भारत की साइबर सुरक्षा संरचना का सुदृढ़ीकरण | 28 Jan 2026

यह लेख 27/01/2026 को द हिंदू में प्रकाशित “Cybercrime and the crisis of global governance” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख इस बात पर प्रकाश डालता है कि साइबर अपराध के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन को लेकर मतभेद किस प्रकार वैश्विक डिजिटल शासन में एक गंभीर संकट को दर्शाते हैं, जो भारत की साइबर संप्रभुता और संस्थागत स्वायत्तता के लिये रणनीतिक चुनौतियाँ उत्पन्न करता है।

प्रिलिम्स के लिये: भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C), CERT-IN, संचार साथी, भारत 6G एलायंस, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 

मेन्स के लिये: भारत में बढ़ते साइबर खतरे, साइबर खतरों से निपटने के लिये भारत द्वारा अपनाए गए रणनीतिक उपाय और देश की साइबर सुरक्षा संरचना को सुदृढ़ बनाने के लिये आवश्यक उपाय।

तीव्र गति से विभाजित होती वैश्विक डिजिटल व्यवस्था में साइबर सुरक्षा अब रणनीतिक स्वायत्तता की एक निर्णायक कसौटी बन चुकी है। साइबर अपराध के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन से उत्पन्न मतभेद साइबर क्षेत्र के शासन में साझा सिद्धांतों और विवादित प्रथाओं के बीच बढ़ते अंतराल को उजागर करते हैं। जैसे-जैसे साइबर खतरे अंतर्राष्ट्रीय और प्रौद्योगिकी-आधारित होते जा रहे हैं, भारत जैसे देशों को अपने डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखने के साथ-साथ डेटा और विनियमन पर संस्थागत नियंत्रण बनाए रखने की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में, साइबर सुरक्षा अब केवल रक्षात्मक नहीं रह गई है, बल्कि यह वैश्विक डिजिटल शासन में भारत की केंद्रीय भूमिका का आधार बन गई है।

भारत को किन प्रमुख साइबर खतरों का सामना करना पड़ रहा है?

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा संचालित और स्वचालित साइबर हमले: साइबर अपराध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के एकीकरण ने हमलों के स्तर, गति और परिष्कार में उल्लेखनीय वृद्धि की है। 
    • AI का उपयोग अत्यधिक विश्वसनीय फिशिंग ईमेल, डीप फेक ऑडियो/वीडियो प्रतिरूपण और ऐसे अनुकूलित मैलवेयर तैयार करने में किया जा रहा है, जो पारंपरिक पहचान प्रणालियों से बच सकते हैं।
    • स्वचालित भेद्यता स्कैनिंग हमलावरों को वास्तविक समय में प्रणालियों की कमज़ोरियों की पहचान कर उनका दुरुपयोग करने की सुविधा देती है, जिसके परिणामस्वरूप साइबर सुरक्षा एक निवारक व्यवस्था के बजाए अधिकतर प्रतिक्रियात्मक बनती जा रही है।
      • भारत के लिये, जिसकी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना तीव्र गति से बढ़ रही है, AI-संचालित हमले प्रणालीगत जोखिम उत्पन्न करते हैं।
      • वर्ष 2024–25 के दौरान, भारतीय बैंकों और NBFCs ने AI-निर्मित फिशिंग ईमेल तथा वॉयस-क्लोनिंग घोटालों में वृद्धि की सूचना दी, जिनमें धोखेबाज़ों ने वरिष्ठ अधिकारियों का रूप धारण कर डीप-फेक ऑडियो के माध्यम से धन हस्तांतरण को अधिकृत करवाने का प्रयास किया।
  • रैनसमवेयर और मैलवेयर-एज़-ए-सर्विस (MaaS): रैनसमवेयर एक पृथक आपराधिक गतिविधि से विकसित होकर एक संगठित, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मॉडल का रूप ले लिया है।
    • MaaS कम कुशल हमलावरों को भी तैयार उपकरण किराए पर लेकर जटिल साइबर हमले करने में सक्षम बनाता है। हाल के वर्षों में CERT-In को रिपोर्ट किये गए शीर्ष तीन साइबर खतरों में रैनसमवेयर प्रमुख था।
    • कमज़ोर साइबर सुरक्षा और कम रिकवरी क्षमता के कारण स्वास्थ्य सेवा, नगरपालिका सेवाएँ, शिक्षा और लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) जैसे भारतीय क्षेत्र तेज़ी से लक्षित किये जा रहे हैं।
    • उदाहरण के लिये, वर्ष 2022 में AIIMS दिल्ली एक बड़े रैनसमवेयर हमले का शिकार हुआ, जिसने लगभग दो सप्ताह तक रोगी पंजीकरण, प्रयोगशाला सेवाओं और OPD संचालन को ठप्प कर दिया, जिससे महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों में कमज़ोरियाँ उजागर हुईं।
  • डेटा उल्लंघन और क्लाउड कमज़ोरियों का शोषण: जैसे-जैसे भारतीय संस्थान तेज़ी से क्लाउड-आधारित प्रणालियों में स्थानांतरित हो रहे हैं, गलत विन्यास, कमज़ोर पहुँच नियंत्रण और कमज़ोर एन्क्रिप्शन प्रथाएँ प्रमुख कमज़ोरियों के रूप में सामने आई हैं।
    • व्यापक डेटा लीक होने से संवेदनशील व्यक्तिगत, वित्तीय और बायोमेट्रिक डेटा (जैसे, आधार डेटा लीक) को उजागर करता है, जिससे डिजिटल शासन में नागरिकों का विश्वास कम हो जाता है। 
      • उदाहरण के लिये, वर्ष 2023 में CoWIN लाभार्थियों से संबंधित डेटा, जिसमें नाम, आधार से जुड़े विवरण और फोन नंबर शामिल थे, कथित तौर पर एक टेलीग्राम बॉट के माध्यम से सुलभ था, जो मुख्य डेटाबेस के बजाए एक्सेस नियंत्रण और तृतीय-पक्ष एकीकरण में कमज़ोरियों को उजागर करता है।
    • इस तरह के उल्लंघन के सीमा पार भी निहितार्थ होते हैं, जिससे कानून प्रवर्तन और जवाबदेही जटिल हो जाती है।
  • सामाजिक इंजीनियरिंग और डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी: साइबर अपराधी तकनीकी कमज़ोरियों के बजाए मानवीय व्यवहार का अधिक से अधिक लाभ उठा रहे हैं, जैसा कि 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम में देखा गया।
    • UPI आधारित धोखाधड़ी, सिम-स्वैप हमले और फर्जी निवेश प्लेटफॉर्म पहली बार डिजिटल तकनीक का उपयोग करने वाले उपयोगकर्त्ताओं को असमान रूप से प्रभावित करते हैं। 
    • यह तीव्र वित्तीय समावेशन और डिजिटल साक्षरता के बीच के अंतर को दर्शाता है, जिससे नागरिक साइबर सुरक्षा में सबसे कमज़ोर कड़ी बन जाते हैं।
    • केवल वर्ष 2024 में भारतीय नागरिकों ने साइबर धोखाधड़ी के कारण 22,845 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय हानि को झेला, जो वर्ष 2023 में 7,465 करोड़ रुपये की हानि की तुलना में 206% अधिक थी।
  • महत्त्वपूर्ण सूचना अवसंरचना (CII) पर हमले: भारत का विद्युत ग्रिड, दूरसंचार नेटवर्क, परिवहन नेटवर्क और वित्तीय बाज़ार साइबर हमलों के उच्च-मूल्य वाले लक्ष्य बनते जा रहे हैं। इन पर हमलों से सार्वजनिक व्यवस्था, आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
    • ऑपरेशनल टेक्नोलॉजी (OT) और IT सिस्टम के बीच बढ़ते अंतरसंबंध ने साइबर स्पेस के आँकड़ों को बढ़ावा दिया है। ऐसे खतरनाक साइबर अपराध और साइबर युद्ध के बीच की  रेखा को धुंधला कर देता है।
      • उदाहरण के लिये, अक्तूबर 2020 में, विदेशी तत्त्वों द्वारा किये गए एक मैलवेयर हमले ने मुंबई के विद्युत नेटवर्क को प्रभावित किया, जिससे व्यापक स्तर पर बिजली की कटौती हुई और साइबर-भौतिक दावों के बारे में चिंताएँ बढ़ गईं।
  • एडवांस्ड पर्सिस्टेंट थ्रेट्स (APT) और राज्य-प्रायोगिक जासूस: APT में प्रशिक्षित और गुप्त साइबर घुसपैठिये शामिल होते हैं जिसका उद्देश्य जासूसी करना होता है।
    • भारत को रक्षा अनुसंधान, अनुसंधान संस्थान और सरकारी दस्तावेजों की सुरक्षा में इन APT खतरों का सामना करना पड़ता है।
    • इन खतरों का पता लगाना और उन्हें पहचानना प्रायः चुनौतीपूर्ण होता है, जिससे एंजलर्स को लंबे समय तक संवेदनशील जानकारी चुराने का अवसर मिलता है। एडवांस्ड पर्सिस्टेंट थ्रेट (APT) समूह साइबर स्पेस के भू-राजनीतिकरण में सक्रिय रुचि रखते हैं।
      • रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में महाराष्ट्र साइबर ने सात एडवांस्ड पर्सिस्टेंट थ्रेट समूहों की पहचान की, जिन्होंने पहलगाम आतंकी हमले के बाद संपूर्ण भारत में महत्त्वपूर्ण अवसंरचना वेबसाइटों पर 15 लाख से अधिक साइबर हमले किये।
  • इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और पहचान-आधारित खतरे: स्मार्ट मीटर, कैमरे, चिकित्सा उपकरण और औद्योगिक सेंसर जैसे IoT उपकरण के तीव्र प्रसार ने भारत में साइबर खतरे की दर में वृद्धि की है। कई उपकरणों में बुनियादी सुरक्षा सुविधाओं जैसे नियमित अपडेट या मज़बूत प्रमाणीकरण का अभाव है।
    • साथ ही, पहचान की चोरी और कृत्रिम पहचान का उपयोग प्रमाणीकरण प्रणालियों को दरकिनार करने, धोखाधड़ी करने और अनधिकृत पहुँच प्राप्त करने के लिये किया जा रहा है। ये खतरे पारंपरिक सीमा-आधारित सुरक्षा मॉडलों के लिये चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
      • उदाहरण के लिये भारतीय शहरों में हैक किये गए CCTV कैमरों और राउटरों का उपयोग DDoS हमलों के लिये बॉटनेट बनाने में किया गया है।

भारत ने बढ़ते साइबर खतरों से निपटने के लिये क्या उपाए किये हैं? 

  • संस्थागत सुदृढ़ीकरण - I4C और 'प्रतिबिंब': संगठित धोखाधड़ी के 'जामतारा मॉडल' के विरुद्ध डेटा-आधारित युद्ध छेड़ने के लिये भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) को गृह मंत्रालय के 'संलग्न कार्यालय' के रूप में उन्नत किया गया है।
    • 'प्रतिबिंब' सॉफ्टवेयर को संचालित करके, राज्य अब साइबर अपराधियों द्वारा उपयोग किये जाने वाले सक्रिय सिम कार्डों के भौगोलिक स्थान का वास्तविक समय में मानचित्रण कर सकता है, जिससे केवल डिजिटल अवरोध ही नहीं बल्कि भौतिक छापेमारी मारना भी संभव हो जाता है।
    • प्रतिबिंब मॉड्यूल ने 6,000 से अधिक आरोपियों को गिरफ्तार करने, 17,000 से अधिक आपराधिक संबंधों का खुलासा करने और संपूर्ण भारत में 36,000 से अधिक साइबर जाँच में सहायता करके साइबर अपराध प्रवर्तन को मज़बूत किया है।
  • रणनीतिक स्वदेशीकरण- परियोजना माया और चक्रव्यूह: विदेशी सॉफ्टवेयर में मौजूद 'बैकडोर' कमज़ोरियों को दूर करने के लिये, रक्षा मंत्रालय ने इंटरनेट से जुड़े सभी रक्षा टर्मिनलों में माइक्रोसॉफ्ट विंडोज को स्वदेशी 'माया ओएस' (Ubuntu आधारित) से बदल दिया है।
    • इसे 'चक्रव्यूह' नामक एक विशेष एंडपॉइंट डिटेक्शन सिस्टम से कनेक्ट किया गया है, जो एक विशेष एंडपॉइंट डिटेक्शन सिस्टम है और APT समूहों की पार्श्व गतिविधि को फँसाने के लिये एक भ्रामक परत  बनाता है।
  • नियामकीय 'सख्ती' - CERT-In की 6-घंटे की रिपोर्टिंग अनिवार्यता: सरकार ने सभी सेवा प्रदाताओं और डेटा केंद्रों के लिये साइबर घटनाओं का पता चलने के छह घंटे के भीतर CERT-In को रिपोर्ट करना अनिवार्य कर दिया है। 
    • वर्ष 2025 में, CERT-In ने 29.44 लाख से अधिक साइबर घटनाओं का प्रबंधन किया, 1,530 अलर्ट, 390 भेद्यता नोट और 65 सलाह जारी कीं, जो बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय साइबर प्रतिक्रिया क्षमता को दर्शाती हैं।
  • आपूर्ति शृंखला सुरक्षा- 'विश्वसनीय दूरसंचार पोर्टल' और NCRF: हार्डवेयर को एक ट्रोजन हॉर्स के रूप में मानते हुए, सरकार ने 'विश्वसनीय दूरसंचार पोर्टल' को सक्रिय किया, जो दूरसंचार ऑपरेटरों को 'अविश्वसनीय' देशों मुख्य रूप से चीन) से उपकरण प्राप्त करने से रोकता है।
    • साथ ही, महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को मार्गदर्शन प्रदान करने के लिये राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा संदर्भ ढाँचा (NCRF 2024) को अंतिम रूप दे दिया गया है।
    • उदाहरण के लिये, राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र (NCIIPC) अब प्रमुख महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों (जैसे विद्युत) का सक्रिय रूप से ऑडिट करता है।
      • इसके अतिरिक्त, BSNL का 4G रोलआउट पूरी तरह से 'विश्वसनीय स्रोत' मानकों के अनुरूप है।
  • नागरिक-केंद्रित फायरवॉल - संचार साथी और चक्षु: संचार साथी के शुभारंभ ने नागरिकों को अपने नाम पर पंजीकृत अज्ञात मोबाइल कनेक्शनों की पहचान करने और उन्हें डिस्कनेक्ट करने की सुविधा देकर थ्रेट इंटेलिजेंस का लोकतंत्रीकरण किया है।
    • इसे वर्ष 2024 में शुरू की गई 'चक्षु' सुविधा से और सशक्त किया गया है, जो संदिग्ध धोखाधड़ी संचार (कॉल/व्हाट्सएप) का डेटा क्राउडसोर्स कर उसे एक केंद्रीकृत AI प्रणाली में भेजती है, जो सभी दूरसंचार नेटवर्कों में बार-बार अपराध करने वालों को स्वतः ब्लैकलिस्ट कर देती है।
    • उदाहरण के लिये दिसंबर 2025 तक, संचार साथी पहल के अंतर्गत 42 लाख से अधिक चोरी या गुम हुए मोबाइल उपकरणों को सफलतापूर्वक ब्लॉक किया जा चुका है।
  • साइबर स्वच्छता का संवर्द्धन - साइबर स्वच्छता केंद्र (CSK): DDoS हमलों में प्रयुक्त बॉटनेट जैसे 'मूक' खतरों से निपटने हेतु सरकार बॉटनेट क्लीनिंग और मैलवेयर विश्लेषण केंद्र संचालित कर रही है।
    • यह सुविधा ISP नेटवर्क पर संक्रमित उपकरणों का पता लगाती है और नागरिकों को मुफ्त 'क्लीनिंग टूल्स' प्रदान करती है, जिससे उपयोगकर्त्ता के हस्तक्षेप के बिना ही उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को साफ करके देश की 'अटैक सरफेस' को सक्रिय रूप से कम किया जा सकता है।
  • संप्रभुता का संरक्षण– भारत 6G एलायंस: 5G के अनुभव से सीखते हुए, भारत अब 6G मानकों को सक्रिय रूप से आकार दे रहा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य के नेटवर्क विदेशी स्वामित्व वाली तकनीक पर निर्भर होने के बजाए 'डिजाइन द्वारा सुरक्षित' हों।
    • इस पहल का उद्देश्य सुरक्षा प्रोटोकॉल से जुड़ी बौद्धिक संपदा पर अधिकार प्राप्त करना है, जिससे अगली पीढ़ी का महत्त्वपूर्ण दूरसंचार ढाँचा किसी बाहरी 'किल स्विच' या निगरानी बैकडोर से मुक्त रह सके।
    • भारत 6G विज़न के तहत वर्ष 2030 तक वैश्विक 6G पेटेंटों में 10% हिस्सेदारी का लक्ष्य रखा गया है, ताकि सुरक्षा मानकों को दिशा दी जा सके।
    • इसके अलावा भारत के योगदान से ITU के 6G फ्रेमवर्क में अब “सर्वव्यापी कनेक्टिविटी” को प्रमुख उपयोग परिदृश्य के रूप में शामिल किया गया है तथा कवरेज, अंतरसंचालनीयता और स्थिरता को 6G क्षमताओं का अभिन्न अंग माना गया है।
  • विधायी निवारण-  डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम 2023: "दिशानिर्देशों" से आगे बढ़कर "वैधानिक दायित्व" की ओर संक्रमण करते हुए, यह अधिनियम लापरवाही का "जुर्माना" निर्धारित कर कॉर्पोरेट सुरक्षा संस्कृति को मौलिक रूप से परिवर्तित करता है।
    • यह अनिवार्य करता है कि कंपनियाँ (डेटा फिड्यूशरीज़) न केवल अनुपालन के लिये बल्कि भारी वित्तीय दंड से बचने के लिये मज़बूत एन्क्रिप्शन और सुरक्षा उपायों को लागू करें, जिससे साइबर सुरक्षा एक तकनीकी विषय से आगे बढ़कर बोर्ड-स्तरीय प्राथमिकता बन जाती है।
      • उदाहरण के लिये, डेटा फिड्यूशरी द्वारा उचित सुरक्षा उपायों को बनाए रखने में विफलता पर ₹250 करोड़ तक का अधिकतम जुर्माना लागू होता है।
  • ये सभी प्रावधान मिलकर भारत को वैश्विक साइबर शासन ढाँचे में एक महत्त्वपूर्ण हितधारक के रूप में स्थापित करते हैं, जो जवाबदेही-आधारित डेटा संरक्षण मानकों की ओर एक बदलाव का संकेत देते हैं।

वैश्विक साइबर शासन संरचना

  • विधिक एवं संधि संरचना (हार्ड लॉ): विधिक परिदृश्य दो प्रमुख संधियों के बीच विभाजित है:

विशेषता

बुडापेस्ट कन्वेंशन 

साइबर अपराध के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन 

उत्पत्ति 

यूरोपीय परिषद्

संयुक्त राष्ट्र 

केंद्र

साइबर अपराध से निपटने हेतु सीमा-पार डेटा तक पहुँच के लिये प्रक्रियात्मक शक्तियों पर ज़ोर देता है।

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के साझाकरण में रोकथाम तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर ज़ोर देता है।

आलोचना

आलोचकों का तर्क है कि यह आक्रामक निगरानी को सक्षम बनाता है और इसमें पर्याप्त मानवाधिकार संरक्षण का अभाव है। (भारत इसका पक्षकार नहीं है)

आलोचकों का तर्क है कि यह संधि “साइबर अधिनायकवाद” को बढ़ावा दे सकती है। (भारत ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं)

  • टालिन मैनुअल (2.0): यद्यपि यह कोई संधि नहीं है, यह शैक्षणिक मैनुअल व्याख्या करता है कि विद्यमान युद्ध कानून साइबर अभियानों पर किस प्रकार लागू होते हैं (उदाहरण के लिये, कोई हैक कब “सशस्त्र हमला” माना जाएगा, जिससे आत्मरक्षा को औचित्य प्राप्त हो)।
  • बहु-हितधारक मानक प्रणाली (सॉफ्ट पावर): चूँकि इंटरनेट अवसंरचना का अधिकांश हिस्सा निजी क्षेत्र के स्वामित्व में है, इसलिये सरकारें अकेले शासन नहीं कर सकतीं। इस प्रणाली में “सॉफ्ट लॉ” आधारित स्वैच्छिक समझौते सम्मिलित हैं, जिनमें प्रौद्योगिकी कंपनियाँ (माइक्रोसॉफ्ट, गूगल) तथा नागरिक समाज भी शामिल होते हैं।
  • पेरिस कॉल फॉर ट्रस्ट एंड सिक्योरिटी (2018): यह एक घोषणा है, जो राज्यों, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज संगठनों (जो न तो सरकार से जुड़े हैं और न ही निजी क्षेत्र से) से साइबर क्षेत्र में सुरक्षा को बढ़ावा देने, दुष्प्रचार से निपटने तथा नागरिकों और अवसंरचना को संकट में डालने वाले नए खतरों का समाधान करने हेतु मिलकर कार्य करने का आह्वान करती है।
  • क्राइस्टचर्च कॉल: इसका मुख्य उद्देश्य ऑनलाइन आतंकवादी और हिंसक चरमपंथी सामग्री को समाप्त करना है (यह वर्ष 2019 में न्यूज़ीलैंड की मस्जिद में हुई गोलीबारी की घटना के बाद अस्तित्व में आया)।
  • साइबर सुरक्षा प्रौद्योगिकी समझौता: यह अपने ग्राहकों और उपयोगकर्त्ताओं की सुरक्षा करने और उन्हें दुर्भावनापूर्ण खतरों से बचाने में मदद करने के लिये प्रतिबद्ध वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों के बीच सहयोग को बढ़ावा देता है, जिससे एक अधिक सुरक्षित ऑनलाइन विश्व का निर्माण हो।
  • संबंधित चिंताएँ: 
    • बहुकेंद्रीयता का उदय: संयुक्त राष्ट्र को अमेरिकी वित्त पोषण में कमी, सुरक्षा परिषद की निष्क्रियता और विश्व व्यापार संगठन की विवाद निपटान प्रणाली का विघटन जैसी कमज़ोर बहुपक्षीय संस्थाओं ने साइबर शासन को बहुकेंद्रीय व्यवस्था की ओर धकेल दिया है। 
    • यह व्यवस्था द्विपक्षीय और बहुपक्षीय (plurilateral) व्यवस्थाओं के आच्छादित नेटवर्क पर निर्भर करती है, जिससे जटिलता बढ़ती है और राज्यों की क्षमता पर दबाव पड़ता है।
    • डेटा संप्रभुता और सीमा पार डेटा प्रवाह: हालाँकि विश्वसनीय भागीदारों के बीच डेटा साझाकरण पर सहमति है, लेकिन संप्रभुता से समझौता किये बिना इसे लागू करने के लिये कोई सहमत वैश्विक तंत्र उपलब्ध नहीं है।
    • राज्य प्रायोजित साइबर जासूसी: प्रमुख शक्तियाँ जासूसी और प्रभाव अभियानों के लिये साइबर उपकरणों का तेज़ी से उपयोग कर रही हैं, जिससे अपराध, युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच की रेखा धुंधली हो रही है। 
      • उदाहरण के लिये, रूस पर वर्ष 2016 के संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया गया था

भारत की साइबर सुरक्षा संरचना से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं? 

  • संस्थागत विखंडन और 'पृथक' कमान: यह संरचना एक एकीकृत 'साइबर कमान' की कमी से ग्रस्त है, जिसमें ज़िम्मेदारियाँ कई एजेंसियों (CERT-In, NCIIPC, NTRO) में विभाजित हैं जो प्रायः पृथक रूप से काम करती हैं। 
    • एकल कार्यकारी प्राधिकरण के अभाव में यह अतिव्यापी क्षेत्राधिकार बड़े पैमाने पर राज्य-प्रायोजित साइबर अटैक्स के दौरान पहचान और समन्वित प्रतिक्रिया में महत्त्वपूर्ण विलंब उत्पन्न करता है, जिससे प्रशासनिक समन्वय के कारण शमन का 'स्वर्ण समय' व्यर्थ हो जाता है।
  • 'हार्डवेयर सॉवरेनिटी' अंतर (आपूर्ति शृंखला जोखिम): भारत का महत्त्वपूर्ण अधोसंरचना विदेशी स्रोतों से प्राप्त हार्डवेयर (सेमीकंडक्टर, राउटर, CCTV) पर खतरनाक रूप से निर्भर है, जिससे 'ट्रोजन हॉर्स' का खतरा उत्पन्न होता है, जहाँ एम्बेडेड बैकडोर सॉफ्टवेयर फायरवॉल को बायपास कर सकते हैं। 
    • इस निर्भरता का मतलब यह है कि 'माया' जैसे स्वदेशी ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ भी, अंतर्निहित फिजिकल लेयर भू-राजनीतिक तनाव के दौरान सक्रिय होने वाले विदेशी 'किल स्विच' के प्रति संवेदनशील बनी रहती है।
    • उदाहरण के लिये, भारत दूरसंचार उपकरणों के आयात में विश्व में अग्रणी है, जहाँ उसने 47,974 शिपमेंट किये हैं और विदेशी निर्मित IoT घटक देश के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के लिये एक बड़ा खतरा हैं।
  • महत्त्वपूर्ण अवसंरचना 'एयर-गैप' भ्रांति: बिजली और रेलवे जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र अप्रचलित परिचालन प्रौद्योगिकी (OT) पर निर्भर हैं, जिसे कभी भी इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिये डिज़ाइन नहीं किया गया था, लेकिन अब इसे लापरवाही से डिजिटाइज़ किया जा रहा है। 
    • आईटी और ओटी के इस एकीकरण से असुरक्षित पुराने सिस्टम आधुनिक रैंसमवेयर के शिकार हो जाते हैं, क्योंकि ऑपरेटरों को गलतफहमी होती है कि वे 'एयर-गैप' (ऑफलाइन नेटवर्क) के पीछे सुरक्षित हैं, जिन्हें विक्रेता के रख-रखाव लैपटॉप के माध्यम से आसानी से भेदा जा सकता है।
    • उदाहरण के लिये, ऑयल इंडिया लिमिटेड (असम) को फिरौती की मांग वाले साइबर हमले (2022) का सामना करना पड़ा, जिससे उसका परिचालन ठप हो गया।
  • कौशल-अंतर” और AI-प्रेरित असममिति: वैश्विक आईटी केंद्र होने के बावजूद, भारत में विशिष्ट 'ब्लू टीम' (रक्षा करने वाले) और 'रेड टीम' (आक्रामक) रणनीतिकारों की गंभीर कमी है, जिससे नेटवर्क स्वचालित एआई हमलों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। 
    • वर्तमान कार्यबल को सामान्य IT सहायता में प्रशिक्षित किया गया है, न कि परिष्कृत, AI-जनित बहुरूपी (polymorphic) मैलवेयर से निपटने में, जो मानव रक्षकों की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से विकसित हो जाता है।
      • उदाहरण के लिये वर्तमान में भारत में साइबर सुरक्षा भूमिकाओं के लिये लगभग 25,000 से 30,000 रिक्त पद उपलब्ध हैं, जो इस कौशल-अंतर की गंभीरता को दर्शाता है।
  • 'म्यूल अकाउंट' अर्थव्यवस्था और वित्तीय धोखाधड़ी: डिजिटल भुगतान की तीव्र वृद्धि ने डिजिटल साक्षरता को पीछे छोड़ दिया है, जिससे धोखाधड़ी की धनराशि को शोधन (laundering) के लिये “किराए” पर लिये गये बैंक खातों का एक विशाल नेटवर्क विकसित हो गया है। 
    • यह समस्या केवल तकनीकी हैकिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि एक सामाजिक-आर्थिक विफलता को भी दर्शाती है, जिसमें हज़ारों नागरिक जानबूझकर या अनजाने में अपनी पहचान साइबर गिरोहों को “किराए” पर दे देते हैं, जिससे धन के प्रवाह का पता लगाना लगभग असंभव हो जाता है।
    • यद्यपि भारतीय रिज़र्व बैंक इनोवेशन हब द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग और डिजिटल धोखाधड़ी में प्रयुक्त म्यूल अकाउंट की पहचान हेतु MuleHunter.AI विकसित किया गया है, परंतु इसका कार्यान्वयन धीमी गति से हो रहा है।
  • भूराजनीतिक 'आरोपण' और राजनयिक अनिश्चितता: भारत में एक औपचारिक, पारदर्शी साइबर आरोपण नीति का अभाव है। 
    • अमेरिका या ब्रिटेन के विपरीत, जहाँ राज्य-प्रायोजित अभिनेताओं के विरुद्ध “नाम उजागर करने” (naming and shaming) या संयुक्त कूटनीतिक वक्तव्य जारी करने के स्थापित ढाँचे हैं, भारत सामान्यतः “रणनीतिक मौन” की नीति अपनाता है।
    • मानकीकृत साक्ष्य-आधारित ढाँचे के अभाव में निष्कर्षों को सार्वजनिक करने में असमर्थता के कारण, भारत एक “ग्रे ज़ोन” में फँसा रहता है, जहाँ पड़ोसी राज्यों के परिष्कृत अभिनेता यथार्थपरक अस्वीकृति (plausible deniability) के साथ अवसंरचना को पंगु बना सकते हैं, यह जानते हुए कि भारत की प्रतिक्रिया संभवतः कूटनीतिक या रणनीतिक प्रतिशोध के बजाए घरेलू “छोटे-मोटे उपायों” तक सीमित रहेगी।
  • डीपफेक अति-व्यक्तिकरण और “विश्वास का क्षरण”: मौजूदा संरचना “सोशल इंजीनियरिंग 2.0” की गति के अनुरूप विकसित नहीं हो पा रही है, जहाँ जनरेटिव AI का उपयोग “डिजिटल अरेस्ट” घोटालों और कॉर्पोरेट पहचान चोरी के लिये अति-व्यक्तिकृत डीपफेक तैयार करने में किया जा रहा है।
    • वर्तमान रक्षात्मक दृष्टिकोण मुख्यतः “नेटवर्क” की सुरक्षा पर केंद्रित है, परंतु “मानवीय विश्वास” के दुरुपयोग के विरुद्ध यह लगभग असहाय है, क्योंकि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम जैसे वर्तमान कानून AI-जनित दुष्प्रचार की तीव्रता से निपटने में सुस्त हैं, जो मिनटों में बाज़ार अस्थिरता या सामाजिक अशांति उत्पन्न कर सकता है।
    • उदाहरण के लिये दिल्ली पुलिस ने तीन राज्यों में आठ लोगों को एक ऐसे मामले में गिरफ्तार किया है जिसमें एक वृद्ध NRI दंपति को कथित तौर पर ठगा गया था, जिनसे 'डिजिटल अरेस्ट' घोटाले के माध्यम से 14 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी की गई थी, जिसके संबंध कंबोडिया और नेपाल में ऑपरेटरों से जुड़े हुए पाए गए थे।

भारत की साइबर सुरक्षा संरचना को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • तकनीकी और संस्थागत क्षमता का निर्माण: भारत को सरकार के भीतर विशेष कैडर बनाकर साइबर लॉ, डिजिटल फोरेंसिक्स, एआई गवर्नेंस और सीमा पार डेटा विनियमन में उन्नत विशेषज्ञता में निवेश करना चाहिये।
    • प्रौद्योगिकी और नीति निर्माण के बीच के अंतराल को न्यूनतम करने के लिये पुलिस, अभियोजकों, नियामकों एव राजनयिकों का निरंतर कौशल विकास आवश्यक है। ऐसी क्षमता के अभाव में, भारत वैश्विक साइबर प्रशासन में केवल नियम मानने वाला देश बनकर रह जाने का जोखिम उठाता है।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी को मज़बूत करना: चूँकि अधिकांश डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर निजी स्वामित्व वाली है, इसलिये भारत को साइबर खतरे की खुफिया जानकारी साझा करने के लिये संरचित एवं विश्वास-आधारित सार्वजनिक-निजी भागीदारी की आवश्यकता है। 
    • संयुक्त साइबर अभ्यास, कानूनी सुरक्षा उपाय और स्पष्ट जवाबदेही कार्यढाँचे साइबर अपराधों के लिये वास्तविक काल में कार्रवाई को बेहतर बना सकते हैं। रैंसमवेयर, वित्तीय धोखाधड़ी और प्लेटफॉर्म-आधारित अपराधों से निपटने के लिये ऐसा सहयोग अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • तत्काल घरेलू नियामक और प्रशासनिक सुधार: भारत को परस्पर विरोधी साइबर संस्थानों को सुव्यवस्थित करना चाहिये, जनादेश को स्पष्ट करना चाहिये तथा एजेंसियों के बीच समन्वय में सुधार करना चाहिये। 
    • डेटा सुरक्षा नियमों का अधिक सख्ती से पालन, साइबर अपराध जाँच प्रक्रियाओं में तेज़ी लाना और संविधान के अनुरूप एआई विनियमन की आवश्यकता है। साइबर सुरक्षा के परिणाम केवल नए कानूनों से नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्रभावशीलता से निर्धारित होंगे।
  • बहुकेंद्रीय वैश्विक शासन के लिये संस्थागत रूप से तैयारी: बहुपक्षीय सहमति में कमी के साथ, साइबर शासन तेज़ी से द्विपक्षीय, बहुपक्षीय और क्षेत्र-विशिष्ट व्यवस्थाओं के माध्यम से संचालित होगा। 
    • भारत को रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करते हुए एक साथ कई मंचों पर सक्रिय रूप से भाग लेने की क्षमता विकसित करने की आवश्यकता है। इस जटिलता के प्रबंधन में संस्थागत समुत्थानशिलय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा योजना के साथ साइबर सुरक्षा को एकीकृत करना: साइबर सुरक्षा को रक्षा और आर्थिक सुरक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का एक मुख्य स्तंभ माना जाना चाहिये। 
    • रणनीतिक और सैन्य योजना में साइबर खतरों के आकलन को शामिल करने से राज्य-प्रायोजित साइबर जासूसी और हाइब्रिड युद्ध के खिलाफ तैयारी में सुधार होगा। यह साइबरस्पेस की निरंतर संघर्ष के क्षेत्र के रूप में वास्तविकता को दर्शाता है।
  • महत्त्वपूर्ण सूचना अवसंरचना की सुरक्षा को प्राथमिकता दें: भारत को बिजली ग्रिड, दूरसंचार नेटवर्क, वित्तीय प्रणालियों और परिवहन अवसंरचना को सुरक्षित करने के प्रयासों में तेज़ी लानी चाहिये। 
    • महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के लिये नियमित तनाव परीक्षण, जोखिम-निवारण अभ्यास और अनिवार्य सुरक्षा मानक आवश्यक हैं। इस प्रकार के अधोसंरचना में व्यवधान से राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
  • संप्रभुता से समझौता किये बिना अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाना: भारत को डेटा और नियामक विकल्पों पर नियंत्रण बनाए रखते हुए साइबर अपराध जाँच, डिजिटल साक्ष्य साझाकरण एवं क्षमता निर्माण पर सहयोग को गहरा करना चाहिये। 
    • विश्वसनीय साझेदारों के साथ चुनिंदा जुड़ाव वैश्विक सहमति के अभाव में भी व्यावहारिक परिणाम दे सकता है। कठोर संरेखण की तुलना में रणनीतिक लचीलापन बेहतर है।
  • मानवाधिकारों और प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को मज़बूत करना: साइबर सुरक्षा उपायों को उचित प्रक्रिया, प्राइवेसी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ संतुलित किया जाना चाहिये। 
    • स्पष्ट न्यायिक निगरानी, आनुपातिक प्रवर्तन और निगरानी में पारदर्शिता से लोकतांत्रिक वैधता बढ़ेगी। इससे वैश्विक डिजिटल शासन संबंधी बहसों में भारत की विश्वसनीयता भी मज़बूत होगी।
  • साइबर जागरूकता और डिजिटल साक्षरता में निवेश करना: साइबर जोखिमों को कम करने के लिये बड़े पैमाने पर डिजिटल साक्षरता एवं साइबर स्वच्छता कार्यक्रमों के माध्यम से नागरिकों को सशक्त बनाना आवश्यक है। 
    • फिशिंग, वित्तीय धोखाधड़ी और डेटा के दुरुपयोग के बारे में जागरूकता हमलों की सफलता दर को बहुत हद तक कम कर सकती है। मानवीय समुत्थानशीलता साइबर सुरक्षा की पहली पंक्ति है।

निष्कर्ष: 

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उत्पन्न खतरों और विभाजित वैश्विक साइबर शासन के इस युग में, साइबर सुरक्षा भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का केंद्र बन गई है। यद्यपि भारत ने संस्थागत, कानूनी और तकनीकी उपायों में उल्लेखनीय प्रगति की है, फिर भी क्षमता, समन्वय और कौशल में प्रणालीगत कमियाँ बनी हुई हैं। उभरती बहुकेंद्रीय वैश्विक व्यवस्था यह मांग करती है कि भारत घरेलू साइबर सुरक्षा को सुदृढ़ करे और बहुपक्षीय स्तर पर तत्परता से कार्य करे। अंततः साइबर क्षेत्र को सुरक्षित करने की भारत की क्षमता ही उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और वैश्विक डिजिटल नेतृत्व को आकार देगी।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

प्रश्न. भारत में साइबर सुरक्षा अब केवल एक तकनीकी मुद्दा नहीं बल्कि एक रणनीतिक शासन चुनौती बन गई है। विवेचना कीजिये।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. भारत के लिये साइबर सुरक्षा एक रणनीतिक मुद्दा क्यों है?
क्योंकि साइबर खतरे राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, शासन और रणनीतिक स्वायत्तता को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 2. वर्तमान में भारत को सबसे बड़ा साइबर खतरा क्या है?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा संचालित धोखाधड़ी और व्यापक स्तर पर साइबर वित्तीय अपराध।

प्रश्न 3. भारत ने साइबर अपराध के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किये?
डेटा संप्रभुता, संस्थागत नियंत्रण और साइबर अपराध की व्यापक परिभाषाओं को लेकर चिंताओं के कारण।

प्रश्न 4. साइबर अपराध के प्रति भारत की मुख्य संस्थागत प्रतिक्रिया क्या है?
CERT-In और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) जैसी संस्थाएँ।

प्रश्न 5. वैश्विक साइबर शासन में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सहमति के अभाव में विभाजित और परस्पर विरोधी नियामक संरचना विकसित हो रही हैं।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न 1. भारत में, किसी व्यक्ति के साइबर बीमा कराने पर, निधि की हानि की भरपाई एवं अन्य लाभों के अतिरिक्त, सामान्यतः निम्नलिखित में से कौन-कौन से लाभ दिये जाते हैं? (2020)

  1. यदि कोई मैलवेयर कंप्यूटर तक उसकी पहुँच बाधित कर देता है, तो कंप्यूटर प्रणाली को पुनः प्रचालित करने में लगने वाली लागत 
  2.  यदि यह प्रमाणित हो जाता है कि किसी शरारती तत्त्व द्वारा जान-बूझकर कंप्यूटर को नुकसान पहुँचाया गया है तो नए कंप्यूटर की लागत
  3.  यदि साइबर बलात्-ग्रहण होता है तो इस हानि को न्यूनतम करने के लिये विशेषज्ञ परामर्शदाता की सेवाएँ लेने पर लगने वाली लागत 
  4.  यदि कोई तीसरा पक्ष मुक़दमा दायर करता है तो न्यायालय में बचाव करने में लगने वाली लागत

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1, 2 और 4

(b) केवल 1, 3 और 4

(c) केवल 2 और 3

(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (B)


प्रश्न 2. भारत में, साइबर सुरक्षा घटनाओं पर रिपोर्ट करना निम्नलिखित में से किसके/किनके लिये विधितः अधिदेशात्मक है/हैं ? (2017)

  1. सेवा प्रदाता (सर्विस प्रोवाइडर)
  2. डेटा सेंटर 
  3. कॉर्पोरेट निकाय (बॉडी कॉर्पोरेट)

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 1 और 2

(c) केवल 3

(d) 1,2 और 3

उत्तर: (D)


मेन्स 

प्रश्न. साइबर सुरक्षा के विभिन्न तत्त्व क्या हैं? साइबर सुरक्षा की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए समीक्षा कीजिये कि भारत ने किस हद तक एक व्यापक राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीति सफलतापूर्वक विकसित की है। (2022)