क्या ED एक ‘विधिक व्यक्ति’ है: सर्वोच्च न्यायालय | 23 Jan 2026
भारत के सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने तमिलनाडु और केरल द्वारा दायर याचिकाओं की सुनवाई के लिये सहमति दी है, जिनमें यह स्पष्टता मांगी गई है कि क्या प्रवर्तन निदेशालय (ED) एक ‘विधिक व्यक्ति (Juristic Person)’ है और अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों में याचिका दायर करने का अधिकार रखता है।
- ‘विधिक व्यक्ति’ एक गैर-मानवीय कानूनी इकाई होती है (जैसे- कोई निगम), जिसे कानून द्वारा अधिकार और कर्त्तव्यों वाला माना जाता है, जिसमें मुकदमा दायर करने या मुकदमे का सामना करने की क्षमता भी शामिल है।
- केरल के तर्क: राज्य ने तर्क दिया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने राज्य द्वारा नियुक्त जाँच आयोग (स्वर्ण तस्करी मामले से संबंधित) को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की, जबकि उसके पास ऐसा करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था।
- तमिलनाडु की स्थिति: केरल का समर्थन करते हुए तमिलनाडु ने आरोप लगाया कि ED ने अवैध खनन मामलों के संबंध में मद्रास उच्च न्यायालय से परमादेश याचिका मांगकर कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया और तर्क दिया कि ऐसी रिट याचिकाएँ "भ्रमित और असंगत" हैं।
- सांविधिक निकाय बनाम कॉर्पोरेट निकाय: दोनों राज्यों का तर्क है कि सांविधिक निकाय केवल वही अधिकार प्रयोग कर सकते हैं जो कानून द्वारा स्पष्ट रूप से प्रदान किये गए हों और ED को न तो FEMA, 1999 और न ही PMLA, 2002 के तहत मुकदमा दायर करने का अधिकार दिया गया है।
- कॉर्पोरेट निकाय के विपरीत, ED के पास विधिक व्यक्ति (Juristic Person) के रूप में अपना दर्जा पाने का कोई विशिष्ट संवैधानिक अधिकार नहीं है।
- न्यायिक मिसाल: दोनों राज्यों ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य वन संरक्षक, आंध्र प्रदेश सरकार बनाम कलेक्टर (2003) के निर्णय पर निर्भर किया, जिसमें यह स्थापित किया गया कि किसी कानूनी इकाई के मुकदमा दायर करने या मुकदमे का सामना करने की क्षमता सिर्फ प्रक्रिया का मामला नहीं बल्कि मौलिक विधि का विषय है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 की भूमिका
- अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मूलभूत अधिकारों के प्रवर्तन के लिये रिट (बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण ,अधिकार-पृच्छा) जारी करने का अधिकार प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 32 के विपरीत, अनुच्छेद 226 का दायरा अधिक व्यापक है, क्योंकि उच्च न्यायालय न केवल मौलिक अधिकारों के लिये, बल्कि "किसी अन्य उद्देश्य" हेतु भी रिट जारी कर सकते हैं, जिसमें कानूनी और वैधानिक अधिकार भी शामिल हैं।
- यह कार्यपालिका और प्रशासनिक कार्यों पर संवैधानिक नियंत्रण के रूप में कार्य करता है, जिससे सरकारी प्राधिकारियों की वैधता, निष्पक्षता एवं जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
- अनुच्छेद 226 के अंतर्गत व्यक्ति तथा कानूनी संस्थाएँ दोनों उच्च न्यायालय में जा सकते हैं, यदि उनके पास कानूनी अधिकार/लोकस स्टैंडी और कोई कानूनी रूप से प्रवर्तनीय अधिकार हो।
- यह केंद्र–राज्य संबंधों में भी अहम भूमिका निभाता है, क्योंकि इसके माध्यम से राज्य या प्राधिकरण केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई को चुनौती दे सकते हैं और उसी तरह केंद्र भी राज्य की कार्रवाइयों पर प्रश्न उठा सकता है।
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