सतत विकास हेतु भारत की उभरती समुद्री रणनीति | 30 Dec 2025
यह एडिटोरियल 23/12/2025 को द हिंदू बिज़नेस लाइन में प्रकाशित Why the $30-trillion economy by 2047 will be built at sea शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। इस लेख में भारत के समुद्री क्षेत्र को उसके 30 ट्रिलियन डॉलर के आर्थिक लक्ष्य के प्रमुख चालक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें अधोसंरचना के विस्तार, रणनीतिक सुरक्षा और सतत विकास पर प्रकाश डाला गया है। यह इस बात पर बल देता है कि बंदरगाह, नौ-परिवहन और समुद्री सुधार भारत की दीर्घकालिक वृद्धि एवं वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता के लिये कितने महत्त्वपूर्ण हैं।
प्रिलिम्स के लिये: सागरमाला परियोजना, हिंद महासागर, ग्रीन टग ट्रांज़िशन प्रोग्राम, ब्लू इकोनॉमी
मेन्स के लिये: समुद्री क्षेत्र में वर्तमान घटनाक्रम, प्रमुख मुद्दे और उपाय।
भारत वर्ष 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर है और इस यात्रा को आकार देने में समुद्र की भूमिका निर्णायक होगी। परिमाण के हिसाब से लगभग 95% और मूल्य के हिसाब से 70% व्यापार समुद्री मार्गों से होता है, इसलिये बंदरगाह एवं जहाज़रानी विकास के महत्त्वपूर्ण इंजन बनकर उभरे हैं। बंदरगाहों की दक्षता, क्षमता विस्तार और लॉजिस्टिक्स सुधारों में हालिया प्रगति सकारात्मक संकेत देती है, लेकिन भविष्य की महत्त्वाकांक्षा कहीं अधिक व्यापक है। समुद्री अवसंरचना को मज़बूत करने, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में प्रभावी एकीकरण और सुधारों की निरंतरता के माध्यम से भारत अपनी नीली अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक, समावेशी एवं सतत विकास के एक सशक्त चालक के रूप में रूपांतरित करने की ठोस स्थिति में है।
भारत के समुद्री क्षेत्र में वर्तमान में क्या-क्या घटनाक्रम हो रहे हैं?
- बंदरगाह क्षमता और दक्षता का विस्तार: भारत के बंदरगाह अवसंरचना में महत्त्वपूर्ण विस्तार हुआ है, जिसकी कुल क्षमता सत्र 2013-14 में लगभग 1,400 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष से बढ़कर सत्र 2024-25 में लगभग 2,762 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष हो गई है और प्रमुख बंदरगाह वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग 855 मिलियन टन कार्गो का संचालन करेंगे।
- परिचालन दक्षता में सुधार, जैसे कि सत्र 2023-24 में जहाज़ों के औसत टर्नअराउंड समय को 93 घंटे से घटाकर 48 घंटे (जो कि 48.65% की कमी है) करना, ने प्रतिस्पर्द्धात्मकता एवं उत्पादन क्षमता को बढ़ाया है।
- भारत के समुद्री प्रशासन में संरचनात्मक सुधार: हाल ही में कई महत्त्वपूर्ण समुद्री कानून लागू किये गए हैं, जिनमें मर्चेंट शिपिंग एक्ट, 2025, कैरिज ऑफ गुड्स बाय सी एक्ट, 2025 और इंडियन पोर्ट्स एक्ट, 2025 शामिल हैं।
- इनका उद्देश्य औपनिवेशिक काल के पुराने कानूनों का आधुनिकीकरण करना, भारतीय समुद्री कानून को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना तथा शासन, सुरक्षा, पर्यावरण अनुपालन और व्यापार सुगमता में सुधार करना है।
- समुद्री अमृतकाल विज़न 2047 और निवेश प्रोत्साहन: दीर्घकालिक समुद्री अमृतकाल विज़न 2047 के तहत, सरकार ने अगले 25 वर्षों में नेक्स्ट जेनरेशन के बंदरगाहों, जहाज़ निर्माण, अंतर्देशीय जलमार्गों, हरित शिपिंग गलियारों और समुद्री समूहों के विकास के लिये लगभग 80 लाख करोड़ रुपये (लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर) के निवेश की योजना बनाई है, जिसका उद्देश्य वैश्विक समुद्री व्यापार में भारत की हिस्सेदारी को बढ़ाना है।
- शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SCI) ने 1 लाख करोड़ रुपये के निवेश के साथ वर्ष 2047 तक अपने बेड़े को 216 जहाज़ों तक विस्तारित करने की योजना की घोषणा की है, जिससे 10 मिलियन सकल टन भार (GT) की वृद्धि होगी तथा भारत की वैश्विक समुद्री प्रतिस्पर्द्धात्मकता मज़बूत होगी।
- भारत समुद्री सप्ताह- 2025 ने 85 से अधिक देशों की भागीदारी के साथ भारत के बढ़ते वैश्विक समुद्री नेतृत्व को प्रदर्शित किया, जिससे सतत विकास और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के प्रति प्रतिबद्धताओं को बल मिला। इस आयोजन में 600 से अधिक समझौता ज्ञापनों के माध्यम से 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश प्राप्त हुआ, जो भारत के समुद्री दृष्टिकोण में वैश्विक विश्वास को दर्शाता है।
- तटीय परिवहन एवं अंतर्देशीय जलमार्ग विकास: तटीय परिवहन अधिनियम 2025 आधिकारिक तौर पर तटीय परिवहन को सड़क, रेल, हवाई मार्ग और अंतर्देशीय जलमार्गों के साथ परिवहन के पाँचवें साधन के रूप में मान्यता देता है, जिसका उद्देश्य लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना तथा बहुआयामी संपर्क को बेहतर बनाना है।
- भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में अंतर्देशीय जलमार्गों पर 145.5 मिलियन टन माल ढुलाई का रिकॉर्ड दर्ज किया, जो वित्त वर्ष 2013-14 में 18.1 मिलियन टन से अधिक है तथा 20.86% की CAGR दर्ज की गई है।
- राष्ट्रीय जलमार्गों की संख्या 5 से बढ़कर 111 हो गई है, जबकि परिचालन विस्तार 2,716 किमी. (2014-15) से बढ़कर 4,894 किमी (2023-24) हो गया है।
- घरेलू जहाज़ निर्माण को बढ़ावा: सरकार की पहलों में जहाज़ निर्माण और मरम्मत अवसंरचना के विकास, घरेलू जहाज़ स्वामित्व को बढ़ावा देने तथा बंदरगाह सुविधाओं को सुदृढ़ करने के लिये ₹70,000 करोड़ का वित्तीय पैकेज शामिल है।
- वर्तमान में भारत वैश्विक जहाज़ निर्माण में 16वें स्थान पर है और वर्ष 2030 तक शीर्ष दस में पहुँचने का लक्ष्य बना रहा है।
- भारत के जहाज़ निर्माण मिशन का उद्देश्य वित्तपोषण, जहाज़ निर्माण, जहाज़ मरम्मत, पट्टे पर देना, चालक दल की भर्ती और समुद्री सेवाओं सहित 12 प्रमुख क्षेत्रों पर फोकस करके संपूर्ण समुद्री मूल्य शृंखला को मज़बूत करना है।
- समुद्री मानव संसाधन विकास: भारत के समुद्री कार्यबल में काफी वृद्धि हुई है, नाविकों की संख्या बढ़कर 3 लाख से अधिक हो गई है, जिससे भारत प्रशिक्षित समुद्री पेशेवरों के शीर्ष वैश्विक आपूर्तिकर्त्ताओं में से एक बन गया है।
- इसके अलावा, क्षेत्रीय स्तर पर भी प्रयास किये जा रहे हैं, उदाहरण के लिये, समुद्री साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रम, जिनमें जहाज़ पर आधारित IT–OT सिस्टम, पोर्ट कम्युनिटी सिस्टम, वेसल ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (VTMS) और समुद्री महत्त्वपूर्ण अधोसंरचना शामिल हैं, को बढ़ावा दिया जा रहा है।
- इन पहलों का उद्देश्य साइबर-सुरक्षित समुद्री कार्यबल का निर्माण करना, नौवहन की सुरक्षा बढ़ाना, बंदरगाहों एवं शिपिंग नेटवर्क की रक्षा करना तथा IMO के साइबर सुरक्षा दिशानिर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करना है।
- इसके अलावा, क्षेत्रीय स्तर पर भी प्रयास किये जा रहे हैं, उदाहरण के लिये, समुद्री साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रम, जिनमें जहाज़ पर आधारित IT–OT सिस्टम, पोर्ट कम्युनिटी सिस्टम, वेसल ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (VTMS) और समुद्री महत्त्वपूर्ण अधोसंरचना शामिल हैं, को बढ़ावा दिया जा रहा है।
- हरित नौ-परिवहन और सतत समुद्री परिवर्तन: भारत अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप हरित और कम कार्बन उत्सर्जन वाली नौ-परिवहन को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहा है। ग्रीन टग ट्रांज़िशन प्रोग्राम (GTTP) का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 50 हरित टगों को शामिल करना है, जिससे प्रमुख बंदरगाहों पर उत्सर्जन में कमी आएगी।
- इसके अतिरिक्त, भारत जापान, नीदरलैंड और नॉर्वे जैसे देशों के साथ ग्रीन शिपिंग कॉरिडोर विकसित कर रहा है, जो हरित हाइड्रोजन एवं वैकल्पिक ईंधन का उपयोग करके शून्य-उत्सर्जन समुद्री मार्गों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
- ये पहलें वर्ष 2070 तक भारत के नेट-ज़ीरो लक्ष्य का समर्थन करती हैं और समुद्री क्षेत्र को वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के साथ संरेखित करती हैं।
- इसके अतिरिक्त, भारत जापान, नीदरलैंड और नॉर्वे जैसे देशों के साथ ग्रीन शिपिंग कॉरिडोर विकसित कर रहा है, जो हरित हाइड्रोजन एवं वैकल्पिक ईंधन का उपयोग करके शून्य-उत्सर्जन समुद्री मार्गों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
- समुद्री सुरक्षा और रक्षा तैयारियों में वृद्धि: भारत ने समुद्री मार्गों और व्यापार मार्गों की सुरक्षा के लिये अपनी समुद्री सुरक्षा संरचना को काफी सुदृढ़ किया है।
- तटीय निगरानी में सुधार, सूचना संलयन केंद्र - हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR) का विस्तार और नौसेना की उपस्थिति में वृद्धि समुद्री क्षेत्र की जागरूकता सुनिश्चित करती है।
- आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी युद्धपोत निर्माण में तेज़ी आई है, अब भारतीय नौसेना के 75% से अधिक जहाज़ घरेलू स्तर पर निर्मित हो रहे हैं, जिससे रणनीतिक स्वायत्तता एवं क्षेत्रीय संधारणीयता मज़बूत हो रही है।
- पिछले दो दशकों में, भारतीय नौसेना आयात पर निर्भर खरीदार की नौसेना से मुख्य रूप से स्वदेशी निर्माता की नौसेना में उल्लेखनीय रूप से परिवर्तित हो गई है।
- बंदरगाह आधारित औद्योगीकरण और तटीय आर्थिक क्षेत्र: सागरमाला कार्यक्रम के तहत, विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स और निर्यात को एकीकृत करने के लिये बंदरगाह आधारित औद्योगिक समूहों एवं तटीय आर्थिक क्षेत्रों का विकास किया जा रहा है।
- लगभग 32,600 करोड़ रुपये की लागत वाली 100 से अधिक बंदरगाह आधुनिकीकरण परियोजनाओं से 230 मीट्रिक टन प्रति वर्ष की क्षमता में वृद्धि हुई है।
- इसके अतिरिक्त, ₹52,000 करोड़ की लागत वाली 80 से अधिक कनेक्टिविटी परियोजनाओं ने बंदरगाह से संबद्ध लगभग 1,500 किलोमीटर के अधोसंरचना में सुधार किया है।
- इस कार्यक्रम के तटीय विकास घटक के तहत, बेहतर मत्स्य-ग्रहण वाले बंदरगाहों और सुविधाओं के माध्यम से मछुआरों को भी लाभ हुआ है।
भारत के समुद्री क्षेत्र से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- अधोसंरचना की कमियाँ और क्षमता संबंधी बाधाएँ: हालाँकि कुल बंदरगाह क्षमता बढ़कर लगभग 2,762 मीट्रिक टन प्रति वर्ष (2024-25) हो गई है, भारत वैश्विक समुद्री व्यापार का केवल लगभग 10% का ही प्रबंधन करता है।
- जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह (JNPT) जैसे प्रमुख बंदरगाह सालाना 10 मिलियन TEU का संचालन करते हैं, जबकि शंघाई बंदरगाह की क्षमता लगभग 50 मिलियन TEU है, जो पैमाने और क्षमता की सीमाओं को रेखांकित करता है।
- कई भारतीय बंदरगाहों पर ड्राफ्ट संबंधी प्रतिबंध बड़े कंटेनर जहाज़ों के संचालन में बाधा उत्पन्न करते हैं, जिसके कारण कोलंबो और सिंगापुर जैसे विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से ट्रांसशिपमेंट करना पड़ता है।
- उच्च लॉजिस्टिक्स लागत और हिन्टरलैंड में अड़चनें: सुधारों के बावजूद, लास्ट-माइल कनेक्टिविटी, मल्टीमॉडल एकीकरण तथा सड़क, रेल, बंदरगाहों और अंतर्देशीय जलमार्गों के बीच समन्वय में चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
- बंदरगाहों पर भीड़, कुछ क्षेत्रों में समर्पित माल ढुलाई गलियारों की सीमित उपलब्धता और अवसंरचना की असमान गुणवत्ता लेन-देन लागत को लगातार बढ़ा रही है।
- वहीं, दक्षिणपूर्व एशियाई केंद्र, विशेष रूप से सिंगापुर और मलेशिया का पोर्ट क्लांग, पोत प्रसंस्करण गति के लिये वैश्विक मानक स्थापित करते हैं, जिसका भारत वर्तमान में अनुसरण कर रहा है।
- भारत में उच्च टर्नअराउंड टाइम (TRT) प्रायः ‘प्री-बर्थिंग’ विलंब के कारण होता है, जबकि दक्षिण-पूर्व एशियाई बंदरगाह उन्नत स्वचालित स्टैकिंग और AI-आधारित शेड्यूलिंग का उपयोग कर जहाज़ों को एक दिन से भी कम समय में निपटाते हैं।
- वैश्विक नौ-परिवहन बेड़े की अपर्याप्तता और प्रतिस्पर्द्धात्मकता: यद्यपि भारत अपने व्यापार का लगभग 95% परिमाण की दृष्टि से और 70% मूल्य के हिसाब से समुद्री मार्गों से करता है, फिर भी वैश्विक मर्चेंट फ्लीट में भारत की हिस्सेदारी केवल लगभग 1.2% है। इसके अतिरिक्त, कई जहाज़ पुराने हो चुके हैं, जिससे विदेशी ध्वज वाले जहाज़ों पर निर्भरता कम करने और भारी वार्षिक भाड़े के भुगतान को घटाने की क्षमता सीमित रहती है।
- भारत को शिपिंग सेवाओं के लिये विदेशी कंपनियों को प्रतिवर्ष लगभग 75 बिलियन डॉलर का भुगतान करना पड़ता है।
- पर्यावरण संधारणीयता संबंधी चुनौतियाँ: भारत की तटरेखा बढ़ते जलवायु जोखिमों का सामना कर रही है, तटरेखा का 33.6% भाग अपरदन के प्रति सुभेद्य है, जबकि बंदरगाह चक्रवातों और समुद्र स्तर में वृद्धि से बढ़ते खतरों का सामना कर रहे हैं।
- इसके अलावा, समुद्री उत्सर्जन एक चिंता का विषय बना हुआ है, जिसमें नौ-परिवहन तटीय प्रदूषण में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
- हालाँकि ग्रीन टग ट्रांज़िशन प्रोग्राम और ग्रीन शिपिंग कॉरिडोर जैसी पहलें मौजूद हैं, लेकिन न्यूनतम कार्बन वाले ईंधन का बड़े पैमाने पर अंगीकरण तथा बंदरगाहों का विद्युतीकरण अभी भी शुरुआती चरणों में है।
- अंतर्देशीय जलमार्गों का कमज़ोर एकीकरण: अंतर्देशीय जल परिवहन में वृद्धि के बावजूद, जो वर्ष 2014 में 18 मिलियन टन से बढ़कर वर्ष 2024 में 145 मिलियन टन से अधिक हो गया है, कुल माल ढुलाई में इसकी हिस्सेदारी कम बनी हुई है।
- लास्ट-माइल कनेक्टिविटी की कमी और अपर्याप्त रूप से विकसित टर्मिनल सड़क परिवहन के कम लागत एवं कम उत्सर्जन वाले विकल्प के रूप में इसकी संभावनाओं को सीमित करते हैं।
- हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा: भारत को स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति के तहत बाह्य क्षेत्रीय शक्तियों, विशेष रूप से चीन द्वारा विस्तारित नौसैनिक उपस्थिति के कारण बढ़ते रणनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
- चीन ने हिंद महासागर में बंदरगाहों और दोहरे उपयोग वाली सुविधाओं का एक नेटवर्क विकसित किया है या उस तक अभिगम्यता प्राप्त की है, जिसमें ग्वादर (पाकिस्तान), हंबनटोटा (श्रीलंका), क्यौकप्यू (म्याँमार), जिबूती (हॉर्न ऑफ अफ्रीका) तथा मालदीव और सेशेल्स में बंदरगाह तक अभिगम्यता शामिल है।
भारत के समुद्री क्षेत्र को मज़बूत करने के लिये किन सुधारों की आवश्यकता है?
- बंदरगाह अवसंरचना और क्षमता का उन्नयन: भारत को बड़े कंटेनर जहाज़ों को समायोजित करने के लिये डीप ड्राफ्ट वाले बंदरगाहों, स्वचालित टर्मिनलों और आधुनिक कार्गो-हैंडलिंग प्रणालियों के विकास में तेज़ी लानी चाहिये।
- सागरमाला 2.0 के तहत परियोजनाओं को त्वरित करने तथा ड्रेजिंग, मशीनीकरण एवं बंदरगाह-आधारित औद्योगिक समूहों को प्राथमिकता देने से विदेशी ट्रांसशिपमेंट हब पर निर्भरता कम होगी और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ेगी।
- बहुआयामी कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स एकीकरण: लॉजिस्टिक्स लागत को और कम करने के लिये, बंदरगाहों का रेल, सड़क एवं अंतर्देशीय जलमार्गों के साथ निर्बाध एकीकरण आवश्यक है।
- डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC), मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क और डिजिटल कार्गो ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म का विस्तार करने से लास्ट-माइल कनेक्टिविटी में सुधार होगा तथा पारगमन समय एवं लागत में कमी आएगी।
- भारत के व्यापारिक बेड़े और जहाज़ निर्माण क्षमता का विस्तार: भारत को वित्तीय सहायता, दीर्घकालिक ऋण, कर प्रोत्साहन और सुनिश्चित माल ढुलाई सहायता के माध्यम से घरेलू जहाज़ निर्माण एवं जहाज़ स्वामित्व को प्रोत्साहित करके वैश्विक नौ-परिवहन बेड़े में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी चाहिये।
- 70,000 करोड़ रुपये के जहाज़ निर्माण और मरम्मत पैकेज को प्रभावी ढंग से लागू करने से विदेशी जहाज़ों पर निर्भरता कम हो सकती है तथा माल ढुलाई से होने वाली आय देश के भीतर ही बनी रह सकती है।
- समुद्री सुरक्षा और नौसैनिक तैयारियों को मज़बूत करना: तटीय रडार नेटवर्क, उपग्रह निगरानी और UAV के माध्यम से उन्नत निगरानी, साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र में नौसैनिक उपस्थिति में वृद्धि, आवश्यक है।
- सूचना संलयन केंद्र-IOR जैसी संस्थाओं को मज़बूत करना और समुद्री साझेदारी का विस्तार करना सुरक्षित समुद्री संचार मार्गों (SLOC) को सुनिश्चित करेगा।
- हरित और संधारणीय नौ-परिवहन को बढ़ावा: हरित ईंधन की ओर संक्रमण को गति देना, बंदरगाहों का विद्युतीकरण करना और कम उत्सर्जन वाले जहाज़ों का उपयोग करना महत्त्वपूर्ण है।
- ग्रीन टग ट्रांज़िशन प्रोग्राम जैसी पहलों को बढ़ावा देना, ग्रीन हाइड्रोजन कॉरिडोर का विस्तार और स्वच्छ जहाज़ प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहन देना भारत के समुद्री विकास को जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप बनाएगा।
- अंतर्देशीय जलमार्गों और तटीय नौ-परिवहन को बढ़ावा देना: राष्ट्रीय जलमार्गों पर नौगम्यता, टर्मिनल अधोसंरचना और माल ढुलाई में सुधार से लॉजिस्टिक्स लागत में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।
- अंतर्देशीय जलमार्गों को तटीय नौ-परिवहन और रेल नेटवर्क के साथ एकीकृत करने से अधिक कुशल बहुआयामी परिवहन पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होगा।
- समुद्री कौशल विकास और नवाचार को सुदृढ़ करना: विशेष रूप से जहाज़ डिजाइन, समुद्री इंजीनियरिंग, साइबर सुरक्षा एवं स्वायत्त नौवहन जैसे क्षेत्रों में समुद्री शिक्षा, अनुसंधान एवं विकास तथा उन्नत कौशल प्रशिक्षण में केंद्रीकृत निवेश आवश्यक है।
- उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना और सार्वजनिक-निजी भागीदारी कौशल की कमी को दूर कर सकती है।
- शासन व्यवस्था में सुधार और व्यापार सुगमता: नियामक अनुमोदनों को सुव्यवस्थित करना, मंत्रालयों में कानूनों का सामंजस्य स्थापित करना तथा बंदरगाह और सीमा शुल्क प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण करना विलंब को कम कर सकता है।
- केंद्र और राज्य के अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय से परियोजना क्रियान्वयन और निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।
- क्षेत्रीय और वैश्विक समुद्री सहयोग को दृढ करना: भारत को समुद्री सहयोग को मज़बूत करने, सामान्य मानक विकसित करने तथा नौवहन की स्वतंत्रता को बढ़ावा देने के लिये IORA, BIMSTEC और क्वाड जैसे मंचों का लाभ उठाना चाहिये।
- रणनीतिक साझेदारियाँ भू-राजनीतिक व्यवधानों के प्रति समुत्थानशीलता को बढ़ा सकती हैं।
- तटीय और पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास को संतुलित करना: जलवायु-अनुकूल अधोसंरचना को लागू करना, तटीय पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करना और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को लागू करना समुद्री विकास की दीर्घकालिक संधारणीयता सुनिश्चित करने के साथ-साथ तटीय समुदायों की आजीविका का समर्थन करने के लिये आवश्यक है।
निष्कर्ष:
वर्ष 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की भारत की महत्त्वाकांक्षा बहुत हद तक अपने समुद्री क्षेत्र को सशक्त करने पर निर्भर करती है, जो देश के 90% से अधिक व्यापार का वाहक है। आधुनिक बंदरगाह, कुशल लॉजिस्टिक्स व्यवस्था और मज़बूत समुद्री सुरक्षा निर्यात-आधारित विकास को बढ़ावा देने के लिये आवश्यक हैं। सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के साथ समुद्री विकास को संरेखित करना, विशेष रूप से सतत अवसंरचना और जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई, दीर्घकालिक संधारणीयता सुनिश्चित करेगा। हरित नौ-परिवहन, बंदरगाह आधुनिकीकरण और कौशल विकास में निवेश भारत को एक वैश्विक समुद्री केंद्र में बदल सकता है। ये सभी प्रयास मिलकर भारत को एक सुरक्षित, संधारणीय और प्रतिस्पर्द्धी समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित कर सकते हैं।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न प्रश्न. भारत की 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की महत्त्वाकांक्षा इसके समुद्री क्षेत्र की सुदृढ़ता से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में बंदरगाहों, नौ-परिवहन और समुद्री अवसंरचना की भूमिका का विश्लेषण कीजिये। |
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. भारत के लिये समुद्री क्षेत्र क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह भारत के कुल व्यापार का 90% से अधिक संभालता है और आर्थिक विकास को समर्थन प्रदान करता है।
प्रश्न 2. वर्ष 2047 के लिये भारत का समुद्री क्षेत्र से संबंधित दृष्टिकोण क्या है?
एक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी, सतत और सुरक्षित समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना।
प्रश्न 3. समुद्री क्षेत्र 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था को किस प्रकार सहयोग प्रदान करता है?
व्यापार दक्षता, निर्यात और वैश्विक संपर्क को बढ़ावा देकर।
प्रश्न 4. समुद्री विकास में संधारणीयता की क्या भूमिका है?
इससे हरित बंदरगाहों, न्यूनतम उत्सर्जन और दीर्घकालिक तटीय समुत्थानशीलन को सुनिश्चित होता है।
प्रश्न 5. भारत के लिये समुद्री सुरक्षा इतनी महत्त्वपूर्ण क्यों है?
यह समुद्री मार्गों, व्यापार मार्गों और राष्ट्रीय रणनीतिक हितों की रक्षा करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. 'क्षेत्रीय सहयोग के लिये हिंद महासागर रिम संघ [इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन फॉर रीजनल कोऑपरेशन (IOR-ARC)]' के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2015)
- इसकी स्थापना अत्यंत हाल ही में समुद्री डकैती की घटनाओं और तेल अधिप्लाव (आयल स्पिल्स) की दुर्घटनाओं के प्रतिक्रियास्वरूप की गई है।
- यह एक ऐसी मैत्री है जो केवल समुद्री सुरक्षा हेतु है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (d)
प्रश्न 2. ब्लू कार्बन क्या है? (2021)
(a) महासागरों और तटीय पारिस्थितिक तंत्रों द्वारा प्रगृहीत कार्बन
(b) वन जैव मात्रा (बायोमास) और कृषि मृदा में प्रच्छादित कार्बन
(c) पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस में अंतर्विष्ट कार्बन
(d) वायुमंडल में विद्यमान कार्बन
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न 1. 'नीली क्रांति' को परिभाषित करते हुए भारत में मत्स्यपालन की समस्याओं और रणनीतियों को समझाइये। (2018)
