RBI द्वारा नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड अनुबंधों पर प्रतिबंध | 04 Apr 2026

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के बीच ऑफशोर करेंसी मेनीपुलेशन को रोकने और भारतीय रुपये (INR) को स्थिर करने के लिये बैंकों के नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDD) अनुबंधों में भागीदारी को प्रतिबंधित कर दिया है।

  • निर्देश के बाद, काल्पनिक दबाव (सट्टे के उद्देश्य से) कम होने के कारण रुपये में तेज़ी से सुधार हुआ, जो अमेरिकी डॉलर की तुलना में 93.10 पर आ गया।
  • एक अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू रिलेटेड पार्टी ट्रांजेक्शन (RPT) पर RBI का प्रतिबंध है, जो एक ऐसा कदम है जिसे इंट्रा-ग्रुप ट्रांजेक्शन को या मुनाफे और जोखिमों को क्षेत्राधिकारों में स्थानांतरित करने के लिये उपयोग किये जाने से रोकने के लिये डिज़ाइन किया गया है।

नॉन-डिलीवरेबल डेरिवेटिव

  • परिचय: नॉन-डिलीवरेबल डेरिवेटिव (NDD) एक वित्तीय अनुबंध है, जिसका उपयोग उन मुद्राओं पर हेजिंग या सट्टा लगाने के लिये किया जाता है जो गैर-परिवर्तनीय हैं या स्ट्रिक्ट कैपिटल कंट्रोल के अंतर्गत आते हैं।
    • एक मानक डेरिवेटिव के विपरीत, जहाँ अंतर्निहित परिसंपत्ति का भौतिक रूप से आदान-प्रदान किया जाता है, NDD को सख्ती से एक स्वतंत्र रूप से परिवर्तनीय मुद्रा (आमतौर पर अमेरिकी डॉलर) का रूप दिया जाता है।
  • कार्य व्यवस्था: एक NDD में दो मुद्राओं की "मूल" राशि का कोई आदान-प्रदान नहीं होता है। इसके बजाय, पक्षकार "अनुबंध दर" और "निर्धारण तिथि" पर सहमत होते हैं।
    • निर्धारण तिथि पर बाज़ार विनिमय दर (स्पॉट रेट) की तुलना एग्रीड कॉन्ट्रैक्ट रेट से की जाती है।
    • कॉन्ट्रैक्ट रेट और स्पॉट रेट के मध्य के अंतर का आकलन किया जाता है। इसके पश्चात घाटे में रहने वाला पक्ष लाभ प्राप्त करने वाले पक्ष को इस अंतर की राशि का भुगतान USD जैसी किसी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर परिवर्तनीय मुद्रा में करता है।
  • NDDs की मुख्य विशेषताएँ:
    • ऑफशोर ट्रेडिंग: इनका व्यापार आमतौर पर सिंगापुर, लंदन या दुबई जैसे विदेशी वित्तीय केंद्रों में किया जाता है, ताकि घरेलू नियमों, जैसे कि गृह देश के पूंजी खाता नियंत्रण से बचा जा सके। भारत में NDD मुख्यतः नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (Non-Deliverable Forward-NDF) के रूप में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा विनियमित किये जाते हैं।
    • कोई भौतिक डिलीवरी नहीं: इसमें व्यक्ति वास्तव में ‘प्रतिबंधित’ मुद्रा (जैसे– चीनी युआन या भारतीय रुपया) को भौतिक रूप से प्राप्त या सँभालता नहीं है।
    • नकद-निपटान: इसमें सभी लेन-देन का अंतिम निपटान एक प्रमुख वैश्विक मुद्रा में शुद्ध नकद भुगतान के रूप में किया जाता है।
  • चिंताएँ: इन उपकरणों की लंबे समय से आलोचना की जाती रही है क्योंकि ये मूल्य खोज को विकृत करते हैं और बाज़ार में हेरफेर को संभव बनाते हैं, क्योंकि ऑफशोर बाज़ार की धारणा अक्सर घरेलू मूलभूत कारकों से अलग होती है।
    • कुछ बाज़ार प्रतिभागियों ने NDF बाज़ार का दुरुपयोग किया, उन्होंने अनुबंधों को रद्द करके फिर से प्रवेश करके कीमतों में उतार-चढ़ाव का फायदा उठाया, जिससे हेजिंग के उपकरण वास्तव में सट्टेबाज़ी के साधन बन गए। 
    • इसके अतिरिक्त बड़े ऑफशोर ट्रेडर्स भू-राजनीतिक और व्यापारिक तनावों का लाभ उठाकर रुपये के खिलाफ बड़े पैमाने पर पोज़िशन लेते हैं, जिससे नीचे की ओर दबाव बनता है और भारत के ऑनशोर बाज़ार पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।

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