व तथा उत्तरी अफ्रीका और पश्चिम तथा मध्य अफ्रीका।
  • वर्ष 2019 में आंतरिक रूप से विस्थापित हुए लोगों में से हर चौथा व्यक्ति संघर्ष और हिंसा के कारण विस्थापित हुआ।
  • भारत में 19,000 लोगों का विस्थापन संघर्ष और हिंसा के कारण दर्ज किया गया।

COVID- 19 महामारी और बच्चों का विस्थापन:

  • COVID-19 महामारी ने बच्चों की सुभेद्यता को और अधिक बढ़ा दिया है। विस्थापन राहत शिविरों में सामान्यत: भीड़भाड़ होती है तथा इनमें पर्याप्त स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव होता है। महामारी के प्रसार को रोकने के लिये 'शारीरिक दूरी' बनाए रखना हमेशा संभव नहीं है, अत: इन राहत शिविरों में बच्चों की महामारी के प्रति सुभेद्यता अधिक होती है। 

आंतरिक विस्थापन और आवश्यक पहल:

  • रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न देशों की सरकारों, नागरिक समाज, कंपनियों, मानवीय अभिकर्त्ताओं को आंतरिक विस्थापन, हिंसा, शोषण तथा बच्चों से विशिष्ट रूप से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिये एक साथ मिलकर कार्य करना चाहिये।
  • आंतरिक रूप से विस्थापन पर ‘उच्च-स्तरीय पैनल’ के तहत सरकारों को एक साथ मिलकर कार्य करना चाहिये ताकि आंतरिक रूप से विस्थापित बच्चों और उनके परिवारों को सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में इस पैनल द्वारा आवश्यक जाँच की जानी चाहिये।
  • विस्थापित लोगों से संबंधित आँकड़ों की समय पर तथा सुलभ तरीके से पहुँच के अलावा उम्र और लिंग के अनुसार उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिये। 

स्रोत: द हिंदू


‘वर्ष 2018-19 के लिये ऊर्जा दक्षता उपायों का प्रभाव' रिपोर्ट

प्रीलिम्स के लिये

‘वर्ष 2018-19 के लिये ऊर्जा दक्षता उपायों का प्रभाव रिपोर्ट, ‘ऊर्जा दक्षता ब्यूरो’

मेन्स के लिये

पर्यावरण संरक्षण और विकास, पर्यावरण संरक्षण में भारत का योगदान 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय बिजली एवं नवीन तथा नवीकरणीय राज्य मंत्री ने ‘वर्ष 2018-19 के लिये ऊर्जा दक्षता उपायों का प्रभाव' (Impact of energy efficiency measures for the year 2018-19) नामक रिपोर्ट जारी की है। 

मुख्य बिंदु: 

  • केंद्रीय बिजली एवं नवीन तथा नवीकरणीय राज्य मंत्री ने 6 मई, 2020 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से ‘वर्ष 2018-19 के लिये ऊर्जा दक्षता उपायों का प्रभाव' नामक रिपोर्ट जारी की है।
  • केंद्रीय राज्य मंत्री के अनुसार, भारत अपनी ऊर्जा दक्षता पहलों के माध्यम से वर्ष 2005 की तुलना में अर्थव्यवस्था की ऊर्जा तीव्रता में 20% की कमी करने में सफल रहा है।
  • ध्यातव्य है कि भारत ने COP-21 में वर्ष 2030 तक अर्थव्यवस्था की ऊर्जा तीव्रता में वर्ष 2005 की तुलना में 33 से 35 प्रतिशत की कमी लाने का संकल्प लिया था।
  • यह रिपोर्ट विशेषज्ञ एजेंसी ‘प्राइस वॉटरहाउस कूपर्स लिमिटेड’ (Pricewaterhouse Coopers) द्वारा तैयार की गई है।

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन फ्रेमवर्क’ (United Nations Framework Convention on Climate Change-UNFCCC) की 21वीं बैठक या COP-21:

  • दिसंबर 2015 में फ्राँस की राजधानी पेरिस में आयोजित ‘जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क (United Nations Framework Convention on Climate Change- UNFCCC)’ के अंतर्गत शीर्ष निकाय ‘कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़’ (COP) के 21वें सत्र में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के उद्देश्य से ‘पेरिस समझौते’ पर हस्ताक्षर किये थे।
  • इस समझौते में देशों ने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (Intended nationally determined contributions- INDC) के तहत स्वेच्छा से अपने योगदान की घोषणा की थी।
  • इसके तहत भारत ने वर्ष 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की उत्सर्जन तीव्रता को वर्ष 2005 के स्‍तर की तुलना में 33-35 प्रतिशत तक कम करने का संकल्प लिया था।  
  • साथ ही वर्ष 2030 तक वैश्विक सहयोग के माध्यम से कुल ऊर्जा आवश्यकता के लगभग 40% हिस्से की आपूर्ति हेतु गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित विद्युत उत्पादन संसाधनों की स्थापना का संकल्प लिया गया था।  

‘ऊर्जा दक्षता उपायों का प्रभाव':  

  • इस रिपोर्ट में जारी आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारत अपनी विभिन्न ऊर्जा दक्षता योजनाओं के परिणामस्वरूप वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान 113.16 बिलियन यूनिट विद्युत् ऊर्जा की बचत करने में सफल रहा है।
  • यह ऊर्जा बचत भारत की कुल विद्युत् ऊर्जा खपत के 9.39% के बराबर है।
  • ऊर्जा खपत क्षेत्रों (Energy Consuming Sectors) में की गई यह बचत (इलेक्ट्रिकल एवं थर्मल) 16.54 मिलियन टन खनिज तेल के बराबर (Million Tonne of Oil Equivalent- Mtoe) है, जो वित्तीय वर्ष 2018-19 की कुल ऊर्जा खपत (लगभग 581.60 Mtoe) का 2.84% है।
  • रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान की गई कुल ऊर्जा (आपूर्ति+मांग) बचत 23.73 Mtoe रही, जो कुल प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति का 2.69% है।
  • इन आँकड़ों के अध्ययन से पता चलता है कि वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान विभिन्न ऊर्जा दक्षता योजनाओं के परिणामस्वरूप लगभग 89,122 करोड़ रुपयों की बचत करने में सफलता प्राप्त हुई है, जबकि पिछले वर्ष (वित्तीय वर्ष 2017-18) में यह बचत 53,627 करोड़ रुपए थी।
  • साथ ही इन प्रयासों के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जन में 151.74 मिलियन टन की कमी लाने में में सफलता प्राप्त हुई है, जबकि वित्तीय वर्ष 2017-18 में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जन में की गई कटौती 108 मिलियन टन (CO2) थी।

रिपोर्ट का उद्देश्य:  

  • वित्तीय वर्ष 2017-18 से प्रतिवर्ष भारत सरकार के ‘ऊर्जा दक्षता ब्यूरो’ (Bureau of Energy Efficiency- BEE) द्वारा विभिन्न ऊर्जा दक्षता योजनाओं के परिणामस्वरूप हुई वास्तविक ऊर्जा खपत और अनुमानित ऊर्जा खपत (यदि इन योजनाओं को लागू न किया गया होता तो) के तुलनात्मक अध्ययन हेतु तीसरे पक्ष के रूप में एक विशेषज्ञ एजेंसी को नियुक्त किया जाता है।
  • इस अध्ययन का उद्देश्य ऊर्जा बचत और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जन के संदर्भ में देश में संचालित प्रमुख ऊर्जा योजनाओं के प्रदर्शन और उनके प्रभावों का मूल्यांकन करना है।
  • इस रिपोर्ट में वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिये राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर लागू विभिन्न योजनाओं के प्रभावों का आकलन किया गया। साथ ही वर्तमान में योजनाओं के फलस्वरूप प्राप्त बेहतर आँकड़ों और इन योजनाओं के लागू न होने की स्थिति में (यदि इन योजनाओं को लागू न किया गया होता तब) ऊर्जा खपत एवं CO2 उत्सर्जन की मात्रा की तुलनात्मक समीक्षा की गई है।
  • इस वर्ष के अध्ययन में निम्नलिखित योजनाओं को शामिल किया गया है:
    1. उजाला योजना    
    2. मानक और लेबलिंग कार्यक्रम  (Standards & Labelling Programme) 
    3. प्रदर्शन, उपलब्धि और व्यापार योजना {Perform, Achieve and Trade (PAT) Scheme}
    4. म्युनिस्पल डिमांड साइड मैनेजमेंट कार्यक्रम {Municipal Demand Side Management (MuDSM) programme} आदि      

निष्कर्ष:   भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में विकास के साथ-साथ ऊर्जा की मांग में तीव्र वृद्धि होना स्वाभाविक है। साथ ही सरकार के लिये जनता तथा औद्योगिक क्षेत्र की ज़रूरतों को पूरा करते हुए पर्यावरण संरक्षण पर भी ध्यान देना बहुत आवश्यक है। भारत सदैव पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रतिबद्ध रहा है, हाल के वर्षों में BS-6 ईंधन,सौर ऊर्जा और ऊर्जा के अन्य नवीकरणीय स्रोतों जैसे विकल्पों को अपना कर तथा पर्यावरण संरक्षण की नीतियों से भारत ने अपनी वैश्विक प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में सफलता प्राप्त की है।    

स्रोत: पीआईबी


Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 07 मई, 2020

फोर्ब्स इंडिया बिलियनयर्स लिस्ट 2020

हाल ही में अमेरिकी पत्रिका फोर्ब्स (Forbes) ने फोर्ब्स इंडिया बिलियनयर्स लिस्ट 2020 (Forbes India Billionaires list 2020) जारी की है। इस सूची में रिलायंस इंडिया के चेयरमैन मुकेश अंबानी 36.8 बिलियन डॉलर की संपत्ति के साथ अपना पहला स्थान बरकरार रखा है और वे मौजूदा समय में भारत के सर्वाधिक अमीर व्यक्ति हैं। हालाँकि मुकेश अंबानी की कुल संपत्ति में बीते वर्ष के मुकाबले 13.2 बिलियन डॉलर की कमी आई है, किंतु इसके बावजूद भी वे पहले स्थान पर मौजूद हैं। वहीं स्टॉक मार्केट (Stock Market) में गिरावट के बावजूद भारतीय व्यवसायी राधाकिशन दमानी 13.8 बिलियन डॉलर की संपत्ति के साथ भारत के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति बन गए हैं। ध्यातव्य है कि यह पहली बार है जब राधाकिशन दमानी को इस सूची में दूसरा स्थान प्राप्त हुआ है। तकरीबन 11.9 बिलियन डॉलर की संपत्ति के साथ HCL के संस्थापक और और अध्यक्ष शिव नादर को इस सूची में तीसरा स्थान प्राप्त हुआ है। इस सूची में चौथा स्थान इन्वेस्टमेंट बैंकर (Investment Bankers) उदय कोटक (10.4 बिलियन डॉलर) को प्राप्त हुआ है, वहीं पाँचवें स्थान पर अडानी ग्रुप के अध्यक्ष के गौतम अडानी (8.9 बिलियन डॉलर), छठे स्थान पर भारती एयरटेल के संस्थापक सुनील मित्तल (8.8 बिलियन डॉलर), सातवें स्थान पर भारतीय व्यवसायी साइरस पूनावाला (8.2 बिलियन डॉलर) और आठवें स्थान पर आदित्य बिड़ला ग्रुप के अध्यक्ष कुमार बिड़ला (7.6 बिलियन डॉलर) मौजूद हैं। फोर्ब्स इंडिया बिलियनयर्स लिस्ट 2020 के अनुसार, भारत में बिलियानर्स की कुल संख्या 102 हो गई है, जो कि बीते वर्ष 106 थी। उल्लेखनीय है कि एजुकेशन टेक्नोलॉजी कंपनी बायजूस (BYJU’s) के संस्थापक बायजू रविंद्रन (Byju Raveendran) को भी इस सूची में पहली बार स्थान मिला है और इसी के साथ वे इस प्रतिष्ठित सूची में शामिल होने वाले भारत के सबसे युवा अरबपति बन गए हैं। ध्यातव्य है कि बायजू रविंद्रन की कुल अनुमानित संपत्ति तकरीबन 1.8 बिलियन है।

ऑपरेशन ‘समुद्र सेतु’ 

अपनी तरह के अब तक के सबसे बड़े निकासी अभियान के तहत भारतीय नौसेना ने विदेशों में फंसे भारतीय नागरिकों को वापस लाने के लिये ऑपरेशन समुद्र सेतु की शुरूआत की है। इस निकासी अभियान की शुरूआत में नौसेना के INS जलाश्‍व (INS Jalashwa) और एक अन्य जहाज़ को मालदीव में भेजा गया है। मालदीव में भारत के उच्चायुक्त संजय सुधीर के अनुसार, भारतीय नागरिकों की निकासी के लिये व्‍यापक व्यवस्था की गई है। ध्यातव्य है कि नागरिकों की निकासी का कार्य 8 मई से शुरू किया जाएगा और अनुमान के मुताबिक लगभग 2000 से अधिक फँसे लोगों को निकला जाएगा। वापस लाए गए लोगों को केरल में कोच्चि में उतारा जाएगा और राज्य अधिकारियों की देखरेख में सौंप दिया जाएगा। भारतीय नौसेना के अनुसार, मालदीव और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में फँसे भारतीय नागरिकों को वापस लाने के लिये नौसेना के तीन युद्धपोतों को रवाना किया गया है। इन युद्धपोतों में INS जलाश्‍व, INS मगर और INS शार्दुल शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि भारत में कोरोनावायरस संक्रमण के मामलों में तेज़ी से बढ़ोतरी हो रही है, नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, देश भर में कोरोनावायरस संक्रमण के कुल 52000 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं और इस वायरस के प्रभाव से तकरीबन 1700 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है। 

सीमा सड़क संगठन

07 मई, 2020 को सीमा सड़क संगठन (Border Road Organization-BRO) ने अपना 60वाँ स्थापना दिवस मनाया। सीमा सड़क संगठन (BRO) की स्थापना 7 मई, 1960 को हुई थी और यह रक्षा मंत्रालय के तहत एक प्रमुख सड़क निर्माण संस्था के रूप में कार्य करता है। ध्यातव्य है कि यह संगठन सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क कनेक्टिविटी प्रदान करने में अग्रिणी भूमिका अदा कर रहा है। यह पूर्वी और पश्चिमी सीमा क्षेत्रों में सड़क निर्माण तथा इसके रखरखाव का कार्य करता है ताकि सेना की रणनीतिक आवश्यकताएँ पूरी की जाएँ। उल्लेखनीय है कि आज़ादी के पश्चात् के शुरूआती वर्षों में भारत के सामने लगभग 15000 किमी लंबी सीमा रेखा की सुरक्षा तथा अपर्याप्त सड़क साधन वाले उत्तर व उत्तर पूर्व के आर्थिक रूप से पिछड़े सुदूरवर्ती इलाके को भविष्य में उन्नत व विकसित करने का दायित्त्व था और BRO इस दायित्त्व को पूरा करने के लिये काफी तेज़ी से कार्य कर रहा है। 

लोक लेखा समिति 

संसद में कॉन्ग्रेस के नेता ‘अधीर रंजन चौधरी’ को संसद की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) का अध्यक्ष चुना गया है। ध्यातव्य है कि परंपरा के तौर पर संसद की इस समिति के अध्यक्ष के तौर पर विपक्ष के नेता को ही चुना जाता है। समिति का कार्यकाल 01 मई, 2020 से शुरू हो चुका है, जो कि 30 अप्रैल, 2021 तक रहेगा। लोक लेखा समिति भारत सरकार के खर्चों की लेखा परीक्षा अथवा जाँच करने वाली समिति होती है। इस जाँच का आधार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General-CAG) की रिपोर्ट होती है। इस समिति का गठन भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत पहली बार वर्ष 1921 में हुआ था। इसमें लोकसभा तथा राज्यसभा दोनों ही सदनों के सदस्यों को शामिल किया जाता हैं।