निपाह वायरस | 13 Jan 2026

स्रोत: द हिंदू 

पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्यकर्मियों के बीच निपाह वायरस संक्रमण के दो संदिग्ध मामलों ने राज्य और केंद्र स्तर पर त्वरित सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया को सक्रिय कर दिया है, जो उच्च-जोखिम वाले जूनोटिक रोगों के प्रति भारत की तैयारियों को उजागर करता है।

  • निपाह वायरस (NiV): यह एक अत्यधिक संक्रामक जूनोटिक वायरस है, जिसे सबसे पहले वर्ष 1998-99 में मलेशिया के कंपुंग सुंगई निपाह में पहचाना गया था।
    • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, यह वायरस पशुओं से मनुष्यों में संचरित होता है, जिसमें फलाहारी चमगादड़ (Pteropodidae) प्राकृतिक भंडार के रूप में कार्य करते हैं और सूअर मध्यस्थ मेज़बान होते हैं। यह वायरस पैरामाइक्सोविरिडे परिवार के हेनिपावायरस वंश से संबंधित है।
    • इसमें मनुष्य से मनुष्य में संचरण की क्षमता होती है, जिससे यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम बन जाता है और इसके लिये त्वरित निगरानी और रोकथाम आवश्यक होती है।
  • लक्षण और नैदानिक विशेषताएँ: निपाह संक्रमण आमतौर पर इन्फ्लूएंज़ा जैसे लक्षणों के साथ शुरू होता है, जैसे– बुखार, माँसपेशियों में दर्द, गले में खराश और श्वसन संबंधी कठिनाइयाँ।
    • गंभीर मामलों में यह तीव्र मस्तिष्क शोथ (Acute Encephalitis) तक बढ़ सकता है, जिसके परिणामस्वरूप दौरे, मानसिक भ्रम, कोमा और यहाँ तक कि मृत्यु हो सकती है।
    • महत्त्वपूर्ण रूप से, लक्षणहीन (Asymptomatic) संक्रमण की भी रिपोर्टें हैं, जो रोकथाम और नियंत्रण प्रयासों को जटिल बनाती हैं।
  • निदान और परीक्षण: निपाह वायरस (NiV) को बायोसुरक्षा स्तर-4 (BSL-4) रोगजनक के रूप में वर्गीकृत किया गया है और इसके परीक्षण के लिये उच्च-सुरक्षा प्रयोगशालाओं की आवश्यकता होती है।
  • उपचार और रोकथाम: निपाह वायरस के लिये मानव या पशु दोनों में कोई अनुमोदित टीका उपलब्ध नहीं है।
    • उपचार मुख्यतः गहन सहायक देखभाल (Intensive Supportive Care) और अलगाव (Isolation) पर आधारित होता है। भारत, विशेषकर केरल में मोनोक्लोनल एंटीबॉडी और एंटीवायरल दवाओं, जैसे– रेमडेसिविर (Remdesivir) के उपयोग से उपचार के परिणाम बेहतर हुए हैं, जिससे मृत्यु दर वर्ष 2018 के 91% से घटकर 2023-25 तक लगभग 33% तक पहुँच गई है।
  • भारत और निपाह प्रकोप: भारत ने पश्चिम बंगाल (2007) तथा केरल (2018, 2023 एवं 2025) में निपाह प्रकोप देखे हैं, जिससे शीघ्र पहचान, संपर्क पता लगाना व त्वरित चिकित्सा प्रतिक्रिया सार्वजनिक स्वास्थ्य तैयारी के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

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