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शहरी विकास को नया आकार | 11 Dec 2021 | शासन व्यवस्था

यह एडिटोरियल 09/12/2021 को ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में प्रकाशित “It’s Time to Revisit, Rethink, Reshape Indian Cities” लेख पर आधारित है। इसमें शहरों के विकास के महत्त्व और अनियोजित विकास, खराब भूमि उपयोग एवं शहरी स्थानीय निकायों से संबंधित समस्याओं के संबंध में चर्चा की गई है।

संदर्भ

भारत लगभग दो दशकों से विश्व की सबसे तेज़ी से विकास करती अर्थव्यवस्थाओं में से एक रहा है और वर्ष 2047- स्वतंत्रता के 100वें वर्ष में विश्व की शीर्ष तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की महत्त्वाकांक्षा रखता है।   

भारत के इस आर्थिक विकास में इसके शहरों की प्रमुख भूमिका रही है। भारत के शहर देश के आर्थिक ‘पावरहाउस’ माने जाते हैं और बेहतर जीवन की चाह रखने वाली एक बड़ी ग्रामीण आबादी के लिये चुंबक की तरह कार्य करते हैं। हाल के कुछ वर्षों में, विशेष रूप से शहरों और शहरी निवासियों के विकास के लिये कई योजनाएँ शुरू की गई हैं।  

हालाँकि शहरों के विकास के लिये किये गए प्रयासों के संदर्भ में प्राप्त परिणाम निराशाजनक ही रहे हैं। इसका प्रमुख ज़िम्मेदार खराब योजना-निर्माण, अवसंरचनात्मक कमियों और शहरी स्थानीय निकायों (Urban Local Bodies- ULB) की बदतर स्थिति को ठहराया जा सकता है।  

भारत में शहरी विकास

शहरों के विकास के मार्ग की चुनौतियाँ

आगे की राह

निष्कर्ष

शहर निरंतर विकास से गुज़रते रहते हैं; वे न केवल आर्थिक विकास के चालक हैं, बल्कि वैश्विक ज्ञान के आदान-प्रदान और नवाचार अवसरों के लिये चुंबक की तरह भी होते हैं। उन्हें अपने उद्देश्य की पूर्ति में सक्षम बनाने के लिये, शहरों के नियोजन को (जिसमें भूमि-उपयोग, आवास, परिवहन जैसे विभिन्न घटक शामिल हैं) को नया रूप देना महत्त्वपूर्ण है।

अभ्यास प्रश्न: भारत के आर्थिक विकास में शहरों के महत्त्व का वर्णन कीजिये और शहरों के विकास से संबद्ध चुनौतियों की चर्चा कीजिये।