विकसित भारत 2047 के लिये भारत में उच्च शिक्षा की पुनर्कल्पना | 24 Jan 2026

यह एडिटोरियल द हिंदू के 22/01/2026 को प्रकाशित लेख “Second-generation reforms required in higher education to make India a developed nation” पर आधारित है। लेख में यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि यद्यपि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के अंतर्गत भारत ने उच्च शिक्षा तक पहुँच का उल्लेखनीय विस्तार किया है, तदपि वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु संस्थागत कार्यप्रणाली, गुणवत्ता तथा अनुसंधान पारितंत्र पर केंद्रित द्वितीय-पीढ़ी के गहन सुधार अनिवार्य हैं।

प्रिलिम्स के लिये: NEP 2020, अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF), एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट (ABC), राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग ढाँचा (NIRF), पीएम-उषा (PM-USHA)

मेन्स के लिये:भारत में उच्च शिक्षा प्रणाली में हालिया विकास, प्रमुख चुनौतियाँ तथा उच्च शिक्षा को सशक्त बनाने के उपाय

जैसे-जैसे भारत विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण की ओर अग्रसर हो रहा है, उच्च शिक्षा पारितंत्र एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है जहाँ मात्रात्मक विस्तार तो प्राप्त कर लिया गया है, किंतु गुणवत्ता की समानता अब भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी तथा तीव्र गति से बढ़ते नामांकन के संदर्भ में विश्वविद्यालय अब केवल शिक्षण के केंद्र नहीं रहे, बल्कि नवाचार, सामाजिक गतिशीलता तथा राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धात्मकता के प्रमुख आधार बनते जा रहे हैं। हालाँकि, यदि संस्थागत क्षमता के अनुरूप संरचनात्मक विस्तार नहीं किया गया, तो यह स्थिति क्षमता निर्माण के स्थान पर केवल प्रमाण-पत्रों की वृद्धि तक सीमित रह सकती है। अतः जनसांख्यिकीय लाभांश को वास्तविक विकासात्मक परिणामों में रूपांतरित करने के लिये शासन व्यवस्था, शिक्षण-पद्धति तथा अनुसंधान के क्षेत्रों में गहन और सुविचारित द्वितीय-पीढ़ी के सुधार अपरिहार्य हो जाते हैं।

भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में वर्तमान विकास

  • बहुविषयक एवं अनुसंधान-उन्मुख विश्वविद्यालय: भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के अनुरूप विषयगत संस्थानों बजाय बहुविषयक एवं अनुसंधान-केंद्रित विश्वविद्यालयों को महत्त्व दिया जा रहा है।
    • यह परिवर्तन समस्या-समाधान क्षमता को सुदृढ़ करता है, विभिन्न विषयों में नवाचार को प्रोत्साहित करता है तथा स्नातकों की रोज़गारयोग्यता में वृद्धि करता है।
      • लक्षित वित्तपोषण और परिणाम-आधारित सुधार यह संकेत देते हैं कि नीतिगत-दृष्टिकोण अब मात्र विस्तार से आगे बढ़कर संस्थागत उत्कृष्टता पर केंद्रित हो रही है।
    • उदाहरणस्वरूप, पीएम-उषा (PM-USHA) योजना के अंतर्गत 600 से अधिक परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है, जिनमें 35 चयनित राज्य विश्वविद्यालयों को बहुविषयक शिक्षा एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय (MERU) के रूप में विकसित करने हेतु लगभग ₹100 करोड़ प्रति संस्थान का अनुदान प्रदान किया गया है, जिससे बहुविषयक परिवर्तन और अनुसंधान क्षमता निर्माण को बल मिला है।
  • शैक्षणिक स्वायत्तता हेतु नियामकीय ढाँचे का सरलीकरण: भारत उच्च शिक्षा क्षेत्र में एकीकृत एवं एकल नियामक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, जिसके अंतर्गत UGC, AICTE तथा NCTE जैसे बहु-स्तरीय निकायों द्वारा की जा रही विखंडित निगरानी को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। यह पहल NEP 2020 की भावना के अनुरूप है।
    • प्रस्तावित विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 (पूर्ववर्ती HECI) का उद्देश्य नियामकीय प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना, अनुपालन बोझ को कम करना तथा बहुविषयक शिक्षा को सक्षम बनाना है। 
    • इसमें विनियमन, प्रत्यायन तथा शैक्षणिक मानकों हेतु पृथक-पृथक ऊर्ध्वाधर संरचनाओं की परिकल्पना की गई है, जिससे पारदर्शिता तथा विश्वास-आधारित शासन को बढ़ावा मिलता है।
      • वित्तपोषण से संबंधित कार्य सरकार के पास ही रहेंगे, जबकि चिकित्सा एवं विधि शिक्षा को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।
  • अनुसंधान एवं नवाचार हेतु प्रतिभा-परिस्थितिकी तंत्र का विकास: भारत एक सशक्त अनुसंधान कार्यबल के निर्माण हेतु डॉक्टोरल शिक्षा तथा प्रतिस्पर्धी फेलोशिप कार्यक्रमों का सक्रिय रूप से विस्तार कर रहा है। 
    • उन्नत वित्तपोषण और राष्ट्रीय मिशनों के माध्यम से अनुसंधान की गुणवत्ता, अंतर-विषयक सहयोग तथा वैश्विक सहभागिता में सुधार हो रहा है।
    • बजट 2025–26 में घोषित PMRF 2.0 योजना के अंतर्गत अगले पाँच वर्षों में 10,000 नई फेलोशिप प्रदान करने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे IIT, IIS जैसे अग्रणी संस्थानों में उत्कृष्ट प्रतिभाओं को डॉक्टोरल अनुसंधान की ओर आकर्षित किया जा सके।
      • ये पहलें भारत को ज्ञान-उपभोगकर्त्ता से ज्ञान-निर्माता राष्ट्र में रूपांतरित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण हैं।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं डिजिटल अधिगम का मुख्यधारा में समावेशन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तथा डिजिटल प्रौद्योगिकियों को पाठ्यक्रम, शिक्षण-पद्धति एवं संस्थागत शासन में समाहित किया जा रहा है, जिससे विद्यार्थियों को भविष्य-उन्मुख कौशल प्रदान किये जा सकें।
    • इससे अधिगम का वैयक्तिकरण, अनुसंधान उत्पादकता तथा उद्योग-समन्वय में वृद्धि हो रही है।
    • केंद्रीय बजट 2025–26 में शिक्षा हेतु AI के लिये ₹500 करोड़ के आवंटन के साथ एक समर्पित उत्कृष्टता केंद्र की घोषणा की गई है।
      • इसके साथ ही ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री (APAAR) को शिक्षा पारितंत्र की अनिवार्य डिजिटल रीढ़ के रूप में विकसित किया जा रहा है, जो डिग्रियों, कौशलों और क्रेडिट अंतरण को एकीकृत करता है।
    • इसके अतिरिक्त, AICTE ने वर्ष 2025 को “AI का वर्ष” घोषित करते हुए सभी संबद्ध संस्थानों को AI कार्यान्वयन योजनाएँ प्रस्तुत करने तथा AI अफर्मेशन प्लेज़ अपनाने का निर्देश दिया है, जिसके अंतर्गत यांत्रिक एवं सिविल इंजीनियरिंग जैसे गैर-कंप्यूटर विज्ञान विषयों में भी AI कोर्सेज़ का समावेशन अनिवार्य किया गया है।
  • भारतीय ज्ञान परंपराओं एवं भाषाओं का सार्थक समावेशन: उच्च शिक्षा सुधारों के अंतर्गत भारतीय ज्ञान प्रणालियों (IKS) को मुख्यधारा के विषयों में सम्मिलित किया जा रहा है।
    • शिक्षण एवं अनुसंधान में भाषाई समावेशन से पहुँच और प्रासंगिकता का विस्तार होता है। परंपरा और आधुनिकता का यह समन्वय भारत के सभ्यतागत आत्मविश्वास को सुदृढ़ करता है।
    • उदाहरणस्वरूप, IIT खड़गपुर जैसे संस्थानों ने शिक्षा मंत्रालय के सहयोग से IKS में स्नातकोत्तर कार्यक्रम प्रारंभ किये हैं, जिनके लिये पाठ्यक्रम विकास तथा संकाय-प्रशिक्षण पहलें संचालित की जा रही हैं।
  • ज्ञान एवं अनुसंधान तक पहुँच का लोकतंत्रीकरण: “एक राष्ट्र, एक सदस्यता (ONOS)” पहल के माध्यम से सरकार ने शोध पत्रिकाओं की सदस्यता को केंद्रीकृत कर दिया है, जिससे छोटे एवं राज्य-पोषित विश्वविद्यालयों में अनुसंधान की वित्तीय बाधाएँ दूर हो रही हैं।
    • इसके परिणामस्वरूप, किसी दूरस्थ टियर-2 महाविद्यालय का विद्यार्थी भी IIT के विद्यार्थी के समान उच्च-स्तरीय वैश्विक अनुसंधान तक पहुँच प्राप्त कर सकता है। यह पहल 13,000 से अधिक शोध पत्रिकाओं तक पहुँच प्रदान करती है और 6,300 से अधिक सरकारी शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थानों को कवर करती है।
      • इससे लगभग 1.8 करोड़ विद्यार्थी, संकाय सदस्य एवं शोधकर्त्ता लाभान्वित हो रहे हैं।
  • ऋण गतिशीलता के माध्यम से शैक्षणिक अनुकूलन: एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट (ABC) तथा बहु-प्रवेश–बहु-निर्गमन व्यवस्था आजीवन अधिगम और शिक्षार्थी गतिशीलता को संस्थागत रूप प्रदान कर रही हैं।  
    • ये सुधार विद्यार्थियों को शैक्षणिक सुसंगति बनाए रखते हुए अनुकूलित अधिगम पथ चुनने की सुविधा देते हैं। डिजिटल मंचों के माध्यम से प्रमाण-पत्रों की पारदर्शिता और पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित की जा रही है।
    • उदाहरणस्वरूप, दिल्ली विश्वविद्यालय ने क्रेडिट अंतरण और मॉड्यूलर डिग्री संरचना को पूर्णतः लागू कर दिया है। 
  • अंतर्राष्ट्रीयकरण एवं वैश्विक शैक्षणिक सहभागिता का विस्तार: भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली का स्वरूप अब विद्यार्थी गतिशीलता, संयुक्त अनुसंधान और संस्थागत साझेदारियों के माध्यम से अधिक वैश्विक होती जा रही है। 
    • अंतर्राष्ट्रीय अनुभव शैक्षणिक मानकों तथा अनुसंधान प्रभाव को सुदृढ़ करता है और भारत में ज्ञान मानकों को विश्वस्तरीय बनाता है।
    • यूजीसी के वर्ष 2023 विनियमों के अंतर्गत यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्प्टन ने गुरुग्राम में अपना पहला विदेशी परिसर स्थापित किया है।
      • इसके अतिरिक्त, बेंगलुरु, दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और चेन्नई में कम से कम 12 विदेशी विश्वविद्यालयों को परिसर स्थापित करने की स्वीकृति दी गई है।
  • विद्यार्थी कल्याण एवं मानसिक स्वास्थ्य का संस्थानीकरण: विद्यार्थी कल्याण को अब शैक्षणिक सफलता तथा संस्थागत गुणवत्ता का अनिवार्य घटक माना जा रहा है। उच्च शिक्षा संस्थानों में परामर्श, मार्गदर्शन तथा तनाव-प्रबंधन प्रणालियों को अकादमिक नियोजन का अभिन्न अंग बनाया जा रहा है। 
    • ताकि अधिक स्वस्थ एवं अनुकूल अधिगम पारितंत्र का निर्माण हो सके।
    • इस संदर्भ में, UGC ने एकीकृत मानसिक स्वास्थ्य नीति जारी की है, जिसके अंतर्गत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में परामर्श केंद्र स्थापित करना अनिवार्य किया गया है। 
      • कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों ने पूर्णकालिक मानसिक स्वास्थ्य एवं मेंटरशिप ढाँचे को प्रभावी रूप से लागू भी कर दिया है। 

भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली से जुड़ी प्रमुख समस्याएँ क्या हैं?

  • “डिग्री–रोज़गारयोग्यता” विरोधाभास: भारत के अनेक विश्वविद्यालय आज “डिग्री उत्पादन केंद्र” के रूप में कार्य कर रहे हैं, जहाँ व्यावहारिक कौशल अर्जन की तुलना में सैद्धांतिक एवं पारंपरिक अधिगम को प्राथमिकता दी जाती है। इसके परिणामस्वरूप एक ऐसा कार्यबल तैयार हो रहा है जो प्रमाण-पत्रों से युक्त तो है, किंतु व्यावसायिक रूप से सक्षम नहीं है।
    • यह विसंगति “ऐसे स्नातकों को सृजित कर सही है जो रोज़गार हीनता की समस्या का सामना कर रहे हैं”, जिसके कारण उद्योगों को या तो अत्यधिक प्रशिक्षण लागत वहन करनी पड़ती है अथवा उच्च युवा बेरोज़गारी के बावजूद पद रिक्त रखने पड़ते हैं।
    • जनवरी 2026 में प्रकाशित टीमलीज़ एडटेक की रिपोर्ट “From Degree Factories to Employability Hubs” के अनुसार, भारत के लगभग 75% उच्च शिक्षा संस्थान (HEIs) उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार नहीं हैं।
  • संकाय स्तर पर बाधाएँ एवं ‘एड-हॉक संस्कृति’: उच्च शिक्षा प्रणाली में स्थायी शिक्षकों की गंभीर कमी विद्यमान है, जिसके चलते संस्थान अस्थायी (एड-हॉक) शिक्षकों पर अत्यधिक निर्भर हो गये हैं। ऐसे शिक्षकों के पास न तो अनुसंधान हेतु पर्याप्त प्रोत्साहन होता है और न ही रोज़गार-सुरक्षा, जिससे संस्थागत स्मृति, मार्गदर्शन व्यवस्था तथा शैक्षणिक निरंतरता प्रभावित होती है।
    • यह स्थिति भारत के “विश्वगुरु” बनने के आकांक्षी लक्ष्य को भी बाधित करती है। 
    • वर्ष 2024 में एक संसदीय समिति ने बताया कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 56% प्राध्यापक पद रिक्त हैं तथा केंद्रीय संस्थानों में कुल 5,410 से अधिक शिक्षण पद रिक्त हैं
  • लोक व्यय वृद्धि के बावजूद अभिगम्यता संबंधित चिंताएँ: यद्यपि केंद्रीय बजट 2024–25 में उच्च शिक्षा हेतु आवंटन में वृद्धि की गई, तथापि निजीकरण एवं स्व-वित्तपोषित कोर्सेज़ की प्रवृत्ति निरंतर बनी हुई है, जिससे सार्वजनिक व्यय का वास्तविक वितरणात्मक प्रभाव सीमित रह जाता है।
    • बढ़े हुए वित्तीय संसाधनों का बड़ा भाग छात्रवृत्तियों एवं फेलोशिप के स्थान पर संस्थागत विस्तार तथा पूंजीगत व्यय में समाहित हो जाता है, जिसके कारण हाशिये पर स्थित वर्गों के विद्यार्थी बढ़ती शुल्क-भार से प्रभावित होते हैं।
      • फलतः आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों की पहुँच सीमित बनी रहती है तथा बजटीय वृद्धि के बावजूद विद्यार्थी असंतोष बना रहता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य एवं विद्यार्थी कल्याण संकट: विश्वविद्यालय परिसरों में अकादमिक अतिस्पर्धा, जाति-आधारित भेदभाव तथा सामाजिक अलगाव के कारण वे उच्च-दबाव वाले परिवेश में परिवर्तित होते जा रहे हैं, जबकि संस्थागत सहायता तंत्र अपर्याप्त है।. 
    • कार्यात्मक परामर्श केंद्रों का अभाव और सहायता लेने को कमी या कमज़ोरी माने वाली पूर्वधारणाएँ, विद्यार्थी मानसिक संकट को एक मूक महामारी में परिवर्तित कर रही है।
    • उदाहरणस्वरूप, निम्हांस (बेंगलुरु) द्वारा किये गये एक अध्ययन में पाया गया कि 12.3% प्रतिभागियों ने विगत वर्ष आत्महत्या के विचार व्यक्त किये, 5.2% ने आत्महत्या का प्रयास किया तथा जिनमें ऐसे विचार थे, उनमें से 34.8% ने वास्तविक प्रयास भी किया।
  • अनुसंधान ठहराव एवं नौकरशाही जटिलताएँ: हालाँकि अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) की स्थापना की गई है, फिर भी अनुदान वितरण में विलंब, सीमित स्वायत्तता तथा राज्य विश्वविद्यालयों में कमज़ोर अवसंरचना के कारण भारत का अनुसंधान उत्पादन बाधित है।
    • वर्तमान पारितंत्र में उच्च-जोखिम नवाचार अथवा पेटेंट योग्य प्रौद्योगिकी की तुलना में “सुरक्षित” सैद्धांतिक शोध-पत्रों को अधिक प्रोत्साहन मिलता है, जिससे वैश्विक स्तर पर भारत का अनुसंधान प्रभाव सीमित बना रहता है।
    • इसके अतिरिक्त, भारत का अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय GDP का मात्र 0.64% है, जो चीन के लगभग 2% की तुलना में अत्यंत कम है और नवाचार क्षमता को सीमित करता है।
  • रैंकिंग एवं प्रत्यायन से जुड़ी चुनौतियाँ: भारत की उच्च शिक्षा गुणवत्ता आश्वासन प्रणाली सीमित प्रत्यायन कवरेज तथा विश्वसनीयता से जुड़े प्रश्नों से ग्रस्त है, जिससे संस्थागत गुणवत्ता संकेतकों एवं रैंकिंग की उपयोगिता प्रभावित होती है।
    • यद्यपि NAAC मानकों के संवर्द्धन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, तथापि प्रक्रियात्मक खामियों एवं सत्यनिष्ठा संबंधी मुद्दों ने विश्वास को क्षीण किया है, जिससे घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संस्थानों की छवि प्रभावित होती है।
    • वर्तमान में भारत के 30% से अधिक उच्च शिक्षा संस्थान NAAC से प्रत्यायित नहीं हैं, जिसके कारण बड़ी संख्या में संस्थान औपचारिक गुणवत्ता मान्यता के बिना संचालित हो रहे हैं।
      • इसके चलते NIRF जैसे ढाँचों का प्रभाव भी सीमित रह जाता है तथा वैश्विक रैंकिंग में शीर्ष स्थान प्राप्त करने वाले भारतीय विश्वविद्यालयों की संख्या कम बनी रहती है।
  • अभिगम्यता में क्षेत्रीय एवं सामाजिक असमानताएँ (GER): यद्यपि समग्र सकल नामांकन अनुपात (GER) में सुधार हो रहा है, किंतु यह आँकड़ा गहन क्षेत्रीय एवं सामाजिक विषमताओं को आच्छादित कर देता है। दक्षिणी राज्यों में उच्च नामांकन के विपरीत, आंतरिक एवं पिछड़े क्षेत्रों में उच्च शिक्षा तक पहुँच सीमित बनी हुई है।
    • शिक्षा का सामूहिकीकरण समावेशी नहीं रहा है, क्योंकि टियर-2 एवं टियर-3 शहरों के विद्यार्थी महानगरीय संस्थानों की तुलना में कमज़ोर अवसंरचना और गुणवत्ता की समस्या से जूझते हैं।
    • उत्तर–दक्षिण विभाजन स्पष्ट रूप से विद्यमान है—जहाँ तमिलनाडु (47%) और केरल (41.3%) का GER, बिहार (17.1%) तथा उत्तर प्रदेश (24.1%) जैसे उत्तरी राज्यों की तुलना में लगभग दोगुना है।

भारत में उच्च शिक्षा को सशक्त बनाने हेतु आवश्यक उपाय क्या है?

  • “ग्रेडेड सेल्फ गवर्नेंस” के माध्यम से संस्थागत स्वायत्तता: उच्च शिक्षा में व्याप्त “अफिलिएशन राज” को समाप्त करने हेतु नियामक संस्थाओं को परिपक्वता-आधारित ग्रेडेड स्वायत्तता मॉडल की ओर तीव्रता से संक्रमण करना होगा।
    • इसके अंतर्गत कठोर, अधोगामी निरीक्षण व्यवस्था के स्थान पर “हल्का किंतु प्रभावी”  पर्यवेक्षण तंत्र अपनाया जाए, जिसमें उच्च प्रदर्शन करने वाले संस्थानों को अकादमिक, प्रशासनिक तथा वित्तीय स्तर पर पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हो।
    • नौकरशाही अनुमोदनों से परिचालन निर्णयों को मुक्त करने से विश्वविद्यालय नवीन पाठ्यक्रम शीघ्र प्रारंभ कर सकेंगे। इससे संस्थान प्रमुख शैक्षिक उद्यमी के रूप में कार्य कर सकेंगे, न कि केवल प्रशासक के रूप में और वैश्विक शैक्षणिक प्रवृत्तियों के प्रति त्वरित अनुक्रिया संभव होगी।
  • क्षेत्रीय विकास हेतु “ट्रिपल हेलिक्स” नवाचार क्लस्टर: विश्वविद्यालयों को पृथक इकाइयों के रूप में कार्य करने के स्थान पर सरकार–अकादमिक–उद्योग सहयोग आधारित “ट्रिपल हेलिक्स मॉडल” के अंतर्गत स्थानीय नवाचार क्लस्टरों का केंद्र बनना चाहिये।
    • संस्थानों को अपने अनुसंधान को अपने भौगोलिक क्षेत्र की विशिष्ट आर्थिक एवं विकासात्मक आवश्यकताओं से जोड़ने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिये—जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में एग्री-टेक, औद्योगिक क्षेत्रों में वस्त्र या विनिर्माण अनुसंधान।
    • इससे एक सहजीवी पारितंत्र विकसित होगा, जहाँ विद्यार्थी वास्तविक क्षेत्रीय समस्याओं पर कार्य करेंगे, उद्योगों को लक्षित अनुसंधान समाधान प्राप्त होंगे तथा विश्वविद्यालय स्थानीय आर्थिक विकास के अपरिहार्य प्रेरक बनेंगे।
  • अप्रेंटिसशिप-आधारित डिग्री संरचना का मुख्यधारा में समावेशन: उच्च शिक्षा को “सिद्धांत-प्रधान” से “क्षमता-आधारित” प्रमाणन की ओर ले जाना अनिवार्य है। इसके अंतर्गत सामान्य स्नातक कोर्सेज़ (BA, BSc, BCom) में अनिवार्य रूप से अप्रेंटिसशिप घटक सम्मिलित किया जाना चाहिये।
    • राष्ट्रीय क्रेडिट ढाँचे (NCrF) को उद्योग कौशल मानकों से जोड़ते हुए, डिग्री के 30–40% क्रेडिट कार्यस्थल या कॉर्पोरेट परिवेश में अर्जित किये जा सकते हैं।
      • इससे रोज़गारयोग्यता अंतर समाप्त होगा, क्योंकि विद्यार्थियों में वह अव्यक्त ज्ञान एवं सॉफ्ट स्किल्स विकसित होंगी जो केवल कक्षा शिक्षण से संभव नहीं हैं।
  • “प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस” के माध्यम से संकाय व्यवस्था का आधुनिकीकरण: संकाय व्यवस्था संबंधित चुनौतियों से निपटने हेतु द्वि-आयामी रणनीति आवश्यक है—एक ओर वर्तमान शिक्षकों हेतु निरंतर व्यावसायिक विकास (CPD) को संस्थागत स्वरूप दिया जाए, दूसरी ओर प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस (PoP) मॉडल को सामान्यीकृत किया जाए।
    • PoP व्यवस्था के अंतर्गत उद्योग एवं व्यावसायिक क्षेत्र के अनुभवी विशेषज्ञ, बिना पारंपरिक पीएचडी शर्त के, शिक्षण में योगदान दे सकते हैं, जिससे कोर्सेज़ में व्यवहारिक यथार्थ का समावेश होगा।
      • साथ ही, नियमित संकाय के लिये पदस्थायित्व को केवल शोध-प्रकाशनों से नहीं, बल्कि शिक्षण नवाचार तथा संस्थागत सेवा से भी जोड़ा जाना चाहिये, जिससे संतुलित एवं मार्गदर्शन-केंद्रित अकादमिक संस्कृति विकसित हो
  • विविधीकृत एंडोमेंट के माध्यम से वित्तीय सुदृढ़ता: सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को केवल राज्य अनुदानों पर निर्भरता कम कर व्यावसायिक एंडोमेंट प्रबंधन तंत्र विकसित करना होगा।
    • हाइयर एजुकेशन फाइनेंसिंग एजेंसी (HEFA) के मॉडल की तर्ज पर, संस्थानों को अपने पूर्व विद्यार्थी नेटवर्क, पेटेंट पोर्टफोलियो तथा परामर्श सेवाओं के माध्यम से स्थायी कोष निर्माण हेतु सशक्त किया जाना चाहिये।
    • इससे विश्वविद्यालय उच्च जोखिम–उच्च प्रतिफल वाले अनुसंधान अवसंरचना तथा विद्यार्थी कल्याण में दीर्घकालिक निवेश कर सकेंगे और वित्तीय अस्थिरता से संरक्षित रहेंगे।
  • “फिजिटल” अधिगम पारितंत्र के माध्यम से गुणवत्ता का लोकतंत्रीकरण: भविष्य की उच्च शिक्षा भौतिक + डिजिटल (Phygital) मॉडल में निहित है, जो पहुँच, लागत और गुणवत्ता की “आयरन ट्रायंगल” चुनौती को तोड़ सकता है। शीर्ष संस्थानों को हब विश्वविद्यालय के रूप में कार्य करते हुए, एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट (ABC) के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों के कॉलेजों (स्पोक्स) को उच्च-गुणवत्ता शिक्षण सामग्री उपलब्ध करानी चाहिये।. 
    • इस नेटवर्क आधारित मॉडल से ग्रामीण कॉलेज का विद्यार्थी भी प्रमुख संस्थान से क्रेडिट अर्जित कर सकेगा, जिससे भौगोलिक असमानता कम होगी।
  • ट्विनिंग कार्यक्रमों एवं संयुक्त अनुसंधान के माध्यम से “घरेलू स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता”: केवल विद्यार्थियों को विदेश भेजने के बजाय, देश के भीतर ही अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा और अनुसंधान का अनुभव उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जाना चाहिये।
    • इसके लिये ट्विनिंग कार्यक्रमों एवं संयुक्त डिग्री विनियमों को सरल बनाया जाए तथा विदेशी उच्च शिक्षा संस्थानों के साथ साझेदारी को प्रोत्साहित किया जाए।
    • इससे विश्व स्तरीय कोर्सेज़ एवं सर्वोत्तम प्रणालियों को भारतीय विश्वविद्यालयों तक पहुँचाया जा सकेगा, इससे ब्रेन ड्रेन रुकेगा तथा सहयोगात्मक ऑनलाइन अंतर्राष्ट्रीय अधिगम (COIL) के माध्यम से अकादमिक मानक बेहतर होंगे।

निष्कर्ष: 

भारत की उच्च शिक्षा यात्रा अब केवल विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें समावेशन एवं उत्कृष्टता की भी माँग है। विकसित भारत 2047 का लक्ष्य तभी साकार होगा जब विश्वविद्यालय स्वायत्त रूप से कार्य कर सकेंगे, निर्भीक नवाचार करेंगे तथा बड़े पैमाने पर रोजगारोन्मुख ज्ञान प्रदान करेंगे। द्वितीय-पीढ़ी के सुधारों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों को मात्र डिग्री प्रदान करने वाले केंद्रों से बदलकर अनुसंधान, कौशल एवं सामाजिक गतिशीलता के सशक्त इंजन बनाना होना चाहिये। तभी भारत अपनी जनसांख्यिकीय लाभांश को दीर्घकालिक विकासात्मक लाभ में रूपांतरित कर सकेगा।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

यद्यपि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने उच्च शिक्षा तक पहुँच का विस्तार किया है, तथापि यह संस्थागत गुणवत्ता एवं अनुसंधान क्षमता से संबंधित चुनौतियों का पूर्णतः समाधान नहीं कर पाई है। विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में द्वितीय-पीढ़ी के सुधारों की आवश्यकता पर चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. उच्च शिक्षा में द्वितीय-पीढ़ी के सुधार क्या हैं?
ये सुधार केवल नामांकन विस्तार तक सीमित न होकर संस्थानों के कार्यात्मक ढाँचे, शैक्षणिक गुणवत्ता, अनुसंधान पारितंत्र तथा शासन व्यवस्था में सुधार पर केंद्रित होते हैं।

2. विकसित भारत 2047 के लिये ये सुधार क्यों आवश्यक हैं?
क्योंकि जनसांख्यिकीय लाभ तभी विकास में परिवर्तित हो सकता है, जब उच्च शिक्षा प्रणाली उच्च-गुणवत्तायुक्त, नवाचार-उन्मुख तथा रोज़गारोन्मुख मानव संसाधन का सृजन करे।

3. NEP 2020 उच्च शिक्षा के रूपांतरण में कैसे सहायक है?
NEP 2020 बहु-विषयक शिक्षा, शैक्षणिक लचीलापन, अनुसंधान का एकीकरण तथा संस्थागत स्वायत्तता को प्रोत्साहित कर उच्च शिक्षा प्रणाली के रूपांतरण की आधारशिला रखती है।

4. वर्तमान में भारतीय विश्वविद्यालयों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
प्रदान की जा रही डिग्रियों और वास्तविक रोज़गार-क्षमता एवं अनुसंधान दक्षता के बीच बना असंतुलन सबसे बड़ी चुनौती है।

5. आगे की प्रमुख सुधार प्राथमिकता क्या होनी चाहिये?
स्वायत्त, सुशासित, अनुसंधान-प्रेरित संस्थानों का निर्माण, जिनके उद्योग तथा वैश्विक अकादमिक जगत से सुदृढ़ संबंध हों।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

प्रिलिम्स

प्रश्न. भारतीय संविधान के निम्नलिखित में से कौन-से प्रावधान शिक्षा पर प्रभाव डालते हैं? (2012)

  1. राज्य नीति के निदेशक तत्त्व
  2.  ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकाय
  3.  पाँचवीं अनुसूची
  4.  छठी अनुसूची
  5.  सातवीं अनुसूची

नीचे दिये गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर चुनें:

(a)केवल 1 और 2
(b)केवल 3, 4 और 5
(c)केवल 1, 2 और 5
(d)1, 2, 3, 4 और 5

उत्तर: (d)


मेन्स

प्रश्न. जनसंख्या शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों की विवेचना करते हुए भारत में इन्हें प्राप्त करने के उपायों को विस्तृत प्रकाश डालिये। (2021)

प्रश्न. भारत में डिजिटल पहल ने किस प्रकार से देश की शिक्षा व्यवस्था के संचालन में योगदान किया है? विस्तृत उत्तर दीजिये। (2020)