भारतीय कृषि में प्राकृतिक खेती का उदय: संरचनात्मक संक्रमण | 22 Jan 2026

यह एडिटोरियल 20/01/2026 को द हिंदू बिज़नेस लाइन में प्रकाशित “Designing the transition to natural farming” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। इस संपादकीय में बढ़ती इनपुट लागत, मृदा क्षरण तथा जलवायु संबंधी दबावों की पृष्ठभूमि में प्राकृतिक कृषि की ओर भारत के संक्रमण का परीक्षण किया गया है। इसमें प्राकृतिक खेती को आर्थिक रूप से व्यवहार्य और व्यापक बनाने के लिये आवश्यक नीतिगत पहलों, संरचनात्मक चुनौतियों एवं सुधारात्मक मार्गों का भी विश्लेषण किया गया है।

प्रिलिम्स के लिये: प्राकृतिक खेती (NF), हरित क्रांति, प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन, कृषि विज्ञान केंद्र, कृषक  कल्याण संगठन (FPO) 

मेन्स के लिये: प्राकृतिक खेती की आवश्यकता, प्राकृतिक कृषि हेतु उठाए गए कदम, प्रमुख मुद्दे और परिवर्तन को सुगम बनाने के उपाय।

बढ़ती कृषि आदान लागत, जलवायु की अस्थिरता और कृषि संकट की पृष्ठभूमि में भारत के खेतों में एक मौन किंतु महत्त्वपूर्ण परिवर्तन परिलक्षित हो रहा है। आंध्र प्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश तक, प्राकृतिक खेती के साथ प्रयोग कर रहे किसान हरित क्रांति को गति देने वाले रासायनिक-आधारित विकास मॉडल को चुनौती दे रहे हैं। यह परिवर्तन किसी अतीत-मुखी स्मृतिलोप का परिणाम नहीं, बल्कि पारिस्थितिक अनुकूलन, मृदा संप्रभुता तथा आय स्थिरता की व्यावहारिक खोज को प्रतिबिंबित करता है। अब विमर्श इस प्रश्न तक सीमित नहीं रह गया है कि कृषि में परिवर्तन आवश्यक है या नहीं, बल्कि यह इस बात पर केंद्रित है कि “यह परिवर्तन कितनी तात्कालिकता के साथ और किस पैमाने पर किया जाना चाहिये।”

प्राकृतिक खेती क्या है? 

  • परिचय: प्राकृतिक खेती (NF) एक रसायन-मुक्त, न्यूनतम हस्तक्षेप वाली कृषि प्रणाली है जो प्रकृति की स्वाभाविक प्रक्रियाओं के साथ सामंजस्य में कार्य करती है, जिसमें कृत्रिम इनपुट, जुताई और रासायनिक निराई (खरपतवार नियंत्रण)  के स्थान पर जैव-विविधता, मृदा स्वास्थ्य और खेत-आधारित संसाधनों (जैसे: गोबर एवं गोमूत्र से बने जैव-इनपुट्स) के उपयोग के माध्यम से स्व-नियंत्रित एवं पारिस्थितिक कृषि तंत्र विकसित किया जाता है।  
    • प्राकृतिक खेती मृदा, जल, माइक्रोबायोम, वनस्पति, जीव-जंतुओं, जलवायु और मानवीय आवश्यकताओं के बीच प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की परस्पर निर्भरता को समर्थन प्रदान करता है।
    • दार्शनिक आधार: प्राकृतिक खेती के सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रवर्तक जापानी कृषक मसानोबु फुकुओका हैं, जिन्होंने अपनी कृति ‘The One-Straw Revolution’ में इसके 4 मूल सिद्धांत प्रतिपादित किये—  
      • शुन्य जुताई (No Tillage): इस प्रक्रिया में मृदा को न जोता जाता है और न ही पलटा जाता है, जिससे मृदा संरचना संरक्षित रहती है तथा सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बनी रहती है।
      • शुन्य रासायनिक उर्वरक (No Chemical Fertilizers): पोषक तत्त्व प्रकृति द्वारा प्रदान किये जाते हैं (सूक्ष्मजीवों, केंचुओं और कार्बनिक पदार्थों द्वारा), न कि कृत्रिम रसायनों द्वारा।
      • जुताई या शाकनाशकों से रहित निराई (No Weeding by Tillage/Herbicides): खरपतवारों का जड़ से उन्मूलन करने के बजाय प्राकृतिक रूप से मल्चिंग द्वारा नियंत्रित किया जाता है, क्योंकि ये मृदा के संतुलन में भूमिका निभाते हैं।
      • रासायनिक कीटनाशकों का शून्य प्रयोग (No Chemical Pesticides): कीटों का नियंत्रण पारिस्थितिक संतुलन और प्राकृतिक परभक्षियों द्वारा किया जाता है, न कि पीड़कनाशी अथवा विष द्वारा।
  • भारत में प्राकृतिक कृषि - 'शून्य बजट प्राकृतिक कृषि' (ZBNF): भारत में, सुभाष पालेकर द्वारा प्रोत्साहित शून्य बजट प्राकृतिक कृषि (ZBNF) के रूप में प्राकृतिक कृषि का प्रचलन है। अब इसे राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन (NMNF) जैसी सरकारी पहलों के तहत प्रायः समर्थन प्राप्त होता है।
    • 'जीरो बजट' शब्द का तात्पर्य है— उत्पादन लागत का लगभग शून्य होना, क्योंकि किसानों को उर्वरक या कीटनाशक जैसे महंगे इनपुट खरीदने की आवश्यकता नहीं होती है।
  • प्राकृतिक खेती के घटक
    • बीज उपचार (बीजमृत): स्थानीय रूप से अनुकूलित स्वदेशी बीजों का उपयोग और बीजमृत जैसे प्राकृतिक फार्मूलेशन के साथ खेत में ही बीजों का उपचार करके बीजों की जीवन शक्ति को बढ़ाना तथा मृदा जनित रोगों से सुरक्षा प्रदान करना।
    • मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (घन जीवामृत): सूक्ष्मजीवों की गतिविधि, पोषक तत्त्वों की उपलब्धता और दीर्घकालिक मृदा उर्वरता में सुधार के लिये घन जीवामृत जैसे कृषि उत्पादों का प्रयोग।
    • वर्ष भर मृदा आवरण (आच्छादन–मल्चिंग): जीवित फसलों अथवा फसल अवशेषों द्वारा मृदा को निरंतर ढँके रखना, जिससे नमी संरक्षण, तापमान संतुलन, खरपतवार नियंत्रण तथा मृदा अपरदन की रोकथाम होती है।
    • मृदा सूक्ष्म-जलवायु प्रबंधन (वाफसा–मृदा वायुसंचार): प्राकृतिक सरंध्रता को बढ़ाने के लिये मृदा असंतुलन को न्यूनतम करना, बेहतर जड़ वृद्धि, नमी प्रतिधारण और फसल की सहिष्णुता बढ़ाने के लिये इष्टतम वायु-जल संतुलन सुनिश्चित करना।  
    • पादप स्वास्थ्य प्रबंधन: पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ करने, कीटों के प्रकोप को कम करने और बाह्य रासायनिक इनपुट पर निर्भरता को कम करने के लिये जैविक इनपुट एवं आवश्यकता-आधारित प्राकृतिक फॉर्मूलेशन का उपयोग। 
    • संसाधन दक्षता और आय संवर्द्धन: इनपुट लागत को कम करने, मृदा स्वास्थ्य में सुधार करने तथा सतत कृषि पद्धति से निवल कृषि आय को बढ़ाने के लिये प्राकृतिक कृषि सिद्धांतों का समग्र रूप से अंगीकरण। 

भारत को प्राकृतिक खेती की ओर अग्रसर होने के लिये कौन-से कारक प्रेरित करते हैं?

  • आर्थिक स्थिरता और किसानों की आय सुरक्षा: भारतीय कृषि वर्तमान में बाह्य इनपुट-आधारित उच्च लागत और निम्न प्रतिफल के दुष्चक्र में फँसी हुई है, जिसमें रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक एवं स्वामित्व वाले बीजों पर अत्यधिक निर्भरता है।
    • उदाहरण के लिये, औसतन चावल की खेती करने के लिये किसान रासायनिक इनपुट पर प्रति एकड़ 5,961 रुपये खर्च करते हैं, जबकि पूरी तरह से शून्य बजट प्राकृतिक खेती करने वाले किसान प्राकृतिक इनपुट पर प्रति एकड़ 846 रुपये खर्च करते हैं।
    • भारत में अधिकांश किसान (85% से अधिक) लघु एवं सीमांत किसान हैं, जो बढ़ती लागत और जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। प्राकृतिक खेती बाज़ार से खरीदे गए इनपुट और ऋण पर निर्भरता कम करके किसानों के लिये खेती में प्रवेश की बाधाओं को कम करती है।
  • मृदा स्वास्थ्य और दीर्घकालिक उत्पादकता: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के एक अध्ययन में, 29 राज्यों के 620 ज़िलों से लिये गए 2.54 लाख मृदा नमूनों के विश्लेषण के आधार पर यह संकेत मिलता है कि अवैज्ञानिक उर्वरक उपयोग एवं जलवायु परिवर्तन भारत की कृषि योग्य मृदा में जैविक कार्बन के स्तर को कम कर रहे हैं। 
    • प्राकृतिक खेती जैविक कार्बन संवर्द्धन और सूक्ष्मजीव सक्रियण के माध्यम से मृदा की जैविकता को पुनःस्थापित करती है, जिससे पोषक तत्त्वों का चक्रण एवं मृदा की संरचना में सुधार होता है।
  • जल संरक्षण और जलवायु अनुकूलन: पारंपरिक कृषि में जल की अत्यधिक खपत होती है तथा यह अनियमित मानसून एवं बढ़ते तापमान के प्रति संवेदनशील है।
    • साथ ही भारत में पहले से ही लगभग 60 करोड़ लोग उच्च से लेकर अत्यधिक जल संकट का सामना कर रहे हैं।
    • मृदा में मल्चिंग और बेहतर वायु संचार जैसी प्राकृतिक कृषि पद्धतियाँ वाष्पीकरण से होने वाले नुकसान को कम करती हैं तथा नमी बनाए रखने की क्षमता को बढ़ाती हैं।
    • इससे सिंचाई की मांग कम होती है, साथ ही फसलों की अनावृष्टि और भूमंडलीय तापवृद्धि के तनाव के प्रति सहिष्णुता में सुधार होता है। 
      • जैसे-जैसे जलवायु संबंधी जोखिम बढ़ते जा रहे हैं, इस तरह की कृषि-पारिस्थितिकीय सहिष्णुता एक विकल्प के बजाय एक आवश्यकता बन गई है।
  • पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता का पुनरुद्धार: रासायनिक अपवाह भूजल को संदूषित करता है, पारिस्थितिक तंत्र को क्षति पहुँचाता है तथा लाभकारी कीटों की आबादी को बाधित करता है।
    • प्राकृतिक खेती में कृत्रिम रसायनों का उपयोग कम से कम होता है, जिससे प्राकृतिक परभक्षियों, परागणकर्त्ताओं तथा मृदा के जीवों का पुनरुत्थान संभव होता है। 
    • इससे पारिस्थितिक संतुलन पुनः स्थापित होता है तथा दीर्घकालिक कीटों का दबाव कम होता है। पर्यावरणीय दृष्टि से, यह परिवर्तन उन पारिस्थितिक लागतों को आंतरिक रूप से समाहित करने में सहायक सिद्ध होता है, जिन्हें पहले रासायनिक कृषि के अंतर्गत बाह्य रूप से वहन किया जाता था।
  • मानव स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा: किसान सीधे तौर पर खतरनाक कृषि रसायनों के संपर्क में आते हैं, जबकि उपभोक्ताओं को भोजन और जल में कीटनाशक अवशेषों से जोखिम का सामना करना पड़ता है। 
    • प्राकृतिक खेती खाद्य शृंखला में रासायनिक जोखिम को कम करती है, जिससे व्यावसायिक स्वास्थ्य जोखिम और सार्वजनिक स्वास्थ्य बोझ कम होते हैं। 
    • स्वच्छ खाद्य प्रणालियाँ सुरक्षित और पौष्टिक उत्पादों के लिये बढ़ती उपभोक्ता मांग (विशेष रूप से यूरोपीय संघ के बाज़ार में) के अनुरूप भी हैं।
  • संस्थागत और राजकोषीय विवेकशीलता: भारत में उर्वरक और कीटनाशी सब्सिडी राजकोष पर भारी बोझ डालती हैं और अकुशल इनपुट उपयोग को प्रोत्साहित करती हैं। उर्वरक सब्सिडी खाद्य सब्सिडी के बाद दूसरी सबसे बड़ी सब्सिडी है।
    • प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने से रसायनों के बजाय ज्ञान, प्रशिक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर ध्यान केंद्रित करके सब्सिडी व्यय को धीरे-धीरे युक्तिसंगत बनाया जा सकता है। 
    • इससे खाद्य सुरक्षा को प्रभावित किये बिना सार्वजनिक व्यय की दक्षता में सुधार होता है। समय के साथ, यह कृषि नीति को पारिस्थितिक एवं वित्तीय स्थिरता के अनुरूप बनाता है।
  • सतत विकास और भविष्य की खाद्य प्रणालियों के साथ सामंजस्य: जलवायु परिवर्तन से प्रभावित भविष्य में भारत को खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय सीमाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है।
    • प्राकृतिक खेती में उच्च पूंजी निवेश की आवश्यकता के बिना सतत कृषि, जलवायु परिवर्तन से निपटने और भूमि पुनर्स्थापन के लक्ष्यों में योगदान मिलता है।
    • यह दोहन आधारित उत्पादन मॉडलों के बजाय पुनर्योजी खाद्य प्रणालियों की ओर एक संक्रमण का प्रतिनिधित्व करता है। रणनीतिक रूप से, यह भविष्य के लिये तैयार कृषि अर्थव्यवस्था के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाता है।

भारत ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिये वर्तमान में कौन-कौन से उपाय किये हैं?

  • संस्थागत मिशन मोड: प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (NMNF): यह 'मिशन मोड' प्राथमिकता, एक समर्पित प्रबंधन संरचना बनाकर रासायनिक-गहन कृषि से रासायनिक-मुक्त कृषि की ओर परिवर्तन को प्रभावी ढंग से संस्थागत रूप देती है जो प्रोटोकॉल को मानकीकृत करती है तथा ज़िलों को प्रत्यक्ष वित्त पोषण प्रवाह सुनिश्चित करती है। 
    • वर्ष 2024 के उत्तरार्द्ध में स्वीकृत इस मिशन के लिये ₹2,481 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसका लक्ष्य 7.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 1 करोड़ किसानों को कवर करना है तथा संक्रमणकालीन लागतों को कम करने के लिये प्रति एकड़/वर्ष ₹4,000 का प्रोत्साहन प्रदान करना है।
  • राजकोषीय संघवाद और सब्सिडी सुधार - PM-PRANAM योजना: यह योजना राज्यों को रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने के लिये प्रोत्साहित करती है, जिसके तहत उन्हें सब्सिडी बचत का 50% केंद्रीय अनुदान के रूप में रखने की अनुमति दी जाती है, जबकि 70% जैविक और जैव-उर्वरक अवसंरचना के निर्माण के लिये निर्धारित किया जाता है। 
    • सब्सिडी की बचत को राजकोषीय पुरस्कार में परिवर्तित करके, यह प्रतिस्पर्द्धी संघीय संरचना के भीतर पारिस्थितिक परिणामों को समाहित करता है, जिससे राज्यों को प्राकृतिक खेती एवं संतुलित पोषक तत्त्वों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिये प्रोत्साहन मिलता है।
  • आपूर्ति शृंखला अवसंरचना – जैव-इनपुट संसाधन केंद्र (BRC): जीवामृत जैसे जैव-इनपुट तैयार करने में श्रम और समय की बाधाओं को दूर करने के लिये, सरकार BRC को ग्राम-स्तरीय सूक्ष्म उद्यमों के रूप में बढ़ावा दे रही है, जो मानकीकृत, उपयोग के लिये तैयार प्राकृतिक इनपुट की आपूर्ति करते हैं। 
    • इससे किसानों की मेहनत कम होती है तथा स्वयं सहायता समूहों तथा ग्रामीण युवाओं के लिये उद्यमिता के अवसरों का सृजन होता है। सत्र 2024-25 के रोडमैप में 15,000 क्लस्टरों को सेवा प्रदान करने के लिये 10,000 जैव संसाधन केंद्र (BRC) स्थापित करने का लक्ष्य है, जिससे 1 करोड़ से अधिक किसानों को जैव-उपकरणों की विश्वसनीय उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।
  • पर्यावरण-भौगोलिक गलियारा– अर्थ गंगा पहल: अर्थ गंगा परियोजना के तहत, गंगा नदी के किनारे एक रसायन-मुक्त प्राकृतिक कृषि गलियारा विकसित किया जा रहा है, ताकि कृषि रसायनों के अपवाह को कम किया जा सके तथा नदी के पुनर्जीवन को सतत कृषि से जोड़ा जा सके। 
    • गंगा-ब्रांडेड जैविक पट्टी को बढ़ावा देकर, यह पहल किसानों के लिये उच्च गुणवत्ता वाले बाज़ार संरक्षित करने हेतु सांस्कृतिक मूल्यों का लाभ उठाती है। इस पहल में नदी तट के किनारे 10 किलोमीटर की पट्टी में प्राकृतिक खेती को प्राथमिकता दी गई है, जिसमें जल संरक्षण को आजीविका के साथ एकीकृत किया गया है।
  • प्रमाणन और बाज़ार विश्वास: डिजिटल पोर्टल एवं ब्रांडिंग: विश्वसनीयता और अनुरेखण से जुड़ी चुनौतियों के समाधान हेतु सरकार ने जैविक खेती पोर्टल (Jaivik Kheti), सहभागीता प्रतिभूति प्रणाली (PGS) तथा परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) के माध्यम से प्रमाणन प्रक्रियाओं को सरल बनाया है, जिससे छोटे किसान महंगे तृतीय-पक्ष ऑडिट के बिना प्राकृतिक उत्पादों को प्रमाणित कर सकते हैं। 
    • यह डिजिटल, क्लस्टर-आधारित मॉडल किसानों को एक एकीकृत बाज़ार में एकत्रित करता है, जिससे उन्हें बिचौलियों को दरकिनार करते हुए बेहतर खरीदारों तक पहुँचने में सहायता मिलती है। वर्तमान में पोर्टल पर 6 लाख से अधिक किसान पंजीकृत हैं, जबकि NMNF के अंतर्गत प्रस्तावित ‘सिंगल नेशनल ब्रांड’ का उद्देश्य 15,000 क्लस्टरों में गुणवत्ता का मानकीकरण करना है।
  • शैक्षणिक एकीकरण और लिंग-आधारित सेवाओं का विस्तार: ICAR ने प्राकृतिक खेती को स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में एकीकृत किया है, इसे पारंपरिक प्रथाओं से वैज्ञानिक रूप से मान्य शिक्षण पद्धति में परिवर्तित किया है, जिसके लिये KVK में अनुसंधान एवं क्षेत्र परीक्षणों के माध्यम से विस्तार क्षमता को मज़बूत किया गया है। 
    • इसके पूरक के रूप में, कृषि सखी कन्वर्जेंस प्रोग्राम (KSCP) प्रशिक्षित महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्यों को अर्द्ध-विस्तार कार्यकर्ताओं के रूप में तैनात करता है, जो व्यवहारिक परिवर्तन के लिये सहकर्मी नेटवर्क का लाभ उठाते हैं। 
    • लखपति दीदी की पहल से जुड़ी, 70,000 से अधिक कृषि सखियाँ (अगस्त 2025 तक) अब अंतिम छोर तक मार्गदर्शन, सामुदायिक स्वामित्व एवं आजीविका सृजन सुनिश्चित करती हैं।

भारत के प्राकृतिक कृषि की ओर संक्रमण से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं? 

  • ‘उपज-दण्ड’ अथवा संक्रमणकालीन गिरावट (Yield Penalty): प्राकृतिक खेती की ओर संक्रमण के प्रारंभिक वर्षों में मृदा के जैविक तंत्र के पुनर्निर्माण के कारण फसल उपज में तीव्र गिरावट देखी जाती है, हालाँकि इसका स्तर क्षेत्र-विशेष पर निर्भर करता है।
    • यह ‘संक्रमणकालीन गिरावट’ सीमित संसाधनों पर निर्भर छोटे किसानों के लिये गंभीर तरलता संकट उत्पन्न करती है। एक भी मौसम की कम उपज वहन न कर पाने के कारण अनेक किसान मृदा की उर्वरता स्थिर होने से पहले ही इस पद्धति को त्याग देते हैं।
  • श्रम प्रधानता और इनपुट-जनित श्रमभार: जीवामृत जैसे जैविक इनपुट तैयार करने और खरपतवारों को हाथ से नियंत्रित करने सहित प्राकृतिक कृषि पद्धतियाँ पारंपरिक इनपुट-आधारित प्रणालियों की तुलना में अधिक श्रम-प्रधान होती हैं। 
    • इस तरह की प्रथाओं में प्रायः शारीरिक श्रम पर अधिक निर्भरता की आवश्यकता होती है, विशेषकर जहाँ मशीनीकरण सीमित है, जो श्रम की कमी एवं बढ़ती मजदूरी दरों का सामना कर रहे क्षेत्रों में किसानों के लिये एक चुनौती बन सकता है। 
    • ये व्यापक रूप से अंगीकरण में बाधा उत्पन्न करते हैं, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ कृषि परिवार गैर-कृषि आय पर निर्भर हैं या समय की कमी से जूझ रहे हैं।
  • 'देसी मवेशी' की उपलब्धता से जुड़ा संकट: प्राकृतिक खेती की मूल रूपरेखा देशी गायों के गोबर और गोमूत्र पर आधारित है, परंतु कृषि के यंत्रीकरण से नर पशुओं की संख्या में भारी गिरावट आई है। गैर-डेयरी किसानों के लिये ताज़े जैव-इनपुटों की उपलब्धता एक व्यावहारिक चुनौती बन जाती है।
    • उदाहरण के लिये, 20वीं पशुधन गणना के अनुसार देशी पशुओं की कुल संख्या में लगभग 6% की गिरावट दर्ज की गई है।
    • इससे एक विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न होती है, जहाँ आत्मनिर्भर मानी जाने वाली खेती पद्धति, पशुहीन किसानों को जैव-इनपुट खरीदने हेतु विवश कर देती है, जिससे एक ऐसी लागत संरचना पुनः शुरू हो जाती है जिससे वे बचने की कोशिश कर रहे थे।
  • असममित राजकोषीय प्रोत्साहन: नीतिगत स्तर पर एक स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है, जहाँ सरकार मामूली धनराशि के साथ प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देती है, जबकि साथ ही साथ भारी सब्सिडी के साथ रासायनिक खेती का समर्थन करती है, प्रभावी रूप से किसानों को रासायनिक निर्भरता बनाए रखने के लिये भुगतान करती है।   
    • वर्ष 2024–25 में रासायनिक उर्वरक सब्सिडी लगभग ₹1.64 लाख करोड़ तक पहुँच चुकी है। यह असंतुलित वित्तीय ढाँचा सस्ते यूरिया को अत्यधिक सुलभ बनाता है तथा प्राकृतिक खेती को उसके दीर्घकालिक पारिस्थितिक लाभों के बावजूद आर्थिक रूप से कम आकर्षक बना देता है।
  • प्रमाणीकरण और अनुरेखण (Traceability) की कमी: वर्तमान बाज़ार में प्राकृतिक उत्पादों के लिये एक मज़बूत, व्यापक सत्यापन प्रणाली का अभाव है, जिसके कारण किसानों को उच्च गुणवत्ता वाली रसायन-मुक्त फसलों को सामान्य मंडी कीमतों पर बेचने के लिये विवश होना पड़ता है, क्योंकि वे दूरस्थ शहरी उपभोक्ताओं को उनकी 'प्राकृतिक' स्थिति सिद्ध नहीं कर सकते हैं। 
    • सहभागीता प्रतिभूति प्रणालियों (PGS) पर निर्भरता सामाजिक रूप से समावेशी है, किंतु व्यावसायिक रूप से कमज़ोर है, क्योंकि इसमें प्रमुख खुदरा शृंखलाओं और निर्यातकों द्वारा आवश्यक तृतीय-पक्ष प्रमाणन के ब्रांड विश्वास का अभाव है। 
  • वैज्ञानिक सत्यापन का अभाव: पारंपरिक ज्ञान और औपचारिक कृषि विज्ञान के बीच लगातार अंतर्विरोध बना रहता है, क्योंकि विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में कठोर, दीर्घकालिक सहकर्मी-समीक्षित अध्ययनों की कमी से विस्तार अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों के बीच संदेह उत्पन्न होता है। 
    • प्रत्येक फसल-क्षेत्र संयोजन के लिये विश्वविद्यालयों द्वारा मान्य ‘प्रथाओं के पैकेज’ (Package of Practices) के अभाव में, राज्य कृषि विभाग प्राकृतिक खेती को मुख्यधारा की रणनीति के रूप में आक्रामक रूप से बढ़ावा देने में संकोच करते हैं।
  • बाज़ार अवशोषण और मूल्य जोखिम अनिश्चितता: प्राकृतिक खेती से इनपुट लागत में कमी के बावजूद किसान ऐसे बाज़ारों के अधीन रहते हैं जहाँ मूल्य निर्धारण परंपरागत उत्पादन मानकों से होता है।
    • सुनिश्चित खरीद या भिन्न मूल्य प्रीमियम के अभाव में समान या थोड़ी कम उपज भी आय जोखिम में परिवर्तित हो जाती है।
    • यह कमज़ोर बाज़ार संकेत किसानों को संक्रमण से हतोत्साहित करता है, विशेषतः अनाज और शीघ्र नष्ट होने वाली फसलों में जहाँ MSP या अनुबंध खेती मूल्य-निर्धारण को नियंत्रित करती है।
  • खाद्य असुरक्षा और पोषण संबंधी भेद्यता: यद्यपि प्राकृतिक खेती दीर्घकालिक संवहनीयता, लागत में कमी और मृदा के स्वास्थ्य के पुनः स्थापन का वादा करती है, लेकिन इसका संक्रमणकालीन चरण अल्पकालिक जोखिम उत्पन्न करता है जो भारत की मौजूदा खाद्य एवं पोषण संबंधी चुनौतियों के साथ गंभीर रूप से जुड़ा हुआ है।
    • विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति- 2025 के अनुसार, भारत की लगभग 12% आबादी (लगभग 172 मिलियन लोग) कुपोषण का शिकार हैं और लगभग 42.9% लोग बढ़ती खाद्य लागत के कारण स्वस्थ आहार वहन नहीं कर सकते हैं, जो खाद्य तक अभिगम्यता, वहनीयता और गुणवत्ता में गहन संरचनात्मक चुनौतियों को दर्शाता है। 
    • यह लगातार बनी रहने वाली खाद्य असुरक्षा प्राकृतिक खेती की ओर रुख करने वाले छोटे किसानों के लिये भेद्यता बढ़ाती है, क्योंकि उपज में मामूली गिरावट या बाज़ार की अनिश्चितताएँ भी परिवारों की पर्याप्त पोषण एवं आय प्राप्त करने की क्षमता को और खराब कर सकती हैं।

भारत में प्राकृतिक कृषि की ओर संक्रमण को सुगम बनाने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • उपज अंतर के लिये 'संक्रमण बीमा' को संस्थागत रूप देना: रूपांतरण चरण के दौरान उत्पादकता में तत्काल गिरावट से निपटने के लिये, राज्य को एक 'उपज घाटा बीमा' तंत्र तैयार करना चाहिये, जो किसानों को न केवल फसल खराब होने के लिये, बल्कि प्रारंभिक तीन वर्षों के दौरान पारंपरिक और प्राकृतिक उत्पादन के बीच विशिष्ट मात्रा के अंतर के लिये भी मुआवज़ा दे। 
    • यह वित्तीय जोखिम-न्यूनन साधन बाज़ार मूल्यों के स्थान पर क्षेत्रीय आधारभूत उपज से संबद्ध होना चाहिये, जिससे मृदा के जैविक तंत्र के पुनर्जीवन की अवधि में किसानों की आय में अस्थिरता न रहे। इस प्रकार संक्रमण काल को दीर्घकालिक पारिस्थितिक संपदा निर्माण के लिये राज्य-समर्थित आरंभिक चरण के रूप में देखा जा सकता है।
  • सूक्ष्म उद्यमों के माध्यम से जैव-उपकरण आपूर्ति शृंखलाओं का विकेंद्रीकरण: केवल किसान-स्तर के उत्पादन पर निर्भर रहने के बजाय, पारिस्थितिकी तंत्र को पेशेवर 'जैव-इनपुट संसाधन केंद्रों' (BRC) के एक नेटवर्क की आवश्यकता है, जो महिला समूहों या ग्रामीण युवाओं द्वारा संचालित ग्राम-स्तरीय सूक्ष्म उद्यमों के रूप में कार्य करते हैं।
    • इस व्यवसायीकरण से जीवामृत और बीजामृत जैसे इनपुट के लिये गुणवत्ता का मानकीकरण (pH और सूक्ष्मजीव घनत्व) सुनिश्चित होता है, जिससे व्यक्तिगत किसानों पर श्रम का बोझ कम होता है तथा एक विश्वसनीय, जस्ट-इन-टाइम आपूर्ति शृंखला का निर्माण होता है, जो रासायनिक उर्वरक दुकानों की सुविधा की नकल करती है लेकिन स्थानीयकृत, चक्रीय अर्थव्यवस्था सिद्धांतों के साथ।
  • बाज़ार में व्यापक लाभ उठाने के लिये 'बायो-विलेज क्लस्टर' बनाना: विखंडन की समस्या को हल करने के लिये, संक्रमण रणनीति को अलग-थलग व्यक्तिगत अपनाने के बजाय सन्निहित 'प्राकृतिक कृषि क्षेत्रों' या बायो-विलेजों को अधिसूचित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।
    • ऐसे स्थानिक समूहों से बुवाई का समन्वय, पड़ोसी खेतों से रासायनिक प्रदूषण की रोकथाम और थोक आपूर्ति हेतु पैमाने की अर्थव्यवस्थाएँ विकसित होंगी। इससे किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को एक सत्यापित रासायन-मुक्त क्षेत्रीय ब्रांड के रूप में बड़े खुदरा विक्रेताओं से मोलभाव करने की क्षमता प्राप्त होगी।
  • 'ब्लॉकचेन-सक्षम ट्रेसिबिलिटी' के साथ विश्वास को डिजिटाइज़ करना: महंगे और धीमे तृतीय-पक्ष प्रमाणीकरण प्रणालियों को दरकिनार करने के लिये, इस क्षेत्र को वितरित लेजर प्रौद्योगिकी पर आधारित 'सहभागिता प्रतिभूति प्रणाली (PGS) 2.0' की आवश्यकता है।
    • उपभोक्ताओं को क्यूआर कोड स्कैन करने और स्थानीय किसान समूहों द्वारा सहकर्मी-से-सहकर्मी सत्यापित कृषि इनपुट के अपरिवर्तनीय इतिहास को देखने की अनुमति देकर, यह प्रणाली संस्थागत प्रशासनिक को 'डिजिटल विश्वास' से प्रतिस्थापित कर देती है, जिससे छोटे किसानों के लिये अनुपालन लागत में काफी कमी आती है, जबकि 'ग्रीनवॉशिंग ' से सावधान शहरी उपभोक्ताओं को प्रीमियम बाज़ार आश्वासन प्रदान किया जाता है। 
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में 'हरित खरीद' को अनिवार्य बनाना: राज्य मध्याह्न भोजन और आँगनवाड़ियों के लिये एक निश्चित प्रतिशत उपज को विशेष रूप से स्थानीय प्राकृतिक कृषि समूहों से प्राप्त करने को  अनिवार्य करके 'प्रथम बाज़ार निर्माता' के रूप में कार्य कर सकता है।
    • इससे एक गारंटीकृत, गैर-अस्थिर मांग प्रवाह प्रणाली बनती है, जो किसानों को उनके संवेदनशील संक्रमणकालीन वर्षों के दौरान खुले बाज़ार के उतार-चढ़ाव से बचाती है, साथ ही साथ सार्वजनिक लाभार्थियों के लिये पोषण सुरक्षा में सुधार करती है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्यों एवं कृषि संधारणीयता के बीच का अंतर प्रभावी रूप से समाप्त हो जाता है।
  • कृषि विस्तार सेवाओं को 'किसान-वैज्ञानिक चक्र' में पुनर्गठित करना: वर्तमान शीर्ष-अनुप्रयुक्त प्रौद्योगिकी अंतरण मॉडल को 'सह-निर्माण प्रयोगशालाओं' द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना चाहिये, जहाँ कृषि विश्वविद्यालय केवल प्रयोगशाला तकनीकों को थोपने के बजाय पारंपरिक ज्ञान को मान्य करते हैं। 
    • 'चैंपियन फार्मर्स' को औपचारिक रूप से सहायक संकाय के रूप में मान्यता देकर तथा उनके अनुभवात्मक ज्ञान को आधिकारिक पाठ्यक्रम में संहिताबद्ध करके, यह प्रणाली 'प्रयोगशाला से भूमि तक' विश्वसनीयता के अंतर को समाप्त कर सकती है, यह सुनिश्चित करते हुए कि वैज्ञानिक अनुसंधान कृषि-जलवायु क्षेत्रों एवं कीट गतिशीलता की अति-स्थानीय वास्तविकताओं के प्रति उत्तरदायी है।

निष्कर्ष: 

प्राकृतिक खेती, इनपुट-प्रधान कृषि से हटकर एक पुनर्योजी, जलवायु-सहिष्णु तथा वित्तीय रूप से विवेकपूर्ण खाद्य प्रणाली की दिशा में एक रणनीतिक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती है। हालाँकि, इसकी सफलता संक्रमणकालीन चरण से जुड़े जोखिमों को कम करने, असममित सब्सिडी संरचनाओं को संतुलित करने तथा विश्वसनीय बाज़ारों और वैज्ञानिक सत्यापन के निर्माण पर निर्भर करती है।

मिशन-मोड में कार्यान्वयन, परिणाम-आधारित प्रोत्साहनों और संस्थागत विश्वास-निर्माण तंत्रों के माध्यम से प्राकृतिक खेती मृदा स्वास्थ्य को एक उत्पादक आर्थिक परिसंपत्ति में रूपांतरित कर सकती है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाये, तो यह कृषक आय सुरक्षा, पारिस्थितिक संवहनीयता और दीर्घकालिक खाद्य संप्रभुता— तीनों के बीच संतुलन स्थापित कर सकती है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

“प्राकृतिक खेती कोई वैचारिक विकल्प नहीं है, बल्कि भारत की इनपुट-प्रधान कृषि पद्धति का आर्थिक और पारिस्थितिक रूप से सही समाधान है।” हालिया नीतिगत पहलों और परिवर्तन की चुनौतियों के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिये।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. प्राकृतिक खेती का मूल उद्देश्य क्या है?
प्राकृतिक खेती का मूल उद्देश्य इनपुट लागत को कम करना तथा मृदा पारिस्थितिकी और कृषि की दीर्घकालिक धारणीयता को पुनर्स्थापित करना है।

प्रश्न 2. भारत में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने वाला प्रमुख मिशन कौन-सा है?
भारत में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिये ‘राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन’ (NMNF) संचालित किया जा रहा है।

प्रश्न 3. प्राकृतिक खेती को अपनाने में प्रमुख अल्पकालिक चुनौती क्या है?
संक्रमणकालीन चरण (Transition Phase) के दौरान प्रारंभिक उपज में गिरावट प्राकृतिक खेती के अंगीकरण की प्रमुख अल्पकालिक चुनौती मानी जाती है।

प्रश्न 4. प्राकृतिक खेती में मृदा जैविक कार्बन क्यों महत्त्वपूर्ण है?
मृदा जैविक कार्बन पोषक तत्त्वों के चक्रण, जल धारण क्षमता तथा जलवायु परिवर्तन सहिष्णुता को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रश्न 5. सरकार प्राकृतिक उत्पादों के लिये बाज़ार में विश्वास को किस प्रकार बढ़ावा देती है?
सरकार सहभागिता जैविक प्रतिभूति प्रणाली (PGS) तथा ‘जैविक खेती’ पोर्टल के माध्यम से प्राकृतिक उत्पादों के लिये बाज़ार में विश्वास को सुदृढ़ करती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. स्थायी कृषि (पर्माकल्चर), पारंपरिक रासायनिक कृषि से किस तरह भिन्न है? (2021) 

  1. स्थायी कृषि एकधान्य कृषि पद्धति को हतोत्साहित करती है, किंतु पारंपरिक रासायनिक कृषि में एकधान्य कृषि पद्धति की प्रधानता है। 
  2. पारंपरिक रासायनिक कृषि के कारण मृदा की लवणता में वृद्धि हो सकती है, किंतु इस तरह की परिघटना स्थायी कृषि में दृष्टिगोचर नहीं होती है। 
  3. पारंपरिक रासायनिक कृषि अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में आसानी से संभव है, किंतु ऐसे क्षेत्रों में स्थायी कृषि इतनी आसानी से संभव नहीं है।
  4. मल्च बनाने (मल्चिंग) की प्रथा स्थायी कृषि में काफी महत्त्वपूर्ण है, किंतु पारंपरिक रासायनिक कृषि में ऐसी प्रथा आवश्यक नहीं है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये-

(a)  1 और 3                    

(b)  1, 2 और 4

(c)  केवल 4                      

(d)  2 और 3  

उत्तर: (b)   


प्रश्न 2. निम्नलिखित कृषि पद्धतियों पर विचार कीजिये: (2012)

  1. समोच्च बाँध
  2. अनुपद सस्यन
  3. शून्य जुताई

वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में, उपर्युक्त में से कौन-सा/से मृदा में कार्बन प्रच्छादन/संग्रहण में सहायक है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 3

(c) 1, 2 और 3

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर: (b)