उच्चतम न्यायालय ने गोद लेने वाली माताओं के लिये मातृत्व अवकाश को अनिवार्य किया | 19 Mar 2026

स्रोत: द हिंदू 

भारत के उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाया कि गोद लेने वाली माताएँ बच्चे की उम्र की परवाह किये बगैर मातृत्व अवकाश की हकदार हैं, न्यायालय ने मातृत्व अवकाश को मौलिक मानव अधिकार घोषित किया और केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश को एक सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने का आग्रह किया।

  • आयु प्रतिबंध हटाना: उच्चतम न्यायालय ने सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (जिसने नवंबर 2025 में मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 का स्थान लिया) की धारा 60(4) को असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण घोषित कर दिया।
    • इस प्रावधान ने पहले 12-सप्ताह के मातृत्व लाभ को सख्ती से केवल उन माताओं तक सीमित कर दिया था, जो तीन माह से कम उम्र के बच्चों को गोद लेती हैं।
    • न्यायालय ने कहा कि गोद लेने वाली माताओं को समान अधिकार हैं, जैसे जैविक माताओं को होते हैं। इसलिये मातृत्व अवकाश को गोद लिये गए बच्चे की उम्र के आधार पर प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है।
  • गोद लेने की व्यावहारिकता: पीठ ने कहा कि भारत में कानूनी गोद लेने की प्रक्रिया को पूरा होने में आमतौर पर तीन माह से अधिक समय लगता है, जिससे तीन माह की आयु सीमा पूरी तरह से अव्यावहारिक और "निरर्थक" हो जाती है।
  • प्रजनन स्वायत्तता का अधिकार: न्यायालय ने गोद लेने को "प्रजनन स्वायत्तता की अभिव्यक्ति" तक बढ़ा दिया, इस बात पर बल देते हुए कि एक परिवार साझा ज़िम्मेदारी, देखभाल और भावनात्मक बंधनों से बनता है, न कि केवल जैविकता से।
  • कार्यस्थल समानता उपाय के रूप में मातृत्व अवकाश: न्यायालय ने कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम "अपरिवारीकरण" (de-familisation) के एक साधन के रूप में कार्य करता है।
    • इसका अर्थ यह है कि यह वित्तीय सहायता के लिये एक महिला की अपने परिवार पर निर्भरता को कम करता है, सक्रिय रूप से उसकी आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है और यह सुनिश्चित करता है कि मातृत्व कार्यस्थल से बहिष्कार का कारण न बने।
  • लैंगिक असमानता को संबोधित करना: न्यायालय ने कहा कि मातृत्व अवकाश के बगैर माताएँ शीघ्र कार्यस्थल पर लौट सकती हैं, जिससे बच्चों की देखभाल बड़े भाई-बहनों पर आ सकती है।
    • यदि देखभाल करने वाली एक बालिका है, तो यह स्कूल छोड़ने का कारण बन सकता है, जिससे लैंगिक असमानता का चक्र मज़बूत हो सकता है।
  • पितृत्व अवकाश की कानूनी मान्यता का आह्वान: न्यायालय ने केंद्र सरकार से वैधानिक पितृत्व अवकाश शुरू करने का आग्रह किया, यह देखते हुए कि माता-पिता बनना एक साझा ज़िम्मेदारी है और इसमें केवल माँ की भूमिका नहीं है।
    • बचपन की देखभाल के दौरान पिता की अनुपस्थिति माता-पिता-बच्चे के बंधन और पारिवारिक सहायता प्रणालियों को प्रभावित कर सकती है।

और पढ़ें: तीसरे बच्चे के लिये मातृत्व