सशस्त्र बलों के कार्मिकों द्वारा पुस्तकों के प्रकाशन का विनियमन | 12 Feb 2026
पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे (सेवानिवृत्त) की अप्रकाशित पुस्तक फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी को लेकर उत्पन्न विवाद के बीच रक्षा मंत्रालय सेवारत तथा सेवानिवृत्त सशस्त्र बलों के कार्मिकों द्वारा पुस्तक प्रकाशन के लिये एक नई विनियामक रूपरेखा का मसौदा तैयार कर रहा है।
- सेवानिवृत्त कार्मिकों के लिये वर्तमान विधिक शून्यता: सेवारत कार्मिकों के विपरीत सेवानिवृत्त सेना अधिकारियों द्वारा पुस्तक लेखन को विशेष रूप से विनियमित करने वाला वर्तमान में कोई एक समेकित विधिक प्रावधान उपलब्ध नहीं है।
- यद्यपि वे प्रकाशनों के संदर्भ में सेना अधिनियम, 1950 तथा सेना नियम, 1954 के अधीन नहीं आते, तथापि विनियामक परिदृश्य अब भी एक “विधिक धूसर क्षेत्र” के रूप में बना हुआ है, जो प्रायः व्यक्तिगत विवेक पर निर्भर करता है।
- शासकीय गुप्त बात अधिनियम (OSA) का लागू होना: शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 सेवानिवृत्ति के पश्चात भी आजीवन कार्मिकों पर लागू रहता है।
- वर्गीकृत सूचनाओं, परिचालन संबंधी विवरणों अथवा राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रतिकूल सामग्री का प्रकटीकरण विधि के अंतर्गत दंडनीय अपराध बना रहता है।
- सेवारत कार्मिकों के लिये विनियम: राष्ट्रीय हित से संबंधित विषय-वस्तु के प्रकाशन हेतु संबंधित रक्षा सेवाओं के भीतर अनुमति प्रदान करने की एक निर्धारित प्रक्रिया विद्यमान है तथा किसी भी त्रुटिपूर्ण या अवैध प्रकटीकरण से निपटने के लिये विधिक प्रावधान उपलब्ध हैं।
- किसी भी साहित्यिक अथवा पारिश्रमिक गतिविधि आरंभ करने से पूर्व लिखित अनुमति अनिवार्य है।
- यह सुनिश्चित करने हेतु कि किसी भी प्रकार के परिचालन विवरण, खुफिया जानकारी या आंतरिक प्रक्रियाओं से समझौता न हो, विषय-वस्तु को जाँच हेतु सीरीज़ ऑफ कमांड (सेना मुख्यालय या रक्षा मंत्रालय तक) के माध्यम से प्रेषित किया जाता है।
- सिविल सेवकों के साथ तुलना: सरकार ने वर्ष 2021 में केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियमों में संशोधन किया था।
- इस संशोधन के अंतर्गत खुफिया या सुरक्षा से संबंधित संगठनों, जैसे– अनुसंधान एवं विश्लेषण विंग (RAW) तथा इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) से सेवानिवृत्त अधिकारियों को सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना संवेदनशील सूचना प्रकाशित करने से विशेष रूप से प्रतिबंधित किया गया है।
- रक्षा मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित दिशा-निर्देश: प्रस्तावित नई रूपरेखा का उद्देश्य पांडुलिपियों की स्वीकृति प्रक्रिया का मानकीकरण करना है। इसमें वर्तमान सेवा नियमों तथा शासकीय गुप्त बात अधिनियम के प्रावधानों को समाहित करते हुए पूर्व सैनिकों के संबंध में विद्यमान विनियामक अंतराल को समाप्त करने का प्रयास किया गया है।