भारत में MSME विकास को गति देना | 08 Apr 2026

यह लेख 03/04/2026 को द बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित ‘MSME: From survival to scale' शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह एडिटोरियल भारत के MSME क्षेत्र के खंडित लचीलापन से वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मक स्तर की ओर हो रहे रणनीतिक संक्रमण का विश्लेषण करता है, जिसमें हाल के डिजिटलीकरण तथा वित्तीय सुधारों को रेखांकित किया गया है। यह ‘मिसिंग मिडिल’ जैसी संरचनात्मक चुनौतियों तथा विलंबित भुगतानों की समस्या का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, साथ ही सतत विकास के लिये ज़मीनी स्तर के समाधान भी सुझाता है। 

प्रारंभिक परीक्षा के लिये: MSMED अधिनियम 2006, उद्यम पोर्टल, पीएम विश्वकर्मा, समाधान पोर्टल, प्राथमिकता क्षेत्र ऋण, सीबीएएम। 

मुख्य परीक्षा के लिये: विकास इंजन के रूप में लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME), प्रमुख मुद्दे और आवश्यक उपाय। 

भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) देश की विकास प्रक्रिया की आधारशिला हैं, जो सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 31% तथा निर्यात में लगभग 48% का योगदान देते हैं एवं 32 करोड़ से अधिक लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराते हैं। फिर भी यह क्षेत्र अब भी संरचनात्मक असंतुलन से युक्त है, जहाँ ‘मध्यम वर्ग’ का अभाव स्पष्ट है अर्थात सूक्ष्म उद्यमों का प्रभुत्व बना हुआ है, जबकि मध्यम उद्यमों की उपस्थिति अत्यंत सीमित है। साथ ही विलंबित भुगतान तथा ऋण-संबंधी विसंगतियों जैसी लगातार चुनौतियाँ कार्यशील पूंजी को बाधित करती हैं, जिससे विकास क्षमता प्रभावित होती है। इसलिये MSME क्षेत्र का मुद्दा अब केवल अस्तित्व तक सीमित न रहकर संरचनात्मक असंतुलन से आगे बढ़ते हुए वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता की दिशा में संरचनात्मक परिवर्तन को सक्षम बनाने का बन गया है। 

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) वर्गीकरण

  • परिचय: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र को प्रायः ‘भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार’ के रूप में मान्यता दी जाती है। 
    • यह विकास, रोज़गार तथा निर्यात का एक प्रमुख प्रेरक तत्त्व बना हुआ है, विशेषतः उस संदर्भ में जब सरकार ‘विकसित भारत@2047’ की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में अग्रसर है। 
  • संशोधित वर्गीकरण (अप्रैल 2025 से प्रभावी): व्यवसायों की वृद्धि को प्रोत्साहित करने तथा सरकारी लाभों की निरंतरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वर्ष 2025 में वर्गीकरण सीमाओं में महत्त्वपूर्ण संशोधन किये गए।

भारत के विकास में MSME किस प्रकार महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं?

  • अर्थव्यवस्था का प्रमुख संचालक और GDP का आधार स्तंभ: MSME विकेंद्रीकृत औद्योगीकरण को गति प्रदान करते हुए तथा कार्यबल को कृषि-निर्भरता से उत्पादक विनिर्माण की ओर स्थानांतरित कर संरचनात्मक परिवर्तन के प्रमुख प्रेरक इंजन के रूप में कार्य करते हैं। 
    • यह विस्तृत उद्यम पारिस्थितिकी तंत्र स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को सुदृढ़ आधार प्रदान करता है, क्षेत्रीय असमानताओं को कम करता है तथा विभिन्न राज्यों में आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करता है। 
    • आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, MSME क्षेत्र वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 31.1% का महत्त्वपूर्ण योगदान देता है तथा देश के कुल विनिर्माण उत्पादन का लगभग 35.4% हिस्सा वहन करता है। 
    • 7.47 करोड़ से अधिक पंजीकृत उद्यमों के साथ यह क्षेत्र ‘विकसित भारत@2047’ के आर्थिक दृष्टिकोण की प्राप्ति हेतु एक सुदृढ़ आधारशिला का निर्माण करता है। 
  • निर्यात का केंद्र एवं वैश्विक मूल्य शृंखलाएँ (GVC): वैश्विक मूल्य शृंखलाओं (GVC) में सक्रिय एकीकरण के माध्यम से MSME भारत के विनिर्माण क्षेत्र को घरेलू असेंबली से आगे बढ़ाकर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धात्मकता की दिशा में रूपांतरित कर रहे हैं। 
    • श्रम-प्रधान निर्यात बाज़ारों की ओर यह रणनीतिक परिवर्तन न केवल राष्ट्रीय व्यापार घाटे के संतुलन में सहायक है, बल्कि भारतीय उत्पादों को वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय परिसंपत्ति के रूप में स्थापित भी करता है। 
      • उदाहरणार्थ, वित्त वर्ष 2025 में भारत के कुल व्यापारिक निर्यात में MSME क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 48.55% तक पहुँच गई।
    • निर्यात प्रोत्साहन को गति देने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया 25,060 करोड़ रुपये का निर्यात प्रोत्साहन मिशन तथा विशेष रूप से निर्यातकों के लिये हाल ही में आरंभ की गई 20,000 करोड़ रुपये की बिना गारंटी वाली ऋण गारंटी योजना इस बाह्य आर्थिक गतिशीलता को सशक्त समर्थन प्रदान कर रही हैं।
  • स्थानीय रोज़गार और सामाजिक-आर्थिक भागीदारी का विस्तार: लघु उद्योग को धन के वास्तविक लोकतंत्रीकरणकर्त्ता के रूप में देखा जा सकता है, जो संतृप्त शहरी महानगरों से परे स्थानीय आजीविका का सृजन कर जनसांख्यिकीय लाभांश को व्यापक स्तर पर अवशोषित करने में सक्षम हैं।
    • प्रथम-पीढ़ी के उद्यमियों तथा हाशिये पर स्थित समुदायों को सशक्त बनाते हुए, यह क्षेत्र अत्यधिक गरीबी एवं ग्रामीण बेरोज़गारी के विरुद्ध एक प्रभावी संरचनात्मक अवशोषक (Shock Absorber) की भूमिका निभाता है। 
    • वर्तमान में यह क्षेत्र आधिकारिक रूप से 32.82 करोड़ से अधिक व्यक्तियों को रोज़गार प्रदान करता है, जिससे कृषि क्षेत्र के पश्चात यह देश का द्वितीय सबसे बड़ा नियोक्ता बना हुआ है।
  • डिजिटल औपचारिकीकरण एवं ओपन नेटवर्क की भूमिका: डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के व्यापक विस्तार ने पारंपरिक प्रवेश बाधाओं को काफी हद तक समाप्त कर दिया है, जिससे सूक्ष्म उद्यम अब एकाधिकारवादी ई-कॉमर्स एग्रीगेटरों को दरकिनार करते हुए सीधे राष्ट्रीय उपभोक्ता आधार तक अपनी पहुँच स्थापित कर पा रहे हैं। 
    • इस तीव्र डिजिटल औपचारिकीकरण के परिणामस्वरूप लेन-देन लागत में स्वाभाविक कमी आती है, बाज़ार पहुँच का विस्तार होता है तथा अनौपचारिक विक्रेता क्रमशः मुख्यधारा की, ट्रैक करने योग्य अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनते जाते हैं।
    • TEAM पहल के साथ मिलकर काम करने वाला ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) का लक्ष्य MSME को औपचारिक आपूर्ति शृंखलाओं में आसानी से शामिल करना है। 
      • उदाहरण के लिये, ONDC से संबद्ध मोबाइल एप ‘नम्मा यात्री’ ‘शून्य-कमीशन’ सदस्यता मॉडल पर आधारित होकर डिजिटल बाज़ार तक समावेशी पहुँच को सुदृढ़ एवं विस्तारित करता है।
  • कैश-फ्लो लेंडिंग एवं फिनटेक इंटीग्रेशन: कठोर तथा संपार्श्विक-प्रधान बैंकिंग प्रणाली से दूर होते हुए, नकदी-प्रवाह आधारित मूल्यांकन प्रणालियों को अपनाना अंततः उभरते उद्यमों के लिये ऐतिहासिक ‘मिसिंग मिडिल’ वित्तीय अंतराल को दूर कर रहा है।
    • उन्नत तकनीकी एकीकरण के माध्यम से ऋणदाता अब वास्तविक समय में उद्यमों की व्यावसायिक व्यवहार्यता का अधिक सटीक आकलन कर सकते हैं, जिससे भुगतान में विलंब के कारण उत्पन्न परिचालन विफलताओं को रोका जा सकता है।
    • अकाउंट एग्रीगेटर (AA) फ्रेमवर्क तथा ओपन क्रेडिट एनेबलमेंट नेटवर्क (OCEN) इस परिवर्तन के प्रमुख प्रेरक तंत्र हैं।
    • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा हाल ही में प्रस्तुत एकीकृत ऋण इंटरफेस (ULI) विभिन्न स्रोतों से वित्तीय एवं गैर-वित्तीय डेटा के निर्बाध साझा करने को सक्षम बनाता है, जिससे ऋण मूल्यांकन प्रक्रिया की दक्षता तथा सटीकता में सुधार होता है।
  • औद्योगिक हरित परिवर्तन को प्रोत्साहन: स्थानीय आपूर्ति शृंखलाओं में सतत प्रथाओं एवं ऊर्जा-कुशल प्रौद्योगिकियों के समावेशन के माध्यम से लघु उद्यम भारत की नेट-ज़ीरो रणनीति में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। 
    • यह ज़मीनी स्तर का हरित परिवर्तन न केवल कार्बन फुटप्रिंट को कम करता है, बल्कि  पर्यावरण के प्रति जागरूक और अनुपालनशील वैश्विक बाज़ारों में भारतीय आपूर्तिकर्त्ताओं की पात्रता को भी सुदृढ़ करता है।
    • MSE-GIFT योजना नवीकरणीय प्रौद्योगिकियों को अपनाने हेतु 2% ब्याज सब्सिडी के साथ रियायती वित्त प्रदान कर इस परिवर्तन को गति देती है। 
      • साथ ही निजी बैंक सूक्ष्म निर्माताओं के लिये लक्षित, बिना गारंटी वाले सौर ऋण उपलब्ध कराते हुए ऊर्जा लागत में कमी तथा आत्मनिर्भर भारत के जलवायु लक्ष्यों के अनुरूपता सुनिश्चित कर रहे हैं।
  • डीप टेक और रक्षा क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देना: पारंपरिक कम मूल्य वाले विनिर्माण से आगे बढ़ते हुए, उच्च क्षमता वाले लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) अब चुस्त नवोन्मेषकों के रूप में काम कर रहे हैं, जो एयरोस्पेस एवं रक्षा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों हेतु महत्त्वपूर्ण उप-असेंबली की आपूर्ति करते हैं।
    • यह तकनीकी प्रगति विदेशी आयात पर निर्भरता को कम करती है, घरेलू स्तर पर गहन तकनीकी अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देती है तथा एक सुदृढ़ एवं आत्मनिर्भर औद्योगिक आधार स्थापित करती है।
    • केंद्रीय बजट 2026-27 में 10,000 करोड़ रुपये के SME ग्रोथ फंड के माध्यम से इस क्षेत्र के विस्तार को विशेष समर्थन प्रदान किया गया है, जिसका उद्देश्य भविष्य के औद्योगिक चैंपियन तैयार करना तथा मानदंड-आधारित प्रोत्साहन देना है। 
      • इसके अतिरिक्त, आत्मनिर्भर भारत (SRI) फंड के तहत 682 उच्च-विकासशील MSME में लगभग 15,442 करोड़ रुपये का इक्विटी निवेश कर जोखिम पूंजी की आवश्यकताओं को प्रभावी रूप से पूरा किया गया है।
  • हस्तशिल्प अर्थव्यवस्था का पुनर्संवर्द्धन: लक्षित हस्तक्षेपों के माध्यम से भारत की पारंपरिक हस्तशिल्प अर्थव्यवस्था का व्यवस्थित आधुनिकीकरण किया जा रहा है, जिससे शिल्प कौशल को विस्तार योग्य, वित्तपोषित तथा डिजिटल रूप से एकीकृत सूक्ष्म उद्यमों में रूपांतरित किया जा सके।
    • इस असंगठित क्षेत्र के औपचारीकरण के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि कुशल शिल्पकारों को उचित बाज़ार मूल्य, आधुनिक कौशल उन्नयन तथा औपचारिक बैंकिंग प्रणाली में प्रत्यक्ष एकीकरण प्राप्त हो।
    • प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना इस परिवर्तन का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसके अंतर्गत वर्ष 2025 के अंत तक लगभग 30 लाख लाभार्थियों का सफलतापूर्वक पंजीकरण किया जा चुका है तथा 23.09 लाख कारीगरों को पूर्णतः प्रशिक्षित किया गया है। 
    • वर्ष 2025 में ही लगभग 2.62 लाख शिल्पकारों को बिना गारंटी वाले ऋण के रूप में लगभग 2,257 करोड़ रुपये स्वीकृत किये गए, साथ ही व्यापक स्तर पर डिजिटल सशक्तीकरण अभियान भी संचालित किये गए।

भारत में MSME को किन प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?

  • औपचारिक ऋण अंतराल: पारंपरिक संपार्श्विक-आधारित ऋण मॉडल लगातार सूक्ष्म उद्यमों को औपचारिक बैंकिंग से बाहर रखते हैं, जिससे उनकी मौलिक विकास क्षमता प्रभावित होती है।
    • यह अवरोध उन्हें महँगे और अनियंत्रित अनौपचारिक ऋण बाज़ार की ओर धकेलता है, जो पहले से ही सीमित परिचालन मार्जिन को गंभीर रूप से कम कर देता है।
    • वर्ष 2025 की SIDBI-Crisil रिपोर्ट के अनुसार, भारत वर्तमान में पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में ₹30 लाख करोड़ के विशाल MSME ऋण अंतराल का सामना कर रहा है।
    • यह वित्तीय कमी विशेष रूप से उन लगभग 35% लघु उद्यमों को असमान रूप से प्रभावित करती है, जो पूर्णतः अपंजीकृत हैं और औपचारिक सरकारी योजनाओं की एल्गोरिदमिक संरचनाओं में प्रभावी रूप से अदृश्य बने रहते हैं।
  • विलंबित भुगतानों की संरचनात्मक समस्या: बड़े कॉर्पोरेट खरीदारों एवं सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा समयबद्ध भुगतान चक्रों का पालन न करना सूक्ष्म एवं लघु आपूर्तिकर्त्ताओं की कार्यशील पूंजी को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। 
    • तरलता की अनिश्चितता के कारण ये उद्यम कच्चे माल, वेतन वितरण तथा तकनीकी उन्नयन में सतत पुनर्निवेश करने में असमर्थ रहते हैं। 
    • मार्च 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, MSME समाधान पोर्टल पर दर्ज 82,215 लंबित मामलों में लगभग 20,413 करोड़ रुपये अटके हुए थे, जो वर्तमान में और अधिक बढ़ने की संभावना है। 
    • इसके अतिरिक्त, अप्रैल 2026 की उद्योग रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि बाज़ार अस्थिरता के कारण भुगतान चक्र औसतन 30 दिनों से बढ़कर 120 दिनों से अधिक हो गया है।
  • भू-राजनीतिक आपूर्ति शृंखला के व्यवधान: वैश्विक अस्थिरता तथा क्षेत्रीय भू-राजनीतिक संघर्षों के परिणामस्वरूप अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग लागत में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव निर्यात-उन्मुख MSME पर पड़ा है। 
    • आपूर्ति शृंखला व्यवधानों के कारण डिलीवरी समय-सीमाएँ बाधित होती हैं, जिससे बड़े पैमाने पर ऑर्डर रद्दीकरण तथा अंतर्राष्ट्रीय अनुबंधों की हानि होती है। 
    • वर्ष 2026 के प्रारंभ में पश्चिम एशिया में संघर्ष के तीव्र होने के पश्चात्, कुछ MSME के लिये समुद्री माल-ढुलाई लागत विशिष्ट मार्गों पर लगभग 300 डॉलर से बढ़कर 8,500 डॉलर से अधिक हो गई।
    • परिणामस्वरूप, मार्च 2026 में सरकार को एक राहत योजना प्रारंभ करनी पड़ी, जिसके अंतर्गत 50% तक बढ़ी रसद लागत की आंशिक प्रतिपूर्ति उन पात्र गैर-ECGC बीमित MSME निर्यातकों को प्रदान की गई।
  • इक्विटी पूंजी की कमी: पारंपरिक ऋण-आधारित वित्तपोषण पर ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक निर्भरता, स्वाभाविक रूप से उच्च क्षमता वाले MSME की वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी एवं गहन-तकनीकी संस्थाओं के रूप में विकसित होने की क्षमता को सीमित करती है। 
    • मार्च 2026 की एक संसदीय समिति रिपोर्ट ने यह रेखांकित किया कि हाल ही में घोषित आठ MSME बजट प्रावधानों में से छह का प्रभावी क्रियान्वयन अभी तक नहीं हो पाया है, जिससे वास्तविक विकास की गति बाधित हो रही है। 
    • इस संरचनात्मक कमी के समाधान हेतु केंद्रीय बजट 2026-27 में ₹10,000 करोड़ के SME ग्रोथ फंड की स्थापना के माध्यम से इक्विटी वित्तपोषण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल की गई है, तथापि इसका प्रभावी कार्यान्वयन अब भी एक प्रमुख चुनौती बना हुआ है।
  • अनुपालन संबंधी बाधाएँ: राष्ट्रीय स्तर पर अपराध को गैर-अपराध घोषित करने के निरंतर प्रयासों के बावजूद, स्थानीय नौकरशाही प्रक्रियाएँ तथा कर-संबंधी औपचारिकताओं की अत्यधिक जटिलता के कारण संसाधन-सीमित सूक्ष्म उद्यमों पर असमान प्रशासनिक लागत का बोझ बना रहता है। 
    • अनेक स्थानीय उद्यमों के पास बिना अत्यधिक परामर्श शुल्क वहन किये केंद्रीय एवं राज्य-स्तरीय नियामक ढाँचों को समझने हेतु आवश्यक विशेषज्ञ विधिक क्षमता का अभाव होता है। 
    • टीमलीज़ रेगटेक की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के MSME को प्रतिवर्ष लगभग 13–17 लाख रुपये तक की अनुपालन लागत वहन करनी पड़ती है। 
    • यद्यपि सरकार ने वर्ष 2025 में जन विश्वास संशोधनों के माध्यम से 47,000 से अधिक नियामक अनुपालनों को सरल बनाया है, फिर भी ज़मीनी स्तर पर जागरूकता का अभाव अब भी एक गंभीर चुनौती के रूप में विद्यमान है।
  • डिजिटल ऋण में असमानता: यद्यपि डिजिटल भुगतान का व्यापक प्रसार ज़मीनी स्तर तक हो चुका है, लेकिन केवल लेन-देन प्रसंस्करण से लेकर वास्तव में एल्गोरिदम-संचालित डिजिटल ऋण प्राप्त करने तक का महत्त्वपूर्ण परिवर्तन अभी भी बहुत धीमा है। 
    • डिजिटल वित्तीय साक्षरता में विद्यमान मूलभूत अंतराल इन उद्यमों को अपने इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन अभिलेखों को नकदी प्रवाह-आधारित बैंकिंग मूल्यांकन में रूपांतरित करने से रोकता है। 
    • वर्ष 2025 के वित्तीय सर्वेक्षणों के अनुसार, जहाँ 90% से अधिक MSME डिजिटल भुगतान को स्वीकार करते हैं, वहीं केवल लगभग 18% ने ही डिजिटल ऋण का लाभ प्राप्त किया है तथा मात्र 13% उद्यम ही डिजिटल मार्केटिंग अथवा ई-कॉमर्स का सक्रिय उपयोग कर रहे हैं। 
    • RBI द्वारा प्रारंभ एकीकृत ऋण इंटरफेस (ULI) इस अंतर को कम करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है तथापि अवसंरचनात्मक जागरूकता के अभाव के कारण इसका वृहद् स्तर पर अंगीकरण अब भी बाधित बना हुआ है।
  • वित्तीय पहुँच में लैंगिक असमानता: प्रणालीगत सामाजिक पूर्वाग्रहों तथा औपचारिक संपार्श्विक एवं संपत्ति स्वामित्व के अभाव के कारण महिला उद्यमियों को स्वाभाविक रूप से प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। 
    • यह गहन वित्तीय असमानता उनकी संस्थागत समर्थन प्राप्त करने की क्षमता को सीमित करती है, जिसके परिणामस्वरूप वे शोषणकारी अनौपचारिक ऋण तंत्र पर अधिक निर्भर हो जाती हैं। 
    • वर्तमान में लगभग 26.2% MSME महिलाओं के स्वामित्व में हैं, जो सामाजिक प्रगति का संकेत है, फिर भी ये उद्यम अभी भी आर्थिक रूप से वंचित बने हुए हैं। 
    • महिला-स्वामित्व वाले MSME के लिये ऋण ग्रहण दर लगभग 76% है, जबकि पुरुषों के लिये यह 84% है। 
    • इसके अतिरिक्त, महिलाओं को अनौपचारिक ऋण पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है तथा उनके समक्ष लगभग 35% का ऋण अंतर विद्यमान है, जिसे दूर किया जाना आवश्यक है।

 भारत के MSME क्षेत्र को और अधिक सुदृढ़ करने के लिये कौन-से उपाय आवश्यक हैं?

  • एल्गोरिदम-आधारित नकदी प्रवाह ऋण की दिशा में संक्रमण: वित्तीय संस्थानों को परंपरागत संपार्श्विक-आधारित ऋण आवश्यकताओं से हटकर एकीकृत ऋण इंटरफेस (ULI) और GST एग्रीगेट्स का उपयोग करते हुए डेटा-संचालित नकदी प्रवाह ऋण की ओर अग्रसर होना चाहिये।
    • इससे स्थिर भौतिक सुरक्षा की अपेक्षा वास्तविक बिक्री गति और डिजिटल पदचिह्न के आधार पर वास्तविक समय में जोखिम मूल्यांकन संभव हो जाता है, जिससे ‘asset-light’ सेवा और तकनीक-आधारित सूक्ष्म इकाइयों के लिये ऋण सुलभ हो पाता है।
    • एल्गोरिदम-आधारित क्रेडिट स्कोरिंग को संस्थागत रूप देने से बैंक पूर्व-स्वीकृत कार्यशील पूंजी लाइनों को बिना किसी बाधा के प्रदान कर सकते हैं, जो व्यवसाय की वृद्धि के साथ स्वचालित रूप से विस्तारित होती हैं।
  • टियर-II/III आपूर्तिकर्त्ताओं के लिये अनिवार्य TReDS ऑनबोर्डिंग: तरलता संकट को दूर करने हेतु, सरकार को एक निश्चित कारोबार सीमा से ऊपर की सभी कंपनियों के लिये  ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (TReDS) में अनिवार्य भागीदारी लागू करनी चाहिये, जिससे आपूर्ति शृंखला में गहराई तक प्रभावी पहुँच सुनिश्चित हो। 
    • GSTN पोर्टल के साथ इसका एकीकरण स्वचालित इनवॉइस फैक्टरिंग को सक्षम बनाएगा, जहाँ अपलोड किया गया इनवॉइस तुरंत वित्तदाताओं के लिये व्यापार योग्य परिसंपत्ति में परिवर्तित हो जाएगा।
    • इससे एक स्व-पोषित तरलता चक्र का निर्माण होता है, जो छोटे आपूर्तिकर्त्ताओं के लिये प्रतीक्षा अवधि को समाप्त करता है और उन्हें बड़े खरीदारों के ऋण चक्रों से प्रभावी रूप से सुरक्षित बनाता है।
  • क्लस्टर-विशिष्ट सामान्य सुविधा केंद्र (CFC) का निर्माण: सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से स्थानीयकृत, अत्याधुनिक सामान्य सुविधा केंद्रों की स्थापना MSME को 'उद्योग 4.0' बुनियादी ढाँचे तक पहुँच प्रदान करती है, जैसे कि 3D प्रिंटिंग, उन्नत CNC मशीनिंग और परीक्षण प्रयोगशालाएँ
    • यह इंफ्रास्ट्रक्चर-एज़-ए-सर्विस मॉडल सूक्ष्म इकाइयों को भारी मशीनरी के स्वामित्व के उच्च पूंजीगत व्यय के बिना उच्च-सटीकता वाले विनिर्माण मानकों को प्राप्त करने की अनुमति देता है।
    • इसके माध्यम से एक सहयोगात्मक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होता है, जहाँ छोटी इकाइयाँ वैश्विक गुणवत्ता मानकों को सामूहिक रूप से पूरा करने के लिये ऑर्डर एकत्र कर सकती हैं।
  • ग्रीन-चैनल नियामक अनुपालन का कार्यान्वयन: लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिये ‘नियामक सैंडबॉक्स’ या 'ग्रीन चैनल' स्थापित किया जाना चाहिये, जो नवगठित इकाइयों को गैर-महत्त्वपूर्ण अनुपालन निरीक्षणों पर तीन वर्ष का समय प्रदान करे।
    • जटिल एवं बहुस्तरीय फाइलिंग प्रक्रियाओं को एकीकृत वार्षिक अनुपालन रिटर्न से प्रतिस्थापित करने पर समय तथा प्रशासनिक लागत में उल्लेखनीय कमी सुनिश्चित की जा सकती है।
    • इससे एक ‘कम अनुपालन वाला’ वातावरण बनता है जो अनौपचारिक विक्रेताओं को तत्काल नौकरशाही उत्पीड़न के डर के बिना उद्यम पोर्टल के तहत पंजीकरण करने के लिये प्रोत्साहित करता है। 
  • डिजिटल वाणिज्य नेटवर्क (ONDC) के माध्यम से वैश्विक मूल्य शृंखलाओं (GVCs) में एकीकरण: ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) का उपयोग कर एक विशेष 'निर्यात मॉड्यूल' विकसित करने से पारंपरिक मध्यस्थों के एकाधिकार को दरकिनार किया जा सकता है और ग्रामीण कारीगरों को सीधे अंतर्राष्ट्रीय B2B बाज़ारों से जोड़ा जा सकता है।
    • इस डिजिटल सेतु में एकीकृत लॉजिस्टिक्स-एज़-ए-सर्विस और स्वचालित सीमा शुल्क निकासी शामिल होनी चाहिये, जिससे सूक्ष्म उद्यम को स्थानीय डिलीवरी जितनी ही आसानी से वैश्विक स्तर पर माल भेजने की सुविधा मिले।
    • बाज़ार तक लोकतांत्रिक पहुँच सुनिश्चित करके, ONDC अति-स्थानीय उत्पादों को वैश्विक ब्रांडों में बदल सकता है, जिससे उत्पादक के लिए समान मूल्य वितरण सुनिश्चित होता है।
  • 'ज़ीरो डिफेक्ट ज़ीरो इफेक्ट' (ZED) प्रोत्साहनों का संस्थागतकरण: वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने के लिये, ZED प्रमाणन को वरीयता खरीद और ब्याज सब्सिडी योजनाओं से जोड़ा जाना चाहिये, जो सतत और उच्च-गुणवत्ता वाले विनिर्माण को अपनाने वाली इकाइयों को पुरस्कृत करे।
    • 'ग्रीन ट्रांजिशन क्रेडिट्स' को लागू करने से लघु एवं मध्यम उद्यमों को नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों और चक्रीय अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों की ओर बदलाव के लिये वित्तपोषण में सहायता मिल सकती है, जिससे वे यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM) के अनुरूप हो जाएँ।
    • इससे यह सुनिश्चित होता है कि भारतीय MSME अपने कार्बन फुटप्रिंट के कारण भविष्य के पर्यावरण-सचेत वैश्विक बाज़ारों से बाहर न रह जाएँ।
  • इक्विटी-आधारित 'पेशेंट कैपिटल' इंस्ट्रूमेंट्स: ऋण के अतिरिक्त, राज्य को विशेषीकृत SIDBI-नेतृत्व वाले फंड-ऑफ-फंड्स के माध्यम से 'पेशेंट इक्विटी कैपिटल' के प्रवाह को प्रोत्साहित करना चाहिये, जो विकास के लिये तैयार 'मिसिंग मिडिल' उद्यमों को लक्षित करते हैं।
    • राजस्व-आधारित वित्तपोषण (RBF) मॉडल, जिसमें पुनर्भुगतान मासिक राजस्व का एक प्रतिशत होता है, MSME को कठोर EMI दबाव के बिना दीर्घकालिक अनुसंधान, विकास और बौद्धिक संपदा निर्माण में निवेश करने की क्षमता प्रदान करता है। 
    • यह मॉडल विशेष रूप से मौसमी या उच्च-विकास वाले स्टार्टअप्स के लिये उपयुक्त है, जिससे उन्हें दीर्घकालिक जोखिम-सुरक्षा मिलती है।
  • 'हब-एंड-स्पोक' प्रयोगशालाओं के माध्यम से अति-स्थानीयकृत कौशल उन्नयन: एआई, रोबोटिक्स और सतत पैकेजिंग जैसे उभरते क्षेत्रों में समय पर कौशल उन्नयन सुनिश्चित करने के लिये औद्योगिक समूहों के भीतर विकेंद्रीकृत 'हब-एंड-स्पोक' व्यावसायिक प्रशिक्षण मॉडल अपनाया जाना चाहिये।
    • स्थानीय पॉलिटेक्निक संस्थानों और उद्योग संघों के साथ साझेदारी करके, ये प्रयोगशालाएँ यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि कार्यबल को क्लस्टर की अग्रणी फर्मों द्वारा प्रयुक्त विशिष्ट प्रौद्योगिकियों पर प्रशिक्षित किया जाए।
    • यह सूक्ष्म प्रमाणन दृष्टिकोण कौशल की गंभीर कमी को दूर करता है और यह सुनिश्चित करता है कि जैसे-जैसे लघु एवं मध्यम उद्यम अपनी मशीनरी का आधुनिकीकरण करते हैं, उनके पास स्थानीय स्तर पर तकनीकी रूप से कुशल श्रम की तत्काल उपलब्धता हो। 

निष्कर्ष:

भारत के लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र को खंडित संरचना से निकालकर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बनाना, 'विकसित भारत@2047' के दृष्टिकोण को साकार करने की प्रमुख कुंजी है। एल्गोरिथम आधारित ऋण, अनिवार्य डिजिटल भुगतान प्रणाली और 'मध्यम वर्ग' जैसी संरचनात्मक सीमाओं को दूर करने वाले उपायों के माध्यम से भारत अपने ज़मीनी स्तर के उद्यमियों की अंतर्निहित क्षमता को उजागर कर सकता है। अंततः सक्रिय नीति, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और MSME के नेतृत्व वाली हरित नवाचार को शामिल करने वाला एक समन्वित दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करेगा कि ये उद्यम न केवल जीवित रहें बल्कि वैश्विक मूल्य शृंखला में भारत का नेतृत्व भी करें। 

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

प्रश्न: भारत में लघु एवं मध्यम वर्ग (MSME) क्षेत्र में एक 'खोखले मध्य वर्ग' की समस्या है जो छोटे उद्यमों को वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनने से रोकती है। इसमें योगदान देने वाली संरचनात्मक और वित्तीय बाधाओं का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये।

 

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. लघु एवं मध्यम वर्ग (MSME) क्षेत्र में 'मिसिंग मिडिल' क्या है?

यह मध्यम आकार के उद्यमों की समस्या को दर्शाता है; भारत में लाखों सूक्ष्म उद्यम हैं, भारत में लाखों सूक्ष्म उद्यम हैं, लेकिन ऋण, नियामक जटिलताओं और संसाधन की कमी के कारण बहुत कम उद्यम ही ‘मध्यम’ श्रेणी में उभर पाते हैं।

2. एकीकृत ऋण इंटरफेस (ULI) MSME की मदद कैसे करता है?

यह डिजिटल फुटप्रिंट (GST/UPI डेटा) का उपयोग करके परंपरागत संपार्श्विक-आधारित ऋण की बजाय तत्काल, बिना गिरवी के ऋण प्रदान करने में सक्षम बनाता है, जिससे MSME की तरलता और संचालन क्षमता बढ़ती है।

3. TReDS प्लेटफॉर्म क्या है?

यह व्यापारिक प्राप्तियों पर छूट देने का ऑनलाइन तंत्र है, जो सुनिश्चित करता है कि छोटे एवं मध्यम उद्यम (MSME) बड़े खरीदारों का इंतज़ार किये बिना बैंकों से तुरंत भुगतान प्राप्त कर सकें।

4. 'ZED' प्रमाणन क्यों महत्त्वपूर्ण है?

‘ज़ीरो डिफेक्ट, ज़ीरो इफेक्ट’ (ZED) प्रमाणन MSME को उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद कम पर्यावरणीय प्रभाव के साथ बनाने के लिए प्रेरित करता है, जिससे वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में उनकी पात्रता और स्वीकार्यता बढ़ती है।

5. MSME का नया वर्गीकरण (2026) क्या है?

सूक्ष्म: ₹1 करोड़ तक निवेश / ₹5 करोड़ तक कारोबार, लघु: ₹10 करोड़ तक निवेश / ₹50 करोड़ तक कारोबार, मध्यम: ₹50 करोड़ तक निवेश / ₹250 करोड़ तक कारोबार

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:  (2023)

  1. 'सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (एम.एस.एम.ई.डी.) अधिनियम 2006' के अनुसार, 'जिनके संयंत्र और मशीन में निवेश 15 करोड़ रुपये से 25 करोड़ रुपये के बीच हैं, वे मध्यम उद्यम हैं"।
  2.  सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को दिये गए सभी बैंक ऋण प्राथमिकता क्षेत्रक के अधीन अर्ह हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/है?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2 

उत्तर: (b)


मेंस

प्रश्न. जी.डी.पी. में विनिर्माण क्षेत्र विशेषकर एम.एस.एम.ई. की बढ़ी हुई हिस्सेदारी तब आर्थिक संवृद्धि के लिये आवश्यक है। इस संबंध में सरकार की वर्तमान नीतियों पर टिप्पणी कीजिये।  (2023)