बिहार वन प्रोजेक्ट | बिहार | 09 Apr 2026
चर्चा में क्यों?
बिहार सरकार ने 'बिहारवन' (BiharOne) डिजिटल गवर्नेंस प्लेटफॉर्म को लागू करने के लिये कॉर्पोरेट इंफोटेक प्राइवेट लिमिटेड को ₹87 करोड़ का अनुबंध दिया है, जिसका उद्देश्य सरकारी सेवाओं को एक एकल ऑनलाइन प्रणाली में एकीकृत करना है।
मुख्य बिंदु:
- परियोजना: 'बिहारवन' (BiharOne) एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म है जिसे एक ही ऑनलाइन इंटरफेस के माध्यम से कई सरकारी सेवाएँ प्रदान करने के लिये डिज़ाइन किया गया है, जिससे सार्वजनिक सेवा वितरण सरल और अधिक सुलभ हो सके।
- बिहारवन प्लेटफॉर्म के जुलाई 2026 तक चालू होने की उम्मीद है।
- सिंगल-विंडो प्लेटफॉर्म: यह प्लेटफॉर्म RTPS और गैर-RTPS सेवाओं सहित विभिन्न सरकारी सेवाओं को एकीकृत करेगा, जिससे नागरिक प्रमाण पत्र, योजनाओं एवं प्रशासनिक सेवाओं तक ऑनलाइन पहुँच सकेंगे।
- अनुबंध: बिहार सरकार ने इस परियोजना को विकसित करने और लागू करने के लिये कॉर्पोरेट इंफोटेक प्राइवेट लिमिटेड के साथ ₹87 करोड़ के समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं।
- प्रौद्योगिकी: इस प्रणाली में हिंदी, अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषाओं में AI-आधारित चैटबॉट शामिल होंगे, जो नागरिकों को सेवाओं का लाभ उठाने में आसानी से मार्गदर्शन करेंगे।
- एकीकरण: यह परियोजना सरकारी डेटाबेस को 'बिहार कॉमन सोशल रजिस्ट्री' से जोड़ेगी, जिससे दस्तावेज़ों के दोहराव में कमी आएगी और सेवा वितरण में दक्षता बढ़ेगी।
- महत्त्व: इस पहल का उद्देश्य ई-गवर्नेंस, पारदर्शिता और नागरिक-केंद्रित सेवा वितरण को मज़बूत करना है।
मेनका गुरुस्वामी भारत की पहली खुले तौर पर क्वीर सांसद बनीं | राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स | 09 Apr 2026
चर्चा में क्यों?
वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने राज्यसभा में शपथ लेकर भारत की पहली घोषित क्वीर सांसद बनकर इतिहास रच दिया है, जो भारतीय राजनीति में LGBTQ+ प्रतिनिधित्व के लिये एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
मुख्य बिंदु:
- ऐतिहासिक उपलब्धि: मेनका गुरुस्वामी राज्यसभा के सदस्य के रूप में शपथ लेने के बाद भारत की पहली घोषित क्वीर सांसद बन गई हैं।
- उन्हें पश्चिम बंगाल राज्य से अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा के लिये चुना गया था।
- कानूनी पृष्ठभूमि: वह एक प्रसिद्ध संवैधानिक कानून विशेषज्ञ और भारत के सर्वोच्च न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।
- वह भारत में नागरिक स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकारों और LGBTQ+ समानता के लिये एक प्रमुख आवाज़ रही हैं।
- ऐतिहासिक मामला: वह ऐतिहासिक 'नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ' मामले में शामिल वकीलों में से एक थीं।
- इस मामले के परिणामस्वरूप वर्ष 2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को निरस्त कर समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था।
- महत्त्व: संसद में उनके प्रवेश को शासन में LGBTQ+ प्रतिनिधित्व के लिये एक उपलब्धि माना जा रहा है और यह भारतीय राजनीति में क्वीर आवाज़ों की बढ़ती दृश्यता और स्वीकार्यता को दर्शाता है।