चंबल में रेत खनन को लेकर राज्यों को सर्वोच्च न्यायालय की चेतावनी | 18 Apr 2026

स्रोत:द हिंदू

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में अवैध रेत खनन पर नियंत्रण करने के लिये चेतावनी दी है; अन्यथा अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती की जा सकती है।

  • अवैध खनन के कारण आवासीय क्षरण गंभीर रूप ले रहा है, जिससे घड़ियाल जैसी लुप्तप्राय प्रजातियाँ संकट में पड़ रही हैं तथा नदी पारिस्थितिक तंत्र को क्षति पहुँच रही है।
  • राज्यों को CCTV निगरानी, खनन वाहनों की GPS ट्रैकिंग, संयुक्त गश्त तथा कठोर प्रवर्तन उपायों को लागू करने के लिये निर्देशित किया गया है।

राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य

  • परिचय: राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य, जिसे राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य भी कहा जाता है, भारत के सबसे पारिस्थितिक रूप से महत्त्वपूर्ण नदी-आधारित संरक्षित क्षेत्रों में से एक है।
    • यह देश का पहला और एकमात्र त्रि-राज्यीय संरक्षित क्षेत्र है (राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश), जो चंबल नदी (960 किमी.) के लगभग 600 किमी. लंबे हिस्से में फैला हुआ है तथा  इसका क्षेत्रफल लगभग 5,400 वर्ग किमी. है।
  • जैव विविधता: इसमें दुनिया की शेष जंगली घड़ियालों की लगभग 90% आबादी और संकटग्रस्त गंगा नदी डॉल्फ़िन की एक महत्त्वपूर्ण संख्या पाई जाती है। अन्य प्रमुख प्रजातियों में दलदली मगरमच्छ (मगर), लाल मुकुट वाला कछुआ (रेड-क्राउंड रूफ्ड टर्टल), चिकने बालों वाला ऊदबिलाव (स्मूथ कोटेड ओटर्स), धारीदार लकड़बग्घा और 330 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ शामिल हैं, जैसे कि भारतीय स्किमर
    • यह भारत की 'प्रोजेक्ट क्रोकोडाइल’ पहल का हिस्सा है, जिसे मगरमच्छों की संख्या में हुई भारी कमी की समस्या को दूर करने के उद्देश्य से वर्ष 1975 शुरू किया गया था।
  • संरक्षण का दर्जा: इस क्षेत्र को एक महत्त्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (IBA) की श्रेणी में रखा गया है। वर्तमान में यह रामसर स्थल के रूप में प्रस्तावित है और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की सूची में शामिल होने हेतु एक संभावित स्थल भी है। इसके अतिरिक्त, इसे IUCN द्वारा श्रेणी IV संरक्षित क्षेत्र (पर्यावास/प्रजाति प्रबंधन क्षेत्र) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  • पारिस्थितिक विशिष्टता: चंबल नदी भारत की सबसे स्वच्छ और सबसे कम प्रदूषित नदियों में से एक है, जो अपने गहरे चैनलों, रेत के टीलों और बीहड़ों (खड्डों) के माध्यम से एक अद्वितीय लोटिक (प्रवाही जल) पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करती है।

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